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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

​आशीष बिहानी की कविताएँ ​

आशीष बिहानी

​युवा रचनाकार ​आशीष बिहानी ​का जन्म 11 मार्च 1992 को बीकानेर, राजस्थान में हुआ। प्रकाशित कृति : 'अन्धकार के धागे' (कविता संग्रह)। प्रकाशन : आपकी रचनाएँ यात्रा, गर्भनाल, समालोचन, अनुनाद आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित। सम्प्रति : बिट्स पिलानी से B.E. और M.Sc. करने के बाद वर्तमान में कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र, हैदराबाद में शोधरत। ई-मेल : ashishbihani1992@gmail.com

उखड़

दीवार-सी कठोर उसकी पीठ पर ठुकी कीलें हिल गयीं
रेशे तैर आए हरे गाढे द्रव के
काई से ढके, मच्छरों से तरबतर
सुगबुगे दलदली तालाब बन गए उसकी आँखों के चारों ओर
धँसती गयी उसकी जड़ें
किसी पुरानी गली में
ले आई है उसकी खोज उसे
कूदते-फाँदते, घिसटते-लटकते
उसकी साड़ी में छेद हो गए हैं
और मति में स्मृतिभ्रंश
अवाक्, उसने सर उठाया
दूर किसी बुड्ढे की खाँसी की भांति
सूने घर की काल्पनिक सांय सांय ने
झकझोरा उसे
पहेली सी गूँजती भाषा में

इसी डूब में कहीं आस पास उसका घर था
जिसके कोनों में उसके भय बसते थे
खेजड़ी के काँटों की तरह जो
रक्षा करते थे रह्स्यों की
जिनको नंगा कर देना था उसे हाड़ा रानी की तलवार से
जहाँ गुसलखाने में फिसल कर उसके नितम्ब का जोड़ हिल गया
दुविधाओं के वक़्त उस चोट की कसक लौट आती अचानक ही
जहाँ घट्टी की गरड़-गरड़ में पहाड़ों का रट्टा भुला जाता था
उनकी जगह आ बैठती थीं
विसंगतियों से लदीं कहानियां
जिसकी पानी की मोटर हेडीज़ की तरह भूतों को कुओं
से निकाल कर धूप में लेटा देती थी
उनकी संतुष्टि भरी आहों से उसके नथुने बेचैन हो उठते थे

उसके घुटनों में दर्द है
पर नितम्ब में कोई कसक नहीं
वो भौचक है कि कैसे कहानियों की डोरियाँ ले आयीं उसे
इधर
जहाँ से वो भागी थी भीगी, अधूरी बुनावटें लेकर
अरबों टिड्डे टकराए थे उसकी पीठ से
एक पत्ती भी साबुत नहीं बची
वहाँ धरती की नसों ने जमा कर दिया है
खालीपन का पीब
और अजनबीयत
ये उसका देश नहीं है
पर ये जगह उसकी है।

पता लगाओ


 अधपुती दीवारों के चरमराते ढक्कनों को चीरकर
वो बाहर आती है, क्रोध से जलती आँखों से घूरती हुई
और अपनी सारी ताक़त से चिल्लाकर कहती है,

क्या तुमने जाना, समझा, पता लगाया?
क्या तुम सुन भी रहे थे?
तुम्हारे आँख-नाक-कान किस काम के हैं?
तुम अपने कानों में सीसा भर,
हाथों से सीना ढक कर लेट जाओ
एक मुर्दे की भांति
आसमान तुमपर तूफ़ान बरपाएंगे,
रोएंगी फ़िजाएँ

वो सुन नहीं पाया,
विचित्र आवृति वाली ध्वनियाँ
नग्न हो मिट्टी में लोट-पोट हो रही हैं
उसके घुटने कमज़ोर हो गए हैं
वो इस व्यापक उजाड़ की स्वामिनी के क्रोध से थरथराते पैरों के पास गिर पड़ता है
अपने चेहरे से मिट्टी और अश्रुओं का मिश्रण चाट कर साफ़ करता है
कोशिश करता है घटनाओं को समझने की

वो सवार हो जाती है उसे पलट कर उसके जननांगों पर
वो देखता है भयभीत, चकित, रुग्ण; एक अभूतपूर्व प्रचंडता वाला तांडव।

मुस्कुराहट

सवेरे के परदों
ने दिन को रास्ता दिया
और सूरज की रोशनी
धड़धड़ाती हुई उतर आई
टेबल से फर्श पर

दातुन, साबुन और किताबें गर्माहट पाकर
खुश से हो गए
परदे बाहर वाले पेड़ की पत्तियों
की भाँति
मचलना बंद कर चुके

ननिहाल के
गोबर नीपे फर्श पर बने
मांडणों सी
पारदर्शी, गोलमटोल आकृतियाँ
क्रीड़ाएँ करने लगीं
दृष्टिपटल पर

सुग्गों का एक जोड़ा
पिंजड़े का दरवाजा खुला पाकर
बिना मुझे साथ लिए ही
फट्ट-फट्ट कर उड़ गया

बलिश्त भर मुस्कुराहट
ताज सी आ बैठी उसकी
ठुड्डी पर
झड़ गए दो दर्ज़न सितारे
प्यार के मारे
दिन दहाड़े ही।

मन


 वो देख रही है
अभिभूत हो
स्वप्नों के टुकड़ों
का किमेरा

अंतरिक्ष के कोनों में
सज गए हैं
मोहब्बत में झुलसे हुए डामर के ड्रम,
विचारमग्न बरगद के पेड़,
चट्टान सी सपाट भैंस की पीठ,
रेलमपेल, रंग और रुबाइयाँ
गीत, ग़ज़लें और गाँजा
झूले और झगड़े
झाड़ पर टंगी होली पर फाड़ी गयी कमीज़
काई और कली से पुते गुम्बद
बारिश से धुली सड़क
और सवेरे के बन्दर

पदार्थों और छायाओं की ओर झांकते,
विचित्रताओं के मेले में विचरते-विचरते
उसने छोड़ दी माँ की ऊँगली
और जाकर बैठ गयी
रेल के इंजन में
जहाँ दुनिया के नेता बने बनाये चित्रों में
रंग भर रहे हैं
महानता के निर्माण का शोर
बहरा करने पर आमादा है
उसे प्रतिनिधियों की गतिविधियों का जीवित होना
पसंद आया है

"तुम्हारे पापा का नाम क्या है?"
"पापा"
"तुम्हारी अम्मा का नाम क्या है?"
"अम्मी"
"तुम कहाँ से कहाँ जा रहे हो?"
"ननिहाल से घर"
कई मायनों में वह इस टेढ़े विश्व की
सच्ची बाशिंदी है।

पर यह सब घटित होता है
वास्तविकता की सलवटों में कहीं
गुप्त रूप से
अर्थहीनता के जंजाल के ठीक बाहर
उसके माँ-बाप पागलों की तरह
ढूँढ रहे हैं अपनी बच्ची का
मन

रात

तालाब के गीले कोनो पर
ज़िन्दगी की जेबों में
सिमट कर बैठे हैं
गुलदस्ते
अपने घर मिटटी में डुबोए
इस इंतज़ार में कि
अनिर्वचनीय गंध वाली
अँधेरे की एक लट उन्हें प्यार
कर जाएगी
बयार सा ठंडा दामन
सहला जायेगा उन्हें
हंसी की सलवटों से लदी
नाक सा नन्हा चाँद
नहला देगा चांदनी से
उनकी खट्टी उँगलियों को

वो रात है स्वयं,
उसके हाथों से बने सीप से आवरण में सूरज
औंधे मुँह सोया है
सधे हुए नंगे कदमों से
सूखे पत्तों से लदी राह पर
वो रखती है ओस के मोती
सवेरे की दूब पर,
बढ़ती है पश्चिम की ओर
छिड़कते हुए
अल्हड़ मुस्कान का प्रभात

वो चलती है पानी पर यों
जैसे तैरते हैं बादल
पर्वत श्रृंखला के सहारे-सहारे
  

रम, ख़ुशी और ममत्व

रम के नशे में अलमस्त हो,
नथुआ
गन्ने के जंगल से निकल कर
गाँव की ओर बढ़ा
झूलती गलियों और लड़खड़ाते पेड़ों
को कोसते हुए

उसने सितारों से रास्ता पूछा --
पर सितारे टिमटिमाने में व्यस्त हैं,
धरतीवासियों और उनके
पियक्कड़ बच्चों के फालतू सवालों
पर वो भेजापच्ची नहीं करते

सो बिना खगोलीय सहायता के
उलजलूल दुनिया में
सिरफिरा खो गया
जब बिस्तर के गीलेपन में हाथ मारकर
उसने अपने होश खोजे
तो चाँद उसका मुँह चिढ़ा रहा था
और उसके कानों में
भैंस के गोबर और बरसाती पानी
का ठंडा मिश्रण
प्यार की तरह उतर रहा था

एक पागल बूढी भिखारिन,
जिस पर सड़क के दोनों ओर से
बिजली के खंभे पीली रोशनी मूत रहें हैं,
अपने बेहद छोटे छप्पर से
सिर निकालकर,
जोर-जोर से अपने टुंडे हाथ हिलाकर,
पोपले मुँह से हंसकर
टिन के पींपे सी खाली रात में
दर्शकों के एक काल्पनिक
हुजूम के सामने
अपनी ख़ुशी व्यक्त कर रही थी

कुछ दूरी से एक लटकते खाली थनों वाली
कुतिया,
जिसके तीन पिल्लों को
कुत्ता सरदारों ने गोधूलि के वक़्त
मार डाला था,
अपनी आखिरी संतान को लिए
शरण की तलाश में
बुढिया के छप्पर की ओर भागी चली आ रही है
(कीचड में लंपलेट हो बडबडाते शराबी को
कुतूहल से देखते हुए)

गाँव से नौ-तीस पर निकलने वाली
दिन की आखिरी बस खों-खों करती हुई
इन सब पर कीचड़ और धुआं
उछालती हुई चली गई

रम, ख़ुशी और ममत्व
काफी गर्म होते हैं;
ठंडी रातों में
ज़िगर को जकड कर बैठे रहते हैं।


Hindi poems of Ashish Bihani

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