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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

दो बैलों की एक और कहानी : कथाकार- डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'

डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'

०१ जुलाई १९४७ को अलीगढ़ (उ.प्र.) में जन्मे डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ' का नाम हिंदी साहित्य जगत में स्थापित रचनाकारों में शुमार है। आपकी रचनाएँ प्रत्येक दृष्टि से अमानवीयकरण का विरोध दर्ज करतीं हुईं मनुष्यता की पक्षधर दिखाई पड़तीं हैं । आपके द्वारा सृजित 'बसंत के इंतजार में', 'कितनी अग्नि परीक्षाएं' आदि प्रमुख काव्य-संग्रह, 'दूसरी शहादत', 'दुःख के पुल से', आदि कहानी-संग्रह, 'तीसरी आजादी का सपना' व्यंग-संग्रह, 'उपन्यासकार जेनेन्द्र एवं उनका त्यागपत्र', 'हिंदी कहानी: एक अंतर्यात्रा', 'हिंदी साहित्य: विविध प्रसंग', ''राजेंद्र यादव: कथा यात्रा', 'हिंदी कहानी के सौ वर्ष', 'नयी कहानी: प्रतिनिधि हस्ताक्षर', 'समकालीन काव्य की दिशाएं', 'रामदरश मिश्र:रचना समय','समकालीन कविता का परिदृश्य','हिन्दी उपन्यास की दिशाएं','हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य' आदि समीक्षात्मक ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं । आपने लगभग दो दर्जन कृतियों का संपादन किया है । आकाशवाणी के मथुरा, आगरा, रांची, जलगाँव, रीवा, दिल्ली आदि के केन्द्रों से आपकी वार्ताएं प्रसारित हो चुकी हैं । दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में आपकी भागीदारी रही है । चर्चित व स्थापित पत्रिका 'अभिनव प्रसंगवश' के आप संपादक हैं । आपके साहित्यिक अवदान के परिप्रेक्ष्य में आपको ब्रजसाहित्य संगम मथुरा द्वारा ब्रजविभूति, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा विद्यासागर की उपाधि, साहित्य श्री सम्मान (अलीगढ़), तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। संपर्क - डी १३१, रमेश विहार, निकट ज्ञान्सरोवर, अलीगढ़ (उ.प्र.)- २०२००१, मो: ०९८३७००४११३।


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

दो बैलों की एक और कहानी

उस सन्नाटे में खलबली मचाने के लिए एक कंकड़ी ही पर्याप्त थी। इस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने बड़ा-सा पत्थर ही उछाल दिया था।

कर्फ्यू का आज सत्ताइसवाँ दिन था। दहशत भरी खामोशी में जरा सी आवाज भी विस्फोट की तरह बजती थी। कमरे में लेटे ही लेटे मुझे पता चल गया था कि चीखने की आवाज सराय सुलेमानी के अब्दुल हमीद की है। पता नहीं वह किससे उलझ रहा था? जब तक मैं बालकनी तक पहुँचा घर के आसपास की छतें लोगों से भर चुकी थीं। उधर सराय सुलेमानी की छतों-बारजों पर भी लोग जमा हो चुके थे। उस समय दोनों ओर के भय और क्रोध ठंडे पड़ चुके थे। इतने लम्बे कर्फ्यू ने वैसे ही सबके कस-बल निकाल दिये थे।

इस समय सबको उत्सुकता थी कि सराय के उस छोटे-से चौक में चीख-पुकार किस बात की है। कर्फ्यू की शुरूआत में तो इतनी-सी चीख एक भयंकर उत्तेजना बन जाती और 'अल्ला हो अकबर' और 'हर हर महादेव' का आतंक गूँजने लगता। अब लोग हफ्तों से घर में बंद थे, काम-धंधा ठप था, राशनपानी खत्म होने के करीब था, इसलिए मजहब, सम्प्रदाय और अफवाह की पकड़ धीरे-धीरे कम हो रही थी। चारों ओर दमघोंटू सन्नाटा पसरा रहता था। आमतौर पर कोई जीप रुकने या किसी नेता बगैरह के आने पर शहर के इस हिस्से की जादातअ टूटती थी। पच्चीस-छब्बीस दिनों से लोग घर में कैद जैसे थे। कुछ दुस्साहसी लोग पालीवाल इन्टर कालिज से होकर सिविल लाइन आ-जा चुके थे। लेकिन जब से नल पर पानी भरने वाली औरतों के साथ पी०ए०सी० वाले दुर्व्यवहार कर गऐ थे, तब से लोगों को कर्फ्यू की भयंकरता का अहसास हो गया था। अब तो दूधिए भी मुश्किल से वहाँ आ पा रहे थे।

वर्तमान जिलाधिकारी कभी मिजोरम में तैनात रहे थे। वहाँ उन्होनें तीन महीने लगातार कर्फ्यू लगा कर एक रिकार्ड कायम किया था। यहाँ भी वे उस सफल प्रयोग को दुहरा रहे थे। कर्फ्यू लगने के दो-तीन दिन बाद जब चार घंटों के लिए कर्फ्यू में ढील दी गयी थी तो कई जगहों पर चाकूबाजी, आगजनी की घटनाएँ हो गयी थीं। क्षुब्ध जिलाधिकारी ने अनिश्चित काल के लिए कर्फ्यू थोप दिया था। उनकी धारणा कुछ ऐसी थी कि इस शहर के लोग पैदायशी फसादी हैं। महीने-डेढ़ महीने घर में कैद रहेंगे, दूध-दवा से वंचित रहेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जायेगी। हम लोग भी एक सप्ताह में कर्फ्यू के अभ्यस्त हो चले थे। जो कुछ मुहल्ले की गलियों में मिल जाता था, जिस भाव मिल जाता था, खरीद लेते थे। दूध के अभाव में फीकी चाय से गुजारा हो रहा था। सब्जी नहीं तो दाल काफी थी। सराय सुलेमानी का हाल शायद हमसे भी बुरा था। वह तीन ओर से हिन्दू आबादी से घिरा मुहल्ला था। अगर आगरा रोड से उसका सम्पर्क न होता तो जाने उस मुहल्ले की क्या दुर्गति होती? उसी सड़क के सहारे उन्हें थोड़ा-बहुत दूध और सब्जी मिल जाती थी। गलियों में होकर तो वहाँ का कोई बाशिन्दा कहीं जा नहीं सकता था। यही हाल बनिया पाड़ा और बाबरी मंडी के हिन्दूबहुल मुहल्लों का था।

गनीमत यह थी कि अखबार आ जाते थे। उन्हें पढ़कर कुछ अफवाहों पर विराम लग जाता था। खबरों पर टीका-टिप्पणी में कई घंटे गुजर जाते थे। धूप अच्छी निकल रही थी। इसलिए सर्दियों के दिन का पूरा मजा छत पर मिल रहा था। वहीं खाना, वहीं सोना और वहीं ताशबाजी। आज वहीं लेटे-लेटे झपकी लग गयी थी तो हमीद की चीख-पुकार ने चेतन कर दिया। आधी-अधूरी नींद में तो यही लगा था कि दंगा फिर से भड़क उठा है। और कोई होता तो मैं समझता कि जैसे कोई नाटक कर रहा है। लेकिन मैं हमीद को कई सालों से जानता हूँ। वह कम बोलने वाला, मेहनत मजदूरी करके गुजर-बसर करने वाला बंदा है। वह गाड़ीवान है। अपनी गाड़ी है और दोनों बैल उसी के हैं। नाम रख दिया है- हीरा और मोती। बड़े-बड़े सीगों वाले ये कद्‌दावर बैल दूर से ही ध्यान आकर्षित करते हैं। उनके सींगों से डर लगता है, लोग पास से गुजरते तो बचकर चलते। लेकिन वे निहायत सीधे हैं। हमीद उन्हें रोज नहला-धुला कर साफ-सुथरा रखता। उन्हीं की मदद से पास की मैदा मिल से आटे और मैदे की बोरियाँ लादकर थोक व्यापारियों तक पहुँचाना उसका रोज का काम है। उसके सम्पर्क में आने वाला हर इन्सान चाहे हिन्दू हो या मुसलमान उसे भला, नेक और मेहनती ही मानता है। पिछले साल एक वारदात जरूर हो गयी थी, जिससे वह कुछ हिन्दू भाइयों की नजर में गड़ने लगा था।

हाथरस अड्‌डे और रायल टाकीज के बीच एक सांड मस्तभाव से विचरण करता था। सब्जी वालों की दुकान में मुँह मारना उसे बहुत प्रिय था। एक दिन उसे न जाने क्या हुआ कि बैलगाड़ी में जुते बैलों के प्रति वह बहुत उग्र और आक्रामक हो गया। हमीद की बैलगाड़ी को देखते ही वह डकराना और दौड़ना शुरू कर देता था और बैलों पर हमला बोल देता था। बैल गाड़ी लेकर जीजान से भागते थे और हमीद पैनिया से उसे मारता था, फिर भी वह बैलों को चोट पहुँचाने में सफल हो जाता था। साँड के लिए कोई भी बैलगाड़ी और किसी के भी बैल शक्ति-प्रदर्शन के काम आते थे। वहाँ हिन्दू-मुसलमान का कोई भेदभाव न था। हाँ, तमाशबीनों को इस कांड में बड़ा मजा आता था। फिर इस दृश्य में साम्प्रदायिकता का भाव कब जुड़ गया, पता नहीं। साँड या बिजार ठहरा शंकर जी का नंदी और बैल एक मुसलमान गाड़ीवान के। कुछ लोगों को बहुत अच्छा लगा था कि हिन्दुओं के एक देवता का वाहन मुसलमानों के पशुओं को खदेड़ता है। इस रोज-रोज की झड़प में हमीद का एक बैल कुछ ज्यादा चोट खा गया। वह हमारे मुहल्ले के लोगों से कहता फिरा कि कुछ कीजिए जनाब, नहीं तो मेरी तो रोजी-रोटी
ही चली जाएगी। किसी के कहने पर वह पुलिस चौकी तक हो आया। वहाँ से जबाव मिला कि तुम्हीं बताओ, लावारिस जानवर पर कौन-सी दफा लगाएँ।

एक दिन उस साँड को किसी ने जहर दे दिया था। सबके शक की सुई पहले हमीद की ओर ही घूमने लगी थी। साँड के मर जाने पर धूमधाम से उसकी शव यात्रा निकाली गयी। अगले दिन कुछ नौजवानों ने हमीद का गिरेबान थाम लिया था। हाथरस अड्‌डे पर कुछ दिनों तक खासा तनाव बना रहा। हमीद कई दिन तक सफाई देता फिरा था कि मैंने कुछ नहीं किया। हालाँकि उस साँड से हिन्दू गाड़ीवान भी बहुत दुखी थे, फिर भी दोषी सिर्फ हमीद को माना गया।

तब मुझे यही लगा था कि हमीद ऐसी जलील हरकत नहीं कर सकता है। इसलिए नहीं कि उससे मेरी कोई खास जान-पहचान या यारी थी। वह आते, जाते रास्ते में अक्सर दिखायी दे जाता था। उसे किसी से मालूम हो गया था कि मैं स्कूल में पढ़ाता हूँ। सामने पड़ जाने पर 'उस्ताद जी सलाम' का सिलसिला उसी ने शुरू किया था। एक बार प्यारे नाई की दुकान में आधे घंटे साथ बैठना हुआ तो वह अपने बारे में बहुत कुछ बता गया था।

करीब बीस साल पहले वह यहाँ एक रिश्तेदार के यहाँ आकर रहने लगा था। मेहनत मजदूरी करके पेट भरता था। एक बार एक पंडित जी के मकान पर मजदूरी कर रहा था तो उसकी मेहनत देखकर वे बहुत खुश हुए। उनके सुझाव पर उसने पहले एक ढकेल खरीदी। पैसा पंडित जी ने दिया था बिना ब्याज के। उन्हीं ने बाद में बैलगाड़ी खरीदने में मदद की थी। ''उस्ताद जी पंडित जी की मेहरबानी मरते दम तक नहीं भूल सकूँगा।

बेचारे पिछले साल ही जन्नतनशीन हुए।'' उनकी याद करके वह भरभरा आया था। अब उसका छोटा-सा अपना मकान था और जिन्दगी की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। मेरे मकान की छत से उसका मकान दिखाई देता था। बाहर खड़े दो बैल उसकी पहचान के लिए काफी थे। वैसे वह अपने मुहल्ले के बदनाम निवासियों से कुछ अलग ही रहता था। उसके मुहल्ले के कुछ लोग तो इतने आतंकवादी और उग्र थे कि किसी हिन्दू लड़के की पतंग से मुसलमान लड़के की पतंग कट जाने पर उन्हें मजहब खतरे में लगने लगता था। दंगा-फसाद में किसी काफिर को हलाक करना उन्हें पवित्र काम लगता था। वे अपनी नफरत को छिपाते भी
नहीं थे।

हमीद इन उन्मादियों से दूर ही रहता था। इसलिए भी मुझे नहीं लगा कि हमीद ने साँड़ को जहर देकर मारने का गुनाह किया होगा।और कोई होता तो मैं समझता कि वह खवाहमखवाह का नाटक कर रहा है। लेकिन मामला हमीद का था, इसलिए इस वाकये को गंभीरता से लेना मेरी मजबूरी थी। छत पर जाकर देखा तो एक विचित्र दृश्य दिखायी दिया था। पुलिस वालों की एक टोली दोनों मुहल्लों की सीमा पर तैनात रहती थी। वे पुलिस वाले अपनी-अपनी राइफल सँभाले चौकस खड़े थे। हमीद के दोनों बैल एक-दूसरे से सटे खड़े थे। हमीद पुलिस वालों से जोर-जोर से कह रहा था- ''आप बंदूक से हमें मार दीजिए, लेकिन आज मैं रूकने वाला नहीं हूँ साला, एक महीना हो गया घर में घुसे हुए। रोजी का कोई हिसाब नहीं। पड़ोसी से माँग कर बच्चों को खिला रहे हैं। और आप...।''

तभी एक पुलिस वाले ने उसे धकिया कर एक ओर कर दिया और धीरे से कुछ कहा। हमीद फिर उबल पड़ा- ''गिरफ्तार कर लीजिए कर लीजिए। जेल में रोटी तो मिलेगी।'' फिर एकदम उसकी आवाज गिर गयी थी।

''हम तो फिर भी चाय पी रहे हैं, रूखी सूखी खा रहे हैं। इन बेजुबान जानवरों पर रहम करो दरोगा जी, तीन दिन से भूखे हैं बेचारे। इनके लिए भुस कहाँ से लाएँ। अरे आप ही ला दीजिए कुछ...।'' कहते-कहते उसने छतों पर हमें देखा तो फिर पूरी ताकत से चीख पड़ा था....।'' अरे भाइयो! आप ही रहम कीजिए। ये बैल तो गऊ के जाए हैं। गऊ की तो आप इज्जत करते हो। इबादत करते हो। आप ही घास ला दीजिए इन बेजुबान जानवरों के लिए....कुछ कीजिए जनाब इनके लिए। कुछ इन्तजाम....।" चीखते-चीखते हमीद रोने-सा लगा था।

उसकी चीख-पुकार से या बैलों के भूखे रहने की सूचना से हमारे एक पड़ोसी में कुछ दया का संचार हुआ था। हालांकि ज्यों-ज्यों कर्फ्यू की अवधि बढ़ रही थी, हमारी दया, करूणा का प्रतिशत गिरता जा रहा था। जो भी कारण रहा हो, हमारे पड़ोसी ने पालक की एक गड्‌डी छत से नीचे फेंक दी थी। जो बैलों से कुछ दूरी पर जा गिरी थी। दो-एक लोगों ने लौकी, काशीफल के टुकड़े फेंक दिए थे। हमीद अचानक अपनी तहमद से आँसू पोंछते हुए उठा था। उसने पैनिया लेकर जोर से एक-एक बार दोनों बैलों की पीठ पर कस के जमाया था। ''कम्बखतो जाओ यहाँ से। यहाँ भूखों मर जाओगे। जहाँ जो मिले, खाओ, जहाँ सींग समाये, जाओ। जाओ...''

डंडे की चोट खाकर हीरा और मोती हिले थे, बढे थे। फेंकी गयी लौकी और पालक की ओर बढ़ने लगे थे। हमीद ने पीठ फेर ली थी और अपने दरवाजे पर बैठ कर सिसकने लगा था। तमाशा देख रहे हम सब लोगों ने देखा कि दोनों बैलों ने किसी भी चीज से मुँह नहीं लगाया था। वे अचानक पीछे की ओर मुड़े थे और सिसकियाँ भर रहे हमीद के सिर को चाटने लगे थे।

Story of Two Oxen by Dr. Vedprakash 'Amitabh'

5 टिप्‍पणियां:

  1. namskaar !
    is prakaar hume aur achchi kahaaniyaa padhen koprapt hogi , ye aasha hai , shre amitaabh saab ko badhai sadhuwad ,
    sadar

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  2. डा. अमिताभ की यह दो बैलों की कहानी सामजिक रिश्तों के आधुनिक सन्दर्भों को बहुत ईमानदारी के साथ व्यक्त करती है .बधाई

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