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रविवार, 24 अप्रैल 2011

चार नवगीत: कवि- आनंद कुमार 'गौरव'

आनंद कुमार 'गौरव' 


हंसती-बतियाती
चलती हैं 
सड़कों पर कविताएँ 
(नदी का अकेलापन,पृ.62)

इन पंक्तियों में वरिष्ठ नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जीवन की गाड़ी को समय की सड़क पर जिस प्रकार से हंसते-बतियाते चलने का आग्रह करते हैं, वैसा ही आग्रह दिखाई पड़ता है आनंद कुमार 'गौरव' की रचनाओं में आनंद कुमार 'गौरव'- गीत-नवगीत के क्षेत्र में एक ऐसा नाम- जिसे माहेश्वर तिवारी एवं मुरादाबाद का प्रतिनिधि कहा जा सकता है, बिना किसी लाग-लपेट के। विषय-वस्तु के स्तर पर जितना सहज एवं सजग है यह नवगीतकार, उतना ही उसके पास है मधुर एवं कोमल कंठ; जब गाये तो बजने लगती है बाँसुरी और बोले तो झड़ने लगते हैं फूल, काफी कुछ दादा तिवारी जी की तरह ही एक बात और- कोई रचनाकार अच्छा लिख सकता है, अच्छा गा सकता है, किन्तु जीवन-व्यवहार में भी अच्छा हो- यह जरूरी नहीं; जबकि गौरव जी इस त्रिसूत्रीय डोर पर बखूबी संतुलन बनाए हुए हैं यह कोई घोषणा नहीं है, न ही मुरादाबाद में किसी को ऊपर-नीचे करने का प्रयास-बल्कि यह मेरा अनुभव है, जिसे सहृदयी मित्रों-विद्वानों के समक्ष विनम्रता से प्रस्तुत कर रहा हूँ 

आनंद कुमार 'गौरव' का जन्म हुआ १२ दिसंबर १९५८ को ग्राम-भगवानपुर रैहनी, जनपद-बिजनौर (उ.प्र.) में। आँसुओं के उस पार’ (उपन्यास), ‘थका-हारा सुख’ (उपन्यास), ‘मेरा हिन्दुस्तान कहाँ है?’ (गीत-संग्रह), ‘शून्य के मुखौटे’ (मुक्तछंद-संग्रह) आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 'सुबह होने तक’ (ग़ज़ल-संग्रह), सांझी सांझ (नवगीत-संग्रह ) प्रकाशन के इंतजार में हैं । विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा राष्ट्रीय काव्य संकलनों में आपकी लगभग 300 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं । दूरदर्शन (दिल्ली) एवं आकाशवाणी (रामपुर) से आपकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है। 'नवगीत नई दस्तकें' में शुमार गौरवजी न केवल वेब पत्रिका गीत-पहल के संपादक है बल्कि विप्रा कला साहित्य मंच, मुरादाबाद के संयोजक भी हैं। उत्तरायण (लखनऊ ) का 'प्रथम पुरुष सम्मान' आदि से सम्मानित गौरवजी वर्तमान में हिमगिरि कॉलोनी, काँठ रोड, मुरादाबाद-२४४००१ (उ0प्र0) में निवास कर रहे हैं। आपका मोबाइल नंबर-097194-47843 है। यहाँ गौरव जी के चार नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ:-


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 

1. छुपे हुए हम


जाने क्यूं छुपे हुए हैं हम
खिड़कियों पे झुके हुए हैं हम 

सर्द हवाओं से कंपकंपाते 
लिपट-लिपट स्वयं से लजाते
सह रहे हैं फैला हर तम 
रोटी पर बिके हुए हैं हम 

धुंआ कहीं आहट करता है
पागल मन यूँ ही डरता है
भावना के गीले छप्पर पर 
उपलों से पथे हुए हैं हम 

एक नया ओढ़कर लबादा
अपना अस्तित्व किया आधा
बँट गये हैं क्यारियों में हम
चेहरे अधकटे हुए हैं हम

2. गरल तू पढ़ ले

मनवा रे चट्टानें पढ़ तू
दुविधाएं सरि-कल तू पढ़ ले
पढ़ पाये तो पाहन बनी 
अहिल्याओं प्रति छल तू पढ़ ले 

जुगुनाये तरुओं की सुध में 
कभी तमस की थाह नहीं ली
मीत, प्रतीक सरल अपनाए
कभी दुलभ की राह नहीं ली
अभी समय है कृष्ण-सुदामा
के नाते कुछ पल तू पढ़ ले 

संत दीखना अलग बात है
हो जाना जननी अनुकम्पा
बीज बींजना हाथ हमारे
उग आना धरनी अनुकम्पा
मीरा के पढ़ ले आराधन
राधा के दृग-जल तू पढ़ ले 

गठरी खो जाने के भय से
दीवारों को जीवनि मत दे
धोखे में सृजन के अधर्मी
नारी को संजीवनि मत दे
अनछुई पथराई नाभी 
राग विषाद गरल तू पढ़ ले 

पन्नों फटे बिके अखबारों 
सजरे स्मृतियों के सारे
कागज़ की नावों से बहते
चट्टानें चौसर चौबारे
जागै अरु रोवै कबिरा की 
दुखिया-सुधिया चल तू पढ़ ले 

3. भटका मन

नगर-नगर गाँव-गाँव
धूप-धूप छांव-छांव
बंजारा बन भटका मन 

पग-पग पर पीड़ा 
परिवर्तित प्रतिरूप लिए
डगर-डगर घायल हिरनी
जैसा रूप लिए 
संग भावना के 
अंगारा सा दहका मन

दूरियां मिटा न सके
युग-प्रवाह सपनों से 
हर गली के छोर पे 
बिछुड़ा है कोई अपनों से 
अपनों की खोज में 
परायों से अटका मन 

सपनों की चाहत 
सपना बना गई हमको
हर झूटी आहट 
घटना बना गई हमको
मत पूछो कितनी बार 
शूली पे लटका मन 

4. दोष क्या मेरा

मैंने तो महके गुलाब से 
भरा हुआ पौधा सौंपा था
हाथ तुम्हारे 
काँटों तक ही रहे 
दोष इसमें क्या मेरा!

घड़ी-घड़ी अंगना बिखराई
गंध प्रीत की हंसकर मैंने 
स्वागत को शुभ-दीप तुम्हारे 
देहरी धरे बालकर मैंने 
पाँव तुम्हारे 
फिर भी ठोकर चुनें 
दोष इसमें क्या मेरा!

पीड़ा की हर आग छुपाई
सदा सहज ही मैंने उर मैं 
उल्लासित उमंग की आहट
तुम्हें टेरती रही सुस्वर में 
कान तुम्हारे
रुदन ही सुन सके 
दोष इसमें क्या मेरा 

युग से मात्र प्रतीक्षारत था 
अभी-अभी थककर सोया था 
सोते-सोते भी सपने में
तुमसे मिल जी भर रोया था 
हाथ तुम्हारे 
सांकल तक  न उठे
दोष इसमें क्या मेरा 

हर आवाहन क्रान्ति नहीं है
हर आराधन भ्रान्ति नहीं है
पीड़ा का चरित्र है अपना 
बिन चरित्र के कांति नहीं है
प्यार तुम्हारा 
मात्र वासना पढ़े
दोष इसमें क्या मेरा 


Four Hindi Navgeet of Anand Kumar 'Gaurav'
,,,

9 टिप्‍पणियां:

  1. भाई अवनीश जी इस बार आपका प्रस्तुतीकरण बेहद दमदार है बधाई और शुभकामनाएं |

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  2. आनंद कुमार 'गौरव' जी के चारो नवगीत बेहद रोचक हैं...
    बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आनंद कुमार 'गौरव' जी के नवगीत प्रस्तुत करने के लिये.... हार्दिक धन्यवाद एवं आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  4. भाई वाह...एक से बढ़कर एक बेहतरीन नवगीत पढ़ कर दिल बागबाग हो गया...नए शब्द नयी सोच और नया प्रस्तुतीकरण लिए ये नव गीत बार बार पढने को उकसा रहे हैं...बधाई

    नीरज

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  5. भाई साहब जी , बहुत दिनों के बाद आनंद आ गया | बहुत देर तक पुरानी यादों में खोया रहा मन |
    rastogi.jagranjunction.com
    drmanojrastogi.blogspot.com

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  6. Bade bhai "Gaurav"ji ke navgeeton ko padhna ek alag lok main chahalqadmi karne jaisa hai.Gauravji ke navgeeton main kathy ka nayapan aur bhasha ki mithas milti hai.Main to yahi kah sakta hoon ki-
    kiya tanaavon ne kabhi, man ko jab abhishapt.
    tab geeton ne apke, kiya hirday ko tirapt.

    jag se jeevan bhar mile, pag-pag pal-pal tiraas.
    kintu apke geet to, dete rahe subaas.
    -Yogendra Verma "Vyom"

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  7. पीड़ा का चरित्र है अपना
    बिन चरित्र के कांति नहीं है
    प्यार तुम्हारा
    मात्र वासना पढ़े!
    बहुत ही बढ़िया है !

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  8. आदरणीय आनंद कुमार 'गौरव' जी का परिचय करवाने और उनकी रचनाओं को यहाँ पोस्ट करने के लिए आपका ह्रदय से आभार ....आशा है आप यूँ ही हमें कवियों से परिचय करवाते रहेंगे ....आपका आभार

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