पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

लिखे जो ख़त तुझे - अवनीश सिंह चौहान


मेरी प्यारी सुहानी जी, 

आशा है आप अब स्वस्थ और आनंद से होंगी।

आपको कुछ बताना चाहता हूँ। पिछले दिनों लगभग 20 वर्ष बाद एक मित्र से फोन पर संपर्क हुआ। बहुत मन से बात की हमने। हम आपस में ऐसे बतियाये कि मानो हमारा बरसों से बात करने का मन हो। अभी मन तृप्त भी नहीं हुआ था कि अचानक चौथे दिन से वह मौनी हो गये, उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया, बात करना बंद कर दिया, जवाब देना भी बंद कर दिया। यदि वह पास में होते, सामने होते तो (बक़ौल वरिष्ठ कवि श्रद्धेय श्री वीरेंद्र आस्तिक- 'सामने तुम हो, तुम्हारा मौन पढ़ना आ गया/ आँधियों में एक खुशबू को ठहरना आ गया") उनके मौन को पढ़ा जाता, उन्हें मनाया जाता। लेकिन, कष्ट इस बात का नहीं कि उन्होंने कई दिनों से फोन नहीं उठाया, बात नहीं की या जवाब नहीं दिया; हो सकता है कि उनकी कोई मजबूरी रही हो, स्वास्थ्य ठीक न हो, कुछ और भी समस्या हो सकती है। कष्ट इस बात का है कि वह सोशल मीडिया में सक्रिय हैं (इसे मैं बुरा नहीं मानता) और उनके संदेश वहाँ प्रकाशित भी होते हैं, किन्तु आपसी संवाद से बचते हैं। क्या इक्कीसवीं सदी में हम इतने बदल गये हैं ?

अभी बस इतना ही,

आपका,
विशाल

(एक चुप्पे कवि की डायरी से)
10 सितम्बर 2018

मेरी प्यारी सुहानी जी,

एक अरसे के बाद आज जाने-माने सिंगर मुकेश जी को सुन रहा था- "जिन्हें हम भूलना चाहें, वो अक्सर याद आते हैं/ बुरा हो इस मोहब्बत का, वो क्योंकर याद आते हैं?" कि तभी एक प्रोफेसर साहब याद आ गये। सोचा कि आपको भी उनके बारे में कुछ बता दूँ। पिछले दिनों हमारे निजी विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के एक प्रोफेसर ने शरीरिक असमर्थता के चलते त्याग-पत्र दे दिया। वह यहाँ लगभग 5-6 वर्ष से कार्य कर रहे थे। सरकारी विश्वविद्यालय से सेवानिवृत होने के बाद उनकी यह दूसरी पारी थी और यहाँ भी उनका बड़ा दबदबा था। किसी की क्या मजाल जो उनसे कुछ बोल जाय? पढ़ने-पढ़ाने-काम करने का उनका मन हुआ तो कर लिया, नहीं तो आराम किया; मन हुआ तो ताश खेल लिए, चौसर बिछा ली, मण्डली जमा ली; मन नहीं हुआ तो कहीं घूमने-टहलने निकल गये। हाँ, बायोमेट्रिक पर ठप्पा लगाने के समय तक तो लौट ही आते थे। खैर, वह यहाँ से 'ससम्मान' चले गये, किन्तु अपने पीछे अपने तमाम साथी, अनुयायी और साजो-सामान छोड़ गये। इसलिए, यहाँ कुछ बदला नहीं। विश्ववविद्यालय चल रहा है, वैसे ही जैसे पहले चलता था- वैसे ही जैसे देश चल रहा है। कई बार मुझे यह लगता है कि अब "मैं अकेला ही भला क्यों / रात-दिन यह सोचता हूँ / सोचता हूँ आदमीयत को हुआ क्या / कोई तो सोचे है अच्छा क्या, बुरा क्या/ मस्त दुनिया/ मैं ही केवल / बाल अपने नोचता हूँ" (रमाकान्त)।

और क्या कहूँ? आप स्वयं समझदार हैं।

आपका,
विशाल

(एक चुप्पे कवि की डायरी से)
11 सितम्बर 2018

मेरी प्यारी सुहानी जी, 

शिक्षक दिवस के कुछ दिन पहले 'बेस्ट टीचर अवार्ड 2018' के लिए कुलपति महोदय ने सभी संकायों के अधिष्ठाताओं को एक बैठक में सम्बोधित करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय में कार्यरत आचार्यों और कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें नियमित तरीके से पुरस्कार दिये जाने की योजना है। चयन समिति बनायी गयी। चयन समिति के समक्ष भारी धर्मसंकट। धर्मसंकट यह कि चयन का आधार कुछ भी हो, चयन समिति को कटघरे में ही खड़ा होना पड़ता है; उसे यश और अपयश से एक साथ गुजरना पड़ता है। शिक्षक दिवस को हुआ भी यही। पुरस्कार हेतु नामों की घोषणा होते ही कई आचार्यों के चेहरे लटक गये। आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला चल निकला। अगले दिन सुबह संयोग से अधिष्ठाता-कक्ष में मेरी मुलाकात एक सहकर्मी महिला आचार्य से हुई। उस समय मुझे उक्त महिला बड़ी मायूस दिखीं। मुझसे न रहा गया, मैंने उनसे पूछ ही लिया कि सब खैरियत तो है? वह बोलीं कि पुरस्कारों के चयन में बड़ी धांधली हुयी है। मैंने कहा - कैसे ? वह बोली ऐसे कि पुरस्कार उन्हें नहीं मिला। मैंने कहा कि आपके संकाय में जिन आचार्यों को पुरस्कार मिला, वह डिजर्ब करते हैं, आपके सीनियर हैं, कर्मठ हैं। मायूस न होइये। हो सकता है अगली बार आपको भी पुरस्कार मिल जाय। वह महिला मेरे अप्रत्याशित जवाबों से संतुष्ट नहीं हुई। उस समय वहाँ संकाय के अधिष्ठाता और कई और आचार्य भी मौजूद थे।

अगले दिन पता चला कि उस महिला आचार्य ने विश्वविद्यालय के वरिष्ठ पदाधिकारियों के पास मेरे और संकाय के अधिष्ठाता के विरुद्ध शिकायत दर्ज करवा दी। आरोप यह कि अधिष्ठाता ने दुर्व्यवहार किया और मैंने उन्हें सांत्वना देने की हिमाकत क्यों की? ग्रीवांस कमेटी में मामला पहुँचा। पेशी हुई। ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, विद्वान् अधिष्ठाता ने कहा कि मैंने कभी किसी के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया और यदि किया है तो 05 सितम्बर के समारोह के बाद ही शिकायत क्यों, पहले क्यों नहीं? दूसरा यह कि मैडम जी मेरी आँखों में आँखें डालकर बोलें कि मैंने उनसे आखिर ऐसा क्या कह दिया। महिला आचार्य चुप। अब मेरी बारी आयी। मुझसे पूछा गया कि आप कौन होते हो सांत्वना देने वाले? मैंने कहा वह मेरी कलीग हैं, सदाशयतावश पूछ दिया। उस दिन जैसे-तैसे इस मामले से छुटकारा मिला। पर स्थिति वही थी - 'आसमान से गिरे, खजूर पर लटके।'

उस महिला आचार्य के पति दरोगा हैं। उनके पतिदेव ने जब देखा कि ग्रीवांस कमेटी में शिकायत करने से कोई फायदा नहीं हुआ, तब जिस आचार्य को पुरस्कार मिला था उसे ही एक दिन सुबह अकेला देख उन्होंने धमका दिया। इतने पर भी मन नहीं भरा। अगले दिन अधिष्ठाता के पीछे गाड़ी लगाकर उन्हें डराने के लिए उनकी घेराबंदी भी कर दी (यह दीगर बात है वह बुजुर्ग डरे नहीं)। परन्तु, पता नहीं क्यों मुझे उन्होंने बख्श दिया! उस दिन से बार-बार नचिकेता जी याद आते हैं - "पूरी नींद न हम सो पाते/ अब तक मिले दिलासे से/ जब तक सोने बदले/ गए यहाँ हैं पीतल-काँसे से/ पानी कहाँ रखे हम/ पेंदी तक हैं/ चिसक गए मटके।"

इस थोड़े लिखे को ही बहुत समझ लेना।

आपका,
विशाल

(एक चुप्पे कवि की डायरी से)
12 सितम्बर 2018

मेरी प्यारी सुहानी जी, 

एक अरसे के बाद आपको पत्र लिख रहा हूँ , अन्यथा नहीं लेंगी। इधर बहुत व्यस्तता रही। अंग्रेजी विभाग में इकलौता सह-आचार्य होने के कारण (अन्य सभी अतिथि सहायक आचार्य हैं) विभाग को सुचारु रूप से चलाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पडी। स्नातक, परास्नातक और शोध छात्रों की पढ़ने-लिखने की समुचित व्यवस्था करने में दो-ढाई महीने कैसे बीत गये, पता ही नहीं चला। कुछ अन्य कारणों से भी व्यस्त रहा— समय-समय पर विश्वविद्यालय के तमाम फरमान आते रहे कि कभी यह दस्तावेज बनाना है, तो कभी वह ड्राफ्ट तैयार करना है— कभी विश्वविद्यालय में विज्ञान पीठ, सामाजिक विज्ञान पीठ, व्याख्यानमाला आदि के प्रारूप तैयार किये और उनकी नियमावली बनायी, तो कभी उनका अंग्रेजी अनुवाद किया— कभी माननीय कुलपति जी का पत्रिका के लिए सन्देश लिखा, तो कभी माननीय कुलाधिपति जी के लिए कुछ लिखना-पढ़ना हुआ। चूँकि मैंने यह सब अपने परम श्रद्धेय अधिष्ठाता महोदय के कुशल निर्देशन में ही किया, इसलिए मुझे बहुत अधिक कठिनाई नहीं हुई। हाँ, कहने को तो इन दिनों अकबर इलाहाबादी साहब बहुत याद आये— 'हम क्या कहें अहबाब क्या कार-ए-नुमायाँ कर गए/ बी-ए किया, नौकर हुए, पेंशन मिली, फिर मर गए।'

परन्तु, यह इतना भी महत्वपूर्ण नहीं है कि इसे इस चिट्ठी में लिखा ही जाना चाहिए था ! खास तो यह है कि आज प्रशासनिक भवन से फोन आया कि प्रथम दीक्षांत समारोह की आयोजन समिति के सभी सदस्यों से कुलपति महोदय बातचीत करना चाहते हैं। फोन सुनकर लगा कि हो सकता है कि कुलपति महोदय दीक्षांत समारोह के उपरान्त कर्मयोगियों का धन्यवाद ज्ञापन करना चाहते होंगे, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहते होंगे। सो बड़ी उत्सुकता से मिनी कॉन्फ्रेंस हॉल में पहुँच गया। देखा कि सभी सदस्य, अधिष्ठातागण, परीक्षा नियंत्रक, कुलसचिव महोदय आदि पहले से ही धूनी रमाये बैठे थे, कि तभी कुलपति महोदय का हॉल में प्रवेश हुआ। गुड-मॉर्निंग हुई। सत्र प्रारम्भ। कुलपति महोदय अपने निराले अंदाज़ में बोले— "हाँ, भई, कार्यक्रम तो अच्छा हुआ। बधाई। किन्तु, कुछ कमियाँ भी रही होंगी। बताइये। खुलकर बोलिये।" भोजन समिति के समन्वयक से न रहा गया, झट से बोल पड़े— "कुछ खाना कम पड़ गया था, साब।" कुलपति महोदय शायद इसी मौके की तलाश में थे। उन्होंने भोजन समिति के समन्वयक को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जब आपको पता ही नहीं है कि किसको भोजन कराना है और किसको नहीं, ऐसी समस्या तो आएगी ही। फिर उन्होंने एक-एक करके सभी समन्वयकों को डाँटा-फटकारा। कई लोगों को तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर उनसे क्या अपराध हो गया। ऐसे में कोई बोले तो क्या बोले और क्यों बोले — "बिंदिया बोले क्या बोले साथ सजन का छूटे ना"— बस किसी प्रकार से नौकरी चलती रहे, कुर्सी बची रहे। ये और बात है कि चलते-चलते कुलपति महोदय ने फिर से कह दिया जिसको काम नहीं करना है वह नौकरी छोड़ कर जा सकता है।

और क्या लिखूँ ? आप तो स्वयं समझदार हैं।

आपका,
विशाल

(एक चुप्पे कवि की डायरी से)
8 अक्टूबर 2018 

Letters to My Dear Suhaniji - Abnish Singh Chauhan