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मंगलवार, 12 जुलाई 2016

महेन्द्रभटनागर का काव्य: सामाजिक समता, संघर्ष और विश्व-निर्माण का पथ - डॉ. मोहसिन ख़ान

महेन्द्र भटनागर


मुझे नहीं पता कि बड़े कवि ने मुझ जैसे व्यक्ति को क्या मानकर खोज निकाला और अपना साहित्य परिचय के तौर पर मुझे भेजना प्रारम्भ किया। मैं महाराष्ट्र के कोकण में और वे ग्वालियर में, उनके द्वारा उनका साहित्य भेजना इस बात का कदापि प्रमाण नहीं माना जा सकता है, कि महेंद्रभटनागर के मानस में यह अभिलाषा हो कि उन्हें ज़बरदस्ती लोग पढ़ें। मैंने भी यह आशय बिलकुल नहीं लगाया कि महेंद्रभटनागर का साहित्य जबरन महेंद्रभटनागर ने मुझ पर लाद दिया या थोप दिया हो। यह उनकी कृपाभिलाषी दृष्टि और स्नेह है, जो मुझ जैसे साधारण समीक्षक, प्राध्यापक को उन्होंने अपने साहित्य का भागीदार बनाया एवं समय-समय पर फोन करके अपनी उदारता, सहजता का परिचय दिया। उनका नाम मैंने साहित्य संसार की अनुगूँज में सुन रखा था, लेकिन साहित्यिक परिचय का संयोग न बन पाया था। जब उनका विहंगम साहित्य मेरी दृष्टि में आया, तो श्री महेंद्रभटनागर मेरे सम्मानीय रचनाकारों में अपनी रचनाओं के माध्यम से सम्मिलित हो गए, जब उनके साहित्य को मैंने पढ़ा तो अभिभूत ही नहीं, बल्कि उसमें गहरे तक धँस भी गया और इतना धँस गया कि मेरे अवचेतन में उनकी कविताएँ चलने लगीं। महेंद्रभटनागर मेरी आधी आयु से भी दस वर्ष मुझसे बड़े हैं, मैं चालीस का हूँ तो वे नब्बे दशक देख चुके हैं। मैं घोर आश्चर्य में हूँ कि एक रचनाकर अपने जीवन में इतना ऊर्जावान कैसे बना रह सकता है? क्या इस ऊर्जा का क्षय नहीं हुआ होगा? क्या कभी कवि मानस रुग्ण नहीं हुआ होगा? क्या एक रचनाकर अपने कर्म से थककर विराम मे नहीं उतरा होगा? इसके उत्तर में मुझे उनके साहित्य के भीतर से मिला कि- नहीं, वे साहित्य के अनवरत यात्री और साधक हैं। एक व्यापक दृष्टि यदि उनके साहित्य पर डाली जाए, तो कहा जा सकता है कि महेंद्रभटनागर साहित्य के एक ऐसे साधक हैं, जिनकी ऊर्जा का क्षय कहीं नहीं होता, हर परिस्थिति से टकराकर वे और भी संघर्षी हो उठते हैं, मानस रुग्ण अवश्य होता है, लेकिन वे हताश होकर अपनी रचनात्मकता पर विराम नहीं लगाते, बल्कि और अधिक सार्थक मात्रा में वे अपनी धारदार अभिव्यक्ति देते हैं। उनके सत्तर वर्षों से अधिक की साहित्य की अनवरत यात्रा मुझे सोचने पर बाध्य करती है कि एक कवि का मानस अपने समय में विभिन्न परिस्थितियों से टकराकर, कई मोड़ से गुज़रते हुए अपने पगे हुए अनुभव समाज में अपनी रचनाओं/कृतियों के माध्यम से देकर अब भी अभिव्यक्ति के लिय तड़प रहा है, यह एक सच्चे रचनाकर होने की स्थिति को दर्शाता है।

महेंद्रभटनागर का साहित्य विपुल साहित्य है, पद्य में वे जैसी पकड़ रखते हैं, वैसी ही पकड़ वे गद्य में भी रखते हैं। गद्य कृतियों मे प्रमुख- साहित्य रूपों का सैद्धान्तिक विवेचन एवं उनका ऐतिहासिक क्रम-विकास, आधुनिक काव्य, हिन्दी कथा साहित्य, हिन्दी-नाटक (आलोचना), साक्षात्कार, रेखाचित्र, लघुकथाएँ, एकांकियाँ, रेडियो-फ़ीचर, गद्य-काव्य, वार्ताएं, बाल-किशोर साहित्य, संस्मरणिका, पत्रावली इत्यादि। अपनी लंबी सृजन-यात्रा में उन्होंने कई कविताओं के संकलन दिये जिसे अब महेन्द्रभाटनगर समग्र (रचनावली) में देखा जा सकता है। उनके अपरिमित विपुल साहित्य में विविधता के साथ विषय वैशिष्ट्य, मौलिकता, प्रगतिशीलता, संघर्ष, समता, व्यवस्था के प्रति विद्रोह, आशावाद, निर्माण की भावना, मानवीय संवेदना, करुणा, नारी के प्रति सम्मान एवं सशक्तिकरण की भावना, परिवर्तन की पुकार, न्याय की मांग, मानव के सुनहरे भविष्य की प्रतिबद्धता, वैचारिक प्रतिरोध, रचनात्मकता, समानवर, वैश्वीकरण इत्यादि के दर्शन होते हैं।

महेंद्रभटनागर के पद्य-साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण बात उनके आशावादी होने की स्थिति है, वे अपनी मौलिक दृष्टि में कहीं भी अंधेरे से घबराते नहीं हैं और उम्मीद जताते हैं कि चाहे कितनी भी विषम परस्थितियाँ क्यों न हों आशा का संचार भीतर निरंतर बहते रहना चाहिए। उनकी संघर्षशीलता उन्हें वह दृष्टि प्रदान करती है, जिसके माध्यम से कवि अंधेरे से उजाले की ओर बिना थके यात्रा करता है-

“तय है कि काली रात गुज़रेगी,
भयावह रात गुज़रेगी।
असफल रहेगा
हर घात का आघात,
पराजित रात गुज़रेगी।”

## ## ##

“तय है-
अँधेरों पर उजालों की विजय तय है।
पक्षी चहचाएंगे,
मानव प्रभाती गीत गाएँगे।
उतरेंगी गगन से सूर्य-किरणें,
नृत्य की लय पर,
धवल मुस्कान भर-भर।” 1

महेंद्रभटनागर अंधेरे के होने का विरोध हर स्तर पर अपनी कविताओं में कर रहे हैं, अंधेरा मात्र उनके लिए प्रकाश का न होना नहीं, बल्कि विषम और कटु परिस्थितियों का जीवन पर हावी हो जाना है। वे अंधेरे से घबराते नहीं हैं और न ही वे उसके भय से पीछे हटाते हैं, वे लगातार उससे संघर्ष कर प्रकाश का आह्वान कर रहे हैं, प्रकाश जो कहीं किसी ओट के कारण छिप गया है, उसे खोज लाने के प्रयत्न कर और अभिलाषा को सँजोते हैं। वे अपनी कविता ‘सावधान’ में लिखते हैं-

“अँधेरा है, अँधेरा है,
बेहद अँधेरा है।
घुप अँधेरे ने
सारी सृष्टि को लेकिन
अपने जाल में / जंजाल में
धर दबोचा है,
घेरा है।
नहीं; लेकिन
तनिक भयभीत होना है,
हारकर मन में
पल एक निष्क्रिय बन
न सोना है।
तय है-
कुछ क्षणों में
रोशनी की जीत होना है।” 2

इसी प्रकार आशावादी दृष्टिकोण उनकी एक और कविता ‘अदम्य’ में झलकता है, एक ओर वे संघर्ष पथ का निर्माण कर रहे हैं, तो दूसरी ओर संकल्पित होकर आगे बढ़ाकर एक ऐसे संसार का सृजन करना चाहते हैं, जहां शोषण रूपी अँधेरा सदैव के लिए छंट जाए और समता रूपी प्रगति का सूर्य अपना प्रकाश बिखेर दे-

“काली अंधी रात क़यामत की
धरती पर घिरती है जब-जब
आकशों को जगमग करते
आशाओं के / विश्वासों के
सूर्य उगाते हैं हम।” 3

महेंद्रभटनागर अपनी कविताओं में जगत के चतुर्दिक फैले शोषण के अँधेरे और उसकी दासता से मुक्ति की कामना को, इस आशा को गहराई से अभिव्यक्ति देते हैं, वे मानते हैं कि समस्त संसार में तरह-तरह के शोषण का बोलबाला है, तरह-तरह से व्यक्ति के साथ अन्याय और अत्याचार किया जा रहा है। इस गलित अवस्था के विरुद्ध ही वे कविता के माध्यम से विरोध का परचम लेकर आगे बढ़ते हैं और दर्शाते हैं कि चाहे राहों में कितने ही आँधी, तूफ़ान क्यों न आएँ एक दिन उनकी पराजय होगी, आशा का दीप हमें हर हाल में बुझने न देना होगा। समता, सद्भाव, सहभाव एक रोज़ कायम होगा-

“चाहे रात काली और हो,
चाहे भीषण हों चक्रवात-प्रहार,
पर सद्भाव का सहभाव का
ध्रुव-दीप / मणि-दीप
निष्कंप रह जलता रहेगा।” 4

दु:ख जीवन में निरंतर विद्यमान है, लेकिन दु:ख को काटना भी इंसान होने की पहचान है। कवि जीवन की विवशताओं के बीच भी आशा की किरण खोजता है। ये कवि की आशावादी दृष्टि का परिणाम है, वे कहीं पर भी स्वप्नलोक में नहीं खो जाते, वे बराबर अपनी दृष्टि यथार्थ पर टिकाए हुए हैं। वे क्रान्ति के समर्थक हैं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष को बढ़ावा देते हैं, उनका मानना है कि व्यक्ति चाहे टूट जाए, लेकिन उसे हताश नहीं होना चाहिए। क्रांति ही एक ऐसा मार्ग है जिससे मंज़िल को प्राप्त किया जा सकता है। कवि अपनी रचनाओं में दु:ख-सुख की स्थितियों का वर्णन करने के साथ विश्वास दर्शाता है कि आज अगर दु:ख है तो उससे मुक्ति के लिए संघर्ष ज़रूरी है, प्रतीक्षा करने से दु:ख समाप्त नहीं हो जाएगा, बल्कि कारणों की तलाश करते हुए दु:ख से छुटकारा प्राप्त करना होगा और यह तब ही संभव है जब आपके पास कोई कारगर उपाए हो। वे दु:ख से मुक्ति की बात में आशा के संचार को महत्व देते हैं, आशा ही एक ऐसा उपाए है, जिससे प्रयत्नों को जन्म मिलता है-

“शायद, गहरी-गहरी परतों के नीचे
जीवन सोया हो,
तम के गलियारों में खोया हो!
सींचो! अन्तस की निष्ठा से सींचो!
शायद, चट्टनों को फोड़ कहीं
नव अंकुर डहडहा उठें,
नूतन जीवन से कसमसा उठें।” 5

कवि ने समय और मूड के आधार पर कविताओं का सृजन किया, जब भी जैसी अवस्था ने मन पर प्रभाव डाला वैसे भावों को शब्दों में ढाल दिया। बाधाओं का साम्राज्य चारों ओर है, उसे दूर करने का प्रयत्न कभी कम न होना चाहिए। आशा की किरण जब हृदय पर पड़ती है, तो बाधाओं से मुक्ति के मार्ग भी स्वत: खुल जाते हैं। आशावादी होने के कारण ही कवि हर परिस्थिति से भीड़ जाता है और आगे बढ़ने का हौसला बराबर बनाए रखता है। साहस की बात तब मन में उभरकर आती है, जब मन में कहीं आशा का दीप जले, कवि आशा को प्रमुखता देते हुए लिखता है-

“बाधाएँ
हतोत्साहित नहीं करतीं कभी बाधाहरों को!
वे बनातीं
और भी दृढ़ धारणाओं को,
कठिन के सामने मेधा
कभी होती नहीं दूषित,
वरन, उद्भावना उन्मेष से भर
और हो उठती प्रखर!” 6

समता और प्रगतिशीलता महेंद्रभटनागर की कविताओं की ख़ासी विशेषता है, वे मानव का मानव से भेद किसी भी दशा में स्वीकारते नहीं हैं, उनके लिए मानव सिर्फ मानव है, न जातिगत भेद मानते हैं और न ही धर्मगत, अर्थगत भेद उन्हें स्वीकार है। वे हर उस स्थिति का विरोध खुलकर अपनी कविताओं के माध्यम से करते हैं करते हैं, जहाँ मानव का शोषण किसी भी स्तर पर किया जा रहा हो, वे उसके प्रति हो रहे अत्याचार और अन्याय का जमकर विरोध करने के साथ उसके प्रति गहरी संवेदना प्रकट करते है। यह संवेदना मात्र दिखाव या फैशन के तौर पर नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों के प्रति गहरी आस्था की सार्थक अभिव्यक्ति है। कहीं न कहीं उनकी समता और प्रगतिशीलता का मूल स्वर मार्क्सवाद से सम्मिश्रित होता दिखाई देता है। कवि मन जब भी समता की धरती पर आश्रित होता है, तो उसकी दृष्टि विश्वव्यापी हो जाती है, वह देश, जाति, धर्म, नस्ल, लिंगभेद आदि की सीमाओं और बंधनों से बाहर आकार प्रत्येक मानव की हित-कामना को अपना ध्येय बना लेता है और प्रत्येक मानव की पीड़ा को भीतर सँजोकर उसके प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता है। महेंद्रभटनागर के पद्य साहित्य का अधिकांश भाग इसी संवेदना के मूल के आसपास रचित बड़ा भाग है, जिसमें समय-समय पर कवि महेंद्रभटनागर ने अपने भीतर के छटपटाते उद्गारों को समुचित और कारगर रूप में शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है। इस दृष्टि से उनकी ‘परिवर्तन’ कविता बहुत ही सार्थक और संवेदनशील नज़र आती है, जिसके तहत वे स्पष्ट करते हैं कि नए विश्व की नई व्यवस्था ने आज के मानव को नए अधिकार दिये हैं, जिससे वह एक साथ शोषण के कई स्तरों से मुक्ति पा रहा है-

“मौसम कितना बदल गया!
सब ओर कि दिखाता
नया-नया!
सपना जो देखा था
साकार हुआ,
अपने जीवन पर,
अपनी किस्मत पर
अपना अधिकार हुआ।
समता का
बोया था जो बीज-मंत्र
पनपा, छतनार हुआ।
सामाजिक-आर्थिक
नयी व्यवस्था का आधार बना।
शोषित-पीड़ित जन-जन जागा,
नवयुग का छविकार बना।” 7

प्रगतिशील दृष्टि के कारण महेंद्रभटनागर समता को महत्व देते हैं और शोषण का विरोध करते हैं। वे कई दृष्टियों और स्तरों पर आशावादी हैं। बाधाओं का होना किसी भी समय की चुनौतियाँ हैं, लेकिन उन्हें विश्वास है कि एक रोज़ बाधाएँ भी समाप्त होंगी और शोषण-मुक्त समाज होगा। बाधाएँ हैं तो चुनौतियाँ भी हैं, उनसे संघर्ष करना होगा। इसी संघर्ष से समतामूलक समाज के निर्माण हो पाएगा, इसलिए पीछे कभी नहीं हटना होगा। वे उस कला के समर्थक हैं जो जनवाद के लिए समर्पित हो, जो जन की आवाज़ बन सके। शोषण-मुक्त, वर्गहीन, समतावादी समाज की स्थापना के लिए कला को भी एक हथियार मानकर चलते हैं सन् 1971 का यथार्थ आज और भी भयावह हो गया है। समता और विश्व जन समुदाय को शोषण से मुक्त करने के संबंध में स्पष्ट करते हैं-

“हम
मूक कंठों में
भरेंगे स्वर
चुनौती के,
विजय-विश्वास के,
सुखमय भविष्य
प्रकाश के,
नव आशा के।

## ## ##

न्याय-आधारित व्यवस्था के लिए
प्रतिबद्ध हैं हम,
त्रास्त दुनिया को बदलने के लिए
सन्नद्ध हैं हम!” 8

महेंद्रभटनागर का काव्य शोषण के विरुद्ध अपनी प्रतिक्रिया देता है, उनके काव्य की मूलप्रवृत्ति प्रगतिशीलता की है। उनके काव्य में प्रगतिशीलता ही नहीं, मार्क्सवाद अथवा प्रगतिवाद को गहराई से गृहण किए हुए हैं, कई स्तरों पर प्रगतिवाद के समस्त लक्षणों को देखा जा सकता है। ‘नया संसार’ शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा है-

“नष्ट जिसमें हों ये सब आततायी क्रूर राक्षस,
और पूँजीवाद तानाशाह की तोड़ी गयी नस।” 9
“मुक्त जनता-युग हमारे सामने साकार!
बन रहा इतिहास नूतन
जाग शोषित, देख सम्मुख, है नया संसार!” 10

पूंजीवाद का अंत और साम्यवादी व्यवस्था का समर्थन इनकी कविताओं में अनेक स्थान पर उभरकर आया है, पूंजीवाद ने जिस प्रकार की एक सत्ता का निर्माण किया है, उसमें एक ओर पूँजी प्रमुख है और उसे बनाने में शोषण का प्रयोग है। इस प्रयोग में समाज असंतुलित होकर दो भागों में बाँट गया है, जिसमें मजदूर और वंचितों की दयनीय अवस्था को देखा जा सकता है। पूँजीवादी व्यवस्था में शोषण होता है मज़दूर का; क्योंकि उसी के श्रम का शोषण करके उत्पादन होता है; लाभ कमाया जाता है, पूँजी बनायी और बढ़ायी जाती है। इसलिए सभी प्रगतिवादी कवियों ने मज़दूर के शोषण से मुक्ति के लिए सारे मज़दूरों के एक होने और शोषण पर आधारित व्यवस्था को नष्ट करके एक नयी व्यवस्था क़ायम करने की बात अपनी रचनाओं में कही है।

“जो बर्फ़ीली रातों में
ओढ़े कुहरे का कम्बल
गठरी-से बन
चिपका लेते उर से टाँगें निर्बल
अधसोये-से / कुछ खोये-खोये-से
देखा करते नयी सुबह का स्वप्न मनोरम,
कब होता है विश्वास कराहों से कम?
सर्दी ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है
नव-जीवन की चिनगारी?
निकट सरकती आती है!
ये आँखें देखेंगी कुछ क्षण बाद
नया सबेरा, नया ज़माना,
नव-जीवन का नव-उन्माद!
कभी भी बुझ न सकेगा
जलता नूतन दुनिया के
आज करोड़ों मेहनतकश इन्सानों की
आशाओं-अभिलाषाओं का नया चिराग!” 11

यदि शोषण से मुक्ति की कामना करना है, तो एकता की ज़रूरत है, इसी एकता के माध्यम से संघर्ष करते हुए अपने अधिकारों को प्राप्त किया जा सकता है। एकता के लिए मजदूर और किसान को मिलकर सामने आना होगा और पूंजीवादी शक्तियों से टकराना होगा। इस टकराव में खून भी बहेगा और जीवन भी नष्ट होंगे, टकराव आवश्यक है, वाद-प्रतिवाद और संवाद की स्थिति से ही समाज का विकास संभव है। मार्क्सवाद या प्रगतिवाद क्रांति में विश्वास रखता है, उसे पूंजीवाद को उखाड़ने की लिए हिंसा का भी सहारा लेना होगा और अपनी आहुति भी देनी होगी। ‘शिशिर-प्रभंजन’ नामक कविता में क्रांति की पुकार लगाते हुए लिखते हैं-

“आवाहन
जगत में क्रांति का अब
हो रहा मुखरित निरन्तर,
चल पड़ी है
दूर से आँधी भंयकर!
जन-विजय की कामना भर!
बेड़ियाँ परतंत्रता की
और कड़ियाँ हर तरह की
झनझनाती टूटने को!
हर दमित अब छूटने को!
दे रहा दृढ़ स्वर सुनायी
मुक्त नवयुग के प्रखर संदेश का,
है प्रति चरण नव-क्रांति-पथ पर
नव-सृजन की नींव का मज़बूत पत्थर!
चल रहा क्रम / भ्रम न किंचित,
गिर रहा आकाश से हिम,
आ रहा देता निमंत्रण
शीत का सन्- सन् प्रभंजन!” 12

कवि महेंद्रभटनागर समता की नयी व्यवस्था के प्रति आश्वस्त होते हुए नए मानव के प्रति भी आस्थावान दिखाई देते हैं, वे नए मानव को नए मूल्यों से सुसज्जित होता देख रहे हैं और उससे उम्मीद जाता रहे हैं कि पारंपरिक मूल्यों ने हमें आपस में वर्ग भेद, जातिभेद, लिंगभेद, धर्मभेद के द्वारा इतनी दूरस्थता दी है कि हम छोटे-छोटे समुदायों में विभक्त हो गए हैं और आपस में एक-दूसरे को शत्रु मानकर जीवन जी रहे हैं, ऐसी अवस्था को नये मानव को समाप्त करना होगा। इसलिए महेंद्रभटनागर नये समाज के नए मूल्यों की परिकल्पना को अधिक समुचित, कारगर, कल्याणमयी और समता स्थापना के लिए आवश्यक मान रहे हैं। पुराने मूल्यों ने जहाँ मानव में भेद उत्पन्न किया तो वहाँ उन मूल्यों को कवि ने खारिज कर दिया और उसकी प्रतिनियुक्ति में नए मानव के लिए नए मूल्यों के सृजन को बहुत अधिक उपयोगी मानते हुए उसक स्वागत किया। उनकी काविताओं तथा उनके विषय में कहा जा सकता है कि वे कहीं भी परंपरावादी न होकर वैज्ञानिक दृष्टि और तार्किकता को अधिक महत्व देते हैं, वे पुराने मूल्यों के प्रति आस्थावान नहीं, बल्कि वर्तमान समाज के लिए उसे एक बाधा, बंधन और रूढ़ि स्वीकारते हैं। वे नये मूल्यों को नये इंसानों के लिए बहुत सार्थक स्वीकार करते हैं, क्योंकि नये मूल्य समता और प्रगतिशीलता पर आधारित हैं। वे अपनी कविता ‘नये इंसानों से’ में स्पष्ट करते हैं-

“नये इंसानों!
आओ क़रीब आओ
और मानवता की ख़ातिर
धर्म-विहीन, जाति-विहीन
समाज का निर्माण करो,
देशों की भौगोलिक रेखाएँ मिटाकर।
विभिन्न भाषाओं
विभिन्न लिपियों को
मानव विवेक की उपलब्धि समझो।” 13

कवि महेंद्रभटनागर मनुष्य को केवल मनुष्य की दृष्टि से देखने के समर्थक हैं, वे मनुष्य की पहचान को जात-पात, धर्म-संप्रदाय, भाषा-बोली, देश, धर्म, रंग, नस्ल के आधार पर आकलित नहीं करते, बल्कि उसकी निंदा करते हुए मनुष्य की समता की कामना व्यक्त करते हैं कि इस धरती पर वह सुनहरा दिन कब आएगा जब मनुष्य को समता की दृष्टि से देखा जाएगा। उसमें किसी भी तरह का भेद न होगा। जब मनुष्य केवल मनुष्य होगा। बड़े ही सरल रूप में अपनी सहजता से वे अपनी कविता ‘मन्वंतर’ के माध्यम से साधारण लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बात प्रश्न शैली में उठाते हैं और ये प्रश्न बड़े मासूम और अर्थपूर्ण हैं-

“भविष्य वह आएगा कब
जब- मनुष्य कहलाएगा
मात्र ‘मनुष्य’।
उसकी पहचान
जुड़ी रहेगी कब-तलक
देश से / धर्म से
जाति - उपजाति से
भाषा - विभाषा से
रंग से / नस्ल से? ”

## ## ##

“तोड़ो-
देशों की कृत्रिम सीमा-रेखाओं को,
तोड़ो-
धर्मों की
सम्बद्ध, अप्रासंगिक, दकियानूस
आस्थाओं को!
तोड़ो-
जातियों-उपजातियों की
विभाजक अस्थाओं को।” 14

महेंद्रभटनागर का मानना है कि जब मनुष्य का सबकुछ एक जैसा है उसका आकार, प्रकार, उसकी रचना, उसकी वृत्तियाँ, जरूरतें, जन्म और अंत तो फिर मनुष्य-मनुष्य के मध्य भेद कैसा? इस तरह के विभाजन को लेकर वे भीतर ही भीतर क्षुब्ध और बेचैन हैं, उन्हें आपस में मनुष्यों में ऐसा भेद कदापि स्वीकार नहीं।

महेंद्रभटनागर प्रगतिशील चेतना के कवि हैं, परंपरा से आई मनुष्य की रीति-नीति पर वह इसलिए विश्वास नहीं करते क्योंकि पुरातन परंपरा ने मनुष्य को गलित नियमों में जकड़ कर रख दिया है। वे न तो ऐसी सड़ी-गली रूढ़ि और परंपरा का अनुमोदन करते हैं न समर्थन करते हैं और न ही चले आ रहे सनातन नियमों को स्वीकार करते हैं। उनके लिए तो वही आदर्श और वही उच्च मानवीय मूल्य हैं, जो मनुष्य को मनुष्य कहलाने का समर्थन करते हों उसकी समता, प्रगति और विकास की रूपरेखा निश्चित करते हों। वे इसे शोषकों का शोषण का खेल मानते हैं और इसके प्रति खुला प्रतिकार करते हैं। वे अपनी प्रगतिशील चेतना द्वारा स्पष्ट करते हैं-

“अब संभव नहीं
बीते युगों की नीतियों पर एक पग चलना
निरावृत्त आज
शोषक-तंत्र की प्रत्येक छलना।
अब नहीं संभव तनिक बीते युगों की मान्यताओं पर
सतत गतिशील
मानव-चेतना को रुद्ध कर बढ़ना।” 15

कवि महेंद्रभटनागर समता और प्रगतिशीलता को गहनता से अपनाए हुए हैं, वे नारी को भी समता के अधिकार की दृष्टि से देखते हैं उसे कहीं भी दोयम दर्जे नहीं मानते हैं, उसके प्रति हो रहे अमानवीय अत्याचारों, अन्यायों का विरोधकर उसे समता का अधिकार दिलाने की बात करते हैं। वे नारी को प्रगतिशीलता की दृष्टि से देखते हुए उसकी स्वतन्त्रता, समता, लिंगभेद विरोध का समर्थन करते हुए उसे नए युग की नयी चेतना से सम्पन्न होना स्वीकारते हैं, वे नारी को एक क्रांति के रूप में भी देखते हैं। नारी के माध्यम से वे समाज की नवीन संरचना पर बल देते हैं, जहाँ नारी को सम्मान के साथ उसके अधिकारों की भी पहल करते हुए समानधर्मा, सहभाव होने की स्थिति का उल्लेख करते हैं। उनकी कविताओं में नारी के अस्तित्त्व एवं उसके अधिकारों की प्रतिस्थापना अपनी प्रगतिशीलता के तहत आई है और नारी के अस्तित्त्व को वे पुरुष के अस्तित्त्व के समान ही रखते हैं। नारी के आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता को प्रमुखता देते हुए उसे समता के धरातल पर लाकर देखते हैं और समर्थन करते हैं। वे नारी को नए इतिहास की रचनाकर होना दर्शाते हुए अपनी कविता ‘नारी’ में लिखते है-

“समता का, आज़ादी का नव-इतिहास बनाने को आयीं,
शोषण की रखी चिता पर तुम तो आग लगाने को आयीं,
है साथी जग का नव-यौवन, बदलो सब प्राचीन व्यवस्था,
वर्ग भेद के बंधन सारे तुम आज मिटाने को आयीं।” 16

वे नारी से संबंधित अपनी प्रगतिशील सोच रखते हैं, अपनी इसी दृष्टि के तहत वे कई कविताएं लिखते हैं लेकिन अपने उतरार्धकाल में वे नारी के प्रति अधिक भावुक और मार्मिक हो जाते हैं- वे नारी प्रेम को अधिक सत्य और जीवन का महत्वपूर्ण अंग स्वीकारते हैं, ‘छलना’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-

“कि मैंने आज / जीवित सत्य की तसवीर देखी है /
किसी मासूम की उर-वेदना / बन धार आँसू की /
धरा पर गिर रही है, / और चारों ओर है जिसके
अँधेरे की घटा, / जा रूठ बैठी है / सबेरे की छटा!
उसको मनाने के लिए अब / मैं हज़ारों गीत गाऊँगा,/
अँधेरे को हटाने के लिए / नव-ज्योति प्राणों में सजाऊँगा!
न जब तक / सृष्टि के प्रत्येक उपवन में /
बसन्ती प्यार छाएगा, /
न जब तक / मुसकुराहट का नया साम्राज्य /
धरती पर उतरकर जगमगाएगा,/
कि तब तक / पास आने तक न दूंगा /
याद जीवन में तुम्हारी! /
क्योंकि तुम कर्तव्य से / संसार का मुख मोड़ देती हो!
हज़ारों के / सरल शुभ भावनाओं से भरे /
उर तोड़ देती हो!” 17

कवि महेंद्रभटनागर प्रतिबद्धता के भी कवि हैं, उनकी प्रतिबद्धताएँ अँधेरे के खिलाफ़ लड़ते हुए प्रकाश फैलाने की हैं, समता की हैं, स्वातंत्र्य की हैं। वे हर उस स्थिति के प्रति संकल्पित हैं, जिससे मानवता का विकास हो सके, मानव आगे बढ़ाने के अवसर उपलब्ध हो सकें। उनकी प्रतिबद्धताएँ सकारात्मक्ता का पुंज हैं, इस पुंज के भीतर सबलता, सदाशयता, संकल्प, समता, सौहर्द्र और सफलता के तत्त्व मौजूद हैं, जो इन कविताओं से जुड़ता है उसके भीतर नयी चेतना का संचार हो जाता है। जीवन में कुछ हो न हो लेकिन कवि के लिए प्रतिबद्धताओं का होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है, वे अपनी कविता ‘संकल्पित’ में लिखते हैं-

“प्रतिबद्ध हैं हम-
व्यक्ति के मन में उगी-उपजी
निराशा का, हताशा का
कठिन संहार करने के लिए!
हर हत हृदय में
प्राण उत्साह का संचार करने के लिए!” 18

सांप्रदायिकता, हिंसा ने कवि के मानस को झकझोरकर रख दिया है, कवि देश, समाज में फैल रही सांप्रदायिकता, हिंसा के विरुद्ध अपनी लेखनी से एक ओर तो समाज और देश में सद्भाव की स्थिति का निर्माण कर रहा है, दूसरी ओर वह ऐसी भयावह स्थिति के विरोध में उन तत्वों को खोजता है, जिससे देश, समाज प्रभावित हो रहा है। हर कवि की देश और समाज के प्रति गहरी संवेदना होती है, उसी के तहत वह अपने मन की अभिव्यक्ति देता है, सांप्रदायिकता की आग में देश जब जल रहा हो तो किसी भी कलाकार से भला चुप कहाँ रहा जा सकता है, कभी वह सीधे सांप्रदायिकता पर आक्रमण करता है, तो कभी प्रकारांतर से आक्रमण करता है। महेंद्रभटनागर का काव्य सीधे सांप्रदायिकता से भीड़ जाता है। वे उन हानिकारक शक्तियों को देश और समाज का शत्रु मानते हैं, जिनके कारण अशांति का वातावरण निर्मित हो रहा है, सद्भाव समाप्त हो रहा है, देश, समाज में हिंसा और सांप्रदायिकता का ज़हर प्रसारित हो रहा है। रोज़-रोज़ हो रहे सांप्रदायिक दंगों के विषय में वे ‘अमानुषिक’ कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देते हुए लिखते हैं-

“आज छाये फिर प्रलय-घन,
सूर्य- संस्कृति-सभ्यता का
फिर ग्रहण आहत हुआ,
षणयंत्रों-घिरा ये देश मेरा
आज फिर मर्माहत हुआ।
फैली गंध नगर-नगर
विषैली प्राणहर बारूद की,
विस्फोटों से पट गयी धरती,
सुरक्षा-दुर्ग टूटे
और प्राचीर क्षत-विक्षत हुई।
जन्मा जातिगत विद्वेष,
फैला धर्मगत विद्वेष
भूँका प्रांत-भाषा द्वेष
गंदला हो गया परिवेश।
घुट रही साँसें,
प्रदूषित वायु, विश-घुला जल,
छटपटाती आयु।” 19

महेंद्रभटनागर देश को एक भयावह स्थिति में फंसा हुए देख रहे हैं, यह भयावह स्थिति आतंक का दु:खद परिणाम है। देशहित, शांति और अहिंसा के विरुद्ध आतंक ने जो क़दम बढ़ाए हैं और जिस प्रकार से देश की शांति, सद्भावना को चोट पहुंचाई है कवि की दृष्टि में यह भयावह स्थिति होने के साथ बहुत अधिक घातक और दुष्परिणामों वाली स्थिति है। यदि ऐसी स्थिति निरंतर बनी रही तो एक रोज़ अवश्य देश गर्त में चला जाएगा। कवि को आतंक की भयावह स्थिति एक बहुत बड़े साज़िश के रूप में दिखाई दे रही है, ये साज़िश यहीं के कुछ स्वार्थियों ने रची है, जिसमें उनके गहरे क्षुद्रतम स्वार्थों का जाल है। कवि का सीधा संकेत उन धूर्तों की ओर है, जो अपने स्वार्थ के लिए जातीयता का विष घोल रहे हैं, सांप्रदायिकता की आग लगा रहे हैं, जो दहशत को प्रमुख मान रहे हैं। खून बहाना जिनका लक्ष्य और प्रवृत्ति बन गयी है, कवि अपनी कविता से सबको सचेत करता हुआ लिखता है-

“एक बहुत बड़ी और गहरी
साज़िश की गिरफ़्त में है देश।
चालक और धूर्त गिरोहों के
चुंगल में फँसा
छद्म धर्म और बर्बर जातीयता के
दलदल में धँसा,
एक बहुत ही बड़ी और घातक
जहालत में है देश।
आत्मीय रिश्तों का पक्षधर
दोस्ती के
सपनों व अरमानों का घर,
एक बहुत बड़ी भयावह
दहशत में है देश।” 20

कवि देश को सर्वोपरि मानते हुए उसके शांति, उन्नति और विकास के स्वप्न देखता है, कवि का मानना है कि यह तब संभव हो पाएगा जब देश में शांति और सद्भाव स्थापित हो, कवि अपनी कविताओं से प्रयत्नशील है कि देश में विकास कि लहर आए, हर जीवन समुन्नत और सुखी बन पाए। देश के लिए सबसे अधिक बड़ा खतरा एकता और अखंडता को लेकर उपस्थित हुआ है, समय-समय पर इसे तोड़ने की साज़िशों को रचा जाता है और ऐसे अमानवीय कृत्यों को अंजाम दिया जाता है जिससे मानवता शर्मसार होती है। कवि देश की अखंडता की कामना करते हुए लिखता है-

“एकता को तोड़ने की साज़िशें
नाकाम होंगी,
हम रहेंगे एक राष्ट्र अखंड
शक्ति प्रचंड।
सहन हरगिज़ नहीं होगा
देश के प्रति छल-कपट
विश्वासघात गुनाह।
मेरे देश की विज्ञान आलोकित जवानी
अंध-कूपों में कभी होगी नहीं गुमराह।” 21

परतंत्रता और दासता से मुक्ति के समय देश के बलिदानियों ने सोचा था कि स्वराज होगा तो ये देश स्वर्ग बनेगा और किसी भी तरह का शोषण, अन्याय और अत्याचार न होगा, परंतु स्वराज आते ही सबमें स्वार्थ आगया, अब दासता के काल से भी अधिक अमानवीय अत्याचार होने लगे, अपने देश के नेता ही देश को लूटने लगे और आमजन के कल्याण की भावना की जगह स्वार्थ ने ले ली। विकास के नाम पर असंतुलन की उपज के तहत विकास निश्चित किया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि जो जितना धनवान था, वह और भी अधिक धनवान होने लगा और दरिद्र अधिक दरिद्र होने लगा। इस अर्थ के असंतुलन ने अन्य असंतुलन से कहीं अधिक वृद्धि की और समाज मुख्य रूप से दो हिस्सों में विभाजित हो गया, एक हिस्सा धनवानों का दूसरा हिस्सा दरिद्रों का। राजनीति ने धनवानों का दामन पकड़ लिया, उनके विकास के लिए समस्त मार्ग खोल दिये और दरिद्रों के लिए योजनाएँ बनाईं, लेकिन कारगर रूप में उनको लागू न किया, जो योजनाएँ बनीं उसमें भी भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा लीं। ऐसी अवस्था में देश का एक बहुत बड़ा समुदाय आमजन समस्त सुविधों से वंचित होकर शोषित होता चला गया। देश की राजनीति के नेतृत्त्व में जब खोट उत्पन्न हुई, तो देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया, ईमानदारी, त्याग, निस्वार्थ सेवा, कल्याण की भावना, देशभक्ति और भी कई आवश्यक मूल्य राजनीति से पूरी तरह नदारद हो गए। ऐसी अवस्था में देश को दिन पर दिन गर्त में जाना ही था, राजनीति द्वारा देश को जो उच्चता प्रदान करनी थी, वह नेताओं ने स्वयं को प्रदान कर दी, आमजन के विकास और कल्याण के नाम पर इन देश के भक्षकों ने खूब भ्रष्टाचार किया और आमजन को वोट के नाम पर भरपूर इस्तेमाल किया। जैसी अवस्था दरिद्रता की देश में स्वतन्त्रता के पूर्व रही, उससे कहीं अधिक भयानक दरिद्रता भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात देखने को मिलती है। ऐसी दु:सह स्थिति के विषय में महेंद्रभटनागर लिखते हैं-

“यह कितना अजीब है।
आज़ादी के तीन-तीन दशक
बीत जाने के बाद भी,
पाँच-पाँच पंचवर्षीय योजनाओं के
रीत जाने के बाद भी
मेरे देश का आम आदमी गरीब है।
यह कितना अजीब है!
सर्वत्र धन का, पद का, पशु का
साम्राज्य है,
यह कैसा स्वराज्य है?” 22

देश के राजनेता को जनता की परवाह कहाँ रह गयी है, जनता तो केवल उनके इस्तेमाल की चीज़ है। राजनीति ने जब स्वार्थ की चादर औढ़ ली, तो उसे किसी भी तरह से जनता की संवेदनाओं से सरोकार नहीं बचा। उसे लगता है इस चादर के भीतर जो करना हो करलो, कोई देखनेवाला नहीं, कोई पूछनेवाला नहीं। राजनीति से मूल्यों का क्षरण हो जाना एक गहरी चिंता के साथ देश के हित के विरुद्ध स्थिति है। केवल राजनीति सत्ता-प्राप्ति कर हुकूमत करना चाहती है, उसे नेतृत्व से कोई लेना-देना नहीं।

“जगत यथार्थ / कितना भिन्न!
सपनों का रचाया लोक / रेशम-सी नरम चिकनी /
बुनावट कल्पनाओं की / तनिक में छिन्न!
कोई भाग्यशाली / शक्तिशाली
कुछ क्षणों को / कर सका साकार!
औचट या कि कर अपहार!
औरों के लिए / केवल विसंगति / आत्मरति!” 23

कवि अपने समय की राजनीतिक अवस्था पर दुखी होकर खेद प्रकट करता है, देश के नेता दीमकों की तरह देश को चट कर रहे हैं और कोई भी उन्हें कुछ कहनेवाला न बचा है। सब खेल, तमाशा संसद में खुलेआम चल रहा है और देश सारा चुपचाप देख रहा है। विकास की जगह बाधाओं ने, भ्रष्टाचार ने ले ली है, कोई अपने पर किसी भी तरह का कर्तव्य लागू नहीं करता बल्कि अधिकारों के लिए सड़कों पर हिंसा करते फिरते हैं। वर्तमान राजनीति ने जैसा अपना कुरूप दिखाया है, उससे कवि को बहुत अधिक मात्रा में देश के हित की चिंता खा रही है। सत्ताधारियों का काम केवल सत्ता के माध्यम से अपने भीतर अहम को कायम रखना है, किसी भी प्रकार की सेवा उन्हें अपनी घटती ही इज्ज़त लगती है। जबकि नेता जनता का सेवक है, लेकिन आज अवस्था बादल गई है, वो सेवक की जगह मालिक बन बैठा है-

“मस्तिष्क की नस-नस
विवश है फूट पड़ने को,
ठिठक कर रह गये हम!
खंडित पराक्रम
अस्तित्व / सत्ता का अहम्!
सच है कि
आक्रामक-प्रहारक सबल हाथों की
जैसे छीन ली क्षमता त्वरा
अब न हम ललकार पाते हैं / न चीख पाते हैं,
स्वर अवरुद्ध मानवता-विजय-विश्वास का
सूर्यास्त जैसे
गति-प्रगति की आस का!” 24

महेंद्रभटनागर को बड़ी हैरानी के साथ अफ़सोस ज़ाहीर करते हुए कहना पड़ रहा है कि इस देश की राजनीति और नेताओं ने बर्बाद किया है, देश हित में ऐसे कोई भी सशक्त और कारगर उपाए नहीं किए गए, जिससे कहा जा सके कि आम आदमी के बदहाल जीवन से उसे मुक्ति प्राप्त हुई हो। बदहाली की अवस्था दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और नेतृत्व कर रहे नेता आम आदमी को रौंदते चले जा रहे हैं। आज भी जनता फुटपाथों पर सो रही है, अधनंगी होकर अधपेटभर जीवन जीने को बाध्य है। महेंद्रभटनागर ऐसी भयावह स्थिति को दर्शाते हैं-

“मेरे देश में
ओ करोड़ों मज़लूमों।
तुम्हें
अभी फुटपातों से
छुटकारा नहीं मिला,
खौलते ख़ून के समुंदर में
तैरते-तैरते किनारा नहीं मिला।
बीसवीं शताब्दी के
इस आंठवे दशक में भी
सिर पर
खुला आसमान है,
नीचे
नंगी धरती
सूनी निगाहें
ठंडी आहें
विकलांग निरीहता
सर्दी, बरसात, आँधी।”

## ## ##

“मेरी पूरी पीढ़ी हैरान है।
नेतृत्व कितना बेईमान है।” 25

महेंद्रभटनागर मानवीय जीवन को व्यापक दृष्टि से देखते हैं, वे देश की सीमाओं से परे पूरे विश्व के मानव को एक मानते हुए उसके कल्याण की कामना करते हैं। विश्व में कहीं पर भी मानव पर हो रहे अत्याचार, अन्याय, शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं और सबको सचेत करते हैं कि किसी भी प्रकार का कहीं पर भी शोषण अब मनुष्य को सहना नहीं है। उनके काव्य में वैश्विक कल्याण और संवेदना का गहरा भाव दिखाई देता है। वे विश्व में हो रही अमानवीय यतनाओं के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं और समस्त विश्व के मानव की ऐसी यतनाओं से मुक्ति की बात करते हैं। वे उस पशुता की निंदा करते हैं, जो वर्षों से विश्व में कायम है, वे समस्त अत्याचारों को मानव जाति के लिए घातक और भयावह मानते हैं जो धर्म, जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, नस्ल, संप्रदाय इत्यादि के नाम पर हो रहे हैं, वे वास्तव में वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध समस्त चेतना को अपने काव्य में जिलाए हुए हैं। देश की सीमाओं को मिटाकर एक विश्व की कल्पना करते हैं जहां किसी भी प्रकार की असमानता और अन्याय का स्थान न हो। महेंद्रभटनागर का काव्य विश्व शांति के काव्य का अमर संदेश प्रदान करता है, वे एक ओर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का विरोध दर्ज करते हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर समन्वय की बात करते हैं। वे समय की मांग के साथ अपने काव्य को जोड़ते हैं और हर उस योजना, उपाए का स्वागत करते हैं, जो मनुष्य जाति के लिए हितकर और कल्याणकारी हो। उनका काव्य वैश्विक एकता और अखंडता का काव्य है, वे उस संक्रमणता की खुलकर निंदा करते हैं, जहाँ सच्चाई को समाप्त किया जा रहा है और अमानवीय अत्याचारों को बढ़ावा दिया जा रहा है-

“यह नहीं होगा-
बंदूक की नोक
सच्चाई को दबाए रखे,
आदमी को आततायी के,
पैरों पर झुकाए रखे,
यह नहीं होगा।” 26

विश्व के मानव की एक सभ्यता की कामना करते हुए वे समन्वय पर बल देते हैं और दर्शाते हैं कि अब मनुष्य एक है, उसे अपनी सभ्यता-संस्कृति का आदान-प्रदान कर नए विश्व की रचना में अपना योगदान देना होगा। इसलिए विश्व के मनुष्य से वे आवाहन करते हैं-

“आओ-
अविद्या-अज्ञता
धर्मांतरों की
भिन्नता विश्वास की
समधीत सम्यक बोध में
बदलें
सुनिश्चित
विश्व-मानव-हेतु
साधें।” 27

वे इस धारा पर से मानव-शोषण को समाप्त करने के साथ विश्व के मानव के हर भेद को मिटाकर उसे केवल मानव के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। उनकी यह मानवीय विश्व एकता की कल्पना आज के वैश्विक समुदाय की योजना वैश्वीकरण की ही कल्पना और योजना है। वैश्वीकरण के इस दौर में वे मानव के एक हो जाने की कल्पना के साथ किसी भी अंतर को मिटा देना चाहते हैं, वे एक विश्व-जन-समुदाय की भावना को प्रबल रूप में सबके सामने लाते हैं-

“हर व्यक्ति का जीवन
समुन्नत कर
धारा को
मुक्त शोषण से करेंगे,
वर्ग के
या वर्ण के
अंतर मिटा कर
विश्व-जन-समुदाय को
हम
मुक्त दोहन से करेंगे।” 28

युद्ध की भयावहता और उसके परिणामों को लेकर भी महेंद्रभटनागर चिंतित और व्याकुल हैं, पूरे विश्व को युद्ध की छाया से ग्रसित देख रहे हैं, चाहे वह युद्ध प्रत्यक्ष लड़ा जा रहा हो या उसकी शक्ल शीत युद्ध वाली हो। उनकी दृष्टि में युद्ध हर दशा में निंदनीय और दुष्परिणामों वाला होता है। वे ऐसे विश्व की कल्पना करते हैं जहाँ समन्वय की धरती हो और अहिंसा का मनोनिशान न हो। विश्व-शांति की स्थापना के लिए निशस्त्रीकरण का समर्थन करते हुए राष्ट्रों के आपसी द्वेषभाव को समाप्त करते हुए उन्हें सद्भाव, समता, मैत्री, समन्वय और मानवीयता का संदेश प्रसारित करते हैं-

“शीत युद्ध से समस्त विश्व त्रस्त
हो रहा मनुष्य भय विमोह ग्रस्त।
डगमगा रही निरीह नीति-नाव
जल अथाह, नष्ट पाल-बंधु-भाव।
राष्ट्र द्वेष की भरे अशेष दाह
मित्रता प्रसार की निबद्ध राह।” 29

उन्हीं के काव्य का एक और अन्य उदाहरण इसी संदर्भ में देखा जा सकता है-

“मनुष्य का भविष्य-
अंधकार से,
शीत-युद्ध-भय प्रसार से
मुक्त हो, मुक्त हो।
रश्मियाँ विमल विवेक की विकिरण हों,
शक्तियाँ विकास की विरोधिनी विदीर्ण हों।
वर्ग-वर्ण भेद से,
आदमी-ही-आदमी की कैद से
मुक्त हो, मुक्त हो।” 30

महेंद्रभटनागर के काव्य की अभिव्यंजना बहुत ही सादी, सीधी और सहज है। ऐसा सहजपन उनकी रचित कविताओं का प्राण बनकर आया है। बहुत अधिक कल्पना और शब्दों के जाल से कविता असहज, असपष्ट और बोझिल हो जाती है। महेंद्रभटनागर की कविता इस प्रकार के अवस्था से मुक्त अपने में मूल रूप में अभिधा के सर्वथा निकट है। जैसा सहज व्यक्तित्व है, वैसी ही सहज अभिव्यक्ति भी उनकी कविताओं में आगई है। कवि ने पहले-पहल अपनी कविताओं को छंदों में लिखना प्रारम्भ किया, परंतु समय की मांग के अनुसार वे जल्द ही मुक्त छंद की कविता लिखने लगे। छंदों के मोह और बंधनों से वे जीवन की मुक्तता के आधार पर बाहर आजते हैं और खुले मन से कविताओं को बंधनों से मुक्त मानते हुए आमजन के साथ जोड़कर कविता को कारगर बनाते हुए सार्थकता प्रदान करते हैं। अलंकारों की दृष्टि से कविता में अलंकारों का प्रयोग नहीं करते बल्कि स्वत: अलंकार उनके काव्य में समाहित हो गए हैं। अनुप्रास, उपमा, मानवीकरण, रूपक, विभावना, विरोधाभास इत्यादि अलंकारों को सहज रूप में देखा जा सकता हैं। प्रतीकों का इस्तेमाल वे पारंपरिक रूप में करते हुए कई नए प्रतिकों को भी अपनी सहजता से काव्य में ले आते हैं, अँधेरा, प्रकाश, दीप, बादल, रात, आदि अपने पारंपरिक रूप में मौजूद हैं। कवि की दृष्टि में कविता में विषय का महत्व है न कि उसकी शैली का। शैली तो स्वयं विषय के साथ लिपटकर चली आई है। उपमान का एक उदाहरण इस प्रकार है-

“ज़िन्दगी
एक बेतरतीव सूने बंद कमरे की तरह,
दूर सिकता पर पड़े तल-भग्न बजरे की तरह,
हर तरफ़ से कस रहीं गाँठें,
सुलझता कुछ नहीं!
ज़िन्दगी क्या?
धूमकेतन-सी अवांछित
जानकी-सी त्रस्त लांछित,
किस तरह हो संतरण
भारी भँवर, भारी भँवर!” 31

उनके काव्य की भाषा सहज और विषय के अनुकूल है, जहां वे तत्सम प्रधान शब्दावली में अपनी बात कहते हैं वहाँ उनके काव्य में एक अलग प्रकार का कसाव आजाता है, जो कविता में प्रभाव उत्पन्न करता है। शब्दों के प्रयोग में वे खुले हुए हैं, वैसे भी जो कवि जीवन में बाधाओं को काटने की बात करता है और सहजता, समता की बात करता है वो कभी भी संकुचित नहीं हो सकता इसी दृष्टि से महेंद्रभटनागर अपने काव्य में भाषा की दृष्टि से संकोची नहीं। हर प्रकार की शब्दावली उनके काव्य में मौजूद है। जहां वे तत्सम का प्रयोग करते हैं, वहाँ वे अरबी, फारसी शब्दों को भी सहजता से ग्रहण करते हैं। शब्दों से उन्हें न तो कोई परहेज़ है और न ही वे कहीं पर भाषा को लेकर आग्रही-दुराग्रही बने हुए हैं। भाषा की सहजता उनकी कविता को सीधे पाठकों के हृदय में उतार देती है। भाषा के लिए जो आवशयक प्रवाह कविता की मांग बना हुआ है उसका वे सफलता से निर्वाह कर जाते हैं, इसलिए उनकी भाषा में एक लायतमकता भी विद्यमान है, जबकि अधिकांश कविताएं मुक्त-छंद में रची हुई हैं।

निष्कर्षत्मक रूप से यह स्थिति हमारे समक्ष आती है कि कवि महेंद्रभटनागर काव्य जगत में एक ऐसे साधक की रूप में विद्यमान हैं, जिनकी अनवरत अथक यात्रा सत्तर वर्षों से चली आ रही है। यह दीर्घ और लंबा समय साहित्य जगत को और अधिक समृद्धि प्रदान करता है, साथ ही कई नई दृष्टियाँ प्रदान करता है। उनके काव्य में कई भावलोकों का समायोजन है, कई दृष्टियों विद्यमान है, कई भीतरी-बाहरी अवस्थाओं की अत्यंत गहरी अनुभूतियाँ मौजूद हैं। वे अपने जीवन में संघर्ष को महत्व देते हुए काव्य का आधार बनाते हैं और कविता को जनोपयोगी बनाते हैं। वे समता जैसे मूल्य को सबसे अधिक उपयोगी मानकर ससमस्त संसार में उसकी स्थापना को बल प्रदान करते हैं। प्रगतिशीलता उनके काव्य का प्राण माना जा सकता है, क्योंकि वे मानवीय विकास कि चिंता अपने साहित्य में दर्शाते हैं और शोषण से मुक्ति की प्रबल कामना करते हुए क्रांति के पथ का निर्माण करते हैं। यथार्थ को वे अपनी काव्य का आधार बनाते हुए उसके विकास की बाधाओं को चिन्हित करते हैं और रूढ़ियों से मुक्तता को प्राथमिकता प्रदान करते हैं। वे अपने काव्य में आशा को प्रबल रूप में अभिहित करते हैं, क्योंकि मानव जबतक है, उसे कभी परिस्थितियों के समक्ष हारना नहीं चाहिए, उसे बार-बार उठाकर लड़ना चाहिए। आशा हमें ऐसी है अवस्था का ज्ञान कराती है, इसलिए वे आशा के गीत गाते हैं। वे मानवीय समुदाय की समता, न्याय और अधिकारों की चिंता अपने काव्य में करते हैं, केवल अपने देश का मनुष्य सुखी न हो, बल्कि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति विकास और उन्नति करे इस बात को वे वैश्विक विकास की दृष्टि से कविता के माध्यम से दर्शाते हैं। उनके लिए मनुष्य केवल मनुष्य है, वे लिंगभेद, जातिभेद, रंगभेद, धर्मभेद, भाषाभेद, प्रांतभेद की खुलकर निंदा करते हैं और समन्वय के मार्ग को अपनाने की बात करते हैं। कवि का मानना है कि अब समय आचुका है कि हमारी नवीन पीढ़ी नए मूल्यों का खुलकर स्वागत करे और पुराने मूल्यों के स्थान पर नए मूल्यों का निर्माण हो। वे परंपरा का अनुमोदन कम करते हुए नवीनता, मौलिकता और समय के बदलाव को महत्व प्रदान करते हैं। वे वर्तमान राजनीति पर खिन्न और दुखी होकर खेद प्रकट करते हैं। देश हित की कामना उनके काव्य में एक उच्चस्तर की अवस्था का संकेत देती है, कवि की दृष्टि में देश और समाज पहले है फिर व्यक्ति का समर्थन करते हैं, वे आजकल के रानीतिक नेतृत्व से संतुष्ट न होकर राजनीति को धोखादायक होना दर्शाते हैं और आमजन के समर्थन में उससे बचे रहने की बात को स्पष्ट करते हैं। धर्म की संकीर्ण सीमाओं को तोड़कर समन्वय और एकता को वह अवशयक मानते हुए नए समाज और नए विश्व की रचना को महत्व देते हैं, ताकि दुनिया से हर प्रकार के विवाद ही समाप्त हो जाएँ, समस्याएँ हीं समाप्त हो जाएँ । नए विश्व की कल्पना आज के वैश्वीकरण के बहुत निकट है, आज वैश्वीकरण अर्थ के आधार पर हो रहा है, वे मानवीय आधार पर वैश्वीकरण चाहते हैं। उनकी ऊर्जावान रचनाओं की मूल चिंता मानवीय विकास, समता, समन्वय, देश-हित और नए सकारात्मक मूल्यों का निर्माण है, साथ ही कविताओं का लक्ष्य वर्तमान मनुष्य के लिए अधिक उपयोगी होने के साथ भविष्य में बेहतर मानवीय समाज के लिए कारगर सिद्ध होता है।
 

संदर्भ-

1. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-10
2. वही, पृष्ठ-11
3. वही, पृष्ठ-12
4. वही, पृष्ठ-23
5. डॉ. रामसजन पाण्डेय (संपादक)-महेंद्रभटनागर की काव्य-यात्रा, प्रकाशन-गौरव बुक्स, वैस्ट घौंडा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012, पृष्ठ- 37
6. महेंद्रभटनागर-महेंद्रभटनागर-समग्र, खंड-3, प्रकाशन-निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ-135
7. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-5
8. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-42
9. डॉ. रामसजन पाण्डेय (संपादक)-महेंद्रभटनागर की काव्य-यात्रा, प्रकाशन-गौरव बुक्स, वैस्ट घौंडा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012 पृष्ठ- पृष्ठ-21
10. वही, पृष्ठ-91
11. महेंद्रभटनागर-समग्र-महेंद्रभटनागर-समग्र, खंड-2, प्रकाशन-निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ-305-06
12. डॉ. रामसजन पाण्डेय (संपादक)-महेंद्रभटनागर की काव्य-यात्रा, प्रकाशन-गौरव बुक्स, वैस्ट घौंडा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2012 पृष्ठ-104
13. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-26
14. वही, पृष्ठ-27-28
15. वही, पृष्ठ-37
16. वही, पृष्ठ-68
17. महेंद्रभटनागर-समग्र’-महेंद्रटनागर-समग्र, खंड-2, प्रकाशन-निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ-172-73
18. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-15
19.वही, पृष्ठ-19
20. वही, पृष्ठ-22
21. वही, पृष्ठ-24
22. वही, पृष्ठ-32
23. महेंद्रभटनागर-समग्र-महेंद्रटनागर-समग्र, खंड-3, प्रकाशन-निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ-198
24. वही, पृष्ठ-323
25. महेंद्रभटनागर-सृजन-यात्रा, इंडियन पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूशन, 166-डी, कमला नगर, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ-38-39
26. वही, पृष्ठ-33
27. वही, पृष्ठ-34
28. वही, पृष्ठ-42
29. वही, पृष्ठ-44
30. वही, पृष्ठ-45
31. महेंद्रभटनागर-समग्र’-महेन्द्रभटनागर-समग्र, खंड-2, प्रकाशन-निर्मल पब्लिकेशन्स, शाहदरा, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ-367-68

 

लेखक : 


डॉ. मोहसिन ख़ान
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष
एव शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय
अलीबाग-402 201
ज़िला-रायगड़-महाराष्ट्र
ई-मेल- Khanhind01@gmail.com
मोबाइल-09860657970



Article on Mahendra Bhatnagar by Dr Mohsin Khan

1 टिप्पणी:

  1. पूर्वाभास के संपादक महोदय और सम्पूर्ण संपादक मण्डल का बहुत आभार!!! आज के महत्वपूर्ण कवि महेन्द्रभटनागर पर मेरा आलेख प्रकाशित किया। सहयोग के लिए पुन:आत्मीय आभार!!!

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