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रविवार, 28 सितंबर 2025

'एक अकेला पहिया' : एक समीक्षा — डॉ वीरेंद्र 'निर्झर'


पुस्तक: एक अकेला पहिया (नवगीत-संग्रह) 
ISBN: 978-93553-693-90
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष : 2024
संस्करण : प्रथम (पेपरबैक) 
पृष्ठ : 112
मूल्य: रुo 250/-
प्रकाशक: प्रकाश बुक डिपो, बरेली
फोन :  0581-3560114

Available At:
AMAZON: CLICK LINK

नवगीत नए और नगरीय जीवन के विसंगत यथार्थ और स्खलित होती मानवता को स्वर देने का सम्यक प्रयास है। इन गीतों में जितना आक्रोश, तनाव, क्षोभ, पीड़ा, उदासी आदि से मुक्ति की छटपटाहट परिव्याप्त है उतनी ही भारतीय जनमानस की विकासशील समृद्ध परंपरा और अस्तित्व को संबलित करने की चाहत भी है। नवगीत कोई नारा नहीं है, कोई आंदोलन भी नहीं है और न जुलूस ही। यह तो जीवन का संक्रांति पर्व है जो नए बिंबो और प्रतीकों के झंडे लेकर नए बोध की जमीन पर निरंतर आगे से आगे बढ़ता जा रहा है। डॉ अवनीश सिंह चौहान भी इस संक्रांति पर्व के प्रमुख हिस्सा हैं। उनका नवीनतम नवगीत संग्रह 'एक अकेला पहिया' 2024 में प्रकाशित हुआ है। 112 पृष्ठों के इस संग्रह में चौहान जी ने नवगीत की एक पुष्ट जमीन प्रशस्त की है। इसमें कवि द्वारा न केवल आज की विद्रूपता को ही व्यक्त किया गया है, समाज को उद्बुद्ध करने के प्रति भी एक सक्रिय प्रयास है। चौहान जी का हर गीत सोद्देश्य है।

डॉ अवनीश में गीत अपने दायित्वों का विस्तार कर जीवन में गहरे तक समोया हुआ है। इस संग्रह का शीर्षक 'एक अकेला पहिया' तिमिर-हारी सूर्य-सा गतिमान जनचेतना को उद्दीप्त करता मानो समकालीन कथ्य और शिल्प से सम्पृक्त मनुष्यता के प्रतिष्ठापन की जययात्रा को स्वर देता है, तो वहीं नवगीत के रूप में नारी जीवन की विडंबना को दर्शाता है। जीवन की गाड़ी दो पहियों पर चलती है, पर जब गाड़ी की स्त्री रूपी पहिए को बल देने वाला पहिया बिखर जाता है, तब जीवन कितना कष्टप्रद हो जाता है, चौहान जी उसकी व्यंजना— "बीच राह में टूटी बिछिया" (पृ. 37) से करते हैं। बिछिया का यों टूटना, जीवन का टूटना है, नारी के पूरे हौसले का टूटना है। जीवन के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, कुछ सूझ नहीं पड़ता। वक्त का यह छलाव शरीर को रोटी का जरिया बनने के लिए विवश कर देता है।  कवि कहता है—

ठोंक-बजाकर देखा आखिर

जमा न कोई भी बंदा

पेट वास्ते सिर्फ बचा था

न्यूड मॉडलिंग’ का धंधा

 

व्यंग्य जगत का झेल करीना

पाल रही है अपनी बिटिया। ('एक अकेला पहिया', पृ. 37)

जगत के इस वीभत्स व्यंग्य को झेलते हुए व्यक्ति चलने को तो चलता है, पर— "चलने को चलना पड़ता, पर—/ तनहा चला नहीं जाता/ एक अकेले पहिए को तो/ गाड़ी कहा नहीं जाता” (पृ. 37)। जीवन की यह विवशता और विद्रूपता मन को बार-बार कचोटती है, पर आज की जीवन शैली में मूढ़ तुला पर” (पृ. 38) सब कुछ तुल जाता है।

विचित्र है, आज के समय में सबको अपने करियर की इतनी चिंता है, इतना उससे जुड़ाव है कि बच्चों की सुख-सुविधा से भी दूरी बढ़ती जा रही है— "कौन करे बच्चों की केयर/ सबके अपने प्लान” (पृ. 39)।" आज की इस पारिवारिक विसंगति को— "खिलौने भी उदास हैं" गीत में चौहान जी ने कुछ इस प्रकार आरेखित किया है—

मम्मी जी ऑफिस करती हैं

पापा की भी ड्यूटी

अगल-बगल जो बाल-श्रमिक हैं

किस्मत उनसे रूठी

 

बच्चे जीते रामभरोसे

क्यों कोई दे जान

 

बच्चे किए हवाले— आया

क्या सच्ची, क्या खोटी

कभी खिलाती, कभी झिड़कती,

कभी दिखाती सोटी

 

माँ बिन बच्चे की बेकदरी

अभिभावक अनजान। (‘खिलौने भी उदास हैं’, पृ. 39)

बच्चों को रामभरोसे जीवन आया के हवाले कितनी झिड़कियों और बेकदरी से आगे बढ़ता है। उसको कौन और कैसे संस्कार दे रहा है, इससे भी कवि चिंतित है— "इक तो सूना घर है, दूजे/ अच्छा नहीं मुहल्ला/ और खिलौने भी उदास हैं/ किससे खेले लल्ला" (पृ. 40)। खिलौने जैसे निर्जीव वस्तुओं में भी उदासी का संप्रेषण बालक की जीवंतता को धीरे-धीरे जड़ता की ओर ले जाता है। वह जो देखता-सुनता है, वह उल्टा-सीधा ज्ञान ही उसके भविष्य का पाथेय बनता है। दायित्वों से यह दूरी कितनी निर्मम है।

अवनीश जी के गीतों में आज के मनुष्य का वास्तविक प्रतिबिंब अलग-अलग कोणों से अभिव्यक्त हुआ है। आज के भागमभाग और कृत्रिमता के वातावरण में आदमी इतना रच-बस गया है कि जीवन में संवेदना और कोमलता का भाव ही विलुप्त हो गया है। दर्पण मुख की कुरूपता को दिखाता है, पर सब कुछ लेपित- विलेपित करने के बाद भी मुख पर आभा नहीं आती। हमसे हमारा प्राकृतिक सौंदर्य छिन गया है। 'कठिन है भाई' गीत में कवि कहता है—

दर्पण रोज

दिखाता रहता

सारे खंदक-खाँई।

xx           xx           xx

जैसे हैं

वैसा दिखना भी

बहुत कठिन है भाई। ('कठिन है भाई', पृ. 41-42)

आज हम अपने ही भ्रमजाल में बिद्ध, चापलूसों कि वाहवाही में तृप्त फूले नहीं समा रहे और "फूटा ढोल बजाते हरदम" (पृ. 54)। अपना अब यही रवैया हो गया है।

यद्यपि मन ने जीवन से बहुत-सी बातों में समझौता कर लिया है, पर समय की विद्रूपता से व्यक्ति चिंतित है और सोचता है कि शकुनि के कपटों से मैं कब तक हारता रहूँगा। जाति, धर्म और राजनीति की अलगाव वाली प्रवृत्ति से हम कब तक बँटते रहेंगे। कब तक अपने टूटे कंधे और अंदर तक तोड़ते गोरखधंधों से दो-चार होते रहेंगे। आज की समस्याओं से जूझते मनुष्य की जिजीविषा अब गलने लगी है और वह अपने से क्षुब्ध स्वयं में ही एक शीत युद्ध का अनुभव करता है। चौहान जी 'कब तक?' गीत में इसी भाव को स्वर देते हैं— "मुँह पर/ पट्टी बाँधे देखूँ/ टूटा कंधा कब तक?" (पृ. 43) x x x "नंगी-भूखी जनता का यह/ समय क्रुद्ध है कब तक?/ खलनायक-हीरो का झेलूँ/ शीत युद्ध मैं कब तक?" और अंत में वह बगावत कर बैठता है— "बहुत हुआ/ अब और न होगा/ धीर धरूँ मैं कब तक? (पृ. 44)

डॉ अवनीश शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हैं। वे शिक्षा और शिक्षक की गरिमा के प्रति जागरूक भी हैं, पर उसकी विसंगतियों तथा व्यापारिकता की मनोवृत्ति पर व्यथित भी हैं। वे लिखते हैं—

पढ़े-लिखे वे डिगरीधारी

शोध-बोध में हैं विद्याधर

जॉब, सैलरी, सुविधाएँ सब

मिली हुईं हैं झोली भर-भर   

 

फिर भी कहाँ पढ़ाते ढंग से

शिक्षक, वे अपकारी निकले। ('वे व्यापारी निकले', पृ. 63)

कैसी विडंबना है, जिनको शब्दों का दानी होना था वे व्यापारी हो गए। सब कुछ— धन, मान, मर्यादा पाकर भी अपने कर्तव्यों से विमुख आज शिक्षक और शिक्षा— "ट्यूशन लेकर ज्ञान बढ़ाओ/ खर्च करोगे तो बदले में/ बिना पढ़े ही नंबर पावो" (पृ. 63) की वास्तविकता बन गई है। कवि इन दृश्यों से हतप्रभ है और "जो जीते हैं परहित खातिर" (पृ. 63) उनको नमन करता है।

पर्यावरण के प्रति भी अवनीश जी की सजगता उनकी समसामयिक चेतना का महत्वपूर्ण स्वर है। 'मिले सभी को पानी' गीत में वे पानी की महत्ता, संवर्धन, संचयन और सदुपयोग के लिए कदमताल करते दीख पड़ते हैं—

जल संचय का

ध्येय बना हम

आओ कदम बढ़ाएँ

आने वाले

कल की खातिर

जल को आज बचाएँ। (पृ. 34) 

कवि कल के लिए जल को बचाने के प्रति जितना सचेत है, उसके अपव्यय के प्रति भी उतना ही सावधान है, ताकि— "सदा धरा पर/ मिले सभी को पानी" (पृ. 34)

'कहाँ जाय गौरैया' गीत में भी कवि गौरैया के माध्यम से पर्यावरण और प्रकृति से दिन-प्रतिदिन बढ़ती दूरी को तो स्पष्ट करता ही है, "कैदखाने से हुए घर" (पृ. 35) के रूप में जीवन में आई संकीर्णता को भी व्यक्त करता है। जहाँ न कोई खुलापन है, न मुड़ेरें हैं, न घरों में आंगन और न नीम की शीतलता ही। देखिये—

खिड़कियाँ

खुलती नहीं, ना—

घर झरोखेदार हैं

घोंसले

कैसे बनें, ना

दूब, तिनके-तार हैं

 

अजनबी-से

हो गए घर

कहाँ जाय गौरैया। (कहाँ जाय गौरैया', पृ. 36)

कवि गौरैया के प्रतीक से मानो खंडहराती मानवता को पुनः पर्यावरण से जोड़ने के लिए, उसे निरखने-परखने और सरसब्ज होने के लिए निमंत्रित करता है।

नवगीत जन संवेदना का वह उद्दात और सशक्त पटल है जो निराशा, कुंठित और हारे हुए मन को उदबुद्ध करता है। आम आदमी के दुख-दर्द, तकलीफ, संघर्ष और आक्रोश को स्वर देता है और समय की विसंगतियों के विरुद्ध लड़ने का माद्दा भी प्रदान करता है। पर इसमें कहीं कुछ ऐसा कोना भी है जो आने वाले समय के प्रति मन को ढाढस बँधाता है, आसान्वित करता है। 'कितने मन हैं' गीत में इसी जिजीविषा को बल देते हुए कवि कहता है—

कोई खूँटी है मन,

जिस पर—

आशा का आकाश टँगा है

 

लक्ष्य अगर है

तो आशा है

धैर्य बिना क्या हो पाएगा

यदि न मिले

तीनों ये नभ में

मन का पंछी खो जाएगा। ('कितने मन हैं', पृ. 29)

स्पष्ट है कि आशा का आकाश एक त्रिकोण में स्थित है। अगर लक्ष्य है तो आशा आवश्यक है और यह आशा की उर्वरता धैर्य से ही बल पाती है। अतः लक्ष्य, आशा और धैर्य की खूँटी का होना जीवन में आवश्यक है। मन की सफलता का परिचायक है।

डॉ अवनीश 'मन का पौधा' गीत में भी इसी आशा की शक्ति को व्यक्त करते हैं— "कभी फलेगा मन का पौधा/ जैसे फलते अंबर तारे" (पृ. 29)।  जैसे समय आने पर अंबर में तारे अपना वैभव विखेरते हैं, ऐसे ही मन का पौधा भी फलीभूत होगा। किन्तु, इसके लिए प्रयत्न करते रहना होगा। जैसी— "छू न कुसंगत सके पौध को/ काट छाँट करना होता है" (पृ. 29)। ऐसे ही मन के पौधे का उचित संवर्धन आवश्यक है, भटकाव से बचाना आवश्यक है, अपने पर विश्वास और आशा को बनाए रखना भी आवश्यक है।

यह आशावादिता, आंचलिकता और लोक संवेदना भाई अवनीश जी के गीतों में गहरे तक समोई हुई है। भारतीय जन-जीवन के साथ उनके आत्मिक संबंध हैं। वे उसके क्षण-प्रतिक्षण के सहभोक्ता हैं। ब्रज की संस्कृति, उसकी पावनता और अपनत्व अवनीश जी के जीवन में झांकता ही नहीं, संवेदना के रूप में झंकृत भी होती है। ब्रज के कण-कण में लीला बिहारी परिव्याप्त हैं और अवनीश जी की जीवन दृष्टि उन्हीं के राग-रस में विभोर है, परिपूर्णता देखती है। 'कहाँ मिलोगे' गीत में उनकी अनन्यता पूछ बैठती है—

वंशीवाले,

कहाँ मिलोगे,

क्या तुम वृन्दावन में?

 

नाम, रूप,

लीला में तेरी 

डूब-डूब उतराऊँ

एक झलक

पाने को हरदम 

व्याकुल मैं हो जाऊँ

 

रोम-रोम में

पुलक उठे नित—  

अश्रु बहे नैनन में। (पृ. 111)

चैतन्य महाप्रभु सा  कवि का यह रोमांच अद्भुत अद्भुत है। वृंदावन को प्रेम की राजधानी निरूपित करता हुआ कवि भ्रमर की तरह गुन-गुन गीत गाते हुए कुंज गलियों में विचर रहा है, जहाँ प्रेम की गहनता में प्रकृति का मनभावन रूप अपनी ओर खींचता है। भक्ति में दर्प नहीं, निश्छलता है। सब जैसे उसकी लीला में निमग्न हैं — "प्रेम यहाँ का गहरी नदिया/ प्रकृति यहाँ की मनभावन/ लोग यहाँ के निश्छल-निश्छल/ भक्त यहाँ के दर्पण-दर्पण" ('प्रेम-भाव की रजधानी', पृ. 109)। यहाँ की धरती राग, रंग, रस, गंध से परिपूरित है। जहाँ— "गली-गली औ' चौराहे सब/ भगवत-कथा सुनाते हैं/ कर्म न त्यागो सच का/ बिगड़े—/ काम सभी बन जाते हैं" ('अपनी धरती वृन्दावन', पृ. 107)। यहाँ की सुबह पूजा, अर्चन, दीपदान तथा राधे-राधे के अभिवादन के रूप में आरंभ ही नहीं होती, आस्था और स्तवन के जीवन-दर्शन को साकार भी करती है। कहते हैं— "गिरधारी, अनुकंपा बरसे/ सुखी होय संसारी मन" ('सुखी होय संसारी मन', पृ. 106)। भारतीय दर्शन के अनुसार यह सुख ही संसार का प्रेम है और इन गीतों की महदाकांक्षा भी यही है।

ब्रज वसुंधरा की रज से ओतप्रोत डॉ अवनीश आस्था और प्रेम के गीतों के तो निकट हैं ही, सामाजिक स्थितियों और अधुनातन विकास की हर छोटी बड़ी गतिविधियों पर भी उनकी दृष्टि है। आज के कंप्यूटर युग में ऊँगलियों के कमाल और चमकीली प्रोफाइल के बीच खुद को छलते मनुष्य की बात जहाँ अवनीश जी उठाते हैं, वहीं "लॉलीपॉप/ हाथ पकड़ाती/ विज्ञापन की टोली" (पृ. 49) के मंत्रमुग्ध करने, मूर्ख बनाने, लूटने और बाजार निर्धारित करने वाले कर्म पर भी प्रकाश डालते हैं। 'अखिल देश बस कहने का' गीत में "झूठे सिद्ध हो रहे सच्चे/ सविधान खुद खाए गच्चे" (पृ. 57) कहकर कवि जहाँ असली अन्यायी को पहचानने की नसीहत देता है, वहीं 'कविवर बड़े नवाब' में वह आज के लेखन और भाव-कुभावों को खिताबों की मिल्कियत दिए जाने पर व्यंग भी करता है और खेलों में "हुनर नहीं, है चालाकी" (पृ. 75) के नापाक इरादों के अर्थों को भी खोलता है। कहीं 'बॉस' के सयानेपन को वे उजागर करते हैं, तो कहीं छटे हुए लोगों की बात करते हैं, तो कहीं 'लालटेन बुझ गई', 'कोरोना का डर', 'माता-पिता से दूरी', विदेश का रहवास और पत्थर दिल औलादों की करतूतों का चिट्ठा खोल कर रखते हैं। 'ये बंजारे' गीत में बंजारों की जीवन-यात्रा, उनकी मुसीबत, श्रम और रोटी के रिश्तों को अभिव्यक्ति देते हैं।

कुल मिलाकर अवनीश जी के नवगीतों का यह संकलन 'एक अकेला पहिया' नहीं, मानव जीवन की संत्रस्त गाड़ी को सुख-दुख, निराशा, कुंठा, दुर्भाव आदि से निकालकर आशा, प्रेम, आस्तिकता के पहियों पर आगे ले चलने का उपक्रम है। वे लोक की सुभता के लिए— 'कुछ शुभम कहो' के आकांक्षी हैं—

चेतन के पर्वत से

बोलो

कोई चिनगी-सी बात छुए

संस्मृति जो सोयी

वह जागे

फिर दृष्टि लक्ष्य की आँख छुए।

xx           xx           xx

तुम करो क्रांति,

तुम क्रांति करो,

संकल्प करो जी तुम। (पृ. 55)

और उन्हें विश्वास है— समय यदि आज मोड़ा जा सका तो— "कल शुभ हो जाएगा" ('जीवन तो असीम'... , पृ. 85)

कहते हैं कविता जीवन की तरह विराट है और उसकी तरह सूक्ष्म भी है। वह रमणीक है, सुंदर है और लोक को सुंदर देखना चाहती है। वह जीवन में बिखरी कुरूपता की तरह कुरूप नहीं है और न जीवन को कुरूप होने देना चाहती है। डॉ अवनीश सिंह चौहान के गीत भी इसी काव्य मार्ग पर बड़े सधकर चले हैं। वे समाज में फैल रही कुरूपता से सचेत करते, मनुष्य को उससे दूरी बनाने और मानवता को जगाने का प्रयत्न करते हैं। मैं भाई अवनीश जी को इस संग्रह के प्रकाशन के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।



समीक्षक के बारे में :
 :  
डॉ वीरेन्द्र निर्झर जाने-माने कवि, आलोचक व आचार्य हैं। इनका जन्म 15 अक्टूबर 1949 को महोबा, उत्तर प्रदेश में हुआ। सेवासदन महाविद्यालय, बुरहानपुर (म.प्र.) में हिंदी विभागाध्यक्ष रह चुके डॉ निर्झर की अब तक आधा दर्जन से अधिक कृतियाँ— 'ओंठों पर लगे पहरे', 'सपने हाशिये पर' व 'खिड़की पर सूरज बैठा है' (नवगीत संग्रह), 'विप्लव के पल' (काव्य संग्रह), 'ठमक रही चौपाल' (दोहा संग्रह),'वार्ता के वातायन' (वार्ता संकलन), 'संघर्षों की धूप' (दोहा सतसई) आदि प्रकाशित हो चुकी हैं। इन्होंने  'कजली समय' व 'वीर विलास' (पाठालोचन), 'बुंदेली फाग काव्य : एक मूल्यांकन', 'आल्हाखण्ड : शोध और समीक्षा', 'हिन्दी साहित्य में पर्यावरणीय चेतना', 'ताप्ती तट से' (कविता-संग्रह) आदि का सम्पादन किया है। आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से इनकी कहानियाँ, कविताएँ, रूपक एवं वार्ताएँ प्रसारित हो चुकी हैं। सम्प्रति : निदेशक, डॉ जाकिर हुसैन ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट्स, बुरहानपुर। संपर्क : एम.बी./120, न्यू इंदिरा कालोनी, बुरहानपुर-450331 (म.प्र.)

Ek Akela Pahiya (Hindi Navgeet).  Book Review by Dr Virendra Nirjhar

शनिवार, 20 सितंबर 2025

वीरेंद्र आस्तिक : गतिशील जीवन का निर्मल झरना — अवनीश सिंह चौहान


पिछले दिनों डाक से दो महत्त्वपूर्ण नवगीत-संग्रह— ‘आनंद! तेरी हार है’ और ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ प्राप्त हुए। दोनों ही संग्रह हिंदी काव्य-जगत के चर्चित कवि, आलोचक और संपादक श्रद्धेय श्री वीरेंद्र आस्तिक जी की सृजन-यात्रा के उज्ज्वल उदाहरण हैं।

‘आनंद तेरी हार है’ का प्रथम संस्करण सन् 1987 में प्रकाशित हुआ था, जबकि इसका द्वितीय संस्करण सन् 2024 में ‘भारतीय साहित्य संग्रह’ (www.pustak.org), कानपुर, उत्तर प्रदेश से सजिल्द रूप में प्रकाशित हुआ। इसी प्रकार ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ का प्रथम संस्करण सन् 2002 में आया और इसका द्वितीय संस्करण सन् 2025 में ‘भारतीय साहित्य संग्रह’ द्वारा प्रकाशित किया गया है। आस्तिक जी की अब तक लगभग एक दर्जन कृतियाँ (नवगीत, आलोचना एवं संपादन) प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन पर दो स्वतंत्र आलोचना-ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। साहित्य-साधना के प्रति उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा ‘साहित्य भूषण’ सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।


आस्तिक जी का नाम हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में शुमार है, जिन्होंने नवगीत को नई दिशा दी है। उनकी काव्य-साधना (आलोचना और सम्पादन कार्य भी) मानवीय संवेदनाओं की गहन अभिव्यक्ति है। शायद यही कारण है कि उनका हृदय आज के यांत्रिक, व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन से बार-बार आहत हो उठता है। कई लोग जहाँ इस कटु सत्य से आँखें मूँद लेना ही उपयुक्त समझते हैं, वहीं आस्तिक जी उसे पूरे साहस और ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं। यही निष्ठा और स्पष्ट दृष्टि उनकी रचनाओं को मानवीय गहराई तथा वैचारिक ऊँचाई प्रदान करती है, जिससे वे केवल काव्य न रहकर, जीवन-दर्शन का सजीव दस्तावेज़ बन जाती हैं।

आस्तिक जी का काव्य-संग्रह ‘आनंद तेरी हार है’ जीवन-संघर्ष की वीणा से उपजा वह शुद्ध स्वर है, जिसमें पीड़ा की गहराइयों के बीच भी उल्लास और विस्मय के सुर गूंजते हैं। इस संग्रह की रचनाएँ अपनी सहजता, गेयता और भाव-संपन्नता के कारण पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करती हैं। इनको निरखने-परखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो कवि ने अनकहे सत्य को शब्दों का जामा पहनाकर उसमें साँसों की गर्माहट भर दी हो।

आस्तिक जी की सृजन-यात्रा का अगला सोपान है— ‘आकाश तो जीने नहीं देता’। इस संग्रह में उन्होंने संवेदना की एक नई भाषा गढ़ी है, जो उनकी काव्य-दृष्टि की परिपक्वता का प्रमाण प्रस्तुत करती है। इसमें जीवन की लय को तलाशते हुए उसके कैनवास को व्यापक बनाने की गहन इच्छा स्पष्ट रूप से झलकती है। यही कारण है कि इसे आस्तिक जी की सर्जना का एक महत्त्वपूर्ण तथा उपलब्धिमय चरण माना जा सकता है।

आस्तिक जी की रचनाएँ उस प्रचलित धारणा को चुनौती देती हैं कि गीत और कविता को अलग-अलग खाँचों में बाँटा जा सकता है। उनके नवगीतों में लयात्मकता के साथ-साथ गहन विचार और संवेदनाओं का अद्वितीय संगम स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इनमें नवीन शिल्प और ताजगीपूर्ण बिम्बों की सशक्त उपस्थिति पाठक को सहज ही प्रभावित करती है। ये रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि सच्चा काव्य किसी ‘कॉपी, कट, पेस्ट’ जैसी यांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि जीवन के प्रामाणिक और गहन अनुभवों की कोख से जन्म लेता है।

इन दिनों श्रद्धेय आस्तिक जी अत्यंत अस्वस्थ हैं। उनके शीघ्र एवं पूर्ण स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए, यहाँ उनकी एक रचना (संग्रह: ‘आकाश तो जीने नहीं देता’, पृष्ठ 107) प्रस्तुत की जा रही है :

चलो आज यों ही चलते हैं
राह जहाँ तक ले जाए

छोड़ कलुष के ये गलियारे
बैठेंगे उस नदी किनारे
बूँद-बूँद घुल-घुल जाने को
रह-रह मझधार बुलाए

चाहों की कोई जात न हो
बीती बातों पर बात न हो
पीछे छूट गए उन अंधे
महलों से जी घबराए

देखो, इस बरगद को क्षण भर
इसकी खामोशी में रहकर
कोई कोयल हममें–तुममें
कुहू–कुहू करती आए।

इस गीत में प्रस्तुत की जा रही प्रेम-चेतना जीवन का अमृत-तत्व है। इसमें प्रेम-चेतना का अमानवीय जड़ताओं से मोहभंग और प्रेम की मार्मिक छुअन, जो स्वाभाविक कथा-दृश्यों द्वारा अनुभूत हुई है, अद्वितीय है।

कुल मिलाकर, आस्तिक जी का काव्य किसी क्षणिक उत्तेजना का परिणाम नहीं है, बल्कि साहित्य को समृद्ध करने वाला गतिशील जीवन का निर्मल झरना है, जो विवेक की धरा पर अनवरत बहते हुए पाठकों को प्रेरणा प्रदान करता है।


लेखक के बारे में :
डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) वृंदावन के द्विभाषी साहित्यकार और आभासी दुनिया  में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। ‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को जीवन में आत्मसात करने वाले डॉ. चौहान वर्तमान में बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के बीआईयू कालेज ऑफ ह्यूमेनिटीज़ एंड जर्नलिज्म में आचार्य और प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

Veerendra Aastik: Gatisheel Jeevan ka Nirmal Jharna — Abnish Singh Chauhan

रविवार, 24 अगस्त 2025

नवगीत कुटुंब में अवनीश सिंह चौहान के नवगीतों पर चर्चा


23 अगस्त 2025 
"आज शनिवार का कार्यक्रम : किसी भी वर्तमान नवगीतकार का एक या दो नवगीत और उसका जीवन परिचय साहित्यिक उपलब्धियों के साथ। संयोजक के निवेदन पर किसी भी नवगीतकार द्वारा रखा हुआ और उस पर सौम्य निष्पक्ष परिचर्चा।" — नवगीत कुटुंब (वॉट्सऐप ग्रुप)

अवनीश सिंह चौहान

जन्मतिथि : 4 जून, 1979
पिता : श्री प्रहलाद सिंह चौहान
माता : श्रीमती उमा चौहान
पत्नी : नीरज चौहान

शिक्षा : देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर (म.प्र.) से अंग्रेजी में एम.फिल., पीएच-डी. व डी.लिट. (मानद उपाधि)

प्रकाशित कृतियाँ : अंग्रेजी में— ‘स्वामी विवेकानन्द : सिलेक्ट स्पीचेज’, 2004 (द्वितीय सं. 2012), ‘विलियम शेक्सपियर : किंग लियर’, 2005 (आईएसबीएन सं. 2016), ‘स्पीचेज ऑफ स्वामी विवेकानन्द एण्ड सुभाषचन्द्र बोस : ए कॅम्परेटिव स्टडी’, 2006, ‘फंक्शनल स्किल्स इन लैंग्वेज एण्ड लिट्रेचर’, 2007, ‘फंक्शनल इंग्लिश’, 2012, ‘राइटिंग स्किल्स’, 2012, ‘द फिक्शनल वर्ल्ड ऑफ अरुण जोशी : पैराडाइम शिफ्ट इन वैल्यूज’, 2016

पद्यानुवाद : ‘बर्न्स विदिन’ (हिंदी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद), 2015

नवगीत संग्रह : ‘टुकड़ा कागज का’ (तीन संस्करण : 2013, 2014, 2024), ‘एक अकेला पहिया’, 2024  

कविता संग्रह : 'टेल मी प्लीज' (2025)

संपादित कृतियाँ : अंग्रेजी में— ‘इंडियन पोएट्री इन इंग्लिश— पेट्रिकोर : ए क्रिटीक ऑफ सीएल खत्री'ज पोएट्री’, 2020 (सह-सं)। हिंदी में— ‘बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता’, 2013, 'नवगीत वाङ्मय', 2021 (सं)

साक्षात्कार संग्रह : ‘नवगीत : संवादों के सारांश’ (साक्षात्कार संग्रह), 2023

विशेष : 'समकालीन नवगीत संचयन'— भाग 1, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, 2023 में रचनाएँ संकलित

संपादन: 'पूर्वाभास' (www.poorvabhas.in) तथा 'क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म' (www.creationandcriticism.com)

सम्मान : 'प्रथम कविता कोश सम्मान', 2011, 'बुक ऑफ द ईयर अवार्ड— 2011', 2012, 'सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार', 2013, 'नवांकुर पुरस्कार', 2014, 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान', 2014, 'साहित्य गौरव सम्मान', 2015, 'दिनेश सिंह स्मृति सम्मान', 2018 आदि से अलंकृत

सम्प्रति : आचार्य व अध्यक्ष, अंग्रेजी विभाग तथा प्राचार्य, बीआईयू कॉलेज ऑफ ह्यूमनिटीज एण्ड जर्नलिज्म, बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली (उ.प्र.), ईमेल— abnishsinghchauhan@gmail.com, व्हाट्सएप्प— +91-9456011560

(1) असंभव है

चौतरफा
जीवन ही जीवन
कविता मरे
असंभव है

अर्थ अभी
घर का जीवित है
माँ, बापू, भाई-बहनों से
चिड़िया ने भी
नीड़ बसाया
बड़े जतन से, कुछ तिनकों से
मुनिया की पायल
बाजे छन-छन
कविता मरे
असंभव है

गंगा में
धारा पानी की
खेतों में चूनर धानी की
नये अन्न की
नई खुशी में
बसी महक है गुड़धानी की
शिशु किलकन है
बछड़े की रंभन
कविता मरे
असंभव है।

(2) सर्वोत्तम उद्योग

छार-छार हो
पर्वत दुख का
ऐसा बने सुयोग

गलाकाट इस 'कंप्टीशन’ में
मुश्किल सर्वप्रथम आ जाना
शिखर पा गए किसी तरह तो
मुश्किल है उस पर टिक पाना
सफल हुए हैं
इस युग में जो
ऊँचा उनका योग

बड़ी-बड़ी ‘गाला’ महफिल में
कितनी हों भोगों की बातें
और कहीं टपरे के नीचे
सिकुड़ी हैं मन मारे आँतें
कोई हाथ
साधता चाकू
कोई साधे जोग

भइया मेरा बता रहा था
कोचिंग भी है कला अनूठी
नाउम्मीदी की धरती पर
उगती है कॅरिअर की बूटी
सफल बनाने का
असफल को
सर्वोत्तम उद्योग।

(3) बाज़ार समन्दर

चेहरे पढ़ो
कि सबके सब हैं
अविश्वास के अक्षर

थर्मामीटर तोड़ रहा है
उबल-उबल कर पारा 
लेबल मीठे जल का
लेकिन पानी लगता खारा
समय उस्तरा है जिसको
अब चला रहे हैं बन्दर

चीलगाह जैसा है मंजर
लगती भीड़ मवेशी
किसकी कब थम जाएँ साँसें
कब पड़ जाए पेशी
कितने ही घर डूब गए हैं
यह बाज़ार समन्दर

त्यागी है हंसों ने कंठी
बगुलों ने है पहनी
बागवान की नज़रों से है
डरी-डरी-सी टहनी
दिखे छुरी को सेंदुर-जैसा
सूरज एक चुकंदर।

सौजन्य से : शिवानन्द सिंह 'सहयोगी', वाराणसी

नवगीत कुटुंब : समर्थ आलोचकों की प्रतिक्रियाएँ 
(1)
आज पटल पर अवनीश सिंह चौहान जी के तीन नवगीत पढ़े। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अवनीश जी नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर हैं।

पहला नवगीत "असम्भव" एक आशावादी रचना है। जब तक संसार में कोमल भावनाएँ विद्यमान हैं और उन्हें उद्वेलित करने वाले कारण उपस्थित हैं, तब तक कविता मुखरित होती रहेगी।

दूसरा नवगीत स्पष्टतः वर्तमान की गला-काट स्पर्धा की ओर संकेत करता है, जहाँ प्रतिभाएँ पददलित हो रही हैं। सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ पीड़ादायक हैं।
बाज़ारवाद और बढ़ता दिखावा असली-नकली की पहचान करना कठिन बना रहे हैं।

तीनों नवगीत समाज की दुखती रग पर कोमलता से हाथ रखते हैं। अच्छे नवगीतों के लिए अवनीश जी को बधाई और इन गीतों से रूबरू कराने के लिए सहयोगी जी को साधुवाद।

— मधु प्रधान, कानपुर
(2)
श्री अवनीश सिंह चौहान जी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एवं प्रतिभासंपन्न रचनाकार हैं। इनके तीनों ही गीत जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूते हैं और पाठकों को आकर्षित करते हैं। भाई अवनीश जी को हार्दिक बधाई। पटल पर इन्हें प्रस्तुत कर हमसे रूबरू कराने के लिए आदरणीय श्री सहयोगी जी को भी बहुत-बहुत साधुवाद।

— विजय सिंह, प्रयागराज 
(3)
अवनीश सिंह चौहान समकालीन हिंदी साहित्य के एक बहु-आयामी रचनाकार हैं, जिनका कार्यक्षेत्र कविता, आलोचना, संपादन, अनुवाद और शिक्षण तक फैला है। उनकी विद्वत्ता अंग्रेजी साहित्य में एम.फिल. और पीएच.डी. के स्तर तक विकसित है, वहीं उनकी रचनात्मकता नवगीत, समालोचना और भाषा के व्यावहारिक प्रयोगों में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। अवनीश जी की रचनाओं में परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

असंभव है : यह नवगीत जीवन की जिजीविषा, संवेदना और आशावाद का सशक्त उद्घोष है। गीत का केन्द्रीय कथ्य यह है कि जब तक जीवन की सहज प्रवृत्तियाँ— ममता, श्रम, सृजन, परिवार, प्रकृति और प्रेम, अविरल प्रवाहित हैं, तब तक कविता (अर्थात् संवेदना) का मरना असंभव है।

सर्वोत्तम उद्योग : यह गीत समकालीन प्रतिस्पर्धात्मक समाज की विडंबनाओं को उजागर करता है। यहाँ ‘कोचिंग’ और ‘कॅरिअर’ जैसे शब्दों से स्पष्ट है कि यह गीत आज की शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और युवाओं की संघर्षशीलता पर केंद्रित है। 

बाज़ार समन्दर : यह नवगीत आधुनिक बाजारवादी संस्कृति की आलोचना करता है, जहाँ हर मूल्य बिकाऊ है और सत्य व विश्वास का ह्रास हो चुका है। यह गीत उपभोक्तावादी व्यवस्था की अमानवीयता को प्रतीकात्मक भाषा में उद्घाटित करता है।

समग्र रूप से अवनीश सिंह चौहान के ये तीनों गीत आधुनिक हिंदी गीत कविता की गहनता, बहुआयामिता और सामाजिक चेतना को दर्शाते हैं। वे एक ओर जीवन की संवेदना और सौंदर्य को बचाए रखने की जिद में हैं ("असंभव है") और दूसरी ओर वे सामाजिक विडंबनाओं से भी मुँह नहीं मोड़ते ("सर्वोत्तम उद्योग", "बाज़ार समन्दर" जैसे गीतों में)।

अवनीश जी को हार्दिक बधाई। साझा करने के लिए आदरणीय सहयोगी जी का बहुत-बहुत धन्यवाद। 

 अशोक शर्मा 'कटेठिया', जयपुर 
(4)
अवनीश जी के तीनों गीत सहज कवि-कर्म के जीवन-सन्दर्भ  से जुड़े हुए  हैं। ऐसा लगता है मानो कवि ने बात-बात में गीत लिख लिए हों। इनमें कहीं भी केवल शब्द-लाघव या अर्थ-विलास की कृत्रिम क्रीड़ा नहीं है; सब कुछ कवि के जीवनानुभव में रचा-पका हुआ है।

अवनीश जी को हार्दिक बधाई! फलक पर इन्हें प्रस्तुत करने के लिए आदरणीय सहयोगी जी प्रशंसा के पात्र हैं।

— उदयशंकर सिंह 'उदय', मुजफ्फरपुर
(5) 
अवनीश सिंह चौहान जी प्रसिद्ध नवगीतकार, साहित्यकार और विभिन्न अकादमिक क्षेत्रों के विद्वान हैं। आज पटल पर आपकी रचनाओं को देखकर और पढ़कर अत्यंत सुखद अनुभव हुआ। प्रस्तुत नवगीत प्रेरक एवं हृदयस्पर्शी हैं।

अवनीश जी का हार्दिक अभिनंदन। पटल पर इनका प्रस्तुतीकरण करने हेतु आदरणीय सहयोगी जी का हृदय से आभार।

— रघुवीर शर्मा, खण्डवा 
(6)
समर्थ नवगीतकार अवनीश सिंह चौहान जी के नवगीत समकालीन विद्रूपताओं को इंगित करते हैं— "चीलगाह जैसा है मंजर/ लगती भीड़ मवेशी।" बाजारवाद के समंदर में जकड़े हुए इस युग पर वह बिल्कुल सटीक लिखते हैं। एक रचनाकार का यही युगबोध है और उत्तरदायित्व भी। तो "भइया मेरा बता रहा था/ कोचिंग भी है कला अनूठी" की अभिव्यक्ति वर्तमान का आईना है। बावजूद इसके वे उद्घोष करते हैं कि "चौतरफा/ जीवन ही जीवन/ कविता मरे/ असंभव है।" विसंगतियों भरे इस परिवेश में नवगीत के माध्यम से सकारात्मक संदेश प्रदान करने की उनकी स्पष्ट शैली नवगीत विधा को समृद्ध करती है। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी चौहान जी को शानदार रचनाधर्मिता के लिए बधाई।

— डॉ शैलेश गुप्ता 'वीर', फतेहपुर 
(7)
आज स्वास्थ्यगत परेशानी के कारण भैया अवनीश जी के गीतों पर टिप्पणी नहीं कर पाया, इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। अभी डॉक्टर से मिलने जा रहा हूँ।

— जयप्रकाश श्रीवास्तव, जबलपुर 
(8)
‘नवगीत कुटुंब’ के इस समृद्ध पटल पर मेरे नवगीतों पर अभिमत देने वाले सभी महानुभावों के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ। साथ ही, इस पटल पर मौन रहकर स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करने वाले सभी आदरणीय जनों का भी हार्दिक आभार।

— अवनीश सिंह चौहान, वृन्दावन  
(9)
आज की चर्चा में सम्मिलित सभी मित्रों का आभार।

— शिवानंद सिंह 'सहयोगी', वाराणसी 

पूर्वाभास के एक पाठक की प्रतिक्रिया 

‘नवगीत कुटुंब’ के इस समृद्ध मंच पर हाल ही में डॉ. अवनीश सिंह चौहान के नवगीतों पर सार्थक चर्चा हुई। अवनीश जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रचनाकार हैं, जिनकी कविताओं और नवगीतों में जीवन-संवेदना, सामाजिक यथार्थ और नवीन दृष्टि का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

प्रस्तुत नवगीतों में कहीं आशा और जिजीविषा का स्वर मुखरित है, तो कहीं समकालीन समाज की विषमताओं, स्पर्धा और बाजारवाद की आलोचना व्यंजित होती है। उनके गीत भाषा की सादगी, अनुभूति की गहराई और विचार की प्रखरता के कारण पाठकों एवं श्रोताओं को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।

चर्चा में सम्मिलित सभी साहित्य-प्रेमियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से गीतों की अर्थवत्ता और सामयिक प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए। मौन रहकर भी आशीर्वाद देने वाले सभी वरिष्ठ जनों की उपस्थिति ने इस विमर्श को और अधिक गरिमामय बना दिया।

इस सफल आयोजन हेतु ‘नवगीत कुटुंब’ और सहयोगी साथियों का हृदय से आभार।

— डॉ प्रियंका चौहान, ग्वालियर 

Discussion on the Hindi lyrics of Abnish Singh Chauhan at Navgeet Kutumb

शनिवार, 15 मार्च 2025

पुस्तक चर्चा : 'एक अकेला पहिया' : जीवन की समझ लिए नवगीत — डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी


पुस्तक: एक अकेला पहिया (नवगीत-संग्रह) 
ISBN: 978-93553-693-90
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष : 2024
संस्करण : प्रथम (पेपरबैक) 
पृष्ठ : 112
मूल्य: रुo 250/-
प्रकाशक: प्रकाश बुक डिपो, बरेली
फोन :  0581-3560114

Available At:
AMAZON: CLICK LINK

हिंदी नवगीत के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले कवि डॉ अवनीश सिंह चौहान का सद्यः प्रकाशित संग्रह— 'एक अकेला पहिया' पाठकों की उम्मीद पर खरा उतरता है। इससे पहले आपने 'टुकड़ा कागज़ का' नवगीत संग्रह पाठकों के हाथों में सौंपा था, जो काफी सराहनीय रहा है।

'एक अकेला पहिया' की भूमिका लिखते हुए प्रख्यात नवगीतकार वीरेंद्र आस्तिक कहते हैं— "साहित्य-जगत में डॉ अवनीश सिंह चौहान एक प्रतिष्ठित नवगीतकार हैं। वे हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं के प्रख्यात लेखक और इन दोनों भाषाओं की आभासी दुनिया और प्रिंट मीडिया के जागरूक संपादक हैं। यहाँ यह भी बताना चाहूँगा कि वे आभासी दुनिया में नवगीत की स्थापना करने वाले उन्नायकों में अग्रपांत रहे हैं। यद्यपि आपका नवगीतीय अवदान बहुत अधिक नहीं है, किंतु जो है उसकी सुगंध देश की सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक हो गई है— विश्व स्तर पर आपके हिन्दी और अंग्रेजी भाषी पाठकों की संख्या लाखों में है" ('एक अकेला पहिया', पृ. 7)

इस संग्रह के नवगीतों में जीवन और समाज के विविध विषयों पर नवगीतकार डॉ चौहान की सोच और उनकी भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। 'मन का पौधा' में आपने मन के नानाविध रूपों और भावों की परख की है; जैसे पौधे के सही फलन और विकास के लिए उसकी कांट-छांट अपेक्षित है, वैसे ही आपने मन को नियंत्रित करने की बात कही है। आपका 'कितने मन है' नवगीत मन से संवाद करने में सक्षम है। मनुष्य का मन उसे नियंत्रित करता है। उसकी इच्छाएँ, कामनाएँ, आशा-निराशा, प्राप्ति-बिछुड़न, सभी भाव इस मन की उपज है, मन में पनपती हैं और मन को प्रभावित करतीं हैं। मन की अलग-अलग परतों को उकेरती पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—

मन के भीतर कितने मन हैं

कौन अधिक है सबसे सुन्दर

आसमान से जग को देखा

निराकार भी दिखता मनहर

 

खोज रहा है पुरुष प्रकृति को

अद्भुत मन का रोग लगा है। ('एक अकेला पहिया', पृ. 30)

आपका नवगीत 'ये बंजारे' सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है। इसमें मेहनतकश मजदूर की जद्दोजहद की कहानी दर्ज है। इसमें रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जी-तोड़ श्रम करने वाले श्रमिक की स्वेद-बूंदों और पसीने से नहाई देह की तकलीफ बयान की गई है। लोहे की भट्टी में आग के सामने अपना रक्त जलाने वाली तपती देह की व्यंजना मार्मिक है

ये बंजारे मारे-मारे

फिरते रहते गली-गली

 

भट्टी जलती, लोहा तपता

लाल रंग जीवन पर चढ़ता

 

श्रम औ' रोटी के रिश्ते का

धर्म निहाई एक बली ('एक अकेला पहिया', पृ. 30)

आपकी कलम आशा की किरण उजागर करती हुई 'कोरोना का डर' में कहती है कि हमें साहस के साथ सावधानीपूर्वक बाहर निकलना होगा, क्योंकि कोरोना के डर ने हमें घर में दुबककर रहने पर बाध्य किया है। इस डर को जीतना होगा, अन्यथा हम कभी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाएंगे—कोरोना का डर है, लेकिन—/ डर-सी कोई बात नहीं” (77) और "सूरज निकलेगा पूरब में / होगी फिर से प्रात वही" ('एक अकेला पहिया', पृ. 78)

यह समाज स्वार्थी और आत्म-केंद्रित होता जा रहा है। इससे दुखी होकर नवगीतकार 'नया वर्ष' नवगीत रचता है, जहाँ उसने नए वर्ष के आने पर टीवी-चैनलों द्वारा बीते साल का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने की परिपाटी पर तंज कसा है। वह कहना चाहता है कि प्रत्येक नव वर्ष पर सैलानियों की भीड़ मौज-मस्ती करने निकल पड़ती है, तदुपरांत वे लोग वही खटरागी जिंदगी जीने लगते हैं और इस प्रकार वर्ष बीत जाता है। और तब—

‘पोल-नृत्य’ की गहराई में

खोये मन सैलानी

आँखों में कुछ नशा चढ़ा है

खोज रहे हैं पानी

 

खुश हैं छोटी-सी दुनिया में,

खाया खूब कमाया। ('एक अकेला पहिया', पृ. 82)

शिक्षा वर्तमान युग में व्यापार में तब्दील हो चुकी है और शिक्षक व्यापारी बन गए हैं। इस विसंगति पर व्यंग्य करते हुए आप अच्छी तनख्वाह पाने वाले कामचोर व कपटी शिक्षकों को व्यापारी कहते हैं। स्वयं लंबे समय से अध्ययन व अध्यापन में संलग्न होने के कारण डॉ. चौहान ने शिक्षण क्षेत्र में व्याप्त कलुषित व्यावसायिक वृत्ति को करीब से देखा है। आलोच्य गीत में आपने शिक्षकों द्वारा अर्थ के बदले में विद्यार्थियों को उत्तीर्ण करने-कराने के निंदनीय कृत्य को आड़े हाथों लेते हुए लिखा है कि इससे हमारी भावी पीढ़ी शिक्षित होकर मात्र थोथी और अज्ञानी बनी रहेगी—

कहते हैं वे घर पर आओ

ट्यूशन लेकर ज्ञान बढ़ाओ

खर्च करोगे तो बदले में

बिना पढ़े ही नंबर पाओ

 

स्वारथ में जो रँगे हुए हैं,

कागज, वे अखबारी निकले। ('एक अकेला पहिया', पृ. 63)

'कविवर बड़े नवाब' में इस कवि ने जोड़-तोड़ कर निरर्थक कविता लिखने वाले कवियों पर कटाक्ष किया है। ऐसे कवि मंचों पर वाह-वाही लूटना जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि कैसे कविता छपवायी जाए, कैसे उसका प्रचार-प्रसार हो और कैसे ऐसी कविताओं का काव्य-संग्रह प्रकाशित करवाया जाए। मंचीय कौशल, अभिनय, खुशामद और तिकड़म भिड़ाकर नाम कमाने वाले ढोंगी कवियों की पूरी जमात को इस नवगीत में उघाड़ दिया गया है—

दो-कौड़ी का लेखन फिर भी 

कविवर बड़े नवाब

 

सीढ़ी चढ़ना सीखा, सबकी—

करके जय-जयकार 

मंचों पर हो चर्चा उसकी

बातों में हुशियार

 

भाव, कुभाव, रचे जो भी बस

उसको मिले खिताब। ('एक अकेला पहिया', पृ. 59)

देश में भाषणबाजी करने वाले नेताओं की भीड़ लगी हुई है। इनमें से कई नेताओं द्वारा मंचों पर झूठ प्रचारित किया जा रहा है। कई बार ये लोग संविधान का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। निम्न वर्ग के शोषण और भ्रष्टाचार से उपजी इनकी संपत्ति के आंकड़े अचंभित करने वाले हैं। इन सब पर डॉ चौहान की नजर है। आपके नवगीत सामाजिक क्रांति के अभिलाषी हैं। ये शिव-सुंदर के आकांक्षी हैं। इसलिए 'कुछ शुभम करो' गीत में आपने धर्म-पथ का अनुगमन करते हुए गंभीरतापूर्वक कर्मरत होने की प्रेरणा दी है। आपने पथ की बाधाओं का सामना करते हुए उत्पीड़न के विरुद्ध स्वर बुलंद किया है।

प्रकृति वर्षा ऋतु में अपना मनोरम रूप धारण करती है। आपका 'गगन में बदरा' बड़ा प्यारा नवगीत है, जिसमें बारिश की फुहार, बादल का सूरज से आंख मिचौली खेलना, जनमानस का मग्न होकर कजरी गाना, बारहमासी गाना, पुरवइया की थिरकन, बिजली का ज़ोर से कड़कना, धरती से हरियाली का फूटना तथा फसल उगने के दृश्य साकार किए गए हैं। लेकिन नवगीतकार डॉ.चौहान मानते हैं कि यह बारिश केवल खेतों व धरा को नवजीवन नहीं देती, बल्कि यह मानव मन को भी नई उम्मीदों और आशाओं से भरना सिखाती है जिससे उसका वर्तमान और भविष्य संवर जाए। वर्षा के बाद धूप का स्वागत करने में भी आपके नवगीत पीछे नहीं रहते। प्रकृति के सौंदर्य पर आधारित आपके नवगीतों में धूप खिलती-मुस्कुराती हुई आती है—

मंगल वर्षा करने वाली

धूप आँगने आई

 

सोया था इकतारा मन की

किसी गुफा में कब से

चाह रहा था खुलना-खिलना

वह तो अपने ढब से

 

बड़े दिनों के बाद आज फिर

दी झनकार सुनाई। ('एक अकेला पहिया', पृ. 89)

प्राकृतिक समृद्धि को आप अमराई की महक, प्यार, सौंदर्य, खुशबू, कोयल की कूक, पेड़ों की हरियाली आदि के माध्यम से भी प्रदर्शित करते हैं—कानों को कोयलिया—/ के स्वर पड़े सुनाई/ महक उठी अमराईऔर "आधे घूँघट चंद्रिमा जले/ छूने को मन-सागर उछले/ बहक गई पुरवाई/ महक उठी अमराई" ('एक अकेला पहिया', पृ. 91)आपके नवगीतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रकृति-केंद्रित अलंकारों का सौंदर्य भी मन को आह्लादित कर देता है, जैसेझरना झरता/ झर-झर, झर-झर,/ कल-कल करती नदिया” ('एक अकेला पहिया', पृ. 33)

नवगीतकार अवनीश मानते हैं कि प्रेम शाश्वत है, चिरंतन है। इसलिए उन्होंने 'ढाई आखर', 'प्यार हो गया सुविधावादी', 'किन्तु न तुम आये' जैसे नवगीत रचकर प्रेम के बदलते स्वरूप व समय के अनुसार प्रेमियों के बदलते बर्ताव पर अपने विचार साझा किए हैं। आप मानते हैं कि प्रेम के ढाई आखर जीवन को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। इस ढाई आखर का विस्तार ऐसा कि जो व्यक्ति कागज पर लिखी भाषा नहीं समझ सकता, वह भी हिय की भाषा पढ़ लेता है” ('एक अकेला पहिया', पृ. 99), उसका अनुगमन कर लेता है। प्रेम- पथ पर चलने वाले कठिन से कठिन डगर पर अपना सफर तय कर लेते हैं, क्योंकि नवगीतकार के अनुसार प्रेम उन्हें साहस, ढाढ़स और धैर्य देता है। लेकिन नवगीतकार  इस बात से चिंतित है कि आज का प्यार सुविधावादी हो गया है। आज लैला-मजनू जैसी निष्ठा और समर्पण का अभाव दिखता है। आज प्रेम ने तर्क का रूप धारण कर लिया है, जहाँ पर लंबी बहसें होती हैं और आस्था में दरार आ जाती है। आपने 'प्रेम भाव की रजधानी' शीर्षक से बहुत सुन्दर प्रेम गीत रचा है, जहाँ प्रेम के मनभावन रूप का वर्णन अविस्मरणीय है—

वृन्दावन, नव वृन्दावन है

प्रेम-भाव की रजधानी

 

प्रेम यहाँ का गहरी नदिया

प्रकृति यहाँ की मनभावन

लोग यहाँ के निश्छल-निश्छल

भक्त यहाँ के दर्पण-दर्पण

 

वर्तमान को रोज जगाती

संतों की चेतन वाणी। ('एक अकेला पहिया', पृ. 109)

उपरोक्त प्रेम-कथा आपने वृंदावन को केंद्र में रखकर रची है, क्योंकि कृष्ण की इस नगरी को आप प्रेम की नगरी मानते हैं। इसी प्रकार आपने अपने एक नवगीत में 'बरसाने की होली' का सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है— "दिखे अनौखी आभा आली/ बरसाने की होली में।/ बजे नगाड़े ढम-ढम-ढम-ढम/ चूड़ी खनके, पायल छम-छम/ भँजीं पीठ पर नेह-लाठियाँ/ उड़े गुलाल चमक चम-चम-चम/ ब्रजवासिन की सुनें गालियाँ/ ब्रज की मीठी बोली में” ('एक अकेला पहिया', पृ. 103)

आपने अपने नवगीत 'अपनी धरती वृन्दावन' में वृन्दावन की कुंज-गलियों को रेखांकित करते हुए माखनचोर गोपाल की लीलाओं में रमने वाले ब्रजवासियों तथा रसिक-जनों के प्रेम-भाव को दर्शाया है। वृंदावन की धरती राग (संगीत), रंग (सुंदरता), रस (आनंद) और गंध (पवित्रता) से भरपूर है। यहाँ सुबह होते ही मंदिर जीवंत हो जाते हैं, दीप जलाए जाते हैं, और पूजा-अर्चना की जाती है, ब्रजवासी और भक्तजन 'राधे-राधे' कहकर एक-दूसरे का अभिनन्दन करते हैं, साँस-साँस  में कृष्ण की चेतना विद्यमान है और भजन की धुनें अंदर और बाहर दोनों ओर गूंजती हैं—

राग, रंग, रस, गंधमयी है

अपनी धरती वृंदावन

 

सुबह हुई तो मंदिर जागे

दीप-दान, पूजा, अर्चन

राधे-राधे कह सब करते

इक-दूजे का अभिवादन

 

साँस-साँस में कृष्ण-चेतना 

भीतर-बाहर चले भजन। ('एक अकेला पहिया', पृ. 107)

इसी प्रकार 'कहाँ मिलोगे' शीर्षक नवगीत में आपने उस वंशीवाले को ढूंढने की ललक प्रस्तुत की है। आप उसे ढूंढ रहे हैं— कभी वृंदावन में तो कभी यमुना के जल में और चाहते हैं कि वह बांसुरीवाला आपके अंतर में रहे और आपको इसकी अनुभूति होती रहे। आपके शब्दों में—

 

वंशीवाले, कहाँ मिलोगे,

क्या तुम वृन्दावन में?

 

तुम परिपूर्ण, प्राप्य तुम हो,

तुम पर कलम चलाऊँ

शब्द-शब्द को गूंथ-गूंथ कर

गीत तिहारे गाऊँ

 

बंद आँख खुल जाए, देखूँ—  

तुमको ही कण-कण में। ('एक अकेला पहिया', पृ. 111-112)

इसी रचना के साथ आपने अपने नवगीत संग्रह— 'एक अकेला पहिया' का सुंदर समापन किया है। यह मानना पड़ेगा कि इस संग्रह में परिवार से लेकर समाज, प्रेम से लेकर ईश्वर-भक्ति तक, जीवन और संसार के अनेक पहलुओं को आपने नवगीत की सीमित परिधि में अत्यंत कुशलता से समेटा और सजीव किया है। आपकी भाषा न केवल सरल और सुबोध है, बल्कि उसमें लचीलापन भी है। लयात्मकता को बनाये रखते हुए देशज और विदेशी शब्दों का आपने बहुत ही सटीक और सुसंगत प्रयोग किया है। इसमें आलंकारिकता का कोई अभाव नहीं है। यह संग्रह सहज ही पाठकों को प्रभावित करने में सक्षम हैं। नवगीत विधा में आपकी कलम इसी प्रकार से नई-नई रचनाएँ प्रस्तुत करती रहे और आपकी रचनात्मकता इस विधा को निरंतर समृद्ध करती रहे।





समीक्षक के बारे में :
 :  
चर्चित लेखिका डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी वर्तमान में गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज, कोलकाता में एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (हिंदी) पद पर कार्यरत हैं। 

Ek Akela Pahiya (Hindi Navgeet).  Book Review by Dr Reshmi Panda Mukharjee