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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

दो कविताएँ: कवि- संजीव निगम

संजीव निगम

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मुम्बई भारतीय राज्य महाराष्ट्र की राजधानी तो है ही, पश्चिमी देशों से जलमार्ग या वायुमार्ग से आनेवाले जहाज, यात्री एवं पर्यटक सर्वप्रथम मुम्बई ही आते हैं इसलिए मुम्बई को भारत का प्रवेशद्वार भी कहा जाता है। बहुभाषी और बहुआयामी जीवनशैली वाले इस शहर की झलक फ़िल्मी दुनिया और मीडिया के माध्यम से भी कई बार देखने को मिलती रहती है। यह शहर साहित्य के क्षेत्र में भी काफी आगे रहा है। इसी शहर के एक विशिष्ट रचनाकार हैं संजीव निगम। संजीव जी कविता, कहानी, व्यंग्य लेख, नाटक आदि विधाओं में सक्रिय रूप से लेखन कर रहे हैं। पत्र, पत्रिकाओं, मंच, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर सक्रिय उनकी रचनाएँ कई संकलनों में प्रकाशित हुई हैं। आप प्रभावशाली वक्ता और कुशल मंच संचालक हैं और आपने कई टीवी धारावाहिकों तथा कॉर्पोरेट फिल्मों का लेखन किया है। स्वाधीनता संग्राम और कांग्रेस के इतिहास पर 'एक लक्ष्य एक अभियान' नाम से अभिनय-गीत- नाटक मय मंच प्रस्तुति का लेखन आपने किया है जिसका मुंबई में कई बार मंचन हुआ। गीतों का एक एल्बम प्रेम रस नाम से जारी, आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से नाटकों का प्रसारण। आपको कथाबिम्ब कहानी पुरस्कार, व्यंग्य लेखन पर रायटर्स एंड जर्नलिस्ट्स असोसिअशन सम्मान, प्रभात पुंज पत्रिका सम्मान, अभियान संस्था सम्मान आदि से अलंकृत किया जा चुका है। संप्रति- एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मुख्य प्रबंधक के पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर अब मुंबई में सक्रिय रूप से स्वतंत्र लेखन, विज्ञापन जगत से जुड़ाव, जनसंपर्क व विज्ञापन विशेषज्ञ। संपर्क: डी-२०४, संकल्प २, पिंपरी पाड़ा, फिल्म सिटी रोड, मलाड [पूर्व], मुंबई-४०००९७। ईमेल: nigamsanjiv59@gmail.com । आपकी दो कविताएँ यहाँ प्रस्तुत है:-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
1. अब तुम्हारी बारी है

तुम मुझे देख कर मुस्कराए
और मैं डर गया
तुमने मुझे नज़र भर कर देखा
और अनिष्ट की आशंका से
मैं चीख पड़ा

मेरी चीख डर से शुरू हुई
और गुस्से को छूती हुई ,
बदल गयी नफरत में

पर तुम बिना कुछ सुने ,
मुस्कराते बैठे, धूप का आनंद लेते,
उँगलियों से उठा कर चबाते रहे मूंगफलियाँ,
जैसे कोई घाघ कुत्ता मुफ्त पड़ी हड्डियों को
मस्ती से चिंचोड़ रहा हो

मेरा डर, मेरा गुस्सा, मेरी नफरत
मेरी हांफती चीख की पीठ पर से
गिर पड़े घायल सवारों की तरह
और मेरा मन,
किसी सुनसान मकबरे के ऊंचे अँधेरे गुम्बद में,
चक्कर मारता छटपटाता पंछी हो गया

मैंने चाहा कि तुम मेरे शरीर पर पड़े
ज़ख्मों के निशानों की तरफ भी निगाह भर कर देखो तो,
चीख के पीछे छिपी कराहट के स्वर को पहचानो तो
पर तुम, उसी तरह से बैठे,
बिना कुछ देखे चबाते रहे मूंगफलियाँ ,
जैसे कई दिनों का भूखा कुत्ता,
सूखी रोटियाँ चपर चपर कर खा रहा हो

मैं जानता हूँ कि तुम न बहरे हो, न अंधे,
और वह जो तुम्हारी लपलपाती जीभ है न,
वह बतलाती है कि तुम गूंगे भी नहीं हो
पर तुम्हारी दुखी व पीड़ितों की परिभाषा में
आते हैं वे लोग
जिनके रसीले -आरती -मंगलाचरण
सुनकर तुम्हारी रोयेंदार दुम हिलती है

बाकियों के लिए तुम हो भूखे शिकारी कुत्ते,
हड्डियां निचोड़ते, रोटियाँ चपरते .
मेरे खुरदरे हाथों में नहीं है कोई वंदन-प्रणाम
तुम्हारे लिए,
इसलिए तुम्हारी नज़रों में है मेरा मूल्य
हड्डियों और ग़ोश्त जितना

पर यदि डर से परे,
मेरी चीख का गुस्सा सच्चा है,
और गुस्से में नफरत की धार है,
मेरे ज़ख्मों में अभी भी कराहट बाकी है
तो, सतर्क रहने की अब बारी तुम्हारी है

2. यह विद्रोह नहीं

वर्षों से दबा हुआ ज्वालामुखी
जब धरती की कठोर चादर को
फाड़ कर,
विस्फोट कर उठता है,
और गरम लावा मिटा देता है,
मजबूत जड़ों वाले पेड़ों को,
ठोस पत्थर की चट्टानों को,
तो देखने वाले,
अपनी जीभ पर दाँत रखकर कहते हैं,
यह विद्रोह है

परन्तु क्या कभी सोचा है
कि यह आग किसी एक दिन की पैदाइश नहीं,
न जाने कितने समय की संचित ऊर्जा है,
जो सालों अपना अस्तित्व छुपाये
पड़ी रही चुपचाप धरती की गहराइयों में,
और तुमको देती रही अवसर,
फलने का, फूलने का

मगर तुमने अपने विकास के क्षणों में,
यह भी न देखना चाहा कि
तुम्हारे पैर तले की ज़मीन,
कितना भार डाल रही है उन सहारों पर,
जो रोक रहे हैं उसे रसातल में जाने से

और अब ,
जब दबे हुए आश्रयों ने,
तुम्हारे निरंतर बढ़ते बोझ को उतार फेंका है,
और अपनी मुक्ति के लिए विस्फोट किया है,
तो तुम व तुम्हारे साथी,
पीठ दिखा कर भागते हुए,
यह कह रहे हैं-
" यह विद्रोह है, यह विद्रोह है."

Hindi Poems Of Sanjeev Nigam

13 टिप्‍पणियां:

  1. परमेश्वर फुंकवाल18 फ़रवरी 2012 को 2:26 pm

    समय की सच्चाइयों को बयां करती सुन्दर कविताएँ. बधाई संजीव निगम जी, अंतस के लावे को सार्थक काव्य में रूपांतरित करने के लिए.

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  2. सार्थक कवितायें संजीव जी की .....
    मेरे ज़ख्मों में अभी भी कराहट बाकी है
    तो, सतर्क रहने की अब बारी तुम्हारी है
    बहुत प्रभावी अंत कविता का..... दूसरी कविता मे ज्वालामुखी के माध्यम से धैर्य व संयम को परिभाषित कराती एक सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. कथ्य और अभिव्यक्ति की दृष्टि से उत्कृष्ट सशक्त कविताएँ। हिंदी कविता का भविष्य ऐसे कवियों पर ही निर्भर है। बधाई! साधुवाद!
    *महेंद्रभटनागर
    E-mail : drmahendra02@gmail.com

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    1. Aapne jo utsahvardhan kiya uske liye aapka aabhaari hoon.

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    2. कृपया सम्पर्क करें। और-और कविताएँ भी पढ़ना चाहता हूँ।
      *महेंद्रभटनागर
      फ़ोन : 0751-4092908

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    3. Jee maine aapka number le liya hai,zaroor sampark karunga.

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  4. संजीव अपने समय को शब्द देने में सिद्धहस्त हैं,उनकी कवितायेँ सच का सामना कराती हैं सुलेखन के लिए बधाई

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  5. Jee zaroor. Miane aapka number note kar liya hai, avashy sampark karunga.

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    1. Maam ye uttr Mahendra Bhatnagar ji ke liye tha, galti se aapke post par aa gaya hai. Aapne jo likha hai us par main khush hoon.

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  6. bahut hi sundar or saandar rachnaa h ... waah sir ji bahut khub likha h aapne

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  7. संजीव जी , आपकी रचनाएँ सुंदर व अभिव्यक्ति सशक्त है , IT से अधिक परिचित नहीं हूँ ,इसलिए आज इस "पूर्वाभास" मे अनजाने मे ही पढ़ने को मिल गया-अच्छा लगा । मैं चन्द्रकान्त पाराशर (हंसराज कालेज 1977-79-,)9418475605,वर्तमान में SJVN jhakri शिमला मेन हूँ ।

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