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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

क्या आप इरोम शर्मिला को जानते हैं?

इरोम शर्मिला


क्या आप इरोम शर्मिला को जानते हैं?

उनके घर का नाम चानू है जो मेरी छोटी बहन का भी हैं और इत्तेफाक से दोनों का चेहरा भी मिलता हैं। वे भारत के मणिपुर राज्य की रहनेवाली एक कवियत्री हैं। वो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पिछले ११ सालों से अनशन पर बैठी हैं। उसकी नाक में जबरन रबड़ की नाली डालकर तरल खाना खिलाया जाता हैं। उन्हें आये दिन गिरफ्तार करके जेल भेज दिया जाता हैं। एक दिन वे जेल से छूटकर सीधे दिल्ली राजघाट, गांधीजी की समाधि पर पहुच कर फफक कर रो पड़ती हैं। कहते हैं कि वो गाँधी का पुनर्जन्म हैं, उन्होंने ७ साल से आपनी माँ का चेहरा तक नहीं देखा हैं। कहीं पढ़ा था कि अगर आगे के कमरे में लाश पड़ी हो तो आप बगल के कमरे में चुप कैसे बैठ सकते हैं??

शर्मिला भी चुप कैसे रहती?

२, नवम्बर २०००, गुरवार की उस शाम में सब बदल गया, जब आतंकवादियों द्वारा किये गये एक विस्फोट की प्रतिक्रिया में असम रायफल्स के जवानों ने १० नागरिकों को  गोली मार दी। विडम्बना तो यह है कि जिन लोगों को गोली मरी गयी वे अगले दिन एक शांति रैली निकालने कि तैयारी में लगे हुये थे...

भारत का स्विटजरलैंड कहे जाने वाले मणिपुर में मानवाधिकारों सरेआम की जा रही हत्या को शर्मिला बर्दाश्त नहीं कर पाई, वो हथियार उठा सकती थी किन्तु उसने सत्याग्रह और अहिंसा के मार्ग पर चलने का निश्चय किया। ऐसा सत्याग्रह जिसका साहस आजाद भारत के किसी भी हिन्दुस्तानी ने अब तक नहीं किया था।

शर्मिला उस बर्बर कानून के खिलाफ खड़ी हो गयीं जिसकी आड़ में सेना को बिना वारंट के किसी की भी गिरफ़्तारी का और तो और गोली तक मारने का अधिकार मिल जाता हैं। POTA से भी कठोर इस कानून में सेना को किसी के घर में बिना इजाजत घुसकर तलाशी लेने का आधिकार मिल जाता हैं।

शर्मिला का कहना है कि जब तक भारत सरकार AFSPA 1958 को नहीं हटा देती तब तक मेरा अनशन जारी रहेगा। आज शर्मिला का एकल सत्याग्रह सम्पूर्ण विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिये किये जा रहे आंदोलनों की अगुवाई कर रहा हैं। अगर आप शर्मिला को नहीं जानते हैं तो इसकी वजह सिर्फ यह हैं की आज भी देश में हनन के विरुद्ध उठने वाली आवाजों को सत्ता के गलियारों में कुचल दिया जाता हैं।

शर्मिला कवरपेज का हिस्सा नहीं बन सकती क्यूंकि वो कोई मॉडल या अभिनेत्री नहीं हैं और न ही गाँधी परिवार की बेटी या बहू।

* यह आलेख मुझे आदरणीय अनिल श्रीवास्तव जी के फेसबुक वाल पर मिला था। किसने लिखा , मैं नहीं जानता। यहाँ पर साभार प्रकाशित कर रहा हूँ।

16 टिप्‍पणियां:

  1. आपने भला काम किया. इरोम शर्मीला जैसी लौह महिला पर लिखा जाना चाहिए. बार-बार. मैंने भी उन पर कुछ न कुछ लिखा ही है. जैसे ''इक दीप-सी जलती रही इरोम शर्मिला'', ''इरोम शर्मिला जिन्दाबाद' (गजल) एक लेख भी लिखा था कभी . उन पर लिखे जाने का मतलब है कि हम इस देश के सही नागरिक है, जो देश के किसी भी कोने में होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं..दुःख का बात है कि दस साल बाद भी भारत सरकार शर्मिला की एक सूत्री मांग को मानने तैयार नहीं हो रही.

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  2. आदरणीय अन्ना को अनशन के समय अखबारों में पढ़ी थी.......इरोम की मांगों पर सरकार क्या फैसला लेगी वही इरोम जो पिछले कई सालों से अनशन पर है ऐर लगभग कोमा की स्थिति में है................
    परन्तु ये सरकार महात्मा गांधी के तीन बंदरों के चरणचिन्हों पर चल रही है.... न देखो...न सुनो..न बोलो...........बस सुप्रीमों के हुकुम का पालन करो

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  3. अबनिश सिंह जी अभिवादन जिसने भी लिखा हो ये लेख बहुत अच्छा है ऐसी जानकारियों को सामने लाना ही चाहिए अच्छा काम आप ने किया इस सरकार को इस तरह की चीजें कहाँ दिखाई देती हैं जेब भरने से फुर्सत मिले तब न ..
    एरोम शर्मिला जी की मांग पर विचार होना ही चाहिए ..
    जय श्री राधे
    भ्रमर ५

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  4. indian army ke jawano ne jo kiya uska mujhe bohad khed he ... par agar indian army bhi police ke tarah sab so search warrent dikhayegi to wo terrorist ko shut kese karegi...

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  5. आप सभी शुभचिंतक मित्रों का आभार...

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  6. आप सभी शुभचिंतक मित्रों का आभार...

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  7. एरोम शर्मिला जी की मांग पर विचार होना ही चाहिए

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  8. is desh ki yahi vidambna hai .ek to koi awaj nahi uthana chata aur agr koi awaj uthata bhi hai to koi sunne wala nahi hai ........

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  9. aisee mahalaayen sau men ek milengee.shree annaji anshan ke silsile men padhaatha unke bare.yah lekh aur sakaeatmak pratikriyaayen unke manval ko badhaayegeen.
    dhanyvaad.
    dr JaiJaiRam Anand
    LOs Angeles

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  10. इरोम शर्मिला के बारे में पहले-पहल गिरीश पंकज जी के ब्‍लॉग पर ही पढ़ा था।
    उत्‍तर-पूर्वी राज्‍यों के हालात् कुछ ऐसे हैं कि वहॉं ऐसी आवाज़ का दबे रहना नयी बात नहीं। प्रश्‍न यह है कि इंटरनैट के युग ऐसी स्थिति क्‍यूँ है।
    क्‍या किसी ने इरोम को आंदोलन में बदलने का प्रयास किया; अगर नहीं तो उचित होगा कि तह तक पहुँच कर इस मामले को समझा जाये और फिर इंटरनेट जेसे सशक्‍त माध्‍यम का उपयोग किया जाये।

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  11. एक अफ़सोस जनक बात है ... कितना संवेदनहीन हो गए हैं हम ... इरोम जो इतने सालों से सत्याग्रह कर रही हैं उसको कोई नहीं पूछता ... मीडिया भी उसकी तरफ नहीं देखता ...

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  12. मैंने भी इरोम शर्मीला जी के बारे मे अन्ना आंदोलन के दौरान पढ़ा था | उनके अनशन का सन्देश आम जनता तक ना जाना केवल मीडिया का इसे वरीयता ना दिया जाना है | क्योकि आज भी हर आंदोलन का प्रचार मीडिया पर काफी हद तक निर्भर है | लेकिन आपने इसे अपनी पत्रिका मे स्थान दे कर इस आंदोलन की चिंगारी पाठकों तक पहुंचा कर अपना दायित्व निभाया है|उनका प्रयत्न विफल ना जाए यही प्रार्थना है .....

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  13. mai Bhi erom sharmila i ka bada adar karta hoon par kya humari sarkar itni nisthur ho gayi hai ki use dikhai nahi deta ? Kya chand logo ki bhid ikttha kar lene ko hi Andolan kahate hai ? kya iske liye humar loktantra ka chhotha stambh jimmedar nahi hai ? Kya hum aur aap Jimmedar nahi Hai? kya is desh me Loktantra mar gaya hai ? Kya humkao aur apko nahi pata ki is afsa kanoon ki aad me ye sena wale kitna julm karte hai ? humko to lagta hai ki humare purvi pradesh kanhi algavvad ki bhent na chhad jayen .

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