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सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

चर्चित कवि एवं आलोचक कुमार मुकुल— अवनीश सिंह चौहान


मुरादाबाद की प्रतिष्ठित शायरा मीना नक़वी का एक शेर है— "जब ख़यालों में दबे पाँव वो आ जाता है/ वो मुलाक़ात मुलाक़ात हुआ करती है।" कुछ ऐसी ही मुलाक़ात बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में 5 अगस्त 2011 को कुमार मुकुल से मेरी भी हुई। किसी रचनाकार से इस प्रकार की मुलाक़ात सुखद अनुभूति तो कराती ही है, रचनात्मक ऊर्जा भी प्रदान करती है। हुआ भी यही। उस रात बीकानेर हाउस में मैं और मेरे अज़ीज़ कवि, अनुवादक एवं संपादक अनिल जनविजय जयपुर जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी वहाँ पर कुमार मुकुल का आगमन हुआ। अनिल जी ने बड़े प्रेम से परिचय कराते हुए कहा कि कुमार मुकुल अच्छे कवि हैं। अच्छे कवि से मिलकर कविता सुनना कविता पढ़ने से कहीं ज्यादा अच्छा लगता है। इसलिए हमने विचार किया कि कुमार मुकुल से उनकी कुछ कविताएँ सुन लीं जाएँ। बस के आने में समय था ही। आग्रह करने पर मुकुल जी ने प्रसन्न-मुद्रा में 'ग्यारह सितम्बर', 'अंतरिक्ष में विचार', 'प्रेम के बारे में' आदि कविताएँ सुनायीं। विचार विनिमय हुआ। बस आयी। हम सब बस पर सवार हुए और जयपुर के लिए निकल पड़े। सुबह जयपुर पहुँचे। वहाँ हमें एक बड़ी होटलनुमा धर्मशाला में ठहराया गया। 

एक दिन बाद यानी कि 07 अगस्त 2011 को 'प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह' जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में आयोजित किया जाना था। 6 अगस्त की रात को बाहर से आने वाले सभी साहित्यकार-मित्र—  बल्ली सिंह चीमा, नरेश सक्सेना, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', ललित कुमार, प्रतिष्ठा शर्मा, धर्मेन्द्र कुमार सिंह, आदिल रशीद, पूनम तुषामड़ आदि अपने-अपने कमरों में ठहरे हुए थे (बाद में यहीं पर प्रेमचन्द गाँधी, दुष्यंत, माया मृग, मीठेश निर्मोही, बनज कुमार ‘बनज’ आदि से भी मुलाकात हुई थी)। एक कमरे में कुमार मुकुल के साथ मैं ठहरा हुआ था। चारों तरफ खुशनुमा माहौल था। संध्या हो चुकी थी।  लगभग आठ बजे के आस-पास वरिष्ठ साहित्यकार नरेश सक्सेना और युवा कवयित्री पूनम तुषामड़ हम दोनों से मिलने आये। बातचीत हुई और उसके बाद कुमार मुकुल की कविताएँ पुनः सुनने को मिलीं। उस समय मुकुल जी की 'आज' नामक कविता की सराहना करते हुए नरेश सक्सेना ने कहा था कि इस कविता के कथ्य में ताज़गी एवं मौलिकता है। यह सब जान-समझकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा था कि मुकुल जी कविताई करने में सिद्धहस्त हैं। 

चर्चित कवि एवं आलोचक कुमार मुकुल (मूल नाम— अमरेन्द्र कुमार) का जन्म 2 मई 1966 को आरा, भोजपुर (बिहार) के संदेश थाने के तीर्थकौल गाँव में हुआ था। सामान्य जीवन-स्थितियों में अध्ययन एवं मनन करते हुए उन्होंने आरा से ही इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई करने के लिए अपने पिता श्री गंगा प्रसाद सिंह के पास सहरसा चले आये। सहरसा में उनके पिताश्री एक सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे। पिताश्री के सानिध्य में उन्होंने 1986 में सहरसा कॉलेज, सहरसा से राजनीति विज्ञान में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तदुपरांत वे पटना चले आये और स्वाध्याय एवं संघर्ष करने लगे। इसी दौरान 1989 में उन्होंने अमान वीमेंस कॉलेज, फुलवारी शरीफ, पटना में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया। अध्यापन का सुख और संघर्ष कुछ विचित्र होता है। शायद यह सुख और विचित्रता उन्हें रास नहीं आयी और वे अपनी बौद्धिक अभिरुचि के अनुसार लेखन और संपादन में अपने आपको व्यवस्थित करने लगे। 

कॉलेज की नौकरी छोड़ने के बाद  उन्होंने 1994 से 2015 के बीच हिन्दी की आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं, यथा— 'अमर उजाला', 'देशबन्धु', 'पाटलिपुत्र टाइम्स', 'प्रभात खबर', 'कल्पतरू एक्सप्रेस' आदि में संवाददाता, उप संपादक, संपादकीय प्रभारी, फीचर संपादक व स्थानीय संपादक के रूप में सफलतापूर्वक कार्य किया। इसी दौरान 2003 में उनके बेटे की कैंसर की बीमारी के चलते जब उनके जीवन में बाधाएँ आने लगीं, तब वे दिल्ली स्थित ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका— 'नया ज्ञानोदय' में जाने-माने साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय के साथ संपादकीय सहयोगी के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने 2005 से 2007 के बीच द्वैमासिक साहित्यिक लघु पत्रिका— 'सम्प्रति पथ' का दो वर्ष तक संपादन, 2007 से 2011 तक त्रैमासिक पत्रिका— 'मनोवेद' में कार्यकारी संपादक एवं 2011 से 2012 तक आकाशवाणी में 'को-आर्डिनेटर' के रूप में भी कार्य किया है। तदुपरांत नवंबर 2015 से जून 2020 तक उन्होंने 'राजस्थान पत्रिका' (जयपुर) में कंटेंट स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। 

पेशे से पत्रकार और 'पैशन' से लेखक कुमार मुकुल कलम के धनी हैं। उनकी लेखन क्षमता ग़जब की है। उनकी यह विशिष्ट स्थिति उनकी लगन, समर्पण एवं कड़ी मेहनत का प्रतिफल है। कहने का आशय यह भी कि उनकी कविताई एवं आलोचना जनता-जनार्दन को गहरी नींद से जगाने, जागती आँखों से यथार्थ को परखने और बेहतर जीवन के लिए सार्थक सपने बुनने की प्रेरणा एवं उत्साह प्रदान करने में पूरी तरह से सक्षम है। शायद तभी उनकी कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ, लेख आदि 'वसुधा', 'हंस', 'पाखी', 'कथादेश', 'इंडिया टुडे', 'सहारा समय', 'समकालीन तीसरी दुनिया', 'जनपथ', 'जनमत', 'समकालीन सृजन', 'देशज', 'शुक्रवार', 'आउटलुक', 'नवभारत टाइम्स', 'हिन्दुस्तान', 'जनसत्ता', 'दैनिक जागरण', 'कादम्बिनी', 'आजकल', 'समकालीन भारतीय साहित्य', 'प्रथम प्रवक्ता' आदि पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होते रहे हैं। 'परिदृश्य के भीतर' (पटना पुस्तक मेले का ‘विद्यापति सम्मान' से अलंकृत कविता संग्रह, रश्मिप्रिया प्रकाशन, 2000), 'ग्यारह सितंबर और अन्य कविताएँ' (हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा अनुदान प्राप्त कविता संग्रह,  मेधा बुक्स, 2006), 'डॉ लोहिया और उनका जीवन-दर्शन' (जीवन-दर्शन एवं आलोचना, प्रभात प्रकाशन, 2012), 'अंधेरे में कविता के रंग' (काव्यालोचना, नई किताब प्रकाशन, 2012), 'सोनूबीती— एक ब्लड कैंसर सर्वाइवर की कहानी' (मनोवेद संस्थान, 2015), 'एक उर्सुला होती है' (कविता संग्रह, अंतिका प्रकाशन, 2016) आदि उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 2014 में 'हिन्दी की कविता : प्रतिनिधि स्वर' के पाँच कवियों में उन्हें भी शामिल किया गया था। दिल्ली में रचे-बसे कुमार मुकुल वर्तमान में 'कारवाँ' ब्लॉग का संचालन एवं संपादन कर रहे हैं।

यहाँ पर कुमार मुकुल की दस कविताएँ प्रस्तुत की जा रही हैं :-

1. वसंत, चींटियाँ और मनुष्यता

वसंत आ चुका है
यूँ बहुत से पेड़ अब भी नंगे खड़े हैं
पर चींटियों की फ़ौज़ बहराने लगी है
अपने बिलों-दांदरों से
अब मुझे भी बहराना होगा
अपने आलस्य, अपने मौन से

जमने को रखे दूध पर
कैसी पिल पड़ी हैं वे
जैसे माओ की सेना
एक जमात धंस जा रही
तो दूसरी उनके मृत सरों पर सवार
पहुँचना चाह रही
अपनी भूख अपनी प्यास तक

करोडों-करोड़ लोगों
तुम भी उठो अब
बहराओ अपनी दरारों से
और लील जाओ
जो तुम्हारी भूख-प्यास पर कब्जा किये बैठे हैं
कि अब बंटवारा बिल्कुल साफ होता जा रहा
कि अब कोई मुकाबला नहीं
कि गिनती के हैं वे अब
दस, बीस, पचास, सौ, बस
उठो कि फ़ैज़ पुकार रहे—
'कटते भी चलो बढ़ते भी चलो...'

उठो और मनुष्यता की इस
धोखे की टाट से गिरो
पर इस बार शेर बाघ-बघेरों के पाले मे नहीं
कि वे तो निश्चिन्ह हो चुके कब के
गिरो अब चींटियों की पांत में
कि मनुष्यों से बच नहीं पा रही मनुष्यता
चींटियों से बच जाये शायद।

2. कवि और आदमी 

अपने या 
इसके-उसके चाहने से 
कोई कवि नहीं हो जाता 
होते-होते ही 
कवि होता है कोई
जैसे कोई मनुष्य बनता है 
बनते-बनते ही
बना बनाया नहीं होता वह।

3. सुबह 

चांदनी की
रहस्यमयी परतों को दरकाती
सुबह हो रही है

जगो
और पाँवों में पहन लो
धूल मिट्टी ओस
और दौड़ो
देखो-स्मृतियों में
कोई हरसिंगार अब भी हरा होगा
पूरी रात जग कर थक गया होगा
संभालो उसे-उसकी गंध को संभालो

जगो
कि कुत्ते सो रहे हैं अभी
और पक्षी खोल रहे हैं
दिशाओं के द्वार

जगो
और बच्चों के स्वप्नों में
प्रवेश कर जाओ।

4. आज 

अशोक राज-पथ, सिकन्दर लेन, शाहजहाँ-पथ
कभी मुल्क होता था
जिन सम्राटों-शहंशाहों के नाम
आज
जोगा रहे हैं वो
एक-एक सड़क।

5. अंतरिक्ष में विचार 

आजकल विचार
अंतरिक्ष में लटक रहे हैं
जूतों की तरह
विश्वासों की अंधता से बंधे
और हम कुछ नहीं कर पा रहे
सिवाए इसके
कि उन जूतों की टक-टक
अपनी खोपड़ी पर महसूस करें
और एक बुसी हँसी हँसें
जैसी कि
युवा कवि हँसते हैं इन दिनों
मंचों पर अकेला पड़ते ही

कुछ भी खुला नहीं है आज
सिवा मुँह के
कुछ परचूनिए
उसे भी दबा रहे हैं
अपनी घुटी मुस्कराहटों को
बाहर करने की कोशिश में

नहीं
कोई समस्या नहीं
बस देश है, पार्टियाँ हैं, सीमाएँ हैं
और राष्ट्रमंडल के ग़ुलाम देशों का खेल
किरकेट
और उसमें ली गई दलाली है, सट्टे हैं
कहीं कोई प्रतिरोध नहीं
अन्नदाताओं को ओढ़ा दी गई है रामनामी
या तो भरपेटा भजन कर रहे वे
या रामजी-सीता जी की राह पकड़
अपना रामनाम सत कर रहे

इतिहास की प्लास्टिक सर्जरी
की जा चुकी है
मोहक बनाया जा चुका है
उसके छल-कदमों को इरेज करके
द्वारिका ढंढ़ ली है उन्होंने
और अब द्रौपदी का पात्र ढूंढ़ रहे हैं
जिसमें कृष्ण को खिलाया गया था
साग का एक पत्ता
और उसके मिलते ही
जनदुर्वासाओं की मिट्टी
पलीद कर दी जाएगी।

6. ग्यारह सितंबर 

यह उनका अपना ही विशाल माथा था
जो भरभराकर ढहा आ रहा था
ख़ुद उन्हीं के क़दमों में
और भयाक्रांत भाग रहे थे वे
भाग जाना चाह रहे थे
अपने ही माथे की तनी भृकुटी से
व अपनी ही तीसरी आँख के
वैश्विक प्रकोप से

हिरोशिमा-नागासाकी नहीं था वह
वियतनाम-इराक भी नहीं था
यह उनका अपना ही
सर्वग्रासी, महाबलशाली हाथ था
जो अपना ही मुँह जाब रहा था

उनके ही हथियार थे
बारूद भी उनके ही कारखानों की थी
उनकी अपनी ही खोदी खाइयाँ थीं
और सीढ़ियाँ कम पड़ गई थीं
और उनके पाँव
लाचारी के जलजले में
धँसे जा रहे थे

न्यूटन की गति का तीसरा नियम था यह
जिसे असंख्य बार बेच चुके थे वह
पर जो आज उनके ही घर में
लागू हो रहा था पहली बार
बिक रहा था उनके ही हाथों
उनकी अपनी ही सर्वद्रष्टा आँख थी
कैमरे भी उनके ही थे
जो दुनिया को सब-कुछ दिखा रहे थे

अनगिनत त्रासदियों को
फ़िल्मा चुके थे वे
आज वह फ़िल्म
वे ख़ुद देख रहे थे।

7. प्रेम के बारे में 

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आँखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में
कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज़-ब-रोज़ चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म साँसों की तरह
कि इन साँसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाज़ार कर दूँ
आखिर क्यूँ चाहूँ मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्स
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूँ।

8. उड़ान हूँ मैं 

चीजों को सरलीकृत मत करो
अर्थ मत निकालो
हर बात के मानी नहीं होते

चीजें होती हैं
अपनी संपूर्णता में बोलती हुयी
हर बार
उनका कोई अर्थ नहीं होता

अपनी अनंत रश्मि बिंदुओं से बोलती
जैसे होती हैं सुबहें
जैसे फैलती है तुम्हारी निगाह
छोर-अछोर को समेटती हुई
जीवन बढता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्यर्थ करता हुआ
एक नये आकाश की ओर

हो सके, तो तुम भी उसका हिस्सा बनो

तनो मत बात-बेबात
बल्कि खोलो खुद को
अंधकार के गर्भगृह से
जैसे खुलती हैं सुबहें
एक चुप के साथ
जिसे गुंजान में बदलती
भागती है चिडि़या
अनंत की ओर
और लौटकर टिक जाती है
किसी डाल पर
फिर फिर
उड जाने के लिये

नहीं
तुम्हारी डाल नहीं हूं मैं

उडान हूं मैं
फिर
फिर।

9. भला होता है आदमी 

भला होता है आदमी
बुरा होता है
गला होता है आदमी
छुरा होता है
आदमी के वश में होता है
सीधा होना
बेबस होता है
तो वह मुड़ा होता है

मुसीबतों में
टूट भी जाता है आदमी
टूट कर भी
आदमीयत से जुड़ा होता है

छोटी सी ख़ुशी में
फूट पड़ता है आदमी
छोटे से गम में
वह बेसुरा होता है।

10. जूते में 

जूते में अपना पाँव डालते ही
लगता है
कि सिर डाल रहा होऊँ
फिर वही एक आवाज़ गूँजने लगती है
ठक-ठक
ठक-ठक से ऊँचा कोई भी स्वर
हो जाता है असह्य
जिसे उड़ा देना चाहता है जूता
अपनी ठोकरों में
और ऐसा करते
अक्सर वह
मेरे अपने ही सर से
ऊपर उठ जाता है।

A Note on Kumar Mukul by Abnish Singh Chauhan. Ten Hindi Poems of Kumar Mukul