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रविवार, 24 सितंबर 2017

गोरख प्रसाद मस्ताना की सात कवितायें

गोरख प्रसाद मस्ताना

सुविख्यात साहित्यकार डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना का जन्म 01 फ़रवरी 1954 को बेतिया, पश्चिमी चंपारण, बिहार में हुआ। शिक्षा : एम.ए. (त्रय), पीएच -डी (हिंदी)। प्रकाशित पुस्तकें : (1 ) जिनगी पहाड़ हो गईल (भोजपुरी काव्य संग्रह) (जयप्रकाश विश्वविध्यालय, छपरा एवं वीर कुंवर सिंह विश्व विद्यालय, आरा के एम ए - भोजपुरी हेतु पाठ्यपुस्तक), (2) एकलव्य (भोजपुरी खंड काव्य), (3) लगाव (भोजपुरी लधु कथा संग्रह) (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली में भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स हेतु चयनित), (4 ) भोजपुरी व्यंग यात्रा (प्रेस में), (5) अगरासन (भोजपुरी कथा संग्रह), (6) अंजुरी में अँजोर (भोजपुरी काव्य संग्रह), (7) गीत मरते नहीं (हिंदीगीति काव्य संग्रह), (8) विन्दु से सिन्धु तक (हिंदी काव्य संग्रह), (9) रेत में फुहार (हिंदी गीति काव्य संग्रह), (10) पुन्य-पंथी (हिंदी महाकाव्य), (11) तथागत (हिंदी काव्य संग्रह)। पाठ्यक्रम लेखक : इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली में भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स, एनसीईआरटी, नई दिल्ली द्वारा पटना में में बाल कविता पर पाठ्यपुस्तक निर्माण, एससीईआरटी, पटना द्वारा भोजपुरी और संगीत का पाठ्यक्रम लेखन व संपादन। कार्यकारी सदस्य : कला व संस्कृति मंत्रालय, बिहार सरकार द्वारा पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार कोलकत्ता में सदस्य मनोनीत। प्रधान संपादक : भोजपुरी जिनगी, दिल्ली से प्रकाशित। सम्पादकीय मंडल : हेल्लो भोजपुरी, भोजपुरिया अमन, डिफेंडर स्थायी स्तंभकार: प्रवासी शक्ति (हिंदी साप्ताहिक)। राष्ट्रीय अध्यक्ष / संरक्षक पुरवैया, राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था, दिल्ली, इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद्, दिल्ली, अखिल भारतीय भोजपुरी लेखक संघ , बिहार। सम्मान एवं पुरस्कार : परिवर्तन साहित्य सम्मान, फणीश्वर नाथ रेणु शिखर सम्मान (2017), चंपारण साहित्य विभूति सम्मान (2015), बिहार गौरव सम्मान (2012), पंडित हंस कुमार तिवारी नामित पशस्ति पत्र प्राप्त (1990), रामेश्वर सिंह कश्यप सम्मान (1993) आदि। सम्पर्क : कव्यांगन, पुरानी गुदरी, महाबीर चौक, बेतिया, पश्चिमी चंपारण, बिहार- 845438।


गूगल सर्च इंजन से साभार

1. अहंकार
 
एक आग का दरिया
प्रचंड ज्वाला / विकराल व्याल
मैं जान कर, अनजान हूँ
उतार नहीं पाया इस चादर को
असित / भयानक
अमावस की रात में लिपटा
किसी जल्लाद के वस्त्र की भांति
यह लबादा
जिसके तार बने हैं शोषण के
किनारे बाने हैं प्रताड़ना के
और झालर बानी हैं अनय की
वो तनी है अत्याचारी बादलों की तरह
जिसे यह ढकेगी
वह पनपेगा कहाँ ?
साँस भी नहीं ले पाएगा
छटपटाएगा / हकलायेगा
और पैर पैर पटक पटक कर
मर जाएगा
कुरथ को चला रहा हैं
इसकी परम्परा ही रही है
कंसीय/ रावणवंशी
और कलयुगी परिधान में
यह और दर्पित है
यह बटवृक्ष नहीं विष वृक्ष है
पर इसे काटे कौन
सब हैं मौन
तब तो पनपेगा ही

 
2. पीठ पर हिमालय

वह ढोता है बोरियाँ
उठाता है गठरी
कभी कभी जबाब देने लगती है ठठरी
लेकिन ऋतुओं का रोना नहीं रोता
वह
क्या जेठ क्या माघ
सब सूद खोर की तरह घाघ
लेकिन कर्ज के मर्ज
की दवा है कहाँ
है भी तो दे कौन
गरीब चूप अमीर मौन
घर में गो जवान बेटियाँ
एक अपाहिज पुत्र
एक अंधी मां
अर्धांगिनी साथ में /आधी
राह भी नहीं नाप सकी
अब तो संगिनी है लाचारी
रात दिन की मित्र बेचारी
अमीरी की कब्र पर
गरीबी की धूप
टूटी आशा, बिखरे विश्वास
पल पल उच्छ्वास
अपनी ही पीठ पर ढो रहा
अपनी ही लाश
जीवन की हताश
इतनी भारी
मानो पीठ पर हिमालय

  
3. अखबार 

अखबार या विज्ञापन
विज्ञापनों से ढका चेहरा
मानो सत्य पर पड़ा पर्दा
किसी बुर्के  से ढकी नारी की तरह
या
कफ़न में लिपटा कोई मुर्दा
हाँ! मुर्दा हो तो हैं जहाँ
केवल खबर है, हत्या, बलत्कार
न कोई चिंतन/ न सामाजिक सरोकार
सम्पादकीय या अरण्यरोदन
साफ दिखत हैं लाचारी
क्योंकि इसके मालिक है आदमी / नहीं
व्यापारी
आदमी तो दूसरों का दुःख महसूसता है
व्यापारी को चाहिए धन
भाड़ में जाए वतन
आठ पन्नों में विज्ञापन
दो पन्नों में बाज़ार
और बाकिर बचे पृष्ठों में तन उघारु चित्रों की भरमार
भूल से भी कुछ जगह बच गयी
तो मांसल शारीर को बेचने के साधन का प्रचार
यही है प्रजातंत्र का चौथा खम्भा
या अचम्भा
लंगड़ा कर चलता है
बीमार की तरह
हमारा अख़बार
विज्ञापन के चश्मे से झाँकने वाला
जो स्वयं विद्रूप और विखंडित है
क्या गढ़ेगा नया भारत ?

4. चूल्हा

मैं चूल्हा हूँ
सदियों से जल रहा हूँ
झुलस रहा हूँ
लेकिन 'उफ़'
मेरे शब्दकोश में नहीं है
सूरज भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता
क्योंकि
वह केवल दिन में जलता है
और मैं दिन रात
झेलता हूँ आघात
भयानक आग का
जलना मेरा सौभाग्य
मजबूर के लए दुःख भी तो
सौभाग्य है
मैं एक सच्चा समाजवादी हूँ
जलत हूँ एक सामान
क्या आमिर क्या गरीब
सबके लिए कुर्बान
जलता है मेरा तन, जले
 मुझपर सेंकी गई
रोटियां
किसी की उदराग्नि बुझाती है
यही क्या कम है संतोष
सुख
अपने को जला कर दुसरे को ठंढाना
तृप्त करना
मुझ पर भुने हुए भुट्टे किसी भी भूख मिटा दे
यही तो मेरी सार्थकता है
कभी कभी मुझे होता है दुःख
जब कोई अचानक
मुझ पर पानी डाल देता है
मानो मेरे  सपने को कर देता है चूर
आग पर पानी बनता है फोड़ा
फफोला जैसे पीठ पर पड़े कोड़े हों
लेकिन किसे फुर्सत है इसे पढने की
जलना तो मेरी नियति है
आखिर मैं
चूल्हा हूँ।

5. विजेता 

अभावों के पहाड़
वेदना का सागर
उपेक्षा की लहरें
प्रताड़ना के गागर
सब चकनाचूर
काफूर
मेरे साहस के सूरज ने सबों कों
किया ध्वस्त,
पस्त
धुँध की चादर पर ज्यों पछिया
का वार
फाड़ देती है क्षितिज के उस पार तक
निराशा को
उम्मीदों की निगलनेवाली
परिभाषा को
मैं कदापि हतोत्साह नहीं होता
जैसे सूरज नहीं सोता
नहीं हारता घने कुहरे से
असित मेघों से
समय की जंजीर
रोक नहीं सकती मेरे रास्ता
बाँध नहीं सकती मेरे उत्साह को
जीवन तरंग को जैसे
हवा नहीं बाँध सकती
धुप के सात रंगों को
मेरे अंतर के सूरज ने
व्रत ले रखा है
अँधेरे को बेधने का
निराशा को छेड़ने का
आँख आंसू के तिजोरी है
आदमी की कमजोरी है
लेकिन जिसने इसे साध लिया
ह्रदय में बाँध लिया
वही विजेता है।

6. आह

एक भयंकर आग
एक दहन एक तपन
अंतर जवाला
जिसकी दाह में
चमड़े की क्या बिसात
लोहे की क्या औकात
भस्म हो जा है अश्म
एक अलौकिक, अदृश्य हथियार
तीक्ष्ण, तीव्र धार
जिसकी मार से धराशायी हो गयी
लंका
दुर्योधनी तेवर हो गये
तार तार
ध्वस्त हो गयी रावणी नीतियों
सावधान! वर्तमान
निंरकुंशता
मानवता ही सिसकियों को सुनों
समझों उसकी धाह को
जल जायेगी साम्राज्यवाद
पिघल जायेगा महाशक्ति
होने का दंभ टूट जायेगा
घमंड
किसका रहा है जो रहेगा?
वक्त की आह अथाह है
गला डालेगी जला डालेगी
इसकी तपन में
क्या नहीं गला है ?
यह अद्भुत बला है
चेतो / चेतो
समय की धर बड़ी तीक्ष्ण है
बड़ी तेज इसका वार
मार / चेतो

 
7. मेरा गाँव

हाथ बाँधे सच खड़ा है
असत्य की मुट्ठी में कैद
कराहता, अश्रु बहाता
उपेक्षा प्रताड़ना का गीत गाता
छलावे की राजनीति से त्रस्त
बहुमत
अल्पसंख्यक हो गया है
अपनी ही लाश पर
रो रहा है
पर हाथ लगाने वाला कौन
मालिक ! तू भी मौन
---पर
निराशा को ढ़ोता मेरा गाँव
बारह आना धूप चार आना छाँव
ऐसे में न्याय की लालशा
मन को बहलाने का ख्याल
अच्छा है
ईख की  सूखी पत्तियों से
बने हुए घरों की  भीड़
जैसे गौरये का नीड़
गरीबों का जन्म और मृत्यु का
गवाह बना है
सदियों से तना है
लेकिन मात्र डेढ़ हाथ
यही है सपनों का गाँव
जिसपर फ़िल्में  बना कर
कितनों ने अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार पा लिए
बना लिए, महलों पर महल
और मेरे गाँव
हाथ कटे उस कारीगर की तरह
अपाहिज है आज भी
जिसने बनाया दूसरों के
लिए ताजमहल
झूठ का सच जानना हैं तो
मेरे गाँव आइये
वरना शाम कर चौपाल बंद होनेवाली है। 


Seven Hindi Poems of Gorakh Prasad Mastana