पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

रविवार, 1 जनवरी 2017

वीरेन्द्र आस्तिक के नवगीत

वीरेन्द्र आस्तिक 


वीरेंद्र आस्तिक का जन्म कानपुर (उ.प्र.) जनपद के एक गाँव रूरवाहार में 15 जुलाई 1947 को हुआ। आस्तिकजी हिंदी गीत-नवगीत के प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं। इनके गीत, नवगीत, कविताएँ, रिपोर्ताज, ग़ज़ल, ललित निबंध, समीक्षाएँ आदि श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन, समकालीन गीत: अन्तः अनुशासनीय विवेचन, शब्दपदी, गीत वसुधा, दैनिक जागरण, जन सन्देश टाइम्स, मधुमती, अलाव, साहित्य समीर, कविताकोश, अनुभूति, पूर्वाभास आदि ग्रंथों, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। आस्तिक जी बाल्यकाल से ही अन्वेषी, कल्पनाशील भावुक-चिन्तक एवं मिलनसार रहे हैं। आपने 1964 से 1974 तक भारतीय वायु सेना में कार्य किया। तत्पश्चात भारत संचार निगम लि. को अपनी सेवाएं दीं। वर्त्तमान में सेवानिवृत्त। काव्य-साधना के शुरुआती दिनों में आपकी रचनाएँ वीरेंद्र बाबू और वीरेंद्र ठाकुर के नामों से भी छपा करती थीं। साहित्यिक यात्रा: आपकी पहिला कविता 1971 में 'साप्ताहिक नीतिमान' (जयपुर ) में छपी थी। उन दिनों आस्तिक जी दिल्ली में रहा करते थे। दिल्ली में उन दिनों नई कविता का दौर चल रहा था। सो आपने कविता और गीत साथ-साथ लिखे। 1974 में भारतीय वायु सेना छोड़ने के बाद आप कानपुर आ गए। कानपुर में छंदबद्ध कविता की लहर थी। यहाँ आप गीत के साथ-साथ ग़ज़लें भी लिखने लगे। 1980 में आपका पहला गीत संग्रह 'वीरेंद्र आस्तिक के गीत' नाम से प्रकाशित हुआ। 1982 में 'परछाईं के पाँव' एवं 1987 में 'आनंद ! तेरी हार है' (नवगीत संग्रह) प्रकाशित। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से आर्थिक सहयोग मिलने पर 'तारीख़ों के हस्ताक्षर' (1992 ) में प्रकाशित हुआ। इन्हीं दिनों दैनिक जागरण में आलेख आदि और मधुमती (राज. ) में समीक्षा प्रकाशित, गद्य लेखन प्रारम्भ। 2013 में मासिक पत्रिका संकल्प रथ (भोपाल) ने वीरेंद्र आस्तिक की रचनाधर्मिता पर अंक प्रकाशित किया। प्रकाशित कृतियां: 1. नवगीत संग्रह- परछाईं के पाँव, आनंद ! तेरी हार है, तारीख़ों के हस्ताक्षर, आकाश तो जीने नहीं देता, दिन क्या बुरे थे; 2. आलोचना/ सम्पादन-धार पर हम एवं धार पर हम (दो)। सम्मान: 2012 : आखिल भारतीय साहित्य कला मंच (मुरादाबाद) से सम्मानित, 2013 : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (लखनऊ) से 'दिन क्या बुरे थे' को सर्जना पुरस्कार आदि। साहित्यिक वैशिष्ट्य: आस्तिक जी की कविताएँ किसी एक काल खंड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें समयानुसार प्रवाह देखने को मिलता है। उनकी रचनाओं से गुजरने पर लगता है जैसे आज़ादी के बाद के भारत का इतिहास सामने रख दिया गया हो, साथ ही सुनाई पड़तीं हैं वे आहटें भी जो भविष्य के गर्त में छुपी हुईं हैं। इस द्रष्टि से उनकी कविताएँ- गीत भारतीय आम जन और मन को बड़ी साफगोई से प्रतिबिंबित करते हैं, जिसमें नए-नए बिम्बों की झलक भी है और अपने ढंग की सार्थक व्यंजना भी। और यह व्यंजना जहां एक ओर लोकभाषा के सुन्दर शब्दों से अलंकृत है तो दूसरी ओर इसमें मिल जाते है विदेशी भाषाओं के कुछ चिर-परिचित शब्द भी। शब्दों का ऐसा विविध प्रयोग भावक को अतिरिक्त रस से भर देता है। संपर्क: एल-60, गंगा विहार, कानपुर-208010, संपर्कभाष: 09415474755

गूगल से साभार 
1. रोज तमाशा

मानुष हार नहीं माने
वह जय की आशा जीता है

लघु जन हों या हों
भारी भरकम पद वाले
संघर्ष सभी का
जीवन को ही मथ डाले

घोर तिमिर में भी कोई
सूरज की भाषा जीता है

किसी दीन को देखो, जैसे
कोई दिगम्बर
जिए खुलापन
हर मौसम का
गुस्सा पीकर

प्रकृति-पुरूष है या औघड़?
क्षण-क्षण दुर्वासा जीता है

आओ, गौर करें हम
उन जिम्मेदारों पर
रोज उगलते
संवेदनहीन विचारों पर

एक सदन
दो आंसू रोकर
रोज तमाशा जीता है।

2. असली-नकली

कौन बताए
असली-नकली
सब थैली के चट्टे-बट्टे

कोई,  भाई-बहन बनाकर
अपना सगा बना लेता
और किसी के पुरखों का
वलिदानी-पाठ रूला देता

सबके सब आस्तीन चढ़़ाकर
लहराते भाषा के कट्टे

शोर दहाड़ों का इतना है
श्रमिक भूलते महँगाई
बेईमान हुए ‘लाइन’ में
लग, मिली न ब्लैक् कमाई

भय-दहशत से मरे-मरे कुछ
कारिन्दों के खाकर डण्डे

जनता डरी-डरी-सी, ऐसे
देश-भक्त अधिनायक से
मुद्रा के आपात़काल में
मांगे वर गणनायक से

दो दृष्टि हमें हे, दया निधे
इस भू पर गड्ढे ही गड्ढे।

3. एक बाजीगर

भीड़ अद्भुत!
एक बाजीगर शहर में
इक जमूरा
बोलता है हर बशर में

यह शहर है या कोई है
राजपूताना किला
चीन्ह कर, आँखें मिलाकर
हो रहा है दाखिला

ब्लैक गुब्बारों ढ़का
अम्बर गदर में

घर तलाशी? क्यों नहीं,
कितनी कहाँ नकदी धॅसी
गोरे-कालों की लड़ाई में
है आजादी फँसी

नाक में दम- घुस गया
कानून घर में 

दुंदुभी जय की बजे है
साँप सूँघी भीड़ है
यह करिश्मा
या कि जनता
एक टूटी रीढ़ है

शून्य खाते,
लैप’, मोबाइल समर में।

4. तू सोच ‘कूल’ होकर

आक्रोश तो बहुत है
तू सोच ‘कूल’ होकर

बम को जवाब बम से
देकर हुआ फना तू
ताकत अगर है ज्यादा 
तो शब्द-बम बना तू

धिक्कार है उसे जो
मरता है शूल होकर

वो ज्ञान, ज्ञान ही क्या
बस, कम्पनी चलाए
इस दौर में भी गाँधी!
क्यों तू न दिल से जाए

जीना बहुत सरल है
सत्ता का ‘टूल’ होकर

‘वैलून’ जो गगन है
जुड़ते नहीं धरा से
ठहरेंगे कब तलक वे
पूछो जरा हवा से

हम कौस्तुभ हुए पर
गलियों की धूल होकर।

5. बुझना नहीं है

बुझना नहीं है
जग तो बहेसिया है
चुपचाप रह मेरे मन

देखा बहुत जगत ये
चहुँ ओर है हताशा
किस मुक्ति की जुगत में
हर मर्हला है प्यासा

जिस धार बह रहे वे
उसके उलट बहे मन

ये हाँफती कवायद
ये हाँफते जिगर हैं
हर ओर छीना-झपटी
सब चाहते शिखर हैं

देखा, शिखर भी तनहा
जुड़ना जमीन से मन

तम में अजान दे-दे
तुम कितने तप रहे हो
होती सुबह न दिखती
सूरज-से जल रहे हो

बुझना नहीं है वश में
जगता हुआ चले मन।

Poet and Critic Virendra Astik, Kanpur, U.P.