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गुरुवार, 26 मई 2016

समीक्षा: अमिट लकीरें- अनुभवों का इन्द्रधनुषी गुलदस्ता

पुस्तक: अमिट लकीरें (संस्मरण)
लेखक: विभावसु तिवारी
प्रकाशक: मिलिंद प्रकाशन
4-3-178/2,कंदास्वामी बाग
सुल्तान बाजार, हैदराबाद-500095
आईएसबीएन: 978-81-86907-73-6
मूल्य: 250 रु.
पृष्ठ: 160
प्रकाशन वर्षः  2016

बहुत कुछ सिखाती है यह जिन्दगी, बशर्ते कोई खुले स्वभाव और धीरज भरे मन से सीखे। दूसरों के अनुभव भी हमारे बड़े काम के होते हैं। इसीलिए शेक्सपियर कहते हैं कि अनुभव एक रत्न है। और इसे ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि अक्सर यह अत्यधिक मूल्य में ही खरीदा जाता है। खांटी, जुझारू व संवेदनशील मन के पत्रकार विभावसु तिवारी की नई पुस्तक ‘अमिट लकीरें’ उनके अनुभव-जन्य स्मरणों का एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें राजनीति, दर्शन, पर्यटन, इतिहास, संस्कृति, संवेदना, निष्ठा, समपर्ण व अन्य विविध पहलुओं की भीनी-भीनी खुशबू आती है। यह पुस्तक उनके चुनिंदा अनुभवों-संस्मरणों की बानगी है। बानगी इसलिए कि वह चाहते तो करीब 50 बरस के अनुभवों को बेबाकी, बारीकी और बेतकल्लुफी से किताब को और मोटी शक्ल में तब्दील कर सकते थे पर शायद इस जिम्मेदारी को उन्होंने अगली किताब के लिए मुल्तवी कर दिया है।

लगभग 50 बरस के कालखंड के अमिट संस्मरणों को समेटे यह पुस्तक उन बातों, उन यादों से सीधा साक्षात्कार कराती है जिसे विभावसु तिवारी कालिज में कुशाग्र छात्र के रूप में, जर्नलिज्म में बतौर जुझारू पत्रकार के रूप में और मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में स्थित आईएफटीएम विश्वविद्यालय में एक अलग दायित्व के रूप में जिया है। कई दशक तक राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष प्रत्रकारिता और लम्बे समय तक गर्वोक्ति भरे पदों पर रहने के बाद इस विश्वविद्यालय से जुड़ना उनके लिए वाकई लीक से हट कर है। पर खुद चुनी गई नई जिम्मेदारी के प्रति अपनी स्वीकारोक्ति को उन्होंने बड़ी साफगोई से किताब में कुछ इस प्रकार दर्ज किया है- ‘‘उम्र और परिपक्वता का टकराव आड़े आना स्वाभाविक था। मेरी यही पहली परीक्षा थी। अपनी महानगरीय पहचान का चोला उतारना भी जरूरी था। पत्रकारिता क्षेत्र में लगभग चार दशक के अथक प्रयास से संजोय तथाकथित अलंकरण को कंधे से उतार एक लचीले दृष्टिकोण का जामा पहन बौद्धिक क्षेत्र के इस तालाब में तैरने का प्रयास करने लगा।"

दिल्ली विश्वविद्यालय में कालेज की पढ़ाई के दौरान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से भेंट, यशस्वी पत्रकार पिता की छाया में उस जमाने के राजनेताओं नानाजी देशमुख, अटलबिहारी वाजपेई, प्रकाशवीर शास्त्री आदि से घर के ड्राइंग रूम में मिली स्मृतियाँ, इंदिरा गांधी व संजय गांधी से मिलना, वोटक्लब की रैलियाँ, दिल्ली की परत दर परत कहानियाँ, कुतुबमीनार की त्रासदी के साथ-साथ मानवीय पहलुओं पर भी किताब में ऐसी अमिट लकीरें खींची गई हैं जो लेखक के भीतरी व बाहरी व्यक्तित्व से पाठकों को दो-चार कराने में सक्षम है। लेखक का भीतरी मन इतना कृतज्ञ, संवेदी व उदान्त है कि पुस्तक का आरंभ ‘‘प्रेरक को प्रणाम’’ शीर्षक से किया है जिसमें पिता के प्रेरणास्पद बिम्ब का विस्तार है। दिल्ली को नई शक्ल देने वाले प्रशासनिक अधिकारी व राजनेता जगमोहन, टाइम्स आॅफ इंडिया के तत्कालीन कार्यकारी निदेशक रमेश चंद्र जैन तथा जयपुर में रहने वाली मुंह बोली मौसी को भी बड़ी शिद्दत के साथ याद करना बेहद रोचक व प्रशंसनीय है।

पुस्तक मौजूदा दौर के मीडियाकर्मियों, पत्रकारिता व जनसंचार की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए विशेष उपयोगी है क्योंकि उस दौर की बारीक घटनाओं का जिक्र इस किताब में है। भाषा सरल, सुबोध, संतुलित इसलिए है क्योंकि लेखक खुद पत्रकार है। विभावसु तिवारी जी की अमिट लकीरों से सुसज्जित किताब को एक बार जरूर पढ़ना चाहिए, क्योंकि सभी के अनुभवों की लकीरें हमेशा ही अमिट होती हैं और पढ़ते-पढ़ते कई बार वह जेहन में अमिट छाप छोड़ जाती हैं। श्वेत-श्याम चित्रों और रेखांकन ने किताब को और रुचिकर बनाया है।

समीक्षक :
दिनेश तिवारी
वरिष्ठ पत्रकार व समालोचक
हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप)

Amit Lakeeren by Vibhavasu Tiwari