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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

व्यंग्य : गधे ही गधे - डॉ नरेंद्र शुक्ल

डॉ नरेंद्र शुक्ल 

चर्चित युवा साहित्यकार डॉ. नरेंद्र शुक्ल (20 जनवरी 1969) ने अपनी बेबाक शैली से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। शिक्षा: एम.ए, पी.एच.डी, एल.एल.बी, एम.बी.ए., स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद), स्नातकोत्तर डिप्लोमा गॉंधीयन स्टडीज़, स्नातकोत्तर डिप्लोमा कम्प्यूटर विज्ञान, स्नातकोत्तर डिप्लोमा हायर एजुकेशन, सर्टिफिकेट कोर्स कार्यकारी हिंदी। प्रकाशित पुस्तकें : मरो मरो जल्दी मरो (व्यंग्य संग्रह), ही ही ही (व्यंग्य संग्रह), गागर में सागर (हिंदी व्याकरण), धूप अभी बाकी है (काव्य संग्रह), स्वर्ग में इलैकशन, उजाले की ओर, बैंकुंठ हेयर ड्रैसेज़, आधुनिक रामलीला कमेटी (सभी गद्य नाटक)। दैनिक ट्रिब्यून, द ट्रिब्यून,  दैनिक जागरण,  दैनिक भास्कर,  दैनिक सवेरा टाइम्स, उत्तम हिंदू, पंजाब केसरी, नीरज टाइम्स आदि प्रमुख अखबारों में व्यंग्य लेख, कहानियॉं व कविताएँ प्रकाशित। सम्मान : चंडीगढ़ साहित्य अकादमी अवार्ड- 2013। सम्पर्क : मकान नंबर 124, सेक्टर 35- ए, चंडीगढ़ - 160022, दूरभाष मोबाइल : 09316103436। आपकी एक व्यंग्य रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ :- 


गधे ही गधे 

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
एक चौराहे पर खड़े चार गधे एक दूसरे के सामने अपना - अपना दुखड़ा रो रहे थे । काने गधे ने चितकबरे गधे से कहा - यार , पिंकू , मेरा मालिक मुझे बड़ा पीटता है । दिन भर काम करवाता है चैन से खाने भी नहीं देता । चितकबरे गधे ने रोते हुये कहा - मेरा मालिक भी मुझे चैन से नहीं सोने देता हमेशा गालियॉं देता रहता है । सामने बस स्टैंड के बाजू वाली गली में एक कजरारे नयनो वाली सांवली किंतु सुघड़ गधी देखते हुये मिंकू ने कहा - दोस्तों मेरा भी कुछ यही हाल है । चौथा गधा , जिसका नाम , राजू था , ने अपनी पूंछ से अपनी पीठ सहलाने हुये कहा - यार , हमसे अच्छा तो गली का शेरू है । भौंकता भी है और दांव लगने पर काट भी खाता है । गली की सारी सुंदर औरते बड़े प्यार से उसे अपने हाथों से खाना खिलाती हैं । . . . पार्क के मच्छर तक हमसे अच्छे हैं । एक बार इंसान को पा जातेे हैं तो बिना बिना काटे नहीं छोड़ते । कुनैन तक की गोली खानी पड़ती है । सात दिनों तक उठना - बैठना भारू हो जाता है । चितकबरे गधे ने राय दी - क्यों न हम अपनी यूनियन बना ले । सब एक साथ रहेंगे तो कोई हमारा बाल भी बांका नहीं कर पायेगा । बस स्टैंड के बाजू वाली गली की सुंदर -सलोनी गधी को उसका आशिक ले जा चुका था । मिंकू ने चलते हुये कहा - क्यों नहीं , हम कल इसी जगह मिलेंगे और आगे की रणनीति पर विचार करेंगे । चारों गधों ने एक ही स्वर में मिंकू के प्रस्ताव का समर्थन किया और अपने - अपने घर चले गये । अगले दिन मिंकू सांवली - सुंदर व सलौनी गधी को भगा ले गया और बाकी गधे गधे रह गये ।


गधों को मूर्खता का पर्याय समझा जाता है पर , मेरी नज़र में गधा अत्यंत मासूम , संवेदन व सहनशील प्राणी है । हमेशा अपने मालिक की सेवा में लगा रहता है । कभी प्रतिकार नहीं करता । हम अपने आपको शेर , चीता , बाज़, आदि कहलवाना पसंद करते हैं । लोमड़ी व बगुला भक्त तक कहे जाने में हमें गुरेज़ नहीं लेकिन , गधा कहे जाने पर हम मरने - मारने पर उतारू हो जाते हैं । एक रामलीला में मंदोदरी के महल के पर्सनल बॉडीगार्ड को जुआ खेलने के जु़र्म में अचानक पुलिस पकड़ कर ले गई । रामलीला में अफड़ा - तफड़ी मचती देखकर आयोजक ने घर के माली को दारू की एक बोतल का लालच देकर टैंपरेरी बॉडीगार्ड नियुक्त कर लिया लेकिन मंच पर जाते ही वह अपने डॉयलाग भूल गया और मंच पर पर्दे के पीछे से बार - बार इशारा करने पर भी वह डॉयलाग न बोल पाया । अब रावण , जो स्वयं रामलीला का आयोजक भी था , की स्थिति खिसियानी बिल्ली खंबा नोचेे जैसी हो गई । वह बड़े गुस्से से माली की ओर बढ़ा और तलवार खींचते हुए दहाड़ा - अबे गदहे हम पूछते हैं कि मंदोदरी कहॉं है और तू साले मुंह में दही जमाये बैठा है । माली तिलमिला गया । आगे बढ़ते हुये बोला - हमका गदहा कहात हो . . . न तुम कहीं के गर्वनर हो . .। जाओ नाहीं बताइत ..। रावण ने फिर आंखंे दिखाईं , लेकिन इस बार माली से न रहा गया । वहीं से पेट में भाला कोंचते हुये गुर्राया - आंख दिखावत हीं . .। ससुरउ ऑंख दिखावत हीं । ज्यादा बोलबो तो ई अखिया निकाल के हाथ मा पकड़ा देअब । खड़े - खड़े सूरदास बना दिअब । जान्यो कि नाहीं । . . आंख दिखावत हीं . .। देय का एको रूपया नाहीं । आंख दिखावत हीं . .। हमका गदहा कहात हीं । जाओ नाहीं बताइत कर लियो जो करना है । आयोजक चुपचाप टेंट में चला गया । वकील अक्सर अपने क्लाइंट को गधा बने रहने की सलाह देते हैं । उनके अनुसार कानून से बचे रहने का यही सबसे उत्तम तरीका है । 

एक काव्य सम्मेलन में एक उभरता हुआ कवि एक मंझे हुये कवि की कविता इस अंदाज़ से सुना रहा था जैसे वह स्वंय कविता का रचयिता हो । उभरता हुआ कवि एक सच्चा कवि था । उसने कसम खाई हुई थी कि न तो वह स्वयं की कोई कविता रचेगा और न ही उसे किसी मंच से सुनायेगा । पड़ोसियों के घर में लगी अंगूर की बेल को अपने घर में दो बल्लियां गाड़ कर छवा लेने की कला में उसका कोई सानी नहीं था . . . वैसे भी हाथ न आने पर अंगूर खटटे हो जाते है । इस उभरते हुये कवि के काम में इतनी सफाई व पवित्रता थी की कोई उसकी कविता को चुरा नहीं सकता था अलबत्ता कभी - कभी तो मूल कवियों को यह शक हो जाता था कि उक्त कविता उन्होंने लिखी भी है या नहीं । सभा में मूल कवि तालियां बजाते हुये कहते - वाह , क्या खूब कहा है - 

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं ।
जिधर देखता हूँ, गधे ही गधे हैं ।

मंच के दायीं ओर की चौथी कुर्सी पर बैठे डॉक्टर वर्मा से न रहा गया वहीं से पांव बढ़ाकर लड़गी मारी - अबे गधा किसे कहता है मैं एम.बी.बी.एस हूँ  . . . . यू इडियट ! तेरे जैसे लोगों का मैं रोज़ इलाज़ करता हॅूं । डॉक्टर वर्मा अंग्रेजी को हिंदी से अधिक महत्तव देते थे उनका मानना था कि अंग्रेजी बोलने वाला साहब और बाकी सब उसके मातहत होते हैं । वह कभी भी किसी को भी गाली दे सकता है । आस - पास बैठे कविता के मर्मज्ञों द्वारा चुप रहने का संकेत देखकर इस बार आवाज़ का वॅाल्यूम कुछ कम करते हुये उन्होंने थोड़ा नरमी से कहा - लगता है आंखों में मोतिया उतर आया है । मेरे क्लिनिक पर मोतिया का शर्तिया इलाज़ कैंप लगा है आ जाना आई विल्ल मेक यू हैप्पी । डॉक्टर वर्मा एक नया मरीज़ पाकर बेहद खुश थे जब से ननकू ऑपरेशन कांड केस में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया द्वारा ब्रेकिंग न्यूज़ के रुप में हर दस मिनट पर जनमानस के समक्ष उजागर हुआ है तब से डॉक्टर साहब खुद लकवे के शिकार हैं । कैंची पकड़ते हुये उनके हाथ कांपने लगे हैं । दरअसल पथरी का ऑपरेशन करते हुये मरीज़ ननकू के पेट में उनकी कैंची रह गई थी और पेट पुनः खोलते हुये वे अपना तौलिया भूल गये थे । बहरहाल , लड़गी इतनी जोर की थी कि एक पल के लिये उभरता हुआ कवि लड़खड़ा गया लेकिन दूसरे ही पल संभलता हुआ फिर बोला - 

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ, गधे ही गधे हैं ।

अबकि मंच के बायीं ओर बैठी मशहूर मॉडल पूनम के बगल में बैठे शहर के मशहूर उद्योगपति, जिनका कालिया रेसीडेंस सोसाइटी के बगल में , बहुजन हिताय दीन बंधू वि़द्यालय के साथ लगती दीवार के साथ कायदे से शराब का एक ठेका भी है , दांत किटकिटाते, किंतु गोष्ठी की मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुये उभरते हुए कवि को डांटा - व्हॉट नॉनसेंस । दायें बैठी महिलाओं को अपनी ओर घूरते हुये देखकर वे मुस्कराते हुये बोले - आई थिंक ही इज़ मोर डंकी । मिस्टर कालिया हैंडसम थे लेकिन शादी अभी नहीं हुई थी । पार्टियों में वे हॉट बैचलर माने जाते थे । पिछली पंकित में बैठी महिलायें खुश थीं । महिलाओं को गधा नहीं कहा जाता। 

एक अधेड़़ माडर्न कवयित्री ने अपनी बिखरी जुल्फ़ों की लटों को कान पर चढ़ाते हुये उभरते हुये कवि की प्रशंसा में तालिया बजाई - वाह क्या खूब कहा . . . कमाल कर दिया। वाह गधे ही गधे हैं । बाजू़ वाली सीट पर बैठी मोहल्ला किटटी पार्टी की आर्गेनाइज़र स्वीटी ने मार्डन कवयित्री से पूछा - उर्मि ! क्या सभी मर्द गधे होते हैं । - उर्मि ने काउंटर प्रश्न किया - क्या तेरा लकी गधा नहीं है । स्वीटी ने अपने शाइनिंग लाल होंठ सिकोड़ते हुये कहा - हूँ... है तो . . . पर थोड़ा - थोड़ा । कभी - कभी दुलत्ती मार देता है , कहता है सर्दी में ठंडे पानी से मैं बरतन साफ नहीं करुंगा । किचन में हीटर लगवाओ । पास बैठी कांता ने कहा - मेरा पति घोड़ा है । सरपट भागता है । वह स्वीटी से आगे निकल जाना चाहती थी । पतियों की इस रेस में अमेरिका रिर्टन, हाल में ही मिसिज़ बनी डेज़ी ने कहा - माई हसबेंड इज़ माई लिटिल पपी ...यू नो... आलॅवेज़ , मेरे पीछे - पीछे घूमता है। माई लिटिल बेबी । 

आजकल पति कब बेबी हो जाये और बेबी कब कुत्ता हो जाये , कहा नहीं जा सकता । . . . खैर , प्यार में सब कुछ जायज़ है । अपनी प्रशंसा सुनकर उभरता हुआ कवि और जोर से रेंका - जवानी का आलम गधों के लिये है । अपना सब कुछ लुटता देखकर पास बैठे सत्तर साल के काने काका ने अपने जबड़ों में दांत खोंसते हुये कहा - भैया . . हमहू जवान हैं । लड़ाय के देख लियोे। नचाय के देख लियोे . .। सुबह - शाम दिन में दो बार दंड पेलते हैं . . आजकल के इन मरियल छोकरों की तरह नहीं कि दस कदम पैदल चले नहीं कि मिरगी आने लगी । उभरते हुये कवि को भरी जवानी में बुढ़ापा दिखाई देने लगा । उसने सिर घुमाकर एक पल काने काका की ओर देखा और दूसरे ही पल सिर झटक कर आगे बढ गया - तू पिलाये जा साकी तू पिलाये जा डटके ... मटके के मटके ... मटके के मटके . . । सामने बैठे सरदार जी से न रहा गया । जेब से पउआ निकालकर पीते हुये मंच पर चढ़ गये और उभरते हुये कवि से माइक छीन कर गाने लगे - पिलाये जा डटके ... मटके के मटके . मटके के मटके . . । 

इससे पहले कि आयोजक उन्हें मंच से उतारते उन्होंने उभरते हुये कवि के कान पकड़कर उसके गालों पर ताबड़ तोड़ चार - पॉंच चुुम्मे जड़ दिये - ओह मुंडिया कमाल कर छडिया . . . जे मटिकियॉं च विस्की दी थां दारु पा लैंदा तां होर नज़ारे आणे सी । मंच पर बैठे चीफ गैस्ट ने माथे पर हाथ रखते हुये कहा - व्हॉट रबिश ! गदा कहीं का । इतना भी नहीं जानता कि विस्की को ही दारु कहते हैं । मैं और डॉक्टर प्रोफेसर जे. पी . चोपड़ा मंच के सामने बीचों - बीच सबसे पीछे बैठे थे । लिहाज़ा उभरते हुए कवि के रेडार में नहीं आ रहे थे । वैसे भी मंच पर चढ़ा कवि इधर - उधर ही देखता है । मैंने अपने साथ बैठे डॉक्टर प्रोफेसर जे. पी . चोपड़ा के कान में कहा - डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा जी कितना कच्चा गधा है दो ही घूँट में झूम रहा है । यहॉं पूरी बोतल पीने पर भी गले में तरावट नहीं आती । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा हिंदी के रिटायर्ड प्रोफेसर थे । हिंदी के डॉक्टर ही सचमुच के डॉक्टर होते हैं । यह उन्हें पता था । डॉक्टर बनने के बाद , शुरुआती दिनों में वे बड़ी शान से अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाते थे और अगर कोई परिचित उन्हें डॉक्टर न कहता तो वे उससे सदा के लिये संबंध विच्छेद कर लेते थे । लेकिन प्रोफेसर बनने के बाद मामला थोड़ा पेचिदा हो गया । अब उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि वे अपने आप को डॉक्टर कहें या प्रोफेसर । इसी उधेड़ - बुन में वे रिटायर हो गये । सारी उमर वे हिंदी के शिक्षक रहे , लेकिन राप्ट्र भाषा घोषित होने के लगभग 64 साल के बाद भी जिस प्रकार लोग आज भी हिंदी को अछूत समझते हैं उसी प्रकार पड़ोसियों व सगे - संबधियों द्वारा हीन समझे जाने के कारण उन्होने रिटायर होने के बाद अपने घर के बाहर मुगल समा्रठ शहाजहां की तरह संगमरमर के पत्थर पर खुदवा लिया - डॉक्टर प्रोफेसर जे. पी .चोेपड़ा लेकिन , उनकी बीवी मुमताज न होकर ललिता निकली। वह आयकर विभाग में सुपरीटेंडेंट थीं और सुपरीटेंडेंटी के सारे गुर जानती थीं इसलिये असैसी के आते ही वे डॉक्टर साहब को तरकारी लाने बाज़ार भेज देती थीं । डॉक्टर साहब को तरकारी लाते - लाते आत्मज्ञान प्राप्त हो गया था ओर वे बातों ही बातों में डॉक्टर चोपड़ा से डॉक्टर प्रोफेसर जे. पी .चोेपड़ा हो गये । अब पहले की तरह कोई उन्हें केवल डॉक्टर कहता तो वे आजकल की प्रेमिकाओं की तरह ब्रेकअप के लिये धमकी देने लगते । वे चाहते थे कि लोग उन्हें डॉक्टर प्रोफेसर कहें ताकि वे नील अमास्ट्रांग हो जायें । जे. पी . से अब उन्हें इतना लगाव नहीं रह गया था । खैर , इससे पहले कि वे कुछ जवाब दे ते उनका मोबाइल बज उठा । 

आजकल हम पतलून के बटन बंद करना बेशक भूल जायें लेकिन मोबाइल हाथ में लेना नहीं भूलते । जमाना प्रगतिशील है । हम सब वी . आई .पी हो चले हैं । सोते - जागते ,उठते - बैठते हमें कोई न कोई काम हो सकता है । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा ने फोन पर हाथ रखते हुये मुस्कराते हुये कहा - माफ करना , ज़रा वाइफ का फोन है । मैंने अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लिया लेकिन , जहॉं किसी दूसरे की वाइफ का मामला हो मेरे कानों व ऑंखों की कपैस्टी बढ़ जाती है । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा ने मोबाइल कान पर लगाते हुये कहा - हलो ! कि पये करदे हो । उधर से आवाज़ आई - मेरी जूती कित्थे रखी है । तुहांनू किनी बारी किहा है दस के जाया करो । तुहाडे कन्न ते जूं तक नहीं रेंगदी । खसमां नूं खाणियां . .तुहाडा मैं की करां । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा ने सहमते हुये बडे़ प्यार से कहा - डार्लिंग कि पई कहिंदे हो । मैं कल ही तुहाडी जुत्ती लिया दिती सी । पंलग दे निच्चे देखों सां । उधर से आवाज़ आई - खसमां नूं खाणियां दृ राशन लियाए हो ? डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा ने कहा - परची मेरी जेब च है । आंदे होये लिआवांगा । तू एवें ही औखी होई जांदी है । मिसरी पा मुंह च . . । उन्होने फोन काट दिया । मैंने पूछा - प्रोफेसर साहब , भाभी जी क्या कह रहीं थीं । वे बोले - कुछ नहीं, हाल - चाल पूछ रहीं थीं । सुबह से ही खांसी है । मैंने मन में बिना किसी श्रद्धा के कहा - मुझे गधा समझ रहा है । बच्चू मैं तेरा बाप हूॅं । प्रकट में मुस्कराते हुये कहा - क्यों , आपको क्या हुआ ? वे जबरदस्ती खॉंसते हुये बोले - । सुबह से ही खांसी है । मैंने कहा - चलो आपकी बारी आने वाली है । उन्होंने कविता निकालने के लिये जेब टटोली लेकिन, कोट की जेबों से उनकी उंगलियॉं बाहर आ गईं । मैंने कहा - प्रोफेसर साहब , पतलून की जेब देख लो । शायद , वहॉं रखी हो । उन्होंने पतलून की जेब में हाथ डाला । राशन की पर्ची निकली लेकिन कविता नहीं निकली । वे बोले - लगता है वाइफ ने कागज़ बदल लिया है । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा कविता ढूॅंढ़ ही रहे थे कि मोबाइल फिर बज उठा । मैंने कहा -- प्रोफेसर साहब , भाभी जी ने फिर याद किया है । कमाल है इस उम्र में भी इतना ख्याल रखती हैं । डॉक्टर प्रोफेसर चोपड़ा ने मोबाइल कान पर लगाते हुये कहा - हलो । उधर से आवाज़ आई -तुसी कित्थे हो ?

वे बोले - डॉक्टर कोल हॉं . . खॉंसी वद गई है । दवाई लै रिहां हां । मैं मुस्कराया । उन्होंने फोन पर हाथ रख कर आंख मारते हुये कहा - कहना पड़ता है । बहुत प्यार करती है न ! ज़रा सी बीमारी देखकर घबरा जाती है । उधर से वाइफ की आवाज़ आई - सारा दिन दवाइयॉं खांदे रिहा करो । खसमां नूं खाणियां . . पता नहीं किहड़ियां - किहड़ियां बिमारियॉं लगीयां होइंया ने । तूसी कद तक आणा है । मैं बालां नूं मेंहदी लाई होई है । घर दा सारा कम्म पिया है । ़ ़ ़ सफाई वाली नूं वी अज ही मरणा सी । . . तुसी सुणदे हो . . . आंदे होए कल्लू हलवाई दी दुकान तो अददा किल्लो गुलाब जामुन वी लैंदे आयों . . . मुंह सुकदा पिया है । जल्दी आओ . . खसमां नूं खाणियां . . खोते वांग इदर - उदर घुम्मी जांदे हो। 

इधर प्रोफेसर साहब बुदबुदाये - . . मैंनू खोता समजदी है . . न . . मैं खोता हां . . । मैंने मन में कहा - मुझे तो रत्ती भर भी संदेह नहीं है। प्रकट में कहा - प्रोफेसर साहब , भाभी जी क्या कह रहीं थीं । प्रोफेसर साहब फिर बुदबुदाये - . . . . मैंनू खोता समझ रही है । . . . मैं सारे घर दा ठेका लिता होया है । . . सारा दिन खोतियां वांग कम्म करदा रवा. .। हूँ . .जा नहीं करदा मैं। मैंने कहा - . . क्या बात है प्रोफेसर साहब ! अपने आप से ही बातें कर रहे है। भाभी जी ठीक तो हैं ! वे नींद से जाग गये थे - कुछ नहीं . . तुम्हारी भाभी सीढ़ियों से गिर गयी है . . अभी घर जाना होगा । मैंने कहा - ज्.यादा चोट तो नहीं लगी । उन्होंने उठते हुये कहा - अरे नहीं . . । घर चल कर देखता हूँ। मैंने चुटकी ली - उधर , कल्लू हलवाई की दुकान की ओर से जाना शार्टकट है जल्दी पहुंचोगे। वे चले गये । 

इधर उभरते हुये कवि की कविता पर सभा में उपस्थित सभी विद्वानों ने वैल्डन गधे कह कर उभरते हुये कवि को प्रसिद्ध होने का अवसर दिया और मैं सोचने लगा सरकार महंगाई के डोज़ पर डोज़ दिये जाती है और हम टुकुर- टुकुर देखते रह जाते हैं । आज हम आपसी रंजिश में कभी जमीन के एक टुकड़े के लिये तो कभी बाप - दादाओं की संपति के बंटवारे के नाम पर अपने ही भाइयों का कत्ल कर रहे हैं । कही होली के नाम पर सैकड़ों लीटर पानी बहाया जा रहा है । कहीं पानी के अभाव में लोग गंदे नालों का पानी पीने के लिये मजबूर हैं । कहीं गंदे खाने के रूप में बच्चों को बीमारियॉं परोसी जा रही हैं । कहीं अंधविश्वास के चलते औरतें ठगी जा रही हैं । कहीं सीमेंट में अधिक रेत मिलाने से सरकारी इमारतें गिर रही हैं । नव - निर्मित पुल टूट रहे हैं। कहीं लोग पाई - पाई को मोहताज़ हैं तो कहीं विदेशों में अकाउंट खुलवाये जा रहे हैं । कहीं लूटखोरी हैं कहीे सूदखोरी है । कहीं ट्रफिक नियमों को मनवाने के लिये , घूस के अभाव में , बिना हैल्मैट के बाइक सवार छात्रों का वायरलैस मार कर सिर फोड़ा जा रहा है । हम पर कभी आलू- प्याज़ टमाटर लाद दिया जाता है तो कभी डीज़ल - पैट्रोल के दाम बढ़ाकर , वाहन होते हुये भी , खाली सिलेंडर लाद कर चरने पर पर मज़बूर कर दिया जाता है । हम सब कुछ सहते हुये भी हर पांच साल के बाद मालिक के रूप में उन्हें ही चुनते हैं . .। हम सुबह न्यूज़ पढ़ते है और शाम को बीवी के साथ फिल्म देखने चल देते हैं । कहीं कोई संवेदना नहीं . .। कोई प्रतिकार नहीं । . . क्या हम असली गधे नहीं हैं . . और अचानक . . एक झन्नाटेदार झापड़ के साथ सुनाई पड़ा - . .. इडियट . . गधा कहीं का । मैंने देखा . . दरअसल . . भावनावश . . मेरा दायां पैर अगली सीट पर बैठी एक नई - नवेली हिन्दी कवयित्री के बायें पैर से उलझ गये था ।


Dr Narendra Shukl