पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

बुधवार, 27 जून 2018

रमाकांत के ग्यारह नवगीत

रमाकांत

मुल्ला दाऊद, महाप्राण निराला और दिनेश सिंह की बिरासत को समृद्ध करने वाले रमाकांत जी समकालीन रचनाकारों में महत्वपूर्ण स्थान रखते है। साहित्य की कई विधाओं में रचनारत रमाकांत जी अपनी गीतों में (अन्य विधाओं की तरह ही) धर्म, जाति, वर्ण, नस्ल, संप्रदाय आदि से परे आदमी और आदमीयत की बात करते हैं - 'चलो फिर नवगीत में/कुछ बात कर लें हम। आज फिर अखबार पढ़कर/मन हुआ गुमसुम/हर तरफ दंगों-फसादों/में घिरे हम तुम/कोई फरियादी सुनाये/किसको दुख अपना/बांट लेने की ललक/अब हो गई है कम।' आदमी की दुःखद स्थिति और आदमीयत के क्षरण पर वक्र दृष्टि रखने वाले रमाकांत जी जन-मन से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों को न केवल बड़ी बेबाकी से उठाते हैं, बल्कि उनके प्रभावशाली एवं स्थायी हल भी खोजते हैं - 'प्रश्न होता नहीं सरल कोईे / खोजिए तो मिलेगा हल कोई।' कारण यह कि वह समकालीन समस्याओं को हल्के में नहीं लेते और न ही उनके निदान को असम्भव समझते हैं। शायद इसीलिये मानवीय करुणा से लैस उनके दार्शनिक एवं समाजोपयोगी चिंतन का सहज शब्दों में अर्थपूर्ण रूपांतरण उनकी ग़ज़लों को विशिष्ट बनाता है। पूरे लाऊ, बरारा बुजुर्ग, जनपद रायबरेली (उ.प्र.) में जन्मे रमाकांत जी एम.ए., एम.फिल. एवं पत्रकारिता में पी.जी डिप्लोमा करने के बाद अध्यापन से जुड़ गये। 'वाक़िफ रायबरेलवी: जीवन और रचना', 'हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ हाइकु', नृत्य में अवसाद', 'जमीन के लोग', 'सड़क पर गिलहरी' (कविता संग्रह), 'जो हुआ तुम पर हुआ हम पर हुआ', 'बाजार हँस रहा है' (नवगीत संग्रह) एवं 'रोशनी है मगर अंधेरा है' (ग़ज़ल संग्रह) आपकी अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं। आप त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'यदि' के सम्पादक है। आपको म.प्र. का 'अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति रजत अलंकरण' ('सड़क पर गिलहरी' कृति के लिए) एवं ख्यातिलब्ध साहित्यकार स्व दिनेश सिंह की स्मृति में 'ढाई आखर पुरस्कार' सहित कई अन्य विशिष्ट सम्मान प्रदान किये जा चुके हैं। संपर्क: ९७, आदर्श नगर, मुराई बाग़ (डलमऊ), रायबरेली-२२९२०७ (उ.प्र)। मोब. ०९४१५९५८१११। यहाँ पर आपके फेसबुक पर प्रकाशित रचनाओं को पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है।

1. हम वह गली छोड़ आये हैं

हम वह गली छोड़ आये हैं
फूल जहां झरते हैं पल-पल

कांटों वाली राह चुनी है
यह मेरा अपना चुनाव है
ग़म को ग़म की दवा बताना
यह भी ग़म का ही प्रभाव है


कैसी राह कि कैसी मंजिल
एक धुन यही सिर्फ़ चलाचल

लहूलुहान हुआ भी तो क्या
चलने का मतलब तो जाना
हंसी उड़ाने वालों का भी
है तो मुश्किल साथ निभाना


पत्थर दिल होना है जब तब
वैसे तो दिल है ही दलदल

उनसे मेरी राह अलग है
उनसे मेरी यह ही अनबन
उनके हिस्से यह वसन्त है
उनके हिस्से सारा सावन


उनसे मेरी यही लड़ाई
वे छलिया हैं हम हैं निश्छल


2. नवगीत

चलो फिर नवगीत में
कुछ बात कर लें हम

आज फिर अखबार पढ़कर
मन हुआ गुमसुम
हर तरफ दंगों फसादों
में घिरे हम तुम


कोई फरियादी सुनाये
किसको दुख अपना
बांट लेने की ललक
अब हो गई है कम

आज फिर श्री राम के
नारे लगे ज्यादा
शांति का सद्भाव का
झूठा हुआ वादा


कौन मारे किसको मारे
क्यों भला मारे
मार भी दे तो
कहां अब आंख होती नम

वह दलित था
उसका अपना एक घोड़ा था
शान से चलता था
उसमें मान थोड़ा था


बस यही वर्चस्ववादी
सह नहीं पाये
मार कर उसको
लगे फिर नाचने छम छम


3. मैं अकेला ही भला

मैं अकेला ही भला
क्यों रात दिन यह सोचता हूं

सोचता हूं
आदमीयत को हुआ क्या
कोई तो सोचे
है अच्छा क्या बुरा क्या


मस्त दुनिया
मैं ही केवल बाल अपने नोचता हूं

हां मगर
पहले भी थे कुछ लोग ऐसे
जो जिए
मूल्यों की खातिर बिना पैसे


क्या करुं मैं
ज़िन्दगी को हर तरह से तोलता हूं

चाहता हूं
विषमताओं में रहे सम
विषमताएं भी रहें
तो रहें कम कम


चीज सबकी गुम हुई है
मैं उसे ही खोजता हूं

4. झूठ का पहाड़

झूठ का पहाड़ सामने है

लड़ें इससे
कि बच जाएं
संभलना है बड़ा मुश्किल
पढ़ी बातें
लिखी बातें
निरर्थक खोजती हैं हल

हमेशा तो नहीं था ये
मगर इस दौर की तस्वीर
ये तड़पता प्रमाण सामने है

हमारा भी
तुम्हारा भी
कहीं कुछ तो है खोया सा
ज़मीनों पर
टिका है जो
वो मुर्दा है या रोया सा

रुदाली का समय है ये
समय यह ही चुनावों का
फूल का निशान सामने है

5. कहने का मन

कुछ कहने का मन होता है
कुछ सुनने का मन होता है

कहो मगर कुछ ऐसे जैसे
सचमुच जीवन ने भोगा है
ऐसे भी मत कहो कि
सुनने वाला समझे सब धोखा है

खारे आंसू तब बहते हैं
भीतरवाला जब रोता है

रोने धोने से भी पहले
कुछ बाते हैं बड़े काम की
बहुत हुई ये नारेबाजी
रावण की हो याकि राम की

अब यह समय नये खेतोंमें
बीज पुराने क्यों बोता है

तुम बोलो हम सुनें
कभी गर हम बोलें तोतुम भी सुन लो
आज अभी जो गुनना बुनना
आज अभी वो सब गुन बुन लो

भाईचारे का शव अक्सर
यही आदमीतो ढोता है

6. ज़िन्दा हैं अभी प्रश्न

रोहित वेमुला मर गया है
लेकिन ज़िन्दा हैं अभी प्रश्न

हां वही प्रश्न तब से अब तक
मरते ही नहीं न जाने क्यों
एकलव्य द्रोण की हर आज्ञा
अब शीश झुकाकर माने क्यों

कितनी शताब्दियां गुजर गईं
पर वही व्यवस्था नाच रही
होकर निर्लज्ज और नग्न

जो जाति धर्म से हैं कुलीन
कितने कमतर आदमी बने
एकलव्यों की खातिर उनके
कुत्सित विचार गन्दगी सने

जाने कितनों के हक छीना
जाने कितनों को मार दिया
फिर भी हैं मना रहे जश्न

रोहित की चिट्ठी पढ़ो जरा
आंसू आ जाते हैं पढ़कर
संघर्ष बीज जो बोये थे
हंसते रोते हैं रह रह कर

लगता है क्रांति फलेगी ही
प्रतिरोध बड़ा होने को है
नासमझ मगर हैं अभी मग्न

7. ख़ुश अगर होना

ख़ुश अगर होना
तो ख़ुशियों की समझ रखना

बहुत मुश्किल है
कि वे ख़ुश हों तो हम भी हों
मगर अब दरमियां
ये हालात कम भी हों

कौन ऐसा है
जो मानवता का हित साधे
बहुत मुश्किल है
सभी को साथ ले चलना

आदमी को आदमी
मानो तो क्या मुश्किल
पार जाने को
वही कश्ती वही साहिल

लोग कुछ
बहती नदी को बांट देते हैं
जानवर कहना
उन्हें मत आदमी कहना

देखना दीवार
बन जाए तो गिर जाए
भाईचारे में कभी
पानी न फिर जाए

शान से जीना
कि मरना शान से जब भी
क्षुद्रता में किसलिए
जीना कि फिर मरना

8. इस समय भी क्या

कुछ हमारा
कुछ तुम्हारा
खो गया -सा लग रहा है

बड़ी बातें
बड़ी बहसें
नये युग की आहटें भी
भीड़ का
हिस्सा बनी हैं
व्यक्तिवादी चाहतें भी


इस सदी इक्कीसवीं में
हर कोई तो भग रहा है

झूठ सच की
बात करना
मोल लेना है मुसीबत
बच सकोगे
हां तभी
सत्तानशीं
जब रहें सहमत


कोई आज़ादी को
सेवक बन के कैसे ठग रहा है

फिर कभी
इंक्लाब के स्वर
अभी तो सहमी फ़ज़ाएं
हर तरफ
केवल शिगूफे
हंसें फिर सबको हंसाएं


इस समय भी क्या
कोई बेख़ौफ़ होकर जग रहा है

9. प्रेम की अगन लगी

प्रेम की अगन लगी

हारे हारे
जीते जीते
सोये से कुछजागेसे
जाने कैसे
यहां आ गये
पीछे से या आगे से

बस इतना है भान
उसी से लगन लगी

उसने जाल
बिछाया या
हम ही फंसने को आतुर थे
वैसे तो
फुसलाने वाले
और कई भस्मासुर थे

उस माया से हटे
जहां जो ठगन लगी

उसका ठौर ठिकाना
उसकी
रहन सहन के क्या कहने
उसके आलिंगन में
लगते हैं
सारे मधुरस बहने

देह बची ही नहीं
आत्मा मगन लगी

10. प्रेम जी रहा हूं मैं

प्रेम जी रहा हूं मैं
बिल्कुल अलग तरीके से

बहुत पास हूं
मगर देह के आलिंगन से दूर
छुवन साथ देती है फिर भी
अन्दर से भरपूर


प्राण और मन
बतियाते हैं बड़े सलीके से

जिधर नजर डालो
दिखती हैं आंखें ही आंखें
फूल और पत्तों से
जैसे भरी भरी शाखें


क्या कहना क्या सुनना
खुश्बूदार बगीचे से

जिस दर पर हूं
इश्क वहीं पर नृत्य कर रहा है
मेरे अन्दर मैं क्या जानूं

कौन मर रहा है

अब तो क्या लेना देना है
मुझे नतीजे से

11.
और क्या करें अब
 
और क्या करें अब
अधनंगे नंगे हुए किसान
जंतर मंतर चीख रहा है
बंद हुए सब कान

सारे स्तंभों ने
किसके डर से शीश झुकाया
आंख मूंद कर निकल रहे सब
यह किसकी है माया

लाज शर्म आए तो किसको
भरे पेट वालों कोकोई
कब कहता बेईमान

राजा का आवास पास में
दरबारी क्या कम हैं
बात अन्नदाता की हो तो
दोषी तुम हो हम हैं

धरना और प्रदर्शन इतना
गूंगे बहरों की धरती पर
सूख गई है जान

संसद के धंधे में
बाज़ारों के चर्चे पर्चे
बिल में सारे जुड़े हुए हैं
जनप्रतिनिधि के खर्चे

फांसी पर चढ़ते किसान क्यों
मरे कहां कब कितने
अब यह व्यर्थ हुआ अनुमान


Eleven Hindi Lyrics of Ramakant, Raebareli, U.P.

1 टिप्पणी:

  1. रमाकांत जी के प्रस्तुत सभी नवगीत आज की विसंगतियों और सामयिक विद्रूपताओं की यथार्थबयानी से पूर्णतः अपनी उपस्थिति का अहसास करा रहे हैं।हार्दिक शुभकामनाएं

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