पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

प्रिय रचनाकार

दिनेश सिंह के नवगीत


१. गीत की संवेदना!

वैश्विक फलक पर
गीत की सम्वेदना है अनमनी
तुम लौट जाओ प्यार के संसार से
मायाधनी

यह प्रेम वह व्यवहार है
जो जीत माने हार को
तलवार की भी धार पर
चलना सिखा दे यार को

हो जाए पूरी चेतना
इस पंथ की अनुगामिनी

चितवन यहां भाषा 
रुधिर में धड़कनों के छंद है
आचार की सब संहिताएँ
मुक्ति की पाबंद है

जीवन-मरण के साथ खेले
चन्द्रमा की चांदनी

धन-धान्य का वैभव अकिंचन
शक्ति की निस्सारता
जीवन-प्रणेता वही
जो विरहाग्नि में है जारता

इस अगम गति की चाल में
भूचाल की है रागिनी।

2. दुख के नए तरीके!

सिर पर
सुख के बादल छाए
दुख नए तरीके से आए

घर है, रोटी है, कपडे हैं
आगे के भी कुछ लफड़े हैं
नीचे की बौनी पीढी के,
सपनों के नपने तगड़े हैं

अनुशासन का
पिंजरा टूटा
चिडिया ने पखने फैलाए
दुख नए तरीके से आए


जांगर-जमीन के बीच फॅसे
कुछ बड़ी नाप वाले जूते
हम सब चलते हैं सडकों पर
उनके तलुओं के बलबूते

इस गली
उस गली फिरते हैं
जूतों की नोकें चमकाए
दुख नए तरीके से आए

सुविधाओं की अंगनाई में,
मन कितने  ऊबे-ऊबे हैं
तरूणाई के ज्वालामुख,
लावे बीच हलक तक डूबे हैं

यह समय
आग का दरिया है,
हम उसके मांझी कहलाए
दुख नए तरीके से आए!

३. नये नमूने!

कई रंग के फूल बने
कांटे खिल के
नई नस्ल के नये नमूने
बेदिल के

आड़ी-तिरछी
टेढ़ी चालें
पहने नई-नई सब खालें

परत-दर-परत हैं
पंखुरियों के छिलके

फूले नये-
नये मिजाज में
एक अकेले के समाज में

मेले में
अरघान मचाये हैं पिलके

भीतर-भीतर
ठनाठनी है
नेंक-झोंक है, तनातनी है

एक शाख पर
झूला करते
हिलमिल के

व्यर्थ लगें अब
फूल पुराने
हल्की खुशबू के दीवाने

मन में लहका करते थे
हर महफिल के।

४ आ गए पंछी!

आ गए पंछी
नदी को पार कर
इधर की रंगीनियों से प्यार कर

उधर का सपना
उधर ही छोड  आए
हमेशा के वास्ते
मुंह मोड  आए

रास्तों को
हर तरह तैयार कर

इस किनारे
पंख अपने धो लिये
नये सपने
उड़ानों में बो लिये

नये पहने
फटे वस्त्र उतारकर

नाम बस्ती के
खुला मैदान है
जंगलों का
एक नखलिस्तान है

नाचते सब
अंग-अंग उघार कर।

५ हमः देहरी-दरवाजे!

राजपाट छोड़कर गए
राजे-महाराजे
हम उनके कर्ज पर टिके
देहरी-दरवाजे

चौपड़  ना बिछी पलंग पर
मेज पर बिछी
पैरों पर चांदनी बिछीः
सेज पर बिछी

गुहराते रोज ही रहे
धर्म के तकाजे

अपने-अपने हैं कानून
मुक्त है प्रजा
सड़ी-गली लाठी को है
भैंस ही सजा

न्यायालयः सूनी कुर्सी
क्या चढी बिराजे!

चमकदार ऑखें निरखें
गूलर का फूल
जो नही खिला अभी-कभी
किसी वन-बबूल

अंतरिक्ष में कहीं हुआ
तारों में छाजे।


परिचय


दिनेश सिंह


जन्म : १४ सितम्बर १९४७
जन्म स्थान : गौरारुपई, लालगंज, रायबरेली, उत्तरप्रदेश, भारत ।
शिक्षा : स्नातक
रचनाकाल : १९७० से अब तक
व्यवसाय : कवि-रूप में प्रतिष्ठित, उत्तर प्रदेश शासन के स्वास्थ्य विभाग से सेवा निवृत्त।

प्रकाशन : अज्ञेय द्वारा संपादित 'नया प्रतीक' में पहली कविता प्रकाशित हुई। 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' तथा देश की लगभग सभी बड़ी छोटी पत्र-पत्रिकाओं में गीत, नवगीत तथा छन्दमुक्त कविताएं, रिपोर्ताज, ललित निबंध तथा समीक्षाएं निरंतर प्रकाशित होती रहीं। 'नवगीत दशक' तथा 'नवगीत अर्द्धशती' के नवगीतकार तथा अनेक चर्चित व प्रतिष्ठित समवेत कविता संकलनों में गीत तथा कविताएं प्रकाशित।

प्रकाशित कृतियाँ : पूर्वाभास, समर करते हुए, टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर, मैं फिर से गाऊँगा ।

अप्रकाशित कृतियाँ : गोपी शतक, नेत्र शतक (सवैया छंद), परित्यक्ता (शकुन्तला-दुष्यंत की पौराणिक कथा को आधुनिक संदर्भ देकर मुक्तछंद की महान काव्य रचना) चार नवगीत-संग्रह तथा छंदमुक्त कविताओं के संग्रह तथा एक गीत और कविता से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि।

संपादन : चर्चित व स्थापित कविता पत्रिका 'नये-पुराने' (अनियतकालीन) का संपादन।

सम्मान : राजीव गांधी स्मृति सम्मान, अवधी अकेडमी सम्मान, पंडित गंगासागर शुक्ल सम्मान, बलवीर सिंह 'रंग' पुरस्कार

संपर्क - ग्राम-गौरा रूपई, पोस्ट-लालूमऊ, रायबरेली (उ.प्र.)

4 comments:


Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…
अवनीश सिंह चौहान जी नमस्कार ! आपका ब्लॉगजगत में स्वागत है । छंद में सृजन का आपका प्रयास वरेण्य है दर्द के हम भगीरथ सुंदर गीत रचना है … और श्रेष्ठ रचाव के लिए मंगलकामना है - राजेन्द्र स्वर्णकार
MUFLIS ने कहा…
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है गीतावली बहुत मोहक बन पडी है भावों और शब्दों का सुमेल ह्रदय की गहराई तक उतरता है बधाई .
vedvyathit ने कहा…
rchnayen sundr hain bdhai anytha n len nai peedhi itni bhi buri nhi hai us pr bhi vishvash krna pdega vh vishvshneey hai bhi vh to vhi kuchh le rhi hai jo use aglon se mil rha hai hr yug me hr trh ke log rhe hain aage bhi rhenge pr vishvash jroori hai
बेनामी ने कहा…
ekatrit kar shabdon ko diya ek aakar itna hee chaahonga kahna kiya aapne upkar Ajeet, TMU

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