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शनिवार, 25 मार्च 2017

​समीक्षा : स्त्रियों की छद्म आज़ादी का सूरज फेसबुक की झिर्रियों से

उपन्यासकार – सूरज प्रकाश
उपन्यास - नॉट इक्वल टू लव
संस्कारण – 2016
प्रकाशन – स्टोरी मिरर प्रा.लिमिटेड, हरियाणा
मूल्य- 150/-


विश्व में जब भी नवीन वैचारिक उत्स्दन, दर्शन, फ़िलासॉफ़ी, विज्ञान और तकनीक का जन्म होता है, तो विश्व का अधिकांश लोक भाग उससे या तो सीधे प्रभावित होता है या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होता है, लेकिन प्रभावित अवश्य होता है। वर्तमान समय में तकनीक के नए-नए प्रयोगों ने नए-नए जनसंचार साधनों का विकास किया है और इन नए संचार साधनो ने विश्व के व्यक्तियों को आपस में बहुत निकट लाने का प्रयास किया है। फिर भी इस निकटता में अभी भी एक बाधा भाषा की बनी हुई है। हो सकता है यह बाधा आने वाले समय में समाप्त हो जाए, तब तकनीक के इन संचार माध्यमों की उपयोगिता और अधिक बढ़ जाएगी, गति तेज हो जाएगी, इसका अधिक से अधिक महत्व बढ़ेगा और गहरी आवश्यकता बन जाएगी। इस सदी में संचार साधनों ने जितनी तेज गति में विकास किया है और अभिव्यक्ति के नए-नए मंच उपलब्ध कराए हैं, यह अभिव्यक्ति की एक अद्भुत दुनिया के द्वार खोलता है। नए-नए संचार साधनों के विकसित होने से मानवी जीवन के कई भाग प्रत्यक्षत: प्रभावित हुए हैं। आज संचार साधनों ने मनुष्य के जीवन की दिशा और दशा को बदल दिया है। अब वह पहले से भी अधिक संपर्कों की दुनिया में जी रहा है, जो उसे अधिक उदार बनाते हुए समन्वयी बना रहे हैं साथ ही साथ अधिक मानवीय और क्रियात्मक बना रहे हैं। संचार साधनों में फेसबुक एक प्रसिद्ध, उपयोगी, सार्थक, त्वरित संपर्कों का ऐसा सामाजिक नेटवर्किंग मंच है, जिसने सारी दुनिया को संकुचित करके कंप्यूटर की एक वॉल पर लाकर उपस्थित कर दिया है। फेसबुक का प्रारंभ 2004 में हार्वर्ड के एक छात्र मार्ग ज़ुकेरबर्ग ने किया तब इसे द फेसबुक नाम दिया गया था, परंतु अगस्त 2005 में इसका नाम फेसबुक कर दिया गया। ज़ुकेरबर्ग ने इस तकनीकी परिकल्पना के विषय में कभी इतनी बड़ी उड़ान के बारे में नहीं सोचा था कि यह विश्व का एक सशक्त संपर्क जनसंचार माध्यम सिद्ध होगा। आज विश्व में फेसबुक पर लगातार लोगों के खाते बन रहे हैं और इस संचार माध्यम का उपयोग कर रहे हैं। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोला सारकोजी जैसी महान हस्तियां भी इससे जुड़ी और सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से संवाद स्थापित कर पा रहे हैं। आज यह नि:शुल्क जनसंचार का साधन होने के साथ-साथ जनतांत्रिक संवाद पद्धति का एक उपयोगी और महत्वपूर्ण सबल माध्यम बन चुका है।

इसी माध्यम को केंद्रित करते हुए हिंदी का पहला चैट उपन्यास ‘नॉट इक्वल टू लव’ 2016 में हिंदी भाषा में अपनी नवीनता के साथ साहित्य की दुनिया में आता है, जिसके रचयिता प्रसिद्ध कथाकार, अनुवादक सूरज प्रकाश हैं। यूँ तो सूरज प्रकाश ने 1997 में एक कहानी लिखी थी जिसका नाम- ‘दो जीवन समांतर’ है। यह कहानी भी संवादों पर आधारित कहानी थी, जिसमें टेलीफोन की बातचीत को कहानी का रूप दिया गया था। तब भी ये शैली नई शैली थी, लगभग इस कहानी को आज 20 वर्ष हो चुके हैं। इस कहानी के साथ फेसबुक के प्रयोग से एक और सशक्त कहानी ‘लहरों पर बांसुरी’ दो वर्ष पहले लिखी थी जो बेहद सफल रही। अब 2016 में ‘नॉट इकवाल टू लव’ शीर्षक से उपन्यास में बांधकर कहानी की नई शैली संवाद शैली (चैट) फेसबुक के माध्यम से हमारे सामने आती है, जो उपन्यास शैली के अंतर्गत नई शैली के विकास की नई गति सामने लाती है। यूँ तो हिन्दी उपन्यासों की श्रृंखला में हिन्दी में हजारों उपन्यास आए, जो विषयों के प्रतिपादन में नए चौंका देने वाले विषय लेकर उपस्थित हुए। कई उपन्यास अपनी मौलिक शैली के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। परंतु मेरी दृष्टि में सूरज प्रकाश सिर्फ कथाकार नहीं हैं, बल्कि वह एक प्रयोगशील कथाकार हैं। प्रयोगशील इन अर्थों में मानूंगा कि वे तकनीक का साहित्य के लिए उपयोग करते हैं और उपयोग करने के साथ निरंतर वह उसका प्रयोग भी करते हैं। यह उपन्यास नवीन शैली में रचित तकनीक के प्रायोगिक रूप का प्रमाण है, जो उपन्यास के नए तेवर को नई शिल्प योजना में आबद्ध करके हमारे समक्ष रखता है। फेसबुक के माध्यम से यह उपन्यास जहाँ उपन्यासों की छवि को बदल रहा है, वहीं ये उपन्यास फेसबुक की छवि को सकारात्मक रूप में समाज में स्थापना भी दिला रहा है। ये उपन्यास की विशेषता और उसके अंतर्प्रभाव का परिणाम दिखाई देता है। उपन्यासकार ने फेसबुक के माध्यम से हुई चैटिंग के द्वारा संवादात्मक स्तर पर कहानी का ताना-बाना बुना है, जो एक नई कला को बुनने और उसे विकसित करने की राह सुझाता है। प्राय: प्रथम दृष्टि में कोई भी पाठक यह मान सकता है कि संवादों के माध्यम से कैसे किसी कहानी को आकार दिया जा सकता है? क्योंकि चैट कथा तत्व को कैसे उत्पन्न कर सकता है या चैट में कथा तत्वों का समायोजन कैसे हो सकता है? परंतु इस नई शैली के उपन्यास ने यह बात सिद्ध कर दी है किसी संवादों के माध्यम से भी कथा बुनी जा सकती है। इस उपन्यास में उन समस्त तत्वों का समावेश संभव हुआ है, जो एक कहानी गढ़ने के लिए आवश्यक होते हैं। इस उपन्यास में संवादों की भरमार है, लेकिन कहीं भी कहनीपन समाप्त या कम नहीं हुआ है। उपन्यास में चैट अथवा संवाद केवल संवाद नहीं, बल्कि संवादों के माध्यम से कही हुई एक लंबी कहानी है, जिसे उपन्यास की शक्ल दी गई है। संवाद ही कहानी के माध्यम बने हुए हैं और इन्हीं संवादों में कहानी छिपी हुई है। यह अंतर संगुंफन इतनी बारीकी से गूँथा हुआ है कि संवाद कहानी है, कि कहानी संवाद का माध्यम बनती है, कहना बड़ा मुश्किल हो जाता है। मेरी दृष्टि से संवाद के माध्यम से कहानी आगे बढ़ी है और कहानी का मूल प्राण संवाद ही है। वर्तमान में तकनीक का इतना अधिक विकास किया है कि लोगों को अपने मन के विचार स्पष्ट करने के लिए नए-नए मंच मिले हैं, इन मंचों में उसने अपने जीवन की दुविधाएं, समस्याएं, हर्ष, उल्लास, प्यार, सुख, दुख, सफलता, असफलता, खीज, झुंझलाहट, वैचारिक मत, फिलॉसॉफी के साथ-साथ निजी जीवन के उन पक्षों को भी अभिव्यक्ति प्रदान की है, जो वह प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति के सामने कोई नहीं कर पाता है। फेसबुक या अन्य चैट संसार एक ऐसा स्पेस तैयार करता है, जहां व्यक्ति अंतरंगता से प्रतिव्यक्ति से गहरा जुड़ाव महसूस करता है, जो कि सामने नहीं कर पाता है। उपन्यास ‘नॉट इकवाल टू लव’ भी एक ऐसी ही कहानी है, जिसमें एक नायिका और लेखक नायक अपने मन की बात को समाज के प्रत्यक्ष उपस्थित व्यक्ति को न कहकर ऐसे अनदेखे व्यक्तित्व के सामने अपनी अभिव्यक्ति देते हैं, जो कि आभासी दुनिया के नाम से पहचानी जा रही है। माना जाता है कि जनसंचार के संपर्कों की उपस्थित दुनिया आभासी दुनिया होती है, परंतु मैं मानता हूं कि यह आभासी दुनिया नहीं बल्कि एक खरी दुनिया है, जिसमें हम वह सब कुछ बिना किसी डर और खतरे के अभिव्यक्त करते हैं, जिसे हम अपने आप से भी कभी-कभी हम छुपा लेते हैं। इसलिए यह दुनिया आभासी नहीं, बल्कि एक खरी दुनिया है। ‘नॉट इकवाल टू लव’ ऐसी ही खरी दुनिया के दो पक्षों की चैट है, जिसमें एक नायिका है, जो लेखक के संपर्क में आती है। यह संपर्क 18 मई 2014 से शुरू होता है और 8 मई 2015 तक निरंतर चलता है। लगभग 1 वर्ष के अंतराल की यह चैट कहानी अपने आप में एक रोमांच लेकर उपस्थित होती है, जिसमें नायिका (उन समस्त स्त्रियों की प्रतिनिधि जो इस कथा सा जीवन जीती हैं) एक छोटे से शहर में उत्तर भारत में रहती है, जो शादीशुदा है। लेखक भी शादीशुदा है और वह नायिका से उम्र में भी बहुत बड़ा है। दोनों के बीच धीरे-धीरे चैट का सिलसिला शुरू होता है। यह चैट का सिलसिला कोई झूठी लफ्फाजी या टाइमपास का नतीजा नहीं, बल्कि यह चैट गंभीर मुद्दों से होती हुई जीवन की विभिन्न भावनाओं और घटनाओं को दर्शाता हुआ एक कथात्मक स्वरूप लेकर उभरता है, जो धीरे-धीरे कहानी को आगे बढ़ाता है। नायिका विवाह के पश्चात उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में नई जिंदगी शुरू करती है। उसके पति सुरिंदर आड़त का काम करते हैं (जिसमें अनाज की खरीदी बिक्री की जाती है)। नायिका तीन विषयों में एम.ए. है और उसके कुछ स्वप्न थे जो उसके विवाह के पहले उसने देखे थे, लेकिन विवाह के पश्चात वह स्वप्न, स्वप्न ही रह गए। नायक लेखक नायिका दोनों उपाय जुटाते हैं कि हम अपना छद्म नाम रखें और इस छद्म नाम के माध्यम से ही चैटिंग की जाए। इसलिए नायक अपना प्रिय नाम देव चुनते हैं और नायिका को छवि के रूप में संबोधित करते हैं। नायक देव और छवि समय-समय पर जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में जीते हुए चैट करते हैं। वास्तव में लेखक की ये चैट किसी एक महिला से किए गए चैट का परिणाम नहीं, बल्कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग महिलाओं से की गई चैट और उनकी यथास्थिति को एक रूप में साकार कर देने का परिणाम है। इस चैट के दौरान नायिका धीरे-धीरे अपने जीवन की विडंबनाओं, त्रासदियों, चाहत, प्रेम-संबंध इत्यादि विषय में नायक से संवाद करते हुए धीरे-धीरे खुलती है। छवि चाहती है कि वह अंग्रेजी में पीएच.डी. करे। किसी कॉलेज में लेक्चरर हो जाए, परंतु मध्यमवर्गीय बंदिशें उसे यह सब करने के लिए रोकती हैं। छवि यह निश्चित नहीं कर पाती है कि वह अपने परिवार में प्रसन्न है या नहीं? सुखी है या नहीं? कभी तो उसे आभास होता है कि वह अपने परिवार की बहुत चाहिती बहू है और बहुत सुखी और संपन्न है। परंतु कभी-कभी उसे आभास होता है कि वह नकली जीवन जी रही है। वास्तव में उसके स्वप्न ही उसका जीवन है, लेकिन स्वप्न पूरे न कर पाने की असमर्थता उसे भीतर-ही-भीतर उद्वेलित करके उसे बेचैन किए रखती है।

देव ने छवि के माध्यम से भारत की उन असंख्य महिलाओं की आजादी के विषय में प्रश्न उपस्थित किया है, जिसमें उन्हें धोखा दिया जाता है कि वह इस समय में आजाद हैं। वास्तव में वह इस समय में आजाद नहीं, बल्कि आजादी का छद्म लिए छली हुई, दबी हुई, डरी हुई एक स्त्री है, जो किसी अन्य पुरुष से किसी भी प्रकार का संबंध रखने पर प्रताड़ित की जाएगी, उसे नीचा दिखाया जाएगा तथा समाज में उसे कलंकित माना जाएगा। छवि मात्र एक नायिका नहीं, बल्कि वह उन भारत की उन समस्त स्त्रियों का प्रतिनिधित्व कर रही है, जो मध्यमवर्ग का जीवन जीती हुई अपने को आजाद करने की ललक में तड़प-तड़प कर आजादी की खिड़कियों से छलांग लगाना चाहती हैं। लेकिन आज़ादी की छलांग लगाने के बाद उनके पास शेष क्या रह जाता है? यह उसी प्रकार की छद्म आजादी की कथा है, जैसे किसी पक्षी को वर्षों पिंजरे में पालो और फिर उसे आजादी के नाम पर उसके पिंजरे का छोटा सा दरवाजा खोल दो। पक्षी बड़ा खुश हो जाता है कि वह आजाद हो गया, लेकिन वह सोचता है; ऐसी आजादी पाकर वह अब करेगा क्या? जाएगा कहां? खाएगा क्या? वह वास्तव में उड़ान भरना भी भूल चुका होता है। इसलिए वह आदतन फिर से पिंजरे में लौट आता है। स्त्री का जीवन भी ऐसी ही छद्म आजादी से भरा हुआ है, जिसमें वह पिंजरे में कैद है और पिंजरा उसमें क़ैद है। देखा जाए तो पिंजरे में स्त्री है और स्त्री में पिंजरा है। वास्तव में स्त्री की आजादी का यह छद्म झुनझुना देश के हर गली-मोहल्ले, शहर-गांव की सड़कों पर बजाया जा रहा है और वास्तव में राज तो आज भी पुरुष सत्ता का ही है। उपन्यासकार ने उपन्यास में उन यथार्थ स्थितियों को दर्ज किया है, जिसमें स्त्रियों को सामाजिक, राजनीतिक आज़ादी तो मिल रही है, लेकिन राज अब भी उनके पति या पिता ही कर रहे हैं। छवि इस बात को बेहतर तरीके से उदाहरण देकर समझाती है कि- 
-“अभी कुछ दिन पहले यहां स्थानीय निकायों के चुनाव हुए थे। बहुत सारी सीटे महिलाओं के लिए आरक्षित थीं तो जब चुनावी पोस्टर लगे सब तरफ तो पोस्टर पढ़ कर ही खूब हंसी आती थी।”

-“जैसे? ”

-“भीमसेन चक्की वाले की पत्नी दुलारी बाई को वोट दें या रामसेवक सुनार की बहू गुलाबी को वोट देकर सफल बनाएं। पोस्टर पर जिस महिला की तस्वीर होती थी लगता था पहली बार कैमरे के सामने आई है।”

-“यह है आजादी का पैगाम मैडम। अब तय है इनमें से कोई तो चुन कर आएगी। चतुरलाल की या चोखेलाल की। वह बेचारी पहले की तरह उपले थापती रहेगी और चतुर लाल जी अपना धंधा छोड़ कर राजनीति की गोटियां बिछाएंगे” (पृष्ठ 140-141)

वास्तव में मध्यमवर्गीय या निम्न मध्यमावर्गीय परिवारों में स्त्री-पुरुष संबंधों की जो बुनियाद है, वह टेढ़ी-मेढ़ी ही रखी हुई है। पुरुषवादी मानसिकता आज भी अपने चरम पर है। कहानी में सुरिंदर किसी अन्य स्त्री को अपने साथ संबंधों की आजादी पाने के लिए छवि को भी उसके पूर्व प्रेमी चन्दन से मिलने की झूठी आजादी की अनुमति देता है। लेखक देव इस बात को छवि को समझाता है कि तुम्हें तुम्हारे पति ने जो तुम्हें आजादी दी है; वास्तव में वह आजादी तुम्हें नहीं दी, बल्कि वह आजादी उसने अपने लिए सुरक्षित कर ली है। भारत का कोई भी पुरुष ऐसा नहीं जो अपनी पत्नी को अपने पूर्व प्रेमी के हाथ में सौंप दे। लेखक इस मुद्दे को बड़ी साफगोई से उठाते हैं और पुरुषवादी मानसिकता को उनका आईना दिखाते हैं।

उपन्यास मध्यमवर्गीय जीवन के चित्रों को तो दर्शाता ही है साथ ही साथ कस्बाई मानसिकता को भी दर्शाने का प्रयास करता है। आज भी भारत के कई कस्बे, छोटे शहर उन ही रूढ़िगत मार्गों से अपना सफर तय कर रहे हैं जहां पर छोटी मानसिकता का बड़ा बोल-बाला है। जहां पर स्त्रियों को आजाद न रखने और उन पर पाबंदियां कसे रहने की भरपूर कोशिश जारी रहती है। लेखक अपने उपन्यास में न केवल कस्बाई मानसिकता को दर्शाता है, बल्कि वह मुंबई जैसे महानगर की विडंबनात्मक स्थितियों की भी चर्चा करता हुआ स्त्रियों के जीवन को दर्शाता है। जहां वर्तमान में लड़कियां लिव इन रिलेशनशिप को महत्व दे रही हैं। लेकिन यह रिश्ता बाहर से आई हुई नौकरीपेशा लड़कियां अधिक मात्रा में अपना रही हैं, जो लड़कियां मुंबई की लोकल लड़कियाँ हैं वह इस तरह की आज़ादी की या तो पक्षधर नहीं है या उन्हें इस प्रकार की आजादी मिली ही नहीं है।

-“अभी तुमने मुंबई में लड़कियों के लिव इन में रहने की बात की”। लेकिन यहाँ मुंबई में आज भी लड़कियों का एक बहुत बड़ा तबका रहता है जो रहता बेशक मुंबई में है, लोकल भी है, जीवन कुछ हद तक आधुनिक भी है लेकिन बंदिशें उसके हिस्से में उतनी ही है जितनी किसी छोटे शहर में लड़कियों के हिस्से में आती हैं।” (पृष्ठ 139)

स्त्री आज़ादी को लेकर उपन्यास में छवि के माध्यम से एक लंबा चैट (22 अक्तूबर 2014 रात 11:47 मिनिट) पृष्ठ क्रमांक 63 से प्रारम्भ होकर पृष्ठ 70 तक चलता है, जिसमें स्त्री की आज़ादी के स्वप्न के साथ उस पर बन्दिशों का एक लंबा पीड़ादायक सिलसिला दिखाई देता है। वास्तव में इस चैट के द्वारा स्त्री की आज़ादी के ज्वलंत प्रश्न उठाए गए हैं और उपन्यास इस बात को केंद्र में रखकर अपनी कथा को गति देता है, जो इस उपन्यास की विशेषता के साथ इसकी महत्ता का प्रतिपादन दर्शाता है। इस चैट का अंश भारतीय स्त्रियों की आज़ादी की छद्म-कथा के साथ उनके रहस्यमयी चरित्र का यथार्थ अंकन है। स्त्रियों के साथ उनकी छद्म आज़ादी का चमकता सूरज फेसबुक की झिर्रियों से दिखाई देता है। जनसंचार ने स्त्रियों के जीवन पर सीधा प्रभाव डाला है और स्त्री किसी न किसी रूप में इस मंच से अपने को कुछ हद तक अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में तो ला पाई है, लेकिन यह भी सत्य है कि वह भीतर से बहुत डरी हुई है। उसे डर है कि यह मुक्त अभिव्यक्ति उसके जीवन को और अधिक उलझा न दे। वह इस बात से आशंकित और भयभीत है कि कहीं कोई सिर पर हाथ फेरते-फेरते पीठ न सहलाने लगे।

दरअसल उपन्यास उन मानसिक अवस्थाओं को उघाड़ रहा है जहां पर स्त्री आज़ादी के छद्म रूप का बेजा ढोंग किया जा रहा है। वास्तव में कहीं तो स्त्रियाँ स्वयं को आज़ाद कराने पर तुली हुई हैं और कहीं स्त्रियाँ ये निश्चित नहीं कर पा रही हैं कि आज़ादी पाकर हम करेंगे क्या? लेखक इसी दुविधा को बखूबी उपन्यास के माध्यम से उजागर करता है कि भारत की स्त्री चाहे वह कस्बों, गांवो या महानगरों में जी रही हो; वास्तव में वह उस आज़ादी की हकदार न हो पाई है जिसमें उसके पक्ष में आज़ादी के नारे लगाए जा रहे हैं। लेखक उन स्त्रियों के जीवन को भी बराबर दर्शा रहा है, जो कि उत्तर आधुनिकता के दौर में खुलकर जी रही हैं और वे उस कल्चर को अपनाई हुई हैं, जिसे आज स्त्री जीवन होने के नाते हेय रूप में माना जाता है। लेखक छवि को बताता है कि बड़े शहरों की महिलाएं अपनी पार्टी के दौरान वह सब करती हैं जो पुरुष करते हैं, वे बेहिचक ड्रिंक करती हैं। फेसबुक के इस मज़बूत चैट विकल्प के माध्यम से स्त्री की छद्म आज़ादी का वह रूप साकार होकर पाठक के समक्ष उभरता है जहां से स्त्री की आज़ादी की पीड़ा, अभिव्यक्ति का संतोष, एकांत दुनिया के स्वप्न और गोपनियता का पक्का विश्वास झलकता है।

नॉट इक्‍वल टू लव पढ़ कर अहमदाबाद की युवा कवयित्री प्रीति अज्ञात लिखती हैं- “'नॉट इक्‍वल टू लव' को पढ़ते हुए आप किसी-न-किसी रूप में कहीं स्वयं को ही जीता हुआ महसूस करेंगे। फेसबुक की दुनिया में पनपती मित्रता, जुड़ाव और संबंधों की मर्यादा को बनाये रखते हुए लिखा गया यह लघु उपन्यास एक जीवंत चित्र की तरह आँखों के सामने चलता है। देव और छवि की दोस्ती हमारे साथ या आसपास घटित, वाक़या ही लगती है। दोनों ही पात्र आर्थिक रूप से संपन्न हैं और कहीं भावनात्मक सहारे की तलाश में हैं। इसे तलाश कहना भी उचित प्रतीत नहीं हो रहा, ये संभवत: एक रिश्ता है जो मन की दरारों से जगह बना परस्पर स्नेह और भावनात्मक संबल की छाँह तले स्वत: ही पल्लवित होता जाता है। जहाँ दोनों साथ हँसते हैं, सुख-दुःख बाँटते हैं और आत्मविश्वास से भर अपनी-अपनी दुनिया में प्रसन्नचित्त लौट जाते हैं।”

उपन्यास की कथा में देव और छवि के रोजमर्रा के जीवन की घटना और संवाद उपन्यास को और भी रोचक तथा जीवंत बनाए रखने में सहायक सिद्ध होते हैं। यह संवाद मात्र संवाद नहीं बल्कि पाठक को महसूस होता है कि यह संवाद व्यक्ति खुद साध रहा है। देव इस उपन्यास में साक्षी भाव के साथ एक फ्रेंड फिलोसोफ़र की भूमिका का निर्वाह करते हैं और अपने लेखकीय जीवन के कई किस्से तथा रूपों को दर्शाते हुए, एक लेखक की रचना प्रक्रिया को भी अभिव्यक्ति प्रदान कर रहे हैं। इस दृष्टि से उपन्यास लेखक के आत्मकथ्य का बहुत प्रामाणिक ब्योरा बन जाता है। लेखक ने अपनी लेखकीय दुनिया से तो साक्षात्कार कराया ही है साथ ही लेखक की अनुसंधानात्मक दृष्टि से अन्य लेखकों की आदतों और उनकी सनकों का भी ज़िक्र उपन्यास के संवादात्मक अंश बनकर उभरे हैं। वास्तव में लेखक ने लेखकों की दुनिया नाम से रोचक किस्से पहले ही पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किए हैं और वही जीवंत अंश इस उपन्यास के भी हिस्से बन गए हैं। इसके अतिरिक्त लेखक देव और छवि को शौक़ भी उपन्यास के आत्मकथ्य रूप को दर्शाते हुए आपसी रुचियों के आदान-प्रदान को रेखांकित करते हैं, जिनमें संगीत, गायकी, ओशो के प्रवचन, मेडिटेशन शामिल हैं। निजी जीवन के ये अंश भी उपन्यास को पाठकों के बहुत निकट लाता है। यह उपन्यास निराकार पत्रों द्वारा रचित है, परंतु ये निराकार पत्र साकार रूप में अपनी उपस्थिती हमारे मानस में दर्ज कराते हैं। इस प्रकार की शैली में रचित उपन्यास की एक बेहद विशेष बात यह है कि हिन्दी को यह उपन्यास तकनीक के साथ जोड़ता हुआ हिन्दी भाषा का तकनीक में उपयोग करना भी सिखाता है और भाषा विकास में सहयोग भी दर्शाता है। लेखक देव छवि से हिन्दी (नागरी लिपि) में ही चैट करने का आग्रह करता है। यह बात लेखक की भाषा के प्रति प्रतिबद्धता को उजागर करने के साथ अन्यों में हिन्दी के प्रति अभिरुचि जागृत करते हुए हिन्दी के मोहपाश में अनायास रूप में बांध देता है। ‘नॉट इकवाल टू लव’ की संवादात्मक भाषा अत्यंत सरल, सहज और बोधगम्य है। भाषा के खुलेपन का प्रयोग लेखक ने बराबर बनाए रखा है जिससे स्पष्ट होता है कि उपन्यास अपनी सहजता में रचा गया है। भाषा में कहीं कोई बनावटीपन नहीं; बल्कि चैट की भाषा का वास्तविक रूप प्रस्तुत करता है। लेखक ने कहीं भी भाषा के संकोच और अर्थ विस्तार की चिंता नहीं की है और दैनिक जीवन के सहज रूप में प्रयुक्त उन शब्दों को बेलोस तरीके से प्रस्तुत किए हैं, जिनका प्रयोग आम जनता अपने चैट के दौरान करती जा रही है। भाषा की दृष्टि से उपन्यास लोकतान्त्रिक भाषा के बहुत निकट और सम्प्रेषण में कारगर नज़र आता है। इसमें उन रोज़मर्रा के सबदों का समावेश है जिनका प्रयोग हम कहीं न कहीं आग्रह-दुराग्रह के बिना अपनी सहजता से किये रहे हैं। चैट के दौरान दोनों पक्षों ने अँग्रेजी, उर्दू शब्दावली का प्रयोग अपनी सहजता से करते हुए शब्दों के प्रयोग के साथ अपनी भाषा में लोकोक्तियों और मुहावरों का इस्तेमाल किया है जो चैट की भाषा को और पुख्ता बनाते हैं। संवादों में गतिशीलता, वैविध्य और प्रवाह होने के कारण उपन्यास अपनी पठनीयता तथा रोचकता के स्तर को बराबर बनाए रखता है पाठक इससे बंधा रहता है। अंतत: कहा जाए तो अपनी समग्रता में ‘नॉट इक्वल टू लव’ उपन्यास आज के समय की मांग का एक नवीन बेहतर उपन्यास बनने की नयी पद्धति के प्रयोगात्मक स्तर का चैट दस्तावेज़ है, जो कहानी के नयेपन के साथ वर्तमान सामाजिक विसंगतियों को उजागर करता हुआ स्त्री की छद्म आज़ादी का सच्चा बयान अपनी कथात्मक प्रवृत्तियों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। उपन्यास ने नया भाव और शिल्प पकड़ा है, जो प्रगतिशील और परिवर्तनशीलता के स्वभाव और चरित्र को अपने भीतर समेटे हुए है। इसे लेखक सूरज प्रकाश का नया कौशल माना जाना चाहिए।


समीक्षक :
डॉ. मोहसिन ख़ान
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष
जे. एस. एम. महाविद्यालय,
अलिबाग़-जिला-रायगढ़
(महाराष्ट्र) ४०२ २०१



Suraj Prakash/ Mohsin Khan