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बुधवार, 17 अगस्त 2016

'पोएट्री मैनेजमेंट': मूल्यांकन की माँग - डॉ. मोहसिन ख़ान

शुभम श्री


हिन्दी-साहित्य जगत में कोहराम मचा हुआ है कि इस प्रकार की घटिया और अनगढ़ हिंग्लिश भाषा-प्रयुक्त, इंगलिश शीर्षक वाली रचना 'पोएट्री मैनेजमेंट' को 'भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार' के लिए उदयप्रकाश ने चुन लिया! साथ ही तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ तुरंत आने लगीं, प्रतिक्रियाओं के साथ प्रतिस्पर्धियों ने ईर्ष्यावश अपशब्द भी अपनी झोली से निकालने प्रारम्भ कर दिए। आलोचना, प्रत्यालोचना का दौर शुरू है, साहित्य जगत में खलबली मची हुई है और ये बाज़ार अभी बहुत गर्म भी है। साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है कि लोग कई पूर्वाग्रह, दुराग्रह, मतों के आग्रह-दुराग्रह में फँस गए हैं और अपने को या तो शुभमश्री की रचना के लिए विरोधी बना बैठे हैं या समर्थक, या कुछ लोग तटस्थ होकर खेल-तमाशा देख रहे हैं न हामी भर रहे हैं, न नकार रहे हैं। इस रचना और 25 वर्षीय स्त्री रचनाकार की वकालत में कुछ रचनाकार उतरे हुए हैं और कुछ उसके विषय में अपने समर्थित मत प्रदर्शित करने में अपने को झोंके हुए हैं। समर्थन-विरोध के इस दंगल में एक बहुत ज़रूरी काम या तो पीछे छूट रहा है, या वह हो नहीं रहा है, यह ज़रूरी काम बहस को शांत करते हुए किसी एक निर्णय को उभारकर समक्ष ला सकता है। विवादों की समाप्ति कर सकता है, आलोचना, प्रत्यालोचना को जवाब दे सकता है, समर्थकों और विरोधियों में संतुलन ला सकता है, किसी निष्कर्ष और निर्णय की भूमिका को सबलता प्रदान कर सकता है। वास्तव में ये ज़रूरी काम कविता के विश्लेषण, मूल्यांकन, पड़ताल का काम है, विश्लेषण या मूल्यांकन किसी भी प्रकार की गणित नहीं, विश्लेषण आलोचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। विश्लेषण किसी भी प्रकार का शव-परीक्षण, चिकित्सा अथवा चीर-फाड़ नहीं। विश्लेषण और मूल्यांकन की माँग इसलिए आवश्यक बन जाती है, क्योंकि इस रचना पर दुर्बोध होने की आवाज़ों की प्रबलता साफ सुनाई दे रही हैं। दूसरी तरफ समर्थक कविता के पैटर्न को लेकर अतिउत्साहित हैं और इस उत्साहवर्धन में अबतक की चली आ रही कविता को नकारते हुए उसे जड़वादी कविता तक कहने लगे हैं। इस उत्साह-हताशा के बीच यदि सारी स्थितियाँ साफ न हुईं तो समझिए साहित्य में समीक्षा अथवा आलोचना का दायित्व कमजोर पड़ जाएगा। सच माने में यहाँ पर, इन हालात में समीक्षा अथवा आलोचना की भूमिका का बहुत अधिक दायित्व होना चाहिए और उसे धर्म की तरह अपनाते हुए अपनी महती भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।

अबतक मेरे देखने में आया है कि 'पोएट्री मैनेजमेंट' रचना को केंद्र में रखकर किसी भी प्रकार का विश्लेषण / मूल्यांकन समक्ष नहीं आया है, 'पोएट्री मैनेजमेंट' रचना के सन्दर्भ खुलने चाहिए ये एक बहुत आवश्यक मांग इस समय में दिखाई देती है। ये संदर्भ पहले किसी वरिष्ठ और नामवर आलोचक के माध्यम से नहीं खुलने चाहिए, क्योंकि आलोचक की आलोचकीय ग्रहनशीलता, आस्वाद, स्थिति, दृष्टि और प्रसंग विलग भी हो सकते हैं इसलिए रचना का मूल्यांकन रचनाकर का होना चाहिए। सबसे पहले रचनाकर को इस कार्य में आगे आकार अपने हाथ में ये कार्य लेना चाहिए। इसका कारण साफ़ यह है कि रचनाकर ने जिस भाव-विचार भूमि में रहकर इस रचना का बीज बोया होगा और उसे सहेजते हुए विकसित किया होगा, उससे बेहतर इसके संदर्भों को कोई नहीं जान पाएगा। जिसकी रचना होती है, उसी की अपने भूमि और बीज होते हैं। इसी बुआई से रचना अंकुर के समान बाहर आती है और फिर उसका विकास होता है। रचना में संदर्भ रचनाकर के अपने होते हैं। रचना के संदर्भों में इतना भी उलझाव न हो कि वह अपनी मूल भूमि अथवा केंद्र से हटकर कहीं ओर किसी दिशा में बढ़ जाए और अधिक दुरूहता को समक्ष ले आए। इस रचना पर आरोप लग रहे हैं कि रचना में संवेदनहीनता है, भाव ही नहीं, यदि भाव नहीं हैं तो पाठक इसे ग्रहण कैसे करेंगे? कैसे पाठक इस रचना से जुड़ पाएगा? इस रचना में जटिलता का अंश अधिक है, यही जटिलता इसे साधारण पाठकों से दूर करती है। कुछ तो इस हद तक की बात कर रहे हैं कि रचना घटिया और बेमानी से भरी है। यह रचना दुष्परिणामों से उपजी है, पूर्व की परंपरा मे जिन साहित्यकारों ने कविता के पैमाने तय किए थे उन सबके टूटने का परिणाम ये रचना है। इस रचना में न तो भाषा है और न ही भाव है, तो फिर इसे कैसे इसे कविता मान ली जाए? इस रचना के संदर्भ में मेरा मानना है कि इसका लोग पाठ ठीक से न कर पा रहे हैं, या पाठ में उतरने में कठिनाई का आभास कर रहे हैं या संदर्भों की जानकारी का विस्तार उनके पास नहीं। वास्तव में यह रचना मुक्तिबोध की रचना से अधिक कठिन नहीं। जैसी जटिलता मुक्तिबोध के यहाँ मिलती है, वैसी जटिलता यहाँ नहीं। इसका कारण साफ़ यह है कि यह फेंटसीपूर्ण रचना नहीं, बल्कि वर्तमान जगत की समस्याओं पर गंभीरता से संकेतात्मक रूप में प्रश्न उभारकर रखती है, ये रचना ग्लोबल समस्या पर कहीं जाकर टिक रही है और वैश्विक समस्याओं के संकेतों को ग्रहण कर उसकी तरफ नोकदार इशारा कर रही है। ये रचना संकेतों की नोक को पकड़कर चल रही है, संदर्भों को पाठकों के समक्ष रख रही है, वास्तव में यह रचना व्याख्यात्मक रचना, अभिधात्मक, लक्षणात्मक रचना नहीं, बल्कि इससे विलग वह सामयिक समस्याओं, वस्तुस्थिति, विडम्बना और वक्रता को अपने में समाहित कर केवल इशाराभर कर रही है। आवश्यक नहीं कि कोई रचना बिलकुल पाठकों को सरलता से प्रस्तुति देते हुए उनके अनुरूप बनी रहे, कभी-कभी पाठकों को भी संदर्भों को पकड़कर रचनों को ग्रहण करना होगा, यह रचना उसी प्रकार की रचना है, जहां पाठकों को रचना के संकेतों को पकड़कर सामयिकता की तलाश करते हुए व्याख्या में उतरना होगा, क्योंकि ये रचना बहुत से पक्षों के नॉलेज की बात कर रही है; जो कि वर्तमान में विडंबनात्मक स्थिति में हमारे राष्ट्र और विश्व में मौजूद हैं। इसे ख़ारिज करना रचना की हत्या के समान या रचना से दूरस्थता बनाए रखने के सामान होगा, इसे खारिज करने की बजाए बार-बार पढ़ते हुए इस पर मंथन की ज़रूरत बनती है। इसका परीक्षण और मूल्यांकन होना तय होना चाहिए जिससे रचना की दुर्बोधता का निवारण हो सके और रचना अपने संदर्भों में ठीक से व्याख्यायित हो सके। वास्तव में ये रचना समझ की मांग को पैदा करते हुए इसकी उचित व्याख्या और मूल्यांकन की मांग कर रही है ये मूल्यांकन बिना किसी आग्रह-दुराग्रह के हो और उसमें तटस्थता की मात्रा भी अधिक हो तब ही रचना के साथ न्याय और विश्लेषण/मूल्यांकन की मर्यादा और दायित्व का बोध बना रहेगा। ये रचना प्रचलन से विलग रचना है, इसकी रचना भूमि सीमित अथवा संकुचित नहीं, बल्कि यह सामयिक समस्याओं को दर्शाते हुए वैश्विक विडंबनाओं की बात कर रही है अपने में प्रासंगिकता को चित्रित कर रही है। इसमें साहित्य और राजनीति का गठबंधन का संकेत है, जो वर्तमान में हमारे समाज में मौजूद है, गुटबाजी का बड़ा अखाड़ा है, जो दिन-रात लड़ा जा रहा है। सामयिकता में साहित्य का कार्पोरेट के साथ हितलाभांश का संदर्भ है, जो अर्थ केन्द्रित सभ्यता की ओर इशारा करते हुए खुला संकेत दे रहा है, कि अनेवाला समय साहित्य को भी कार्पोरेटों के हाथों में सौंप देगा; अब साहित्य भी कार्पोरेटों के लाभांश का हिस्सा होगा क्योंकि हवा, पानी और संवाद तो कार्पोरेटों ने बेच दिया, आधिपत्य जमा लिया आने वाले समय में साहित्य भी इनके आधीन होगा। कविता अपने संदर्भों, संकेतों में साफ कह रही है-

माने इधर कविता लिखी उधर सेंसेक्स गिरा
कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का

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समकालीन कविता पर संग्रह छप रहा है
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अबे, सीपीओ (चीफ़ पोएट्री ऑफ़िसर) की तो शान पट्टी हो जाएगी !
हर प्रोग्राम में ऐड आएगा
रिलायंस डिजिटल पोएट्री
लाइफ़ बनाए पोएटिक
टाटा कविता

हर शब्द सिर्फ़ आपके लिए
लोग ड्राइँग रूम में कविता टाँगेंगे
अरे वाह बहुत शानदार है
किसी साहित्य अकादमी वाले की लगती है
नहीं जी, इम्पोर्टेड है
असली तो करोड़ों डॉलर की थी
हमने डुप्लीकेट ले ली


जब बात बिक सकती है, जब सबकुछ एक मार्किट की शक्ल में परिवर्तित हो सकता है, तो साहित्य को कैसे बचाया जाएगा, ये रचना चिंता ज़ाहिर कर रही है। ये रचना उसी बाज़ारवाद और भूमंडलीकरण की चुनौतियों को दर्शा रही है; जो आज भी हिन्दी-साहित्य में हो हल्ला मचाया हुआ है, ग्लोबलाइज़ेशन, उदारवाद और प्रौद्योगिकीकरण के विरोध में हल्ला इसी साहित्य ने मचा रखा है, आँख मूंदकर कई पुस्तकों की रचनाकर डाली, लेकिन साहित्यकार / रचनाकर / आलोचक इस भूत और अभिशाप से स्वयं को मुक्त न करा पाया, परिवर्तन को नए रूप में तादात्म्य नहीं कर पाया। ये रचना आर्थिक तौर पर साहित्य पर हो रहे प्रभाव, बदलाव को दर्शा रही है और साहित्य के प्रभाव को अर्थ पर हो रहे प्रभाव को दर्शा रही है, उसके संकेतों की अभिव्यक्ति दे रही है। साहित्य और व्यावसायिकता की विडंबनापूर्ण स्थिति को समक्ष ला रही है। वर्तमान में अमेरिका का बोलबाला है, हर एक वैश्विक परिवर्तन में अमेरिकी प्रभाव और उसकी नीतियों की तलाश की जा रही है। साफ है कि अमेरिका का प्रभाव विश्व में बड़े गहरे रूप में पड़ रहा है। ईरान के प्रति अमीरीकी रवैये को ये रचना उठा रही है और वैश्विक साम्राज्यवाद की नई चालों को प्रेषित कर रही है, हाल ही में अमेरिका ने ईरान में अपने औपनिवेशिक हवाई अड्डे बनाए ये उसकी अपनी साम्राज्यवादी नीति रही, लेकिन विश्व सारा प्रभावित हो रहा है। ये रचना अमेरिका के समक्ष चुनौती का संकेत दे रही है-

कवि ढिमकाना जी ने लिखी पूँजीवाद विरोधी कविता
सेंसेक्स लुढ़का
चैनल पर चर्चा
यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के गिरने का नमूना है
क्या अमेरिका कर पाएगा वेनेजुएला से प्रेरित हो रहे कवियों पर काबू?


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ईरान के रुख़ से चिन्तित अमेरिका
फ़ारसी कविता की परम्परा से किया परास्त


वर्तमान में मीडिया की हालत को रेखांकित करते हुए मीडिया और बाज़ार के अंत:सम्बन्धों और गठजोड़ का इशारा देते हुए उसकी सामयिक स्थिति पर करारा व्यंग्य दे रही है। ये रचना समस्त रचनाकर्म पर मंडरा रहे अदृश्य खतरे की अभिव्यक्ति को उजागर करती है, एक ऐसा खतरा जिसमें हमारा सृजन अप्रासंगिक होते हुए किन्हीं अर्थ, राजनीति धारित सख्त, अनगढ़, बेढंगे हाथों में खिसकता दिखाई दे रहा है। सामयिक साहित्य जगत की गुटबाज़ी, हमलेबाजी की और भी बहुत से सूक्ष्म संकेत देते हुए आपसी द्वंद्वता, प्रतिस्पर्धा को रेखांकित करती है। वर्तमान में साहित्यिक संस्थाओं, साहित्य सम्मेलनों का कितना महत्व रहा गया है, उसकी विडंबनात्मक स्थिति की जायज़ा ले रही है। राजनीति ने साहित्य को भी शिकार बना लिया है, अब राजनीति से साहित्य के प्रतिमान तय होने का समय आ चुका है, वह जिस भाषा में बात कर रहे हैं वह लोक में मुहावरों के रूप में प्रयोग में लाए जा रहे हैं और साहित्य भी उसी दिशा में पिछलग्गू होकर घूम रहा है। साहित्य सम्मेलनों में नेता या प्रधानमंत्री की शिरकत तय करने लगी है कि साहित्य सम्मेलन कितना महत्वपूर्ण और कितना सफल हुआ। किसी समय में राजनीति के मानक साहित्य तय किया करते थे, अब राजनीति साहित्य के मानदंड निर्धारित कर रही है, बड़ी-बड़ी साहित्यिक संस्थाएं राजनीति के चुंगल में हैं और वहाँ रजीनीति की गंदी बिसात तथा चालों के अतिरिक्त है ही क्या-

ये है ऑल इण्डिया रेडियो
अब आप सुनें सीमा आनन्द से हिन्दी में समाचार
नमस्कार
आज प्रधानमन्त्री तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय काव्य सम्मेलन के लिए रवाना हो गए
इसमें देश के सभी कविता गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं
विदेश मन्त्री ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी क़ीमत पर काव्य नीति नहीं बदलेगा
भारत पाकिस्तान काव्य वार्ता आज फिर विफल हो गई
पाकिस्तान का कहना है कि इक़बाल, मण्टो और फ़ैज़ से भारत अपना दावा वापस ले
चीन ने आज फिर नए काव्यालंकारों का परीक्षण किया

सूत्रों का कहना है कि यह अलंकार फिलहाल दुनिया के सबसे शक्तिशाली
काव्य संकलन पैदा करेंगे
भारत के प्रमुख काव्य निर्माता आशिक़ आवारा जी का आज तड़के निधन हो गया
उनकी असमय मृत्यु पर राष्ट्रपति ने शोक ज़ाहिर किया है
उत्तर प्रदेश में फिर दलित कवियों पर हमला
उधर खेलों में भारत ने लगातार तीसरी बार
कविता अंत्याक्षरी का स्वर्ण पदक जीत लिया है
भारत ने सीधे सेटों में ‍‍६-५, ६-४, ७-२ से यह मैच जीता
समाचार समाप्त हुए


रचना एक और सामयिक मुद्दे को गंभीरता से सांकेतिक अभिव्यक्ति देती है, वह है छात्र आंदोलन और विश्वविद्यालय की प्रशासनिक, राजनीतिक खराब अवस्थाएँ। पिछले दिनों छात्र राजनीति गरमाई हुई थी जेएनयू प्रकरण, रोहित वेमुला की अत्महत्या, केन्द्रीय विशावविद्यालय में आंदोलन इत्यादि को बखूबी रचना अपने रूप में सबके समक्ष उठाती है और स्पष्ट करती है कि उच्चशिक्षा किस तरह की गलित अवस्थाओं के मध्य सांस ले रही है-

डीयू पोएट्री ऑनर्स, आसमान पर कटऑफ़
पैट (पोएट्री एप्टीट्यूड टैस्ट)
की परीक्षाओं में फिर लड़कियाँ अव्वल
पैट आरक्षण में धाँधली के ख़िलाफ़ विद्यार्थियों ने फूँका वीसी का पुतला
देश में आठ नए भारतीय काव्य संस्थानों पर मुहर


रचना काव्य जगत की गिरती हालत को बयाँ कर रही है, आज वास्तव में कविता की यह हालत हो गई है कि जैसे है पत्रिका में कोई कविता का पृष्ठ आया बड़ी अरुचि से उसे पलट दिया जाता है, नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, आगे की तरफ बढ़ लिया जाता है। आज के समय में कविता का उबाऊपन की ओर रचना का स्पष्ट संकेत दर्शाता है कि कविता या तो बहुत उबाऊ और बेकार का काम बन गयी है या प्रसिद्धि का हथियार बन गयी है-

कविता लिखना बोगस काम है !
अरे फ़ालतू है !
एकदम
बेधन्धा का धन्धा !
पार्ट टाइम !


शुभम श्री की रचना 'बुखार', 'ब्रेक अप आई लव यू' की चर्चा पहले भी साहित्य जगत में हो चुकी है, वे रचनाएँ एक अलग तेवर और अंदाज़ के साथ रची गयी थी, लेकिन इस रचना को पुरस्कार के लिए चयनित करना और उसपर लोगों का सिर धुनना इस रचना को प्रसिद्दि दिलाने के साथ इसकी नयी टेक्निक पर गौर करने के लिए बाध्य करता है। ये टेक्निक है अथवा शैली इसपर भी विचार करने को बाध्य करता है। किसी भी प्रकार की रचनाएं अपनी भावुकता के दायरे में ढलकर बड़ी सिद्ध नहीं की जा सकती हैं, वास्तव में उनका दायित्व समय और समाज की मांग के साथ बदल जाता है। विधा अथवा रचना जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवेश करती है, या एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी रचना को अपने हाथों में लेती है, तो विषय के साथ शिल्प में भी बदलाव आता है और यह बदलाव आना बहुत ज़रूरी हो जाता है एवं ये काव्य-प्रक्रिया सहज रूप से घटित होती है। ऐसा इसलिए होता है कि आसपास की दुनिया के साथ विश्व तेज़ी से निरंतर बदलाव की स्थिति में है, यह बदलाव आज के समय में बहुत तीव्रता के साथ उपस्थित है, जिसमें मूल्यों के साथ-साथ भाषा का भी महापरिवर्तन जुड़ा हुआ है। अब ऐसे में ये कहना कि अमुक रचना ने काव्य की जड़ता को तोड़ दिया, साहित्य के प्रति अनुचित उद्घोषणा लगती है। वास्तव में कोई भी साहित्य की विधा, या अपने में साहित्य जड़ नहीं होता है, वह प्रगतिशील होता है, उसकी दिशा और संरचना में विकास और परिवर्तन होता है। उसमें जीवन की विडंबना और वक्रता को पकड़ पाने की अपूर्व क्षमता होती हैं। शुभमश्री की इस रचना में बड़े साहित्यकार एक घिसे-घिसाए शब्द का आँख मूदकर धड़ल्ले से प्रयोग में ला रहे हैं कि- शुभमश्री की कविता, कविता की जड़ता को तोड़ने की एक काव्यात्मक कोशिश है। वास्तव में साहित्य या काव्य जड़ नहीं है और न होगा, कलतक जिसे सब प्रगतिशील काव्य कहकर गर्वित हो रहे थे आज इस रचना के आने के पश्चात वही साहित्य जड़ कैसे हो गया? यह सवाल यहाँ उठाया जा सकता है और यह वाजिब भी है। समर्थन की भाषा बहक जाये और वह कुछ भी दिशाहीन अभिव्यक्ति दे, ये बात हास्यास्पद और शर्मनाक लगती है। साथ ही यह बात साहित्य के गंभीर आयाम में मूर्खता की निशानी जैसी दिखाई देती है। यह भी कहा जा रहा है कि- शुभमश्री की इस कविता का नैरेटिव आख्यानपरक है और उत्तर-आधुनिक शिल्प पैरोडी है। न तो ये पैरोडी है और न आख्यानपरकता में संरचित रचना है, न ये इसका कोई गुण रखती है, यह रचना, रचना के सांकेतिक अभिव्यक्ति के नए दायरे तय कर रही है। मूल्यांकन की एक माँग यहाँ यह भी बन जाती है कि जिन रचनाओं के बीच से इस रचना को चयनित किया, क्या शेष रचनाएँ इसके समकक्ष की न थीं? क्या नई प्रासंगिक बात अपने विषय में उन्होंने नहीं उठाई थी? अगर उठाई थी, तो किस धरातल से कहाँ तक उठाई? क्यों उन रचनाओं में उदयप्रकाश को विहंगमता, व्यापकता और सरोकार नहीं दिखाई दिये, जो इसमें दिखाई दिये? क्यों इसके रूप विधान और संरचना के साथ विषय की व्यापकता को वे पकड़ लाते हैं और पुरस्कृत करने पर सहमति देते हैं? आख़िर इस रचना में वे क्या रचनात्मक नव्य गुणात्मक संकेत छिपे हैं, जो रचना को प्रतिस्पर्धी रचना से बेहतर सिद्ध करते हैं? वास्तव में यह बात सच है कि शुभमश्री की रचना अपने में स्वतंत्र और बने-बनाये दायरों तथा प्रचलित सौन्दर्यबोध से कहीं अधिक विलग है, ये हमारे असंगतिपूर्ण यथार्थ को बड़े गहरे से अभिव्यक्त कर रही है। रचना के विषय व्यापक रूप में रचना में उतर गए हैं, जिसका अपना रचना-विधान है। अपने चारों ओर बिखरी असंगतियों के खिलाफ सूक्ष्म अभिव्यक्ति अपनेआप में एक नया अंदाज़ रखती है। वास्तव में शुभमश्री की इस रचना के अंदाज़ और उसतक पहुँचने की समझ का विकास आज पाठक को करना होगा। रचना दिल में सीधे उतर जाए, अब यह बात पुरानी सिद्ध होने जा रही है। अब कविता और भी विचाराश्रित होकर वैश्विक सन्दर्भों की सांकेतिक अभिव्यक्ति के तौर पर नई पहचान बना रही है। अब कविता पाठकों की झोली में आसानी से समाने वाली कम होगी, कविता ने अपना दायरे को बहुत विस्तृत किया है और इस विस्तार को अगर कविता के लिए उपयुक्त न बनाया तो कविता का संकोच हो जाएगा। कविता बात को सीधे नहीं रखती, अभिधात्मक्ता के बजाए व्यंजना और लक्षणा इसकी धरती है। कई अंत:सूत्रों को अपने में बड़ी गहराई से बांधे रहती है और समस्त परिवेश को कम शब्दों में अभिव्यक्ति प्रदान करने की क्षमता भीतर संजोए हुए है। कविता में मारक क्षमता शब्दों के सही और उचित चुनाव से आती है यह विषय पर आधारित होता है कि अपने में वह किस तरह के भाव और विचार प्रेषित कर रहा है। केवल शब्दों का खेल कविता हो ही नहीं सकती है, चमत्कारिक्ता से किसी को लुभाया तो जा सकता है, लेकिन कुछ प्रदान नहीं किया जा सकता है। कविता प्रदाता की भूमिका में है और वह तभी सार्थक हो सकती है जब वह विश्व, समाज और व्यक्ति को कुछ दे सके, जो उसके विकास के लिए उपयोगी हो या बाधाओं को काट सके। सार्थक कविता का एक लक्षण यह भी मानता हूँ कि वह व्यक्ति को बेचैन करदे, उसे सुलाए नहीं बल्कि उसके भीतर कर प्रश्नों को आक्रोश को जगा दे। उसके भीतर असंतुष्टि की भावना और विचार को पैदा कर उसे मथते हुए व्यस्था के विरुद्ध उत्प्रेरित कर दे। कविता दो काम तो अवश्य करती है; एक तो व्यक्ति-जड़ता को मिटा देती है, दूसरी समाज की जड़ता और अंधता के विरुद्ध लड़ना सीखा देती है। कविता ऐसी हो जो भीतर रेंगती रहे और व्यक्ति को भीतर ही भीतर डसती रहे ताकि उसे कहीं चैन तब तक न मिले जब तक कविता की मांग पूरी न हो जाए। आज कविता की माँग आनंद का बोध जगाकर किसी आध्यात्मिकता का अलौकिक आनंद या पार ब्रह्म की अनुभूति का प्राप्तव्य नहीं या किसी रस चर्वणा की अनुभिति नहीं। आज भी कविता को एक हथियार की तरह ही इस्तेमाल करना होगा क्योंकि अभी अराजकता का जंगल समाप्त नहीं हुआ है। 

आज भी कविता की बहुत बड़ी ज़रूरत संघर्ष को गति देते रहने की है। मानवीय संघर्ष की ज्वाला तबतक कविता के माधयम से जलाई जाएगी जब तक मानवीय समाज साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था में न बंध जाए, जब तक वैश्विक समता का बोध उत्पन्न न हो जाए। कविता का कम लिखा जाना मेरी दृष्टि में शुभ है, क्योंकि कविता का प्रस्फुटन एक बेचैनी की अवस्था में होता है। जब बहुत दिनों तक कोई बात भीतर चीत्कार भरते हुए घुमड़ती रहे, हर पल उसी अवस्था पर लेजाकर मानस को केंद्रित कर दे जहाँ आपको कुछ बदलने की बात जगाकर अव्यवस्थित कर दे, कविता तब ही जन्म लेती है और वह कविता अपनी सार्थकता में फिर संप्रेषित होती है। कुछ बदलाव या नवीन रचना संकल्प कविता की प्रकृति में हो, वह अनुभूति की सचाई के साथ यथार्थ के बदलाव की माँग हो। कविता केवल यूटोपिया नहीं है या यूटोपिया जैसा कुछ नहीं चाहती क्योंकि इस धरती पर कहीं कोई यूटोपिया नहीं, न ही हो सकेगा। हर समय परिवर्तन की आवश्यकता है और रहेगी। क्या, कितना, कहाँ, कैसा और कब परिवर्तन चाहिए कविता स्वयम् तय कर लेती है। परिवर्तन की माँग कविता का नेचर है। शुभमश्री की रचना नए रचनात्मक विधान के साथ उतरी है, अब यह रचना-विधान ट्रैंड बनता है, या ट्रैंड को तोड़ता है, या इसे खारिज किया जाता है, यह स्थिति अपने में आगे आने वाले समय में स्पष्ट हो पाएगी; फिलहाल इसके छिपे हुए संदर्भों के उजागर की माँग बहुत अधिक मात्रा में बनी हुई है।

लेखक :

 

डॉ. मोहसिन ख़ान
 
स्नातकोत्तर हिंदी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक
जे.एस.एम. महाविद्यालय
अलीबाग- महाराष्ट्र
09860657970
khanhind01@gmail.com 


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