पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

दो नवगीत: कवि- डॉ. जयजयराम आनंद

डॉ. जयजयराम आनंद

डॉ. जयजयराम आनंद का जन्म 1 अप्रेल 1934 को ग्राम- नगला सेवा (लायकपुर), पो. परोंखा, जिला मैनपुरी (उ. प्र.) में हुआ। शिक्षा: एम.ए., एम.एड. विशारद, साहित्यरत्न, पी.एचडी.। आपने कई विधाओं में साहित्य सृजन किया है, यथा- कविता, दोहा, लेख, कहानी, समीक्षा, यात्रावृत आदि। आपकी प्रकाशित कृतियाँ- दोहा संग्रह: बूँद बूँद आनंद, अमरीका में आनंद, हास्य योग आनंद; नई कविता: घर घर में वसंत, घर के अंदर घर, बोला काग मुंडेर पर; गीत: माटी धरे महावर चंदन; बालगीत: चाँद सितारों में आनंद; गद्य शिक्षा: विश्व के महान शिक्षा शास्त्री, आदि। आपके नवगीत और बालगीतों की पांडुलिपियाँ प्रकाशन के इंतज़ार में हैं।  रा.शै .अ .प्र. परिषद नई दिल्ली से राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई साहित्यक एवम सामाजिक अन्स्थाओं द्वारा आपको सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में आप स्वतंत्र लेखन करते हुई कविता, समीक्षा, कहानी से सम्बंधित साहित्यक गतिविधियों में आप सक्रिय हैं। सम्पर्क: आनंद प्रकाशन ,प्रेम निकेतन E-7/70 अशोका सोसायटी, अरेरा कालोनी ,भोपाल (म.प्र)। 462016 फ़ोन: 0755- 2467604 : मो.: 09826927542 । आपकी दो रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

१. मेरा घर दालान

छूमंतर हो जाय जहां पर
तन-मन बसी थकान
आस -पास में वहीं मिलेगा
मेरा घर दालान

आम नीम बरगद पीपल की
जहां घनेरी छांव
जेठ दुपहरी थके पथिक के
थमें जहां पर पाँव
करें बसेरा मिलजुल पंछीं
गायें गौरव गान

जहां बिसात बिछी सपनों की
लोरी की सौगात
गडी नाल पीढी डर पीढी
बता रही औकात
रहें कहीं भी इस दुनिया में
पल पल खींचे ध्यान

माँ चूल्हे की सिंकी रोटियाँ
दादी फेरी छाछ
सम्बन्धों के कोमल किसलय
हरा भरा ज्यों गाछ
खोज खोज कर हारे घर के
मिलें नहीं उपमान

२. अनगिन कांकड़ ठेले हैं

जाने कितने
रामलाल ने
सचमुच
पापड़ बेले हैं

बचपन में
आँसू ने बह बह
गहरा सागर रूप धरा
हुई नसीब न
दूध बूँद की
पानी पीकर पेट भरा
समय, समाज
कर्ज के ढेरों
हर दिन
झापड़ झेले हैं

बेचारी
अम्मा ने भेजा
ढोर चराने जंगल में
काले आखर
भैंस बराबर
खूब रमा मन दंगल में
धूल फांकते
रहे हमेशा
अनगिन
कांकड़ ठेले हैं

Two Navgeet of Dr Jayjayram Anand

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapne mere do navgeeton kopaamukhtaa se paathkon ke liye sahi dhang se prastut kiyaa,mujhe apaar khushee huee aur aapko dhayvaad n denaa aapke prati anyaay hogaa.
    krapayaa kavitaa kosh se jodane ke liye sujhaav dene kaa kasht karen .
    dr jaijairam anand

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. दोनों नवगीत बहुत सुन्दर है
    प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

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