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मंगलवार, 19 जुलाई 2016

नदी, सीप और घोंघे - जय राम सिंह गौर

जय राम सिंह गौर

वरिष्ठ कथाकार जय राम सिंह गौर का जन्म 12 जुलाई 1943 को ग्राम रेरी, जनपद कानपुर (देहात) में हुआ। डाक विभाग से सेवानिवृत्त गौर जी वर्तमान में स्वाध्याय एवं लेखन कर रहे हैं। आपने न केवल कहानियाँ लिखी, बल्कि कविता, गीत एवं दोहे भी लिखे हैं। आपका दो कहानी संग्रह : ‘मेरे गाँव का किंग एडवर्ड’ एवं 'मण्डी' प्रकाशित हो चुके हैं। संपर्क : 180/12, बापू पुरवा कालोनी, किदवई नगर, कानपुर (नगर)- 208023. मो:09451547042। ईमेल: jrsgaur@gmail.com। आपकी एक मार्मिक कहानी यहाँ प्रस्तुत है:-

गूगल सर्च इंजन से साभार
नदी, सीप और घोंघे

आज स्टेला करीब पच्चीस साल बाद अपने लड़के की शादी का निमंत्रण देने आई थी। इतने साल बाद भी उसमे  इतने बदलाव नहीं आए थे कि उसकी पहचान छुपा सकें, मिलने का अंदाज वही न कोई झिझक न कोई संकोच, आते ही हलो कह कर गले लग कर किस किया तब तक उसका बेटा गाड़ी पार्क करके  आगया, स्टेला ने उससे कहा,‘ हनी, मीट योर अँकल डिक।’ लड़के ने चैंकते हुए हाथ बढ़ाते हुए कहा,‘ हलो अँकल आॅय आलसो डिक।’
‘ वोह, दैट्रस गुड।’
 मेरे चैंकने को को स्टेला ने ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर हल्की सी स्मिति आगई थी। वह चलने को हुई तब तक मेरी बेटी काॅफी लेकर आगई। मैंने कहा,‘ स्टेला मीट माॅय डाॅटर स्टेला।’
‘वाॅट! स्टेला ?’
‘यस।’
उसने स्टेला को भी आने के लिए बोला और अपने बेटे के साथ चली गई।
समय को जैसे बैक गियर लग गया।
सात-आठ साल के एक लड़का-लड़की दौड़ते हुए चर्च के ढलान से उतरते हुए नदी के किनारे घाट के पास एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठ जाते, कुछ देर तक नदी को निहारने के बाद नदी के पास पहुँच कर सीपी-घोंघे बटोरने लगते  उन्हे लेकर फिर उसी चबूंतरे पर  आकर बैठ जाते। अब दोनो अपने-अपने सीपियाँ और घोंघें गिनने लगते,। जाहिर था एक के कम एक के जियादह होंगे जिसके कम होते वह फिर नदी के पास जाकर कुछ घोंघों सीपी ले आता फिर दूसरा जाता और ले आता अब पहले वाले के जियादह हो जाते, यह खेल घ्ंाटों चलता अंत में दोनो अपने-अपने घोंघे-सीपी फेंक एक दूसरे का हाथ पकड़े घंटों नदी की ओर चुपचाप ताका करते। इस क्रम को चलते सालों बीत गए।
अब बच्चे स्कूल जाने लगे थे। कुछ समझदार भी होने लगे थे पर इतने समझदार नहीं हुए थे कि सीपी-घोंघें छूट जाते। अब वह काॅलेज पहुँच गए थे, इस तरह नदी के बैठना कुछ लोगों की आँख की किरकिरी बन चुका था, उनमे एक था नाॅरमन, उसने इस बात की खबर दोनो के घर वालों को कर दी।  दोनो के घर वाले एक दूसरे से परिचित थे उन लोगों आपस में बात की। बच्चों से बात की, उन लोगों ने स्वीकार कर लिया कि पढ़ाई के बाद इनका शादी कर दी जाय।
 पर उस चबूतरे पर बैठना अभी तक बरकरार था। चबूतरे पर बैठे हाथ में हाथ लिए नदी की तरफ ताकना अब भी जारी था। अब उन दोनो ने भविष्य के ताने-बाने बुनने शुरू कर दिए थे, अब एक दूसरे की छुवन उनके शरीरों को ताप से भरने लगी थी, दोनो एक दूसरे के शारीरिक भूगोल से अच्छी तरह परिचित हो चुके हैं फिर भी अंतिम सीमा पार नहीं की। ख्यालों की दुनिया में खोए न जाने क्या-क्या सोचा करते थे।

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डिक को मेडिकल की पढ़ाई के लिए इंगलैंड भेज दिया गया, । डिक था तो इंगलैंड में पर वह मानसिक रूप से कानपुर में स्टेला के पास रहता था, वहाँ से डिक हर हफ्ते स्टेला को पत्र लिखता, वह पत्रों में इंगलैंड के बारे में उसे बताता रहता, स्टेला अपने घर और उसके घर का हाल लिखती। खूब मजे से जिंदगी चल रही थी, डिक उसे बताता कि शादी के बाद हनीमून इंगलैंड में होगा। स्टेला के सपनें डिक और इंगलैंड की सैर से भरे रहते। पढ़ाई के अंतिम वर्ष के अंतिम महीनें दिन काटना भारी पड़ रहा था, वह खूब शाॅपिंग कर रहा था स्टेला के वेडिंग गाउन से लेकर न जानेे क्या-क्या। अचानक दो महीने से पत्र आने बंद होगए। डिक परेशान, उसने अपनी भाभी को पत्र लिखे पर उनका भी जवाब नहीं मिला।
 लौट कर आने पर मालूम हुआ कि स्टेला की शादी नारमन से होगई है। डिक सन्नाटे में आगया। उसकी समझ में नहीं आरहा कि क्या करे। उसने अपनी भाभी से पूछा,‘स्टेला की शादी हो गई और आपने मुझे बताया नहीं ?’
‘ क्या स्टेला की शादी हो गई ?’
‘ हाँ, क्या उनके यहाँ से इंवीटेशन नहीं आया था ?’
‘ नही ंतो, हाँ उसका मेरे यहाँ आना काफी कम हो गया था।’
 वह स्टेला के घर गया तो उसके फादर बड़ी बेरुखी से पेश आए, चाय तो दूर बैठने तक को नहीं कहा। झटके से कह दिया कि वह लोग मद्रास में हैं। उसकी समझ में कुछ नहीं आरहा था। वह बुरी तरह आहत हो गया था। इसी बीच उसकी भाभी को डिलीवरी हुई,। उसी समय वह बीमार पड़ीं और बच्ची को माँ की गोद में डाल चल बसीं।
मेरे ब़ड़े भाई ठीक नेचर के आदमी नहीं थे, उनकी संगत निहायत गंदी थी। शराब,जुआ और न जाने क्या क्या, उनकी घर में किसी से नहीं पटती थी, भाभी से तो उनकी बिल्कुल नहीं पटती थी। भाभी हर तरह से सुंदर थीं तन से भी मन से, वह उनके दोस्तों को भी  नहीं पसंद करती थी। मेरे पापा तो उन्ही के कारण चले गए। मम्मी ने उनकेे दोस्तों के घर आने पर पाबंदी लगा दी थी। भइय्या इसके पीछे भाभी का हाथ मानते और उन्हे परेशान करने की नई-नई तरकीबें निकालते मार-पीट करते। अंत में तंग आकर मम्मी ने उन्हे घर से निकाल दिया और कानूनी कार्यवाही करके  उन्हे प्रापर्टी से डिबार कर दिया, यह काम बहुत पहले होना चाहिए था ,भाभी तब तक बिल्कुल टूट चुकीं थीं।
डिक का किसी काम में मन नहीं लगता वह हमेशा स्टेला के ख्यालों में खोया रहता। उसकी माँ ने चर्च के फादर से बताया। फादर एक दिन घर आए। उन्होने डिक से पूछा,‘ तुम्हारा मेडिकल तो पूरा होगया।’
‘ यस फादर।’
‘ फिर प्रेक्टिस क्यों नहीं करते ?’
‘ मन नहीं करता।’
‘ देखो इस तरह तुम लोगों का नुकसान कर रहे हो।’
‘ तुम इंगलैंड से एक अच्छे डाक्टर बनके आए हो जिसका फायदा यहाँ के लोगों को मिलना चाहिए।’

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डिक को चुप देख फादर नें कहा,‘ देखो डिक मिशन के अस्पताल मे डाक्टर की जरूरत है तुम वहाँ ज्वायन कर लो।’
डिक वहाँं जाने लगा। माँ ने कई बार शादी के लिए कहा पर वह तैय्यार ही नहीं हुआ, अब उसके जीवन के दो उद्देश्य बन गए थे एक तो वह बच्ची दूसरे गरीबों की सेवा। समय अपने हिसाब से चल रहा था। डिक स्टेला को भूल नहीं पारहा था, बच्ची को जब स्कूल भर्ती कराने के लिए लेगया तो एडमीशन फार्म पर उसके नाम की जगह स्टेला लिख दिया था।
इन्वीटेशन देने के बाद आज स्टेला फिर आई, घर में कोई नहीं था, मैं इजीचेयर पर आँख बंद किए लेटा था उसने
पहले की तरह पीछे से आकर अपने दोनो हाथें से मेरी आँखें बंद कर लीं, मैंने उसके हाथों पर हाथ फेरते हुए कहा,‘ स्टेला तुम।’
‘तुमने इतने दिनों बाद भी मुझे छूकर पहचान लिया।’
‘पहचानता कैसे नहीं, तुम्हारी छुवन केे बीच आज तक कोई आया ही नहीं।’
स्टेला हूँ  कह कर उदास होगई, उसे नारमल करने की गरज से मैंने कहा,‘ यार बहुत  अरसे से तुम्हारे हाथ की चाय नहीं मिली।’
‘ अभी मिलती है कह कर वह किचन की तरफ चली गई। इस घर की हर एक चीज उसे आज तक सब याद थीं। तब तक किताबें उठाए वेबी आगई। किचन में खट-पट सुन उसने पूछा,‘ किचन में कौन है?’
‘तुम्हारी स्टेला आँटी।’
‘ वह कब आई।’
‘ कुछ देर पहले।’
वह किताबें मेज पर रख किचन में चली गई।
‘लीजिए गरमागर्म चाय और पकौड़े।’
‘ वाह चाय के साथ पकौड़े भी , पकौड़ौ के लिए तो मैने कहा नहीं था।’
‘ लेकिन मैं तो जानती हूँ कि तुम्हे पकौड़े बहुत अच्छे लगते हैं।’
हम तीनो ने चाय पी। वह काफी देर बेबी से बात करती रही। फिर उसने कहा,‘बेबी आगई है चलो हम लोग नदी की तरफ चलते हैं।’ बेबी ने  सहमति देदी।
वहाँ कुछ भी नहीं बदला था, नदी किनारे नाँव ,बरगद ,उसके नीचे का चबूतरा  सभी कुछ वैसा था केवल समय आगे खिसका था। नदी के पास वह चप्पल उतार पानी में घुस गई और मुझे भी बुलाने लगी,उसका बचपन पूरी तरह जी उठा था, बिल्कुल वही स्टेला सालों पहले वाली स्टेला सामने खड़ी थी वह उसी तरह सीपी-घोंघे बटोर रही थी। मैं अपलक उसे निहार रहा था वह सीप-घोंघे समेटे मुझे गुम-सुम देख मेरे पास आगई, बोली,‘ क्या होगया तुम्हेे ?’
मैंने चैंक कर कहा,‘ कुछ तो नहीं।’
‘ कहीं खोगए थे ?’
‘ शायद!, नहीं तो।’

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‘ चलो चबूतरे पर बैठते हैं, आज मैं कोई बेईमानी नहीं करूंगी तुम्हे आधे सीप-घोंघे दे दूँगी। हम चबूतरे पर जाकर बैठ गए। अब वह गुम-सुम हो गई, मैंने उसे हिलाते हुआ पूछा,‘ अब तुम्हे क्या हूआ ?’
उसने एक क्षण मेरी ओर देखा और लिपट कर रोने लगी , मैं घबरा गया , जितना उसे शाँत करने की कोशिश करता उतना ही वह और रोने लगती किसी तरह शाँत हुई , घर चलने को कहा तो उसने थोड़ी देर और बैठने को कहा , वह मेरा हाथ उसी तरह पकड़ कर बैठी थी जैसे बचपन में बैठती थी।
                     
घर पहुँचने पर बेबी ने कहा ,‘कितनी देर लगा दी डिक भाई अभी आॅन्टी को खोजते हुए आए थे।
‘ यहीं थे नदी के किनारे, तुमने उसे बताया नहीं क्या ?’
उसने हँसते हुए मजाक किया ,‘ क्या सीपी और घोंघे बटोर रहे थे ? ’
स्टेला ने हँसते हुए कहा,‘ तू ठीक कह रही है। ’
‘ पर वह हैं कहाँ ?’
‘ उन्हें फिर नदी किनारे रख आए।’
 थोड़ी देर बाद डिक आया वह उसके साथ चली गई।
वह चली तो गई पर मुझे सोचने के लिए बहुत कुछ दे गई। मैं उसी के बारे में लगातार सोच रहा था कि बेबी चाय लेकर आगई। चाय पीते हुए उसने पूछा ,‘आॅन्टी ने अपने बेटे का नाम डिक क्यों रखा कोई और नाम भी तो रख सकती थीं ?’
‘ यह तुम उसी से पूछना।’
‘ पापा आपने भी तो मेरा नाम स्टेला रखा है, कोई और नाम भी तो रख सकते थे ?’
‘ स्टेला मुझे अच्छा लगा मैंने रख दिया, तुम्हे न अच्छा लग रहा हो तो अभी चेंज करवा दें ?’
‘ नहीं नहीं स्टेला मुझे भी अच्छा लगता है, मैने ऐसे ही पूछ लिया।’
बेबी अब बड़ी हो गई है और उसका दिमाग भी चलने लगा है , स्टेला को देखने के बाद ही उसने पूछा कि मैंने उसका नाम स्टेला क्यों रखा, सोच नहीं पा रहा हूँ     कि असलियत सामने आने पर क्या होगा।
स्टेला आज उदास दिखी, पूछा ,‘ क्या हुआ ?’
‘ जानते हो, डिक आज पूछ रहा था कि मैने उसका नाम डिक क्यों रखा।’
‘ तुमने क्या कहा ?’
‘ मैने कहा डिक मुझे अच्छा लगा रख दिया , तुम्हे एतराज हो तो चेंज करवा दूँ।’
‘ फिर ?’
‘ उसने अजीब तरह से मुस्कुरा कर अच्छा कहा , डिक उसकी मुस्कुराहट ने मुझे बेचैन कर दिया है लगता है तुमसे मिलने के बाद इसके दिमाग में कुछ चल रहा है।’
‘ बच्चे अब छोटे नहीं हैं, यही कल बेबी भी मुझसे पूछ रही थी कि उसका नाम स्टेला क्यों रखा लगता है इन दोनों के दिमाग में कुछ चल रहा है।’
‘ अब क्या होगा ?’
           
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‘ डोन्ट वरी, टाइम सब सेट कर देगा। ’
आज स्टेला ने नदी की ओर चलने को भी नहीं कहा और जल्दी चली गई। अब मुझे भी बेबी से डर लगने लगा है, लगता है उससे बहुत सोच समझ कर बात करनी चाहिए।
कालेज से आते ही बेबी ने पूछा ,‘ आपको मालूम नहीं क्या?‘
‘ क्या ?’
‘ आॅन्टी चार-पाँच दिन से बीमार हैं।’
‘तुम्हे कैसे मालूम ?’
‘डिक कालेज नहीं आ रहा था, एक्जाम सर पर है, मैं उसको देखने उसके घर गई थी, वहाँ देखा तो आॅन्टी बीमार मिलीं, चलिए अभी चलते हैं। ’
मैने स्टेला के घर पहुँचते ही उससे पूछा,‘ तुमने मेरा फोन क्यों नहीं उठाया और अपनी बीमारी की खबर क्यों नहीं दी ?’
‘ मैं आपको वेवजह परेशान नहीं करना चाहा था। ’
 ‘तुम्हारी बीमारी से बढ़ कर कोई वजह हो सकती है क्या,? इट इज वेरी सैड स्टेला तुमने मुझे गैर माना।’
‘ नो नो डोन्ट टेक अदरवाइज, कोई ऐसी बात नहीं है।’
‘ तभी तुमने अपनी ऐसी हालत बना रखी है , मालूम है एग्जाम सर पर हैे और डिक कालेज नहीं जारहा है।’
स्टेला रोने लगी। बड़ी मुश्किल से चुप हुई बच्चे जानबूझ कर कमरे से निकल गए थे। बच्चे आगए, मैने डिक से पूछा,‘ किस का इलाज हो रहा है।’
‘ डा. सेठी का।’
क्या बताया उन्होने ?’
‘ वायरल है कुछ दिन लेगा।’
‘ तुमने मुझे खबर नहीं की और कालेज छोड़ कर बैठ गए।’
उसने कोई जवाब नहीं दिया और स्टेला की तरफ देखने लगा। मैंने उससे कहा वह काॅलेज नहीं छोड़ेगा स्टेला को मैं देख लूँगा। मैंने बेबी से कहा,‘ तुम घर जावो और हम सबके लिए खाना बनवा कर ले आओ, अपनी आॅन्टी से पूछ लो वह क्या खायेंगी, चाहो तो डिक भी साथ लेती जाओ।’
बच्चे चले गए, मैं स्टेला का माथा सहला रहा था, यकायक उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने ऊपर खींच लिया और फिर रोने लगी। मैं घबरा गया कि क्या होगया। मैंने उसे उठा कर तकिए के सहारे बिठाया , उसे पानी पिलाया उसके नाॅरमल होने पर पूछा,‘ तुम्हे मेरी कसम है, सही बताना तुमने मुझे खबर क्यों नहीं दी ?’
‘ किस मुँह से देती ?’
‘क्यों ?’
‘ मेरे कारण तुम्हारी जिंदगी खराब हो गई।’
‘ कैसे ?’

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‘मैंने तुम्हारा इंतजार नहीं किया, शादी कर ली, बेवफा तो मैं निकली। डिक तुम विलीब करो या न करो पर सच सही है कि मैं तुम्हे एक मोमेंट को भी नहीं भूल पाई।’
‘ छोड़ो , जो होना था हो गया , पर यह सब हुआ कैसे ? नारमन को तो तुम हेट करती थीं।’
‘ झूँठ नहीं बोलूँगी जब उन लोंगो ने बताया कि तुमने इंगलैंड में शादी करली है और वहीं सेटल होने का फैसला कर लिया है तो मेरा भी विश्वास एक बार हिल गया था।‘
‘ तुम्हे मेरी माँ और भाभी से तो पूछना चाहिए था।’
‘ तुम्हारे भाई साहब का मेरे घर आना-जाना बढ़ गया था, वह घंटो पापा के पास बैठे रहते, शतरंज खेलते, पापा का भी समय कट जाता था, एक दिन पापा ने उन्हे ड्रिंक आफर की जिसको उन्होने यह कह कह मना कर दिया कि उन्होने ड्रिंक करना छोड़ दिया है। एक बार पापा ने उनसे तुम्हारे बारे में पूछा तो उनका वही जवाब कि डिक ने इंगलैंड में अपने साथ पढ़ने वाली लड़की लोला
                     
 से शादी करके वहीं सेटल होगया, यह मुझसे गल्ती हो गई, मुझे तुम्हारी माँ और भाभी से बात करनी चाहिए थी।’
‘ जानती हो भाई साहब की क्रूएल्टी के वजह से मेरी भाभी छै दिन की स्टेला को मम्मी की गोद में डाल चल बसीं , मैंने कितनी बार उनसे डिवोर्स के लिए कहा पर वह हमेशा कहती थीं कि इतनी अच्छी फेमिली कहाँ मिलेगी और फेमिली की खातिर मेरी इतनी अच्छी भाभी नहीं रहीं। हाँ एक बात बताओ तुमने मेरे खतों का जवाब क्यों नहीं दिया?’’
‘  मिलते तो देती, क्या तुमने शादी नहीं की ?’
‘ शादी ! किससे शादी करता, जिससे करना...।’
‘ हाँ कहो डिक कहो वह तो बेवफा निकल गई, मैं बिल्कुल बुरा न मानूगी।’
डिक ने स्टेला के मुँह पर हाथ रखते हुए कहा,’ नहीं  स्टेला ऐसा नहीं, प्यार बस एक बार होता है, जिससे मैं प्यार नहीं कर सकता उससे मैं शादी कैसे करता, धोखा मैं किसी को दे नही सकता।’
वोह कहकर वह फिर रोने लगी किसी तरह उसे चुप कराया। वह फिर बोली,‘ शादी की रात ही उसकी असलियत सामने आगई थी, जानते हो डिक गोल्डेन नाइट में वह नशे में धुत हो कर आया था            
,उस दिन किसी लड़की के क्या अरमान होते हैं यह तो जानते ही होगे, उस रात उसने रेप किया था, मेरी सोल तो उसी दिन मर गई थी। एक्चुअली उसकी निगाहें पापा की प्रापर्टी पर थी। तुम्हारे भाई ने  पोस्ट आॅफिस से हम लोगों के लेटर गायब करवाए थे। कई बार सोचा कि सुसाइड कर लूँ पर न कर सकी। पापा की बीमारी मुझे जिंदा रहने के लिए मजबूर कर रही थी। थोड़े दिन के बाद डिक की मौजूदगी का अहसास हुआ कई बार दिमाग में आया कि एबार्ट करवा दूँ पर रीना ने समझाया कि इसमें इसका क्या दोष , उस रात के बाद उसको मैंने उसे कभी अपने पास नहीं आने दिया। असलियत कहाँ छिपती है पापा को मालूम हो गया उसी बीच नारमन आ गया था, उसे देख पापा का पारा हाई हो गया उन्हाने पुलिस को फोन कर दिया वह डर कर भाग गया। पापा पर इसका गलत असर हुआ उनको अटैक पड़ गया और वह नहीं रहे। वो पापा के फ्यूनरल में भी नहीं आया।’
‘ इसके बाद वह कभी आया ?’

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‘ नहीं, एक दिन पुलिस के एक सिपाही ने आकर बताया कि नारमन का एक्सीडेंट हो गया, बाडी पोस्टमार्टम हाउस में पड़ा है न चाहते हुए जाना पड़ा पड़ोसियों की मदद से बाडी का फ्यूनरल करवा दिया। उसके मरने का मुझे जरा सा भी अफसोस नहीं हुआ।’
‘इतना सब होगया तुम्हे मेरी याद नहीं आयी ?’
‘ खूब आई पर मेरा संकोच मुझे जकड़े रहा। जानते हो मैने अपने बेटे को उसका नाम भी नहीं दिया’।’
‘फिर डिक की शादी में कैसे इन्वाइट करने आगईं ?’
‘डिक ने पूछा था कि उसके साथ एक लड़की स्टेला डिसूजा पढ़ती है क्या उसे इन्वाइट कर सकता ह,ै उसी ने बताया कि वह तुम्हारी लड़की है, मैंने सोचा तुमने अपनी बेटी को मेरा नाम दिया है इसके माने मैं अभी तक तुम्हारे दिल में जिंदा हूँ और हिम्मत करके आगई।’
‘डिक यह सब जानता है ?’
‘नहीं मैने उसे कुछ नहीं बताया।’                   
‘लेकिन आज हम लोगों ने सब जान लिया, कहते हुए दोनो बच्चे आ गए।’ जिस का डर था वही हो गया। हम लोग सहमे हुए बच्चों को देख रहें थे। उन लोगों ने कहा,‘ अब आप लोगों को एक बात हमारी भी माननी पड़ेगी।’
‘ क्या ?’ हम दोनो ने एक साथ बोल पड़े।
‘ जो भूल पहले हुई थी उसे सुधार लिया जाय।’
‘क्या मतलब ?’
‘ आप दोनो एक हो जाएं।’
‘ इस उम्र में, क्या कहेंगे लोग ?’
‘ जो कहें कहने दीजिए, यह हम लोगों का पर्सनल मामला है।’
‘ अरे इससे क्या मिलेगा ?’
हम लोगों को मम्मी-पापा तो मिल जाएंगे, कहते हुए दोनों बच्चे आकर हम दोनों से लिपट गए।

A Hindi Story by Jay Ram Singh Gaur