पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

हिन्दी महोत्सव - 2018


पहला दिन

 

‘हिन्दी महोत्सव’ का चौथा अध्याय और यूनाइटेड किंगडम के पहले अध्याय का उद्घाटन 28 जून 2018 को ऑक्सफोर्ड में किया गया। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलन अनिल शर्मा ‘जोशी’ (निदेशक, भारतीय संस्कृति केन्द्र, चांसरी प्रमुख, फ़िजी), डॉ. पद्मेश गुप्त (संस्थापक यू.के. हिन्दी), दिव्या माथुर (संस्थापक ‘वातायन’), अरुण माहेश्वरी (चेयरमैन वाणी फ़ाउण्डेशन) और नीलिमा आधार डालमिया (अध्यक्ष, प्रवासी लेखन सत्र) ने किया।

हिन्दी महोत्सव 2018 का स्वागत वाणी फ़ाउण्डेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी ने किया सभा में बैठे सभी श्रोताओं को सम्बोधन करते हुए अरुण जी ने कहा कि यह ‘हिन्दी महोत्सव’ की बड़ी पहल है कि विश्व भर में फैले हिन्दी कर्मियों को एक साथ ऑक्सफोर्ड में जोड़ा। साथ ही उन्होंने प्रवासी लेखन पर वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तीन पुस्तकें डॉ. पद्मेश गुप्त की ‘प्रवासी पुत्र’, दिव्या माथुर द्वारा सम्पादित स्त्री प्रवासी लेखिकाओं की कहानियों का संग्रह ‘इक सफ़र साथ-साथ’ और अनिल शर्मा ‘जोशी’ की पुस्तक ‘प्रवासी लेखन : नयी ज़मीन नया आसमान’ की ओर ध्यान आकर्षित किया कि यह प्रवासी लेखन विधा के लिए नया अध्याय है। साथ ही यह भी कहा कि हिन्दी महोत्सव पहल हिन्दी भाषा के सौन्दर्य तकनीकीकरण और सबसे जरूरी युवा पीढ़ी के लिए भाषा को तैयार करके उसके साथ कदमताल करना इस ध्येय का असल वैश्विक रूप हिन्दी महोत्सव के चौथे अध्याय में हम सबके सामने आया है।


कार्यक्रम में अनिल शर्मा ‘जोशी’ की पुस्तक ‘प्रवासी लेखन : नयी ज़मीन नया आसमान’ का लोकार्पण हुआ । इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार कुसुम अंसल ने कहा कि यह बहुत गौरव की बात है कि हिन्दी के बड़े प्रवासी लेखक अनिल जी की किताब हिन्दी महोत्सव के मंच से पूरी दुनिया के प्रवासी लेखकों के बीच पहुँच रही है। ‘वातायन’ की कोषाध्यक्ष शिखा वार्ष्णेय ने कहा कि अनिल जोशी की पुस्तक उन सभी प्रवासी लेखकों के लिए अत्यन्त आवश्यक है जो अपने देश से इतनी दूर रहकर अपनी भाषा को जीवित रखने की कोशिश करते आये हैं। कार्यक्रम की अध्यक्ष नीलिमा आधार डालमिया ने कहा कि प्रवासी लेखन की Graduating Ceremony है। हिन्दी महोत्सव 2018।

ऑक्सफोर्ड बिज़नेस कॉलेज के निदेशक व भारत के महासचिव भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा ‘पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार’ से पुरस्कृत डॉ. पद्मेश गुप्त ने अपने स्वागत सत्र में कहा कि हिन्दी भाषा को समर्पित कई कार्यक्रम यू.के. में होते आये हैं लेकिन यह पहली बार है कि हिन्दी महोत्सव के बैनर तले इन सभी कार्यक्रमों को एक बृहद आकार मिला है। डॉ. गुप्त ने सभी का स्वागत करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि यूनाइटेड किंगडम में बच्चों को हिन्दी पढ़ाने का बीड़ा उन्होंने दशकों पहले उठाया था। आज वो बड़ा आन्दोलन बन चुका है और हिन्दी महोत्सव के चौथे दिन स्लोह में और बर्मिघम में उन्हीं बच्चों द्वारा प्रस्तुतियाँ की जायेंगी। भारतीय और गैर-भारतीय नागरिकता के होते हुए भी इन बच्चों का हिन्दी भाषा के प्रति समर्पण देखने बनता है

कार्यक्रम
में ‘हिन्दी सिनेमा और साहित्य’ पर परिचर्चा रखी गयी जिसका संचालन ललित जोशी ने किया। ललित जी ने अपने सवालों में साहित्य और सिनेमा के बीच सम्बन्ध पर रोशनी डालने का प्रयास किया, जिसके उत्तर में स्वर्ण कमल से सुसज्जित लेखक यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि साहित्य और सिनेमा भारतीय कांशसनेस की जुबान है और भारतीय संवेदना को एक सेतु में बाँधते हैं। कार्यक्रम में उपस्थित अजय जैन जोकि पेशे से फ़िल्मकार हैं। और दादा साहेब फाल्के से सुसज्जित गुलज़ार के साथ निर्देशन कार चुके हैं, ने कहा कि साहित्य और सिनेमा के बीच का जो आलोचनात्मक रिश्ता है उससे ऊपर उठकर एक निर्देशक की भूमिका में जब कोई कलाकार आता है तो वह एक पतली पगडंडी पर चलता है जहाँ पर साहित्य और उसके सिनेमाई रूपान्तर के बीच सन्तुलन बनाने का काम उस निर्देशक के पास होता है। इसी काम को बखूबी उन्होंने गुलज़ार साहब से सीखा जब उन्होंने मुंशी प्रेमचन्द की तहरीरे कार्यक्रम में काम किया तो उन्हें यह समझ आया कि समय के साथ लेखक की परिकल्पना जो मूल कृति में की गयी, वह बदल जाती है, उसका सिनेमाई रूपान्तरण बदल जाता है इसलिए यह निर्देशक का काम है कि किसी साहित्यकार ने जिस प्रकार का परिवेश अपनी कृति में उजागर किया उसको सिनेमाई रूप से बड़े पर्दे पर जब कोई फ़िल्म निर्देशक लेकर जाता है तो किस तरीके से वो पूरे परिवेश को अपने साथ सँजोकर वैश्विक पटल पर दर्शाता है।

कार्यक्रम का समापन चिन्मय त्रिपाठी (गायन) और जोएल मुखर्जी (गिटार) के कविता सन्ध्या आयोजन से हुआ जिसमें उन्होंने छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता ‘जाग तुझको दूर जाना’ को प्रस्तुत किया।

दूसरा दिन 

 

‘हिन्दी महोत्सव’ के तत्त्वावधान में दूसरे दिन ‘वातायन’ पुरस्कार दिए गए जिसमें पहला पुरस्कार ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ कुसुम अंसल को तथा दूसरा पुरस्कार ‘वातायन कविता सम्मान’ यतीन्द्र मिश्र को। तीसरा ‘संस्कृति सम्मान’ कृष्ण कुमार गौर को और चौथा ‘वातायन विशेष सम्मान’ सरोज शर्मा को प्रदान किया गया ।

पुरस्कार प्राप्त करते हुए यतीन्द्र मिश्र ने वाणी फ़ाउंडेशन, यू.के. हिन्दी समिति, वातायन और कृति यू. के. का विशेष आभार प्रकट किया और कहा कि उनके कविता कौशल को उन्होंने पहचाना और इस अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उनको सम्मानित किया।

कुसुम अंसल का कहना था उनका जीवन ही उनका साहित्य दर्पण है और उसी कि छवि वह अपने प्रवासी भाइयों और बहनों के साथ साझा करती आयी हैं और ऐसे में वातायन शिखर सम्मान और अन्तर्राष्ट्रीय शिखर सम्मान उनके जीवन की तपस्या के फलस्वरूप आज मिला है।

कृष्ण कुमार गौर और सरोज शर्मा ने पुरस्कार ग्रहण करते हुए ‘हिन्दी महोत्सव’ की सफलता पर सभी विद्वानों का धन्यवाद और आभार प्रकट किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि यू.के. के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने हिन्दी महोत्सव को बधाई देते हुए कहा कि विश्वभर के हिन्दीकर्मी खासकर यू.के. के साहित्यकार इस मंच पर इकट्ठे हैं और ये बहुत जरूरी है क्योंकि विदेश में रह रहे भारतीय बच्चों को हिन्दी भाषा और उनके देश की परम्परा भाषा सिखाने का इससे अच्छा माध्यम और कोई नहीं हो सकता। वीरेन्द्र शर्मा ने कहा कि वह आने वाले समय में अपना पूरा सहयोग हिन्दी महोत्सव को देंगे। उन्होंने अगला हिन्दी महोत्सव को करने का आग्रह भी किया है

‘वातायन’ संस्था की संस्थापक दिव्या माथुर ने कहा कि 2003 से वातायन सम्मान यू. के. में भरतीय लेखकों, कलाकारों और कवियों का सम्मान करता आया है। माथुर ने कहा इस वर्ष इस वर्ष हिन्दी महोत्सव के तत्वावधान से जुड़ कर इसका विस्तार स्वागत योग्य है। कार्यक्रम का संचालन ऑक्सफ़ोर्ड बिज़नेस कॉलेज के प्रबन्ध निदेशक डॉ पद्मेश गुप्त ने किया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी प्रतिक्रियाएँ हमारा संबल: