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रविवार, 28 नवंबर 2021

अतीत से वर्तमान : नवगीत वाङ्मय — डॉ रणजीत पटेल

 


[पुस्तक : नवगीत वाङ्मय, संपादक : अवनीश सिंह चौहान, प्रकाशक : आथर्सप्रेस, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष : 2021 (संस्करण प्रथम, पेपर बैक), पृष्ठ : 174, मूल्य रु 350/-]

इक्कीसवीं सदी में देखा गया है कि लगभग हर दो-तीन वर्ष में नवगीत के संकलन प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें कुछ वृहद संकलन हैं, तो कुछ संक्षिप्त भी। इन संकलनों के द्वारा नवगीत सृजन के समसामयिक परिदृश्य को प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है। इस क्रम में सद्यः प्रकाशित संकलन- 'नवगीत वाङ्मय' यशस्वी नवगीतकार एवं संपादक डॉ अवनीश सिंह चौहान के संपादन में प्रकाशित हुआ है। यह संकलन चार उपशीर्षकों में संयोजित है। पहला भाग- 'समारंभ' है, जिसमें क्रमशः जन्मतिथि के अनुसार डॉ शम्भुनाथ सिंह, डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया एवं राजेंद्र प्रसाद सिंह शामिल है। इन वरिष्ठ नवगीतकारों के तीन-तीन नवगीत उद्धृत हैं। दूसरा भाग- 'नवरंग' है, जिसमें गुलाब सिंह, मयंक श्रीवास्तव, शांति सुमन, राम सेंगर, नचिकेता, वीरेंद्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, विनय भदौरिया एवं रमाकांत शामिल हैं। इन सभी के नौ-नौ नवगीत उद्धृत हैं। तीसरा भाग- 'अथ-बोध' है, जिसमें नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर एवं 'नये-पुराने' पत्रिका के संपादक दिनेश सिंह का आलेख- 'गीत की संघर्षशील जयी चेतना' पठनीय है। अंतिम भाग में वरिष्ठ नवगीतकार डॉ मधुसूदन साहा जी से डॉ अवनीश सिंह चौहान द्वारा लिया गया विशिष्ट साक्षात्कार है। यानी कि पूरे संकलन में अतीत से वर्तमान तक नवगीत की दशा-दिशा का बोध होता है। 

भूमिका- 'प्रसंगवश' में संपादक डॉ अवनीश जी द्वारा संक्षिप्त, किंतु सारगर्भित समालोचनात्मक आलेख प्रस्तुत किया गया है। आजकल नवगीत पर केंद्रित कतिपय प्रसंगों को अलग रखकर देखें, तो यह विमर्श अत्यंत प्रभावी एवं उपयोगी है। कहने को तो कोई भी संकलन या ग्रंथ परिपूर्ण नहीं होता है- 'रामचरितमानस' भी नहीं है। यहाँ आधुनिक कवि मैथिलीशरण गुप्त के 'साकेत' को भी उदाहरणस्वरूप दिया जा सकता है। 'नवगीत वाङ्मय' में अवनीश जी ने अपने 'वाङ्मय कौशल' का भरपूर उपयोग किया है। 'वाङ्मुख से साक्षात्कार तक' यह संकलन ध्यानाकर्षक है। खास बात यह भी है कि संपादक अवनीश सिंह चौहान स्वयं नवगीत के अच्छे रचनाकार हैं। पत्र-पत्रिकाओं एवं संकलनों में छपते रहते हैं। इनका नवगीत संग्रह- 'टुकड़ा कागज़ का' प्रकाशित है, फिर भी अपने आप को इस संकलन से अलग रखा है। आज के समय में लोभ-संवरण कोई आसान कार्य नहीं है। सच्चाई है कि कुछ रचनाकार जब आलेख लिखते हैं, तब उन्हें अपनी रचनाओं के उदाहरण देने में थोड़ी भी हिचक नहीं होती है। 

अब प्रश्न उठता है कि क्या संकलन में शामिल सभी नवगीतकार वाङ्मय निपुण हैं? अगर हैं, तो कहा जा सकता है कि समय को देखने और पहचानने की दृष्टि अलग-अलग होगी ही। निहितार्थ नगण्य अपवादों के होते हुए भी संपादक को 'नवगीत वाङ्मय' के सृजन परिदृश्य को प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। संपादक डॉ अवनीश ने जिन तब और अब के कवियों को समग्र रूप में सम्मिलित करने का कठिन प्रयास किया है और इसके माध्यम से उन्होंने जिस संपादन कौशल का परिचय दिया है, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। 'प्रसंगवश' में डॉ अवनीश जी साफ-साफ कहते भी हैं— 
 
"समय-समय पर प्रबुद्ध नवगीतकारों के साथ-साथ समर्पित सम्पादकों ने भी समाज-निर्माण के उद्देश्य से नवगीत की वैश्विक चेतना का विस्तार करने की भरपूर कोशिश की है। ऐसी ही एक छोटी-सी कोशिश के रूप में इस 'नवगीत वाङ्मय' को देखा जा सकता है।"

जाहिर है कि 'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।' छोटी-सी कोशिश एक गिलहरी ने की, पुरुषोत्तम राम का आशीर्वचन मिला था। गीत एक ऐसी विधा है, जिसे कोई खारिज नहीं कर सकता है। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह कहते हैं- "यदि विद्यापति को हिंदी का पहला कवि माना जाए, तो हिंदी कविता का उदय ही गीत से हुआ, जिसका विकास आगे चलकर संतो और भक्तों की वाणी में हुआ" (प्रगति और समाज, पृ. 109)। समयानुसार गीत की काया बदली, किंतु आत्मा नहीं। कभी इसका स्वर मंद भी हुआ, किंतु बंद नहीं हुआ। गीत के स्वर्णकाल को आज भी याद किया जाता है। स्वर्णकाल से भी गीतकारों को संतुष्टि नहीं मिली, इसका कारण भी भिन्न-भिन्न विद्वानों के द्वारा स्पष्ट किया जाता रहा है। आजादी के बाद औद्योगिकीकरण, आधुनिकतावाद, बाजारवाद एवं उत्तर संस्कृति जैसी अवधारणाएँ पूरी दुनिया में फैलने लगीं। इसका प्रभाव साहित्य पर भी होने लगा। नई कहानी, नई कविता, नवगीत इत्यादि इस बदलती दुनिया की ही देन है। यह भी सही है कि नई कविता की प्रतिक्रिया में गीत को नवगीत कहा गया। 1958 में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने 'गीतंगिनी' पत्रिका में ऐसे गीतों को नवगीत संज्ञा से प्रतिपादित किया। प्रारंभ में नामकरण का श्रेय लेने के लिए 'वाक्-युद्ध' भी होता रहा। अनुसंधान में प्रमाण की आवश्यकता होती है, नवगीत की प्रगति में डॉ शम्भुनाथ सिंह का ऐतिहासिक योगदान है। इस प्रसंग में जनवाद के वरिष्ठ गीतकार रमेश रंजक लिखते हैं- "गीतंगिनी' की भूमिका में प्रकाशित नवगीत के इस 'मेनिफेस्टो' को वाराणसी से प्रकाशित होने वाली 'वासंती' मासिक पत्रिका के 'नये गीत : नये स्वर' लेख माला (1961-62) में डॉ शम्भुनाथ सिंह ने कुछ और आगे इस प्रकार बढ़ाया - गीत रचना की परंपरा-पद्धति और भाव-बोध को छोड़कर नवीन पद्धति और विचारों के नवीन आयामों तथा नवीन भाव सारणियों को अभिव्यक्त करने वाले गीत जब भी और जिस युग में लिखे जाएंगे, नवगीत कहलाएंगे" (नये गीत का उद्भव एवं विकास, पृ. 109)। प्रारंभ से अब तक नवगीत हम-ग्रस्त है। यह नवगीत की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। नवगीत को शिखर तक ले जाने के लिए इस हम को दूर करना होगा। स्वस्थ आलोचना किसी भी विधा के लिए आवश्यक है। वह 'हम-ग्रस्त' नहीं होनी चाहिए। हम दावे से नहीं कह सकते हैं कि किंतु देखा जाता है कि कुछ लोग व्यक्तिगत जीवन में कुछ, सर्जना में कुछ और होते हैं। गीत उद्योग का सांचा लेकर बैठे रहते हैं, ताकि बड़ी उपलब्धि प्राप्त की जा सके। 

बहरहाल, 'नवगीत वाङ्मय' के 'समारंभ' में जन्म-तिथि क्रमानुसार तीन वरिष्ठ नवगीतकार प्रारंभिक दौर के हैं। इन तीन नवगीतकारों के तीन-तीन नवगीत उद्धृत है। मूलतः उनके नवगीतों में सामाजिक प्रतिबद्धता है, जीवन यथार्थ तथा मानवीय रिश्तों के पुनर्गठन की चेतना है। अमानवता के प्रति रोष है, किंतु उथल-पुथल मचाने वाला शोर नहीं है। युग-समय एवं आदमी के मर्म को महसूस कर जो रचनाएँ होती हैं, वैसी रचनाएँ इतिहास में स्थाई रहती हैं। डॉ शम्भुनाथ सिंह के नवगीत जातीय परंपरा को पुष्ट करते हैं- “देश हैं हम/ महज राजधानी नहीं।/ हम नगर थे कभी/ खण्डहर हो गए/ जनपदों में बिखर/ गाँव, घर हो गए/ हम जमीं पर लिखे/ आसमाँ के तले/ एक इतिहास जीवित/ कहानी नहीं।/ हम बदलते हुए भी/ न बदले कभी/ लड़खड़ाए कभी/ और सँभले कभी/ हम हजारों बरस से/ जिसे जी रहे/ ज़िन्दगी वह नई/ या पुरानी नहीं।“  

‘हम’ बदलते हुए भी भीतर से नहीं बदले हैं। शम्भुनाथ जी अतीत को याद करते हुए वर्तमान में पहुंच जाते हैं। उन्होंने प्रायः अनदेखी और उपेक्षित सच्चाइयों को अपने नवगीत में संवेदनात्मक विमर्श का विषय बनाया है। उनकी आकांक्षा की जमीन उर्वर है। डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया इसे अपने ढंग से सुदृढ़ करते हैं- “अपनी शर्तों पर जीने की/ एक चाह सबमें रहती है/ किन्तु जिंदगी अनुबंधों के/ अनचाहे आश्रय गहती है/ क्या-क्या कहना, क्या-क्या सुनना/ क्या-क्या करना पड़ता है।/ समझौतों की सुइयाँ मिलतीं/ धन के धागे भी मिल जाते/ सम्बंधों के फटे वस्त्र तो/ सिलने को हैं सिल भी जाते/ सीवन, कौन कहाँ कब उधड़े/ इतना डरना पड़ता है।” स्थिति स्पष्ट है कि समझौतों की सुई एवं धन के धागे के बीच जिंदगी उलझ कर रह गई है। पैबंद लगाकर कब तक जिया जा सकता है। शिवबहादुर जी के नवगीतों में जीवन की समग्रता तक पहुँचने का खुला प्रयास मिलता है।

नवगीत संज्ञा के प्रणेता राजेंद्र प्रसाद सिंह को आधुनिकता की आँधी में जातीय विरासत को बचा लेने की चिंता है- "उतरे जहाज से जो/ जीवन के नये-नये बटखरे/ मैं तुलने लगी उन्हीं से/ फिर वायुयान से उतरे/ जो संबंधों के ग्रह-तारे/ मैं जुड़ने लगी उन्हीं से/ मैं आधुनिका हूँ संदेही/ — तुम क्या हो?" यहाँ आधुनिका कौन है? समय की रंगत में पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण है। याद करें आदि कवि विद्यापति को- "देसिल बयना सब जन मिट्ठा।" आज आधुनिकता के दौर में शहर गाँव में प्रवेश कर गया है। युगबोध से संपृक्त 'समारंभ' के नवगीतकारों को मूल रूप से अपनी संस्कृति को बचा लेने की चिंता है।

'नवरंग' उपशीर्षक 'नवगीत वाङ्मय' का द्वितीय अध्याय है। 'नवरंग' में नौ रचनाकारों के नौ-नौ नवगीत हैं। उम्र के हिसाब से सात पुराने एवं दो नये नवगीतकार हैं। सभी समान विचारधारा के हैं। लिखने की भाव-भंगिमाएँ अलग-अलग हैं। इनमें सबसे पहले गुलाब सिंह जी हैं। गुलाब सिंह भीड़ से अलग रहते हैं। तटस्थ भाव से चुपचाप समय की रंगत को करीने से व्यक्त करते हैं— 

छंदों में जीने के सुख संग/ शब्दों की विभुता
दर्द और दुख भी गाने की/ न्यारी उत्सुकता
भाव, कल्पना, संवेदन/ ले भीतर बसा प्रयाग। 

और-

सघन भीड़ में बचे ‘आदमी’/ उसका आदमकद हो
गए प्यार का नए गीत में/ आगम ही ध्रुवपद हो
धुले मैल, निखरे मानवता/ चमक उठे बेदाग।

स्पष्ट है कि गीत का वंशज नवगीत है। नवगीतकार गुलाब सिंह 'नये गीत' के लिए 'गीत' को खारिज करना नहीं चाहते हैं। शायद इसीलिये वे 'धुले मैल, निखरे मानवता' की सुन्दर कामना करते हैं।

ऐसी ही कामना के पक्षधर कवि मयंक श्रीवास्तव जी हैं, जो बेबाक कह भी देते हैं- 'गीत और नवगीत की पीड़ा में कोई विशेष फर्क नहीं होता है।' यह बात किसी बड़े कवि की पहचान के लिए काफी है। मयंक जी के नवगीतों में, जो सामाजिक ताना-बाना है, वह औरों से अलग है। वे अपने आसपास के बिम्बों से बड़ी इमारत खड़ी करते हैं। वे सरल भाषा में संश्लिष्ट कहने वाले कवि हैं- "कोलाहल में एक बात/ यह मुझको भी कहने दो/ मेरा गाँव अगर छोटा है/ छोटा ही रहने दो।/ बड़े नगर की देख रोशनी/ बेसुध हो जाएगा/ पता नहीं है किस बंगले में/ पूरा खो जाएगा/ जब तक भी बह सके/ हवा पावन होकर बहने दो।" मयंक जी हार नहीं मानते हैं, उम्मीद में जीते हैं, थोड़े में गुजारा करना जानते हैं, आशान्वित भी हैं कि एक रोज विद्रूप समय भी बदलेगा।

नवगीत की प्रथम कवयित्री डॉ शान्ति सुमन ने अपनी राह खुद बनायी है। वे घर, परिवार, प्रकृति से बिंब लेकर सामाजिक असमानता के विरोध में गीत-नवगीत रचती रही हैं। वे कभी-कभी समय की प्रतिकूलता से जूझते हुए अतिक्रमण भी करती हैं- "दहशतों की नींद सोयी/ हर गली, हर मोड़/ देर कुछ जीकर मरा है/ रोशनी का मोर/ छू गया हो पाँव जैसे आग से/ धुंआ, कुहरा, रैन-छल-सी जिंदगी।" आलोचक डॉ रेवती रमण के शब्दों में "शांति सुमन नवगीत की अकेली कवयित्री मान्य हैं। इनके नवगीतों का उपजीव्य मिथिला की जनपदीय संस्कृति है, जनपदीय पर्यावरण और जीवन द्रव्य उन्हें गीतमय सुलभ है।"

राम सेंगर जी ख्याति प्राप्त नवगीतकार हैं। उनकी दृष्टि साफ है। वे इस संकलन में अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहते भी हैं- "बौद्धिक विश्लेषण द्वारा जीवन स्थितियों के आर-पार देखने की सर्जनात्मक आत्म-दृष्टि नवगीत के पास है।" इसीलिये राम सेंगर जी कबीर की तरह खरी-खरी कहते हैं—

बने अलग माटी के ये सब/ नामी और गिरामी 
गैरत बची रहे मत करना/ इनकी गोड़-गुलामी 

इनकी नीयत से टकराना/ लेश नहीं मिमियाना 

ठाकुर, बामन, बनियों में तुम/ ठहरे निरे छदामी 
खाल न उधड़े, ये जो ठहरे/ बड़े-बड़े आसामी 

इनकी फितरत से टकराना/ खुद को ढाल बनाना।

आजादी के वर्षों बाद भी आम आदमी हाशिए पर खड़ा है। प्रतिरोध के स्वर गूँज रहे हैं। जन-मन के वरिष्ठ गीतकार नचिकेता जी समय यथार्थ एवं सुविधाभोगी वर्ग के प्रति रोष व्यक्त करते हैं- "यहाँ नहीं होती अब/ उत्सव-त्योहारों की बात/ ठर्रे-विस्की की बोतल में/ गर्क हुए जज्बात/ तुलसी-चौरा सूनेपन का/ है बन गया पड़ाव।/ युवा वर्ग को रहा नहीं/ गाँवों से तनिक लगाव/ अपनेपन की कब्र खोदता/ है चेहरे का भाव/ काम-धाम का/ टारगेट है लुधियाना-पंजाब।" पुस्तक में संकलित कुछ नवगीतों में नचिकेता जी का प्रेम और प्रकृति से भी गहरा लगाव दिखाई पड़ता है।

कहते हैं कि कविता की वापसी आठवें दशक में हुई थी। यही वह समय था जब 'नवगीत दशक' (सम्पादक- डॉ शम्भुनाथ सिंह) अपनी आभा बिखेर रहा था। दूसरी ओर रमेश रंजक एवं रवींद्र भ्रमर जैसे गीतकार अपना परचम लहरा रहे थे। इसी दौर में सुकंठ कवि वीरेंद्र आस्तिक धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर उभर रहे थे। आस्तिक जी बड़े सहज एवं ईमानदार नवगीतकार हैं। किसी खास 'वाद' से इनका जुड़ाव नहीं है। संवेदनशील हैं, सो इनके कवि की नजर हर तरफ रहती है। आस्तिक जी का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है- "हम जमीन पर ही रहते हैं/ अम्बर पास चला आता है।/ अपने आस-पास की सुविधा/ अपना सोना अपनी चांदी/ चाँद-सितारों जैसे बंधन/ और चाँदनी-सी आजादी/ हम शबनम में भींगे होते/ दिनकर पास चला आता है।/ हम न हिमालय की ऊँचाई/ नहीं मील के हम पत्थर हैं/ अपनी छाया के बाढ़े हम/ जैसे भी हैं हम सुन्दर हैं/ हम तो एक किनारे भर हैं/ सागर पास चला आता है।" भाषा, संवेदना एवं शिल्प की दृष्टि से वीरेंद्र आस्तिक एक सजग नवगीतकार हैं।

प्रेम, प्रकृति एवं मनुष्यता के पक्षधर डॉ बुद्धिनाथ मिश्र मेरे प्रिय नवगीतकार हैं। वे आदि कवि विद्यापति एवं जन-जन के कवि बाबा नागार्जुन के क्षेत्र से आते हैं। बुद्धिनाथ जी के नवगीतों में एक अद्भुत आकर्षण एवं मिठास है। कहा जाता है कि दुनिया की सबसे मीठी बोली मिथिला की ही है। शायद इसीलिये उनके नवगीत श्रोताओं एवं पाठकों को रोमांचित करते हैं। बुद्धिनाथ जी जीवन को समग्रता में लिखते हैं- "मैं वहीं हूँ जिस जगह पहले कभी था/ लोग कोसों दूर आगे बढ़ गए हैं।/ ज़िन्दगी यह, एक लड़की साँवली-सी/ पाँव में जिसने दिया है बाँध पत्थर/ दौड़ पाया मैं कहाँ उन की तरह ही/ राजधानी से जुड़ी पगडंडियों पर/ मैं समर्पित बीज-सा धरती गड़ा हूँ/ लोग संसद के कँगूरे चढ़ गए हैं।" और "दूर पर्वत पार से मुझको/ है बुलाता-सा पहाड़ी राग/ गर्म रखने के लिए बाकी/ है बची बस काँगड़ी की आग/ ओढ़कर बैठे सभी ऊँचे शिखर/ बहुत महँगी धूप के ऊनी दुशाले।"

अपने पिता की तरह जीवन की त्रासदियों के बीच डॉ विनय भदौरिया अपने नवगीत की छाप औरों से अलग छोड़ते हैं—
राम जाने सोच अपनी 
किस दिशा को मुड़ गई 
सड़क संसद भवन की 
अब बीहड़ों से जुड़ गई 

जानकार फिर भी बने अनजान 
खो रहे दिन-दिन निजी पहचान 
युग को क्या हुआ है।

डॉ विनय जी प्रतीकात्मक भाषा में समय पर करारी चोट करते हैं, जबकि समय-सत्य को देखते-परखते हुए बेबाक लहजे में रमाकांत जी कुछ इस प्रकार से लिखते हैं- 

महाभारत फिर न हो/ यह देखियेगा 
फिर वही बातें/ वही चालें पुरानी 

राजधानी में लुटी है/ द्रोपदी फिर 
खेलती रस्साकसी/ नेकी-बदी फिर 

कौन जीते, कौन हारे देखियेगा 
धर्म ने फिर ओढ़ लीं खालें पुरानी।

कहना न होगा कि 'नवगीत वाङ्मय' में सम्मिलित सभी नवगीतकार समय की रंगत को अपनी-अपनी नजर से देख रहे हैं और व्यक्त कर रहे हैं। 

संकलन के तृतीय अध्याय- 'अथ-बोध' में 'नये-पुराने' पत्रिका के यशस्वी संपादक दिनेश सिंह का आलेख- 'गीत की संघर्षशील जयी चेतना' बेहद पठनीय है। यह आलेख नवगीत लिखने-पढ़ने वालों के लिए बहुत उपयोगी भी है। यह कहना उचित ही है कि दिनेश सिंह ने ताउम्र नवगीत के लिए कोई समझौता नहीं किया। ऐसा विरले ही देखने को मिलता है।

अंतिम खण्ड- 'साक्षात्कार' का है- 'नवगीत : न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अभिव्यक्ति।' संपादक द्वारा पूरे गए प्रश्नों के जवाब डॉ मधुसूदन साहा ने बिना लाग-लपेट के खरे-खरे शब्दों में दिए हैं। गद्य लेखन की तरह ही, साहा जी के गीत-नवगीत भी सहज और सम्प्रेषणीय होते हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार में साहा जी पर्दे के भीतर से नहीं, पर्दा उठाकर अपनी बात रखते हैं; उन्होंने कई रहस्यों का पर्दाफाश भी किया है।

इस समवेत संकलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी नवगीतकार को छोटा या बड़ा नहीं दिखलाया गया है और न ही किसी की कमियों को गिनाया गया है। इसमें छः राज्यों से चुने गए नवगीतकारों की वैचारिकी एवं नवगीतों में क्या विशेषताएँ हैं, बस इसे ही संपादक ने बताने की कोशिश की है। पुस्तक में संकलित नवगीत, आलेख, साक्षात्कार संप्रेषण में कितना सफल हुए हैं, यह सब भी पाठकों पर छोड़ दिया गया है। 'नवगीत वाङ्मय' के यशस्वी संपादक डॉ अवनीश सिंह चौहान स्वयं हिंदी और अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हैं, इसलिए आशा है कि उनके पाठक भविष्य में 'नवगीत वाङ्मय' का मूल्यांकन करेंगे ही। इस श्रमसाध्य कार्य के लिए डॉ अवनीश सिंह चौहान को ढेर सारी बधाइयाँ।


समीक्षक :

डॉ रणजीत पटेल 
अलकापुरी, भगवानपुर
मुजफ्फरपुर-842001 (बिहार) 
मो. 94314 75283

Book Review: From Past to Present : Navgeet Vangmaya by Dr Ranjit Patel