पूर्वाभास (www.poorvabhas.in) पर आपका हार्दिक स्वागत है। 11 अक्टूबर 2010 को वरद चतुर्थी/ ललित पंचमी की पावन तिथि पर साहित्य, कला एवं संस्कृति की पत्रिका— पूर्वाभास की यात्रा इंटरनेट पर प्रारम्भ हुई थी। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।
आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 2 नवंबर 2026

“अरे! बुद्धिजीवी” : एक समकालीन समीक्षात्मक दृष्टि — अवनीश सिंह चौहान

राम नारायण रमण

“अरे! बुद्धिजीवी”  

अरे! बुद्धिजीवी
भारत के कहाँ गये?
सच को सच कहने की
सारी हिम्मत टूट गई।

कविगण, लेखक वृन्द
और सब
कलाकार हैं मौन,
बस! दो-चार नाम
बलिदानी,
और बचा है कौन?

निरे गंवार
प्रतिष्ठित होते चले गये
छले गये जनसाधारण की
किस्मत फूट गई।

न्याय भागकर जान
के लिए
छिपता फिरता है,
अन्यायी का
राज तिलक
सिंहासन करता है।

तानाशाही के कारण
बर्बादी, बेचैनी
कुर्बानी से हासिल
वह आजादी छूट गई।

खून माँगती है
धरती
इतिहास खोलकर देख,
कभी नहीं मिटते
हैं बंदे
यह खूनी अभिलेख।

निरे स्वार्थ से
कोई जीत नहीं होती
हमको तुमको नंगी-सी
बेमानी लूट गई।

-- राम नारायण रमण

जाने-माने साहित्यकार राम नारायण रमण जी का प्रस्तुत नवगीत “अरे! बुद्धिजीवी” अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं, बौद्धिक निष्क्रियता और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति सजग चिंता व्यक्त करता है। रचना का मूल स्वर प्रतिरोध का है, किंतु उसके भीतर जनसरोकार, नैतिक बेचैनी और इतिहास-बोध की गहरी संवेदना भी प्रवाहित होती है। कवि का केंद्रीय प्रश्न बुद्धिजीवी वर्ग की सामाजिक भूमिका को लेकर है—जब समय सत्य के पक्ष में खड़े होने की माँग करता है, तब विवेकशील समाज की आवाज इतनी क्षीण क्यों दिखाई देती है?

गीत का आरंभ— “अरे! बुद्धिजीवी / भारत के कहाँ गये? / सच को सच कहने की / सारी हिम्मत टूट गई”—तत्काल पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचता है। ‘अरे!’ का संबोधन रचना को संवादधर्मी और आत्मीय बनाता है, जबकि ‘बुद्धिजीवी’ यहाँ केवल शिक्षित वर्ग का संकेत न रहकर विवेक, सत्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक बन जाता है। ‘सच को सच कहने’ की हिम्मत का टूटना उस नैतिक साहस के संकट की ओर संकेत करता है, जो किसी भी स्वस्थ समाज की आधारभूमि होता है।

इसी भावधारा का विस्तार “कविगण, लेखक वृन्द / और सब / कलाकार हैं मौन” में मिलता है। कवि साहित्य और कला को केवल सौंदर्य-सृजन का माध्यम न मानकर सामाजिक चेतना का प्रहरी भी मानता है। “बस! दो-चार नाम / बलिदानी, / और बचा है कौन?” में प्रतिरोध की विरलता के प्रति कवि की व्यथा मुखर होती है। यह प्रश्न रचना को व्यक्तिगत शिकायत से ऊपर उठाकर व्यापक सामाजिक आत्ममंथन का रूप देता है। कथन की यह सीधी और स्पष्ट शैली नवगीत को जन-संवाद के निकट ले आती है।

“निरे गंवार / प्रतिष्ठित होते चले गये / छले गये जनसाधारण की / किस्मत फूट गई” में सामाजिक विडंबना और जनपीड़ा साथ-साथ उपस्थित हैं। यहाँ कवि उस स्थिति की ओर संकेत करते हैं जहाँ विवेक, योग्यता और जनहित की अपेक्षा बाहरी प्रतिष्ठा और प्रभाव को महत्व मिलने लगता है। इसके प्रतिफलस्वरूप जनसाधारण के छले जाने की अनुभूति सामने आती है। इन पंक्तियों में व्यंग्य के साथ आम आदमी के प्रति कवि की आत्मीय संवेदना भी स्पष्ट होती है।

गीत का एक अत्यंत सशक्त बिंब “न्याय भागकर जान / के लिए / छिपता फिरता है” में उभरता है। न्याय का मानवीकरण इसे जीवंत और प्रभावशाली बना देता है। इसके साथ “अन्यायी का / राज तिलक / सिंहासन करता है” व्यवस्था की उलटबाँसी को तीखे रूपक में व्यक्त करता है। न्याय का भयभीत होकर छिपना और अन्याय का प्रतिष्ठित होना एक ऐसी विडंबनापूर्ण स्थिति रचता है, जो पाठक को गहरे आत्ममंथन की ओर ले जाती है।

“तानाशाही के कारण / बर्बादी, बेचैनी / कुर्बानी से हासिल / वह आजादी छूट गई” में वर्तमान की बेचैनी इतिहास की स्मृति से जुड़ जाती है। ‘आजादी’ यहाँ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का बोध नहीं कराती, बल्कि उन लोकतांत्रिक, मानवीय और नैतिक मूल्यों का भी प्रतीक बनती है जिन्हें असंख्य बलिदानों से अर्जित किया गया। इस प्रकार कवि स्वतंत्रता को एक जीवित मूल्य के रूप में देखता है, जिसकी रक्षा निरंतर सामाजिक जागरूकता से ही संभव है।

अंतिम अंतरे में “खून माँगती है / धरती / इतिहास खोलकर देख” जैसी पंक्तियाँ रचना के चेतावनीपूर्ण स्वर को और गहरा करती हैं। इसके बाद प्रयुक्त “खूनी अभिलेख” का बिंब विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इतिहास यहाँ महज बीती घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक जीवंत साक्ष्य बन जाता है। संघर्ष, अत्याचार और बलिदान की स्मृतियाँ मिटती नहीं—यह भाव पाठक को इतिहास के प्रति सजग रहने और उससे सीख लेने की प्रेरणा देता है।

समापन में “निरे स्वार्थ से / कोई जीत नहीं होती” गीत की वैचारिक परिणति के रूप में सामने आता है। कवि स्वार्थ को किसी स्थायी विजय का आधार नहीं मानता और सामूहिक मूल्यों के क्षरण को व्यापक मानवीय क्षति के रूप में देखता है। “हमको तुमको नंगी-सी / बेमानी लूट गई” में ‘लूट’ का भाव केवल भौतिक क्षति तक सीमित न रहकर उन साझा मूल्यों और विश्वासों के क्षरण तक विस्तृत हो जाता है, जो समाज को भीतर से जोड़ते हैं। अंतिम बिंब की अर्थ-व्यंजना अपेक्षाकृत खुली है, जिससे पाठक उसे अपनी संवेदना और संदर्भ के अनुसार ग्रहण कर सकता है।

भाषा की दृष्टि से यह नवगीत सरल, सहज, जनोन्मुख और संवादपरक है। कवि ने अनावश्यक शब्दाडंबर से बचते हुए ‘बुद्धिजीवी’, ‘सच’, ‘न्याय’, ‘आजादी’, ‘तानाशाही’ और ‘स्वार्थ’ जैसे प्रचलित शब्दों को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की है। प्रश्नवाचकता, संबोधन, व्यंग्य, मानवीकरण और बिंब-विधान इसके प्रमुख शिल्पगत आधार हैं। विशेषतः “न्याय भागकर…”, “आजादी छूट गई” और “खूनी अभिलेख” जैसी अभिव्यक्तियाँ गीत की स्मृति में देर तक बनी रहती हैं। कहीं-कहीं कथन की प्रत्यक्षता विचार को काव्य-संकेत से अधिक प्रमुख बना देती है, किंतु नवगीत की जनपक्षधर और संवादधर्मी प्रकृति में यही स्पष्टता इसकी संप्रेषणीयता को सुदृढ़ करती है।

समग्रतः “अरे! बुद्धिजीवी” एक जागरूक, प्रतिबद्ध और समय-सापेक्ष नवगीत है, जिसमें कवि ने अपने समय की विडंबनाओं को केवल दर्ज नहीं किया, बल्कि उनके प्रति प्रतिरोध और आत्ममंथन की चेतना भी जगाई है। इसकी प्रमुख शक्ति इसके जनसरोकार, नैतिक आग्रह, इतिहास-बोध, तीखे व्यंग्य और सहज अभिव्यक्ति में निहित है। रचना पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि साहित्य, कला और बुद्धि की सार्थकता केवल सृजन में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सत्य के पक्ष में खड़े होने में भी है। इसी चेतना के कारण यह नवगीत अपने समय से संवाद करता हुआ एक सार्थक और प्रासंगिक साहित्यिक हस्तक्षेप बन जाता है।

लेखक के बारे में :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात करने वाले डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून 1979) हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक एवं संपादक हैं। वे ‘पूर्वाभास’ और ‘क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म’ के संपादक तथा आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत ‘नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति’ के मास्टर ट्रेनर भी हैं।


शनिवार, 20 सितंबर 2025

वीरेंद्र आस्तिक : गतिशील जीवन का निर्मल झरना — अवनीश सिंह चौहान


पिछले दिनों डाक से दो महत्त्वपूर्ण नवगीत-संग्रह— ‘आनंद! तेरी हार है’ और ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ प्राप्त हुए। दोनों ही संग्रह हिंदी काव्य-जगत के चर्चित कवि, आलोचक और संपादक श्रद्धेय श्री वीरेंद्र आस्तिक जी की सृजन-यात्रा के उज्ज्वल उदाहरण हैं।

‘आनंद तेरी हार है’ का प्रथम संस्करण सन् 1987 में प्रकाशित हुआ था, जबकि इसका द्वितीय संस्करण सन् 2024 में ‘भारतीय साहित्य संग्रह’ (www.pustak.org), कानपुर, उत्तर प्रदेश से सजिल्द रूप में प्रकाशित हुआ। इसी प्रकार ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ का प्रथम संस्करण सन् 2002 में आया और इसका द्वितीय संस्करण सन् 2025 में ‘भारतीय साहित्य संग्रह’ द्वारा प्रकाशित किया गया है। आस्तिक जी की अब तक लगभग एक दर्जन कृतियाँ (नवगीत, आलोचना एवं संपादन) प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन पर दो स्वतंत्र आलोचना-ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। साहित्य-साधना के प्रति उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा ‘साहित्य भूषण’ सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।


आस्तिक जी का नाम हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में शुमार है, जिन्होंने नवगीत को नई दिशा दी है। उनकी काव्य-साधना (आलोचना और सम्पादन कार्य भी) मानवीय संवेदनाओं की गहन अभिव्यक्ति है। शायद यही कारण है कि उनका हृदय आज के यांत्रिक, व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन से बार-बार आहत हो उठता है। कई लोग जहाँ इस कटु सत्य से आँखें मूँद लेना ही उपयुक्त समझते हैं, वहीं आस्तिक जी उसे पूरे साहस और ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं। यही निष्ठा और स्पष्ट दृष्टि उनकी रचनाओं को मानवीय गहराई तथा वैचारिक ऊँचाई प्रदान करती है, जिससे वे केवल काव्य न रहकर, जीवन-दर्शन का सजीव दस्तावेज़ बन जाती हैं।

आस्तिक जी का काव्य-संग्रह ‘आनंद तेरी हार है’ जीवन-संघर्ष की वीणा से उपजा वह शुद्ध स्वर है, जिसमें पीड़ा की गहराइयों के बीच भी उल्लास और विस्मय के सुर गूंजते हैं। इस संग्रह की रचनाएँ अपनी सहजता, गेयता और भाव-संपन्नता के कारण पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करती हैं। इनको निरखने-परखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो कवि ने अनकहे सत्य को शब्दों का जामा पहनाकर उसमें साँसों की गर्माहट भर दी हो।

आस्तिक जी की सृजन-यात्रा का अगला सोपान है— ‘आकाश तो जीने नहीं देता’। इस संग्रह में उन्होंने संवेदना की एक नई भाषा गढ़ी है, जो उनकी काव्य-दृष्टि की परिपक्वता का प्रमाण प्रस्तुत करती है। इसमें जीवन की लय को तलाशते हुए उसके कैनवास को व्यापक बनाने की गहन इच्छा स्पष्ट रूप से झलकती है। यही कारण है कि इसे आस्तिक जी की सर्जना का एक महत्त्वपूर्ण तथा उपलब्धिमय चरण माना जा सकता है।

आस्तिक जी की रचनाएँ उस प्रचलित धारणा को चुनौती देती हैं कि गीत और कविता को अलग-अलग खाँचों में बाँटा जा सकता है। उनके नवगीतों में लयात्मकता के साथ-साथ गहन विचार और संवेदनाओं का अद्वितीय संगम स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इनमें नवीन शिल्प और ताजगीपूर्ण बिम्बों की सशक्त उपस्थिति पाठक को सहज ही प्रभावित करती है। ये रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि सच्चा काव्य किसी ‘कॉपी, कट, पेस्ट’ जैसी यांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि जीवन के प्रामाणिक और गहन अनुभवों की कोख से जन्म लेता है।

इन दिनों श्रद्धेय आस्तिक जी अत्यंत अस्वस्थ हैं। उनके शीघ्र एवं पूर्ण स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हुए, यहाँ उनकी एक रचना (संग्रह: ‘आकाश तो जीने नहीं देता’, पृष्ठ 107) प्रस्तुत की जा रही है :

चलो आज यों ही चलते हैं
राह जहाँ तक ले जाए

छोड़ कलुष के ये गलियारे
बैठेंगे उस नदी किनारे
बूँद-बूँद घुल-घुल जाने को
रह-रह मझधार बुलाए

चाहों की कोई जात न हो
बीती बातों पर बात न हो
पीछे छूट गए उन अंधे
महलों से जी घबराए

देखो, इस बरगद को क्षण भर
इसकी खामोशी में रहकर
कोई कोयल हममें–तुममें
कुहू–कुहू करती आए।

इस गीत में प्रस्तुत की जा रही प्रेम-चेतना जीवन का अमृत-तत्व है। इसमें प्रेम-चेतना का अमानवीय जड़ताओं से मोहभंग और प्रेम की मार्मिक छुअन, जो स्वाभाविक कथा-दृश्यों द्वारा अनुभूत हुई है, अद्वितीय है।

कुल मिलाकर, आस्तिक जी का काव्य किसी क्षणिक उत्तेजना का परिणाम नहीं है, बल्कि साहित्य को समृद्ध करने वाला गतिशील जीवन का निर्मल झरना है, जो विवेक की धरा पर अनवरत बहते हुए पाठकों को प्रेरणा प्रदान करता है।


लेखक के बारे में :
डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) वृंदावन के द्विभाषी साहित्यकार और आभासी दुनिया  में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। ‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को जीवन में आत्मसात करने वाले डॉ. चौहान वर्तमान में बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के बीआईयू कालेज ऑफ ह्यूमेनिटीज़ एंड जर्नलिज्म में आचार्य और प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

Veerendra Aastik: Gatisheel Jeevan ka Nirmal Jharna — Abnish Singh Chauhan

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023

फ्लैप : वीरेन्द्र आस्तिक : गीतधर्मिता और जीवनराग — अवनीश सिंह चौहान

कृति : वीरेन्द्र आस्तिक : गीतधर्मिता और जीवनराग
लेखक : डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी
प्रकाशन वर्ष : 2023 
पृष्ठ : 160 मूल्य : रु. 400/-
ISBN : 978-1-61301-757-9 
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह, कानपुर (उ.प्र.)


नवीन शिक्षा पद्धति एवं शैक्षिक अनुसंधान को केंद्र में रखकर कार्य करने वाली डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी हिंदी आलोचना की समर्पित लेखिका हैं। पेशे से सह-आचार्य (हिंदी), बंगाली मूल की समझदार एवं संवेदनशील शब्द-यात्री डॉ मुखर्जी ने हिंदी आलोचना की आधुनिक चिंतनधारा को आत्मसात कर विभिन्न साहित्यिक विधाओं का आकलन-मूल्यांकन बड़ी गंभीरता से किया है। डॉ मुखर्जी हिंदी आलोचना के साथ अनुवाद एवं सर्जनात्मक लेखन में भी सक्रिय हैं। इन्होंने अब तक लगभग एक दर्जन पुस्तकों एवं कई दर्जन शोध-पत्र व समीक्षात्मक लेखों का सृजन किया है। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की अनेकशः संगोष्ठियों में सार्थक सहभागिता की है। कोलकाता जैसे बंगाली भाषी व्यस्त शहर में रहकर इनके द्वारा हिंदी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में निष्पक्षता, तटस्थता एवं पूर्वाग्रह-रहित होकर कार्य करना निश्चय ही श्लाघनीय है।

डॉ मुखर्जी मूल रूप से कवि के चिंतन से जुड़े विभिन्न आयामों को रेखांकित करने वाली शिक्षिका हैं। इसलिए इन्होंने "वीरेन्द्र आस्तिक : गीतधर्मिता और जीवनराग" पुस्तक में कवि  की रसमयी गीत-यात्रा में आये विभिन्न पड़ावों को जानने-समझने की भरपूर कोशिश की है। अपनी इस कोशिश में इन्होंने कवि की जीवन शैली एवं रचना प्रक्रिया को केंद्र में रखकर उसकी काव्यकृतियों का गहन और गंभीर अध्ययन एवं विश्लेषण किया और इस निष्कर्ष पर पहुँची कि कवि का जीवन-दर्शन एवं काव्य-दृष्टि बड़ी व्यापक है, कारण कि इसमें सवेदनात्मक आवेग से परिपूर्ण यथार्थ को प्रकट कर सामंजस्यपूर्ण समाज की स्थापना का लक्ष्य विद्यमान है।



लेखक : 
'वंदे ब्रज वसुंधरा' सूक्ति को आत्मसात कर जीवन जीने वाले वृंदावनवासी डॉ अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) का नाम वेब पर हिंदी नवगीत की स्थापना करने वालों में शुमार है। वर्तमान में वे बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के मानविकी एवं पत्रकारिता महाविद्यालय में प्रोफेसर और प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

Virendra Astik: Geetdharmita aur Jivanraag by Dr Reshmi Panda Mukherji

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

अनाहत शब्द और जीवन-मूल्यों के कवि : त्रिलोचन — भैरव सिंह


शोध आलेख : पूर्वाभास, वर्ष 1, अंक 1, जनवरी 2022

आधुनिक हिन्दी कविता में त्रिलोचन एक प्रगतिशील कवि के रूप में विख्यात हैं । प्रगतिशील कवि महान मानवीय मूल्यों और मनुष्यता की खोज का कवि होता है । मनुष्य की ‘जययात्रा’ को सफल और सार्थक बनाने के लिए जितने भी तत्व आवश्यक होते हैं, वह सब उसकी कविताओं में निहित होते हैं । मसलन प्रेम, करुणा, संघर्ष, श्रम, साहस, आस्था, सौंदर्य, प्रकृति, मनुष्यता, सत्य, न्याय, जिजीविषा आदि । इन मूल्यों को वह मानव-जीवन व समाज में वैसे ही रोपने की कोशिश करता है, जैसे एक किसान अपने खेतों में बड़े ही संयमित और सधे रूप में धान की रोपाई करता चलता है । प्रगतिशील कवि रचनाकर्म को एक गंभीर सामाजिक दायित्व के रूप में लेता है । कविता उसके लिए केवल आत्मशोध या आत्मतुष्टि (आनंद) का माध्यम मात्र नहीं होती, बल्कि जीवन को रचने और सँवारने का पर्याय बन जाती है । केदार ने लिखा – ‘कि जब मरूँ संसार को संवारते-संवारते मरूँ, संवारने का सुख भोगते-भोगते मरूँ ।’ उसकी चिंता का केंद्र ‘कविता’ नहीं बल्कि ‘जीवन’ है – ‘धूप सुंदर/ धूप में जग रूप सुंदर/ ....सोचता हूँ क्या कभी/ मैं पा सकूँगा/ इस तरह/ इतना तरंगी/ और निर्मल/ आदमी का रूप सुंदर ।’1 ‘शब्द साधना’ उसके लिए कवि-व्यक्तित्व और कविता को चमकाने का कारण नहीं बल्कि जीवन से कुछ बेहतरीन खोज लेने, पाने और फिर उसे बाँट देने के लिए है । लेकिन लेन-देन की यह प्रक्रिया तभी सफल और सार्थक होगी जब रचनाकार का ‘लोकजीवन से गहरा जुड़ाव’ होगा । अन्यथा नहीं । यह जुड़ाव ही उसके भीतर की जड़ता, निराशा, कुंठा आदि को समाप्त कर उसे नई आशा, दृढ़ संकल्प, साहस और ओज से भरकर जीवन व संसार को नए सिरे से बदलने की इस सांस्कृतिक प्रक्रिया के लिए उत्साहित और प्रेरित करती है । त्रिलोचन ने रचनाकर्म के इस मूलमंत्र को जान लिया था – ‘मुझमें जीवन की लय जागी/ मैं धरती का हूँ अनुरागी/ जड़ीभूत करती थी मुझको/ वह संपूर्ण निराशा त्यागी/ मैं निर्भय संघर्ष-निरत हो/ बदल रहा संसार तुम्हारा ।’2 प्रगतिशील कवि और उसकी कविता की यह अपनी विशेषता है कि आप उसे जहाँ से भी टटोलने या पकड़ने की कोशिश करें एक चीज जो आपको समान रूप से सर्वत्र मिलेगी वह है – जीवन के प्रति उसका झुकाव । यह झुकाव ही उसे सहजता की उस भूमि पर ले जाता है जहाँ उसका सृजनकर्म ‘जीवन सौंदर्य’ का कारण बन जाता है ।

नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की त्रयी हिन्दी में प्रगतिशील कविता की धुरी मानी जाती हैं । रचनात्मक उद्देश्य की एकता होने के बावजूद यहाँ ‘हर एक का अपना अनुभव है, अपनी दृष्टि है और अपना मत’ है । नागार्जुन और केदार की कविताओं का स्वर बहुत कुछ एक-सा है, लेकिन त्रिलोचन के यहाँ जीवन के धूप-छांही झिलमिल की आभा और उसको अभिव्यक्त करने का ढंग तनिक जुदा है । प्रगतिशील कविता की यथार्थवादी धारा के विकास में त्रिलोचन की अलग भूमिका पर विचार करते हुए मैनेजर पांडे ने लिखा – “त्रिलोचन का यथार्थवाद दूसरे कवियों के यथार्थवाद से कुछ अलग है । उसमें न कहीं भावुकता है, न झूठा आशावाद; न काल्पनिक संघर्षों के अमूर्त्त चित्र हैं, न मारो-मारो, काटो-काटो की ललकार है । वहाँ जनशक्ति में आस्था है, संघर्ष के लिए आव्हान है, मुक्ति आंदोलन के गीत भी हैं, लेकिन यह चेतावनी है कि – ‘सोच समझकर चलना होगा ।’ उनकी कविता का मुख्य स्वर यह है – ‘भाव उन्हीं का सबका है जो थे अभावमय/ पर अभाव से दबे नहीं, जागे स्वभावमय ।’ जो लोग जन जीवन की कविता में केवल आशा और उल्लास देखना चाहते हैं, उनको लक्ष्य करके त्रिलोचन ने लिखा – ‘अगर न हो हरियाली/ कहाँ दिखा सकता हूँ? फिर आँखों पर मेरी चश्मा हरा नहीं है । यह नवीन ऐयारी/ मुझे पसंद नहीं है/ जो इसकी तैयारी करते हों वे करें/ अगर कोठरी अंधेरी है तो उसे अंधेरी समझने-कहने का मुझको है अधिकार ।’3 अगर जनता के जीवन में संघर्ष और दुःख है तो उस वास्तविकता को झुठलाना गलत है । लेकिन वह यह भी जानते हैं कि ‘दुख के तम में जीवन-ज्योति जला करती है ’। वे किसान-जीवन की करुण कहानी नहीं कहते, उसके स्वाभिमान की रक्षा को महत्व देते हैं। उनकी कविता में किसान-जीवन का यथार्थ सच्चे और खरे रूप में है; न वह भावुकता के उच्छ्वास में डूबा है, न विचारधारा के आग्रह से ढँका है। त्रिलोचन इसी सजग किसान-दृष्टि से समाज, प्रकृति और विश्व को देखते हैं।”

त्रिलोचन की कविताओं में जीवन की वास्तविकताएँ बड़े ही सहज रूप में सामने आती हैं । जीवन का सहज, स्वभाविक, शांत किन्तु गतिशील चित्र बिना किसी तामझाम और शोर-शराबे के । जीवन के यही शांत, सहज, स्वभाविक चित्र उनकी कविताओं में सौंदर्य का आधार बनते हैं । कुछ-एक कविताओं को उदाहरण स्वरूप देख लें । ‘धरती’ संग्रह में संकलित उनकी एक प्रसिद्ध कविता है – ‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती ।’ चम्पा सुंदर ग्वाला की अच्छी, चंचल, उधम मचानेवाली लड़की है, जो पढ़ने-लिखने की उम्र में चौपायों को लेकर चरवाही करने जाती है । कवि उसे यह सीख देता है कि – ‘तुम भी पढ़ लो/ हारे-गाढ़े काम सरेगा ।’ गांधी जी की भी यही इच्छा है कि – ‘सब जन पढ़ना-लिखना सीखें ।’ जीवन में पढ़ने-लिखने के महत्व को समझाते हुए कवि चम्पा से कहता है – ‘पढ़ लेना अच्छा है/ ब्याह तुम्हारा होगा, तुम गौने जाओगी/ कुछ दिन बालम संग-साथ रह चला जाएगा जब कलकत्ता/ कैसे उसे सँदेसा दोगी/ कैसे उसके पत्र पढ़ोगी ।’ गाँव की यह चंचला जिस निपट गंवई सयानेपन के साथ कवि को जवाब देती है, वह हमें कई दृष्टिकोण से सोचने व समझने को विवश करता है – ‘तुम कितने झूठे हो, देखा,/ हाय राम; तुम पढ़-लिखकर इतने झूठे हो/ मैं तो ब्याह कभी न करूँगी/ और कहीं जो ब्याह हो गया/ तो मैं अपने बालम को संग-साथ रखूँगी/ कलकत्ता मैं कभी न जाने दूँगी/ कलकत्ता पर बजर गिरे ।’4 यहाँ दो पंक्तियाँ गौर करने लायक है । पहली ‘तुम पढ़-लिखकर इतने झूठे हो ।’ यह पंक्ति पढ़े-लिखे समाज पर कटाक्ष है, जिसकी जीवन शैली सहज, स्वभाविक न होकर दिखावे और जटिलता की ओर बढ़ती जा रही है । आवश्यकता से अधिक समझदारी, धूर्तता कहलाती है । गंवई समाज में अक्षर ज्ञान से ज्यादा जीवन से प्राप्त अनुभव का ज्ञान बोलता है । इसी अनुभव के आधार पर चम्पा कहती है – ‘कलकत्ता पर बजर गिरे ।’ यह पंक्ति हमारे मन में कई सवाल पैदा करती है । मसलन चाम्पा क्यों कहती है कि कलकत्ते पर बजर गिरे? क्यों वह विवाह के बाद गाँव में ही अपने बालम के साथ सुखमय वैवाहिक जीवन को नहीं जी सकती? क्यों उसका बालम कलकत्ते जाने को विवश है? इन सारे सवालों का एक ही जवाब है – ‘पूंजी’ । आज के पूंजीवादी समाज में ‘पूंजी’ ही सुखमय जीवन का आधार है । लेकिन पूंजी के स्रोत का आधारभूत ढाँचा गंवई जीवन से बहुत दूर शहरों में विकसित होता जा रहा है । आजादी के बाद जितना विकास शहरों में दिखाई पड़ता है उतना गाँवों में नहीं । इसीलिए उत्तर भारत के अधिकतर परिवारों में युवा अपना घर-परिवार छोड़कर बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए शहर की तरफ भागता है और न जाने कितनी चंपाओं को अकेले ही गाँवों में गुजर बसर करना होता है । यह कविता ‘पूंजी के विरुद्ध प्रेम के प्रतिरोध’ की कविता है ।

त्रिलोचन की ऐसी ही एक कविता है – ‘परदेशी के नाम पत्र’, जिसमें आर्थिक तंगी की वजह से गाँव का खेतिहर शहर जाकर मेहनत-मजदूरी करता है और उसकी पत्नी गांव में अकेले रह जाती है । पति और पत्नी दोनों की जीवनदशा और मनोदशा का बड़ा ही सटीक चित्रण त्रिलोचन ने इस कविता में किया है । लंबे समय तक पति की कोई खबर न मिलने पर पत्नी घर का हालचाल बताती हुई शिकायत भरे लहजे में पति को पत्र में लिखती है – ‘और वह बछिया कोराती है/ यहाँ जो तुम होते/ देखो कब ब्याती है ।/ ....तुम्हें गाँव की क्या कभी याद नहीं आती है/ आती तो आ जाते/ मुझको विश्वास है/ थोड़ा लिखा समझना बहुत,/ समझदार के लिए इशारा ही काफी है।’ पति पत्र के जवाब में लिखता है – ‘सचमुच इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई/ झूठ क्या कहूँ/ पूरे दिन मशीन पर खटना/ बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई/ का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना/ इस-उस पर मन दौड़ाना, फिर उठकर रोटी करना, कभी नमक से कभी साग से खाना/ ...धीरज धरो आज कल करते तब आऊँगा/ जब देखूंगा अपना घर कुछ कर पाऊँगा ।’5 यह कवि कल्पना नहीं बल्कि खेतिहर-मजदूरों के जीवन की वह त्रासद सच्चाई है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता । जीवन के इस कठिन रूप को जिस कुशलता से चित्रित किया गया है, वह यथार्थवादी कला की देन है । ऐसी त्रासद जीवन-स्थितियों से गहरा परिचय होने के कारण ही कवि पूछ बैठता है – ‘हाथों के दिन कब आएँगे/ कब तक आएँगे, यह कोई नहीं बतलाता’ 

‘धरती’ संग्रह में एक कविता है – ‘भोरई केवट के घर’ । भोरई जिस गाँव का निवासी है वह रेल-तार से बहुत दूर है । अनपढ़ देहाती होने के नाते ‘राष्ट्रों के स्वार्थ और कूटनीति, पूंजीपतियों की चालें’ वह नहीं समझ पाता लेकिन जीवन के अनुभव से उसने इतना अवश्य जान लिया है कि जिस ‘महँगाई’ ने उसका जीवन तबाह कर दिया उसका कारण है ‘लड़ाई’ यानी दूसरा विश्वयुद्ध । वह कहता है – ‘बाबू, इस महंगी के मारे किसी तरह अब तो/ और नहीं जिया जाता/ और कब तक चलेगी लड़ाई यह ।’6 

त्रिलोचन के काव्य-संसार में हमें भोरई केवट, चम्पा, नगई, महरा, लखमनी, भिखरिया जैसे ग्रामीण परिवेश से संबंधित चरित्रों की सृष्टि ही अधिक मिलती है । इन चरित्रों को माध्यम बनाकर कवि ‘ठोस अनुभवों की उस दुनिया’ से हमारा परिचय कराता है जैसा ‘प्रेमचंद के कथा-साहित्य’ में मिलता है । त्रिलोचन की कविता के केंद्र में वह मनुष्य है – जिनकी साँसों को आराम नहीं, जिन्होंने सारा जीवन समाज की कल्मष धोने में लगा दिया और जो अपने जीवन की बाजी लगाकर आगामी मनुष्यता का पथ तैयार करने को तत्पर हैं । लेकिन जब यही मनुष्य शासन व सत्ता द्वारा छला जाता है, देश के नेताओं व नौकरशाहों के द्वारा पूंजीपतियों के शोषण का माध्यम-मात्र बना दिया जाता है तब उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए कवि को आवाज उठानी ही पड़ती है । प्रगतिशील कवि जीवन के इस लड़ाई को कविताओं में लड़ता है । क्योंकि उसके लिए कविता जीवन से अलग या ऊपर की चीज नहीं है । कविता की सार्थकता जीवन की सार्थकता से जुड़ने में ही है । 

देश के लाखों-करोड़ों लोगों ने एक साथ मिलकर ‘आजाद भारत’ के सपनों की लड़ाई लड़ी । देश आजाद भी हुआ । लेकिन इस आजाद भारत में नगई महरा, भोरई केवट, चम्पा, अवतरिया, भिखरिया, लखमनी जैसे न जाने कितने लोग हैं जिनके सपनों को आज तक उड़ान नहीं मिली । देश के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक के चुनाव के मूलभूत मुद्दों (रोटी, कपड़ा, मकान, बेरोजगारी) में कोई बदलाव नहीं आया है । जियावन ने चुनाव में नेहरू जी को बोलते हुए सुना था – ‘रोटी कपड़ा सबको किसी तरह देना है/ नाव पड़ी है लहरों में, उसको खेना है/ सब कुछ नया करेंगे/ यह खाली भंडार भरेंगे, विपद हरेंगे ।’ लेकिन हुआ क्या – ‘वे नेहरू जो अपनों को भरते हैं गिन गिन ।’ कथनी और करनी का यह फर्क जियावन में यह विश्वास पैदा करता है कि – ‘पंख लगाकर कौवा फिर मोर न होगा ।’ भोली-भाली जनता को देश के नेताओं ने बड़े-बड़े सपने दिखाए, झूठे वादे किए और जनता इनकी सारी करतूतों की मूक दर्शक बन बैठी – ‘जिसने भोगा है वह तो गूंगी जनता है जिसे जवाहर/ जय प्रकाश गोलवलकर फुसलाया करते हैं/ स्वर्ग तुम्हें हम दिखलाएंगे ।’7 आजाद भारत में गांधी ने रामराज्य का सपना लोगों के सामने रखा । भारत के आम लोगों के लिए रामराज्य आया की नहीं यह तो पता नहीं लेकिन देश के नेताओं, पूंजीपतियों और नौकरशाहों के लिए अवश्य ही रामराज यहाँ स्थापित हो गया । रामराज्य की असल तस्वीर को दिखलाते हुए त्रिलोचन ने लिखा – ‘भीषण कमी अन्न की, बलात्कार की अनुदिन/ बढ़ने वाली गाथाएँ, हत्याएँ, डाके/ चोरी, रिश्वतखोरी, कोई बुरा न ताके/ रामराज्य है ।’ इस व्यवस्था में – ‘अच्छाई इन दिनों बुराई के घर पानी/ भरती है, क्या ठाट बुराई ने बाँधे हैं/ बड़े बड़े अड़ियल भी हार गए.... कहीं किसी ने भौंहें तानी/ उसको निबटाया ।’8 इसीलिए केदार ने लिखा – ‘आग लगे इस रामराज में ।’ 

त्रिलोचन के कवि-व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है – उसका सधा-संयमित स्वर । कवि प्रायः उद्विग्न नहीं होता । वह चाहे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक विद्रूपताओं पर व्यंग्य कर रहा हो, चाहे अपनी देखी-भोगी गरीबी का बयान कर रहा हो अथवा मुक्ति का आह्वान, कहीं भी तीव्र भावाकुल आवेग, प्रहार या ललकार की मुद्रा नहीं अपनाता । आवेगों की राग तनी रहती है, वह उन्हें उन्मुक्त नहीं छोड़ता । दरअसल त्रिलोचन घटनाओं के प्रभाव में आकर तीव्र आवेगों की तुरत प्रतिक्रिया करने वाले कवियों में नहीं हैं, बल्कि उन घटनाओं के मूल में स्थित जीवन-संवेगों के स्थिर आवेगों के कवि हैं । यही वजह है कि हिन्दी का सामान्य पाठक आसानी से स्वयं को उनकी कविताओं से जोड़ नहीं पाता बल्कि पहले-पहल पढ़ते ही बिदकने लगता है । इस संदर्भ में अपनी राय रखते हुए मैनेजर पांडे ने लिखा – ‘त्रिलोचन घटनाओं के कवि नहीं हैं । वे मूल्यों के कवि हैं । उनकी कविताओं में सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं का चित्रण-वर्णन बहुत कम है, मानव-जीवन की दशाओं और अनुभवों की अभिव्यक्ति अधिक है । वे मानवीय अनुभवों और जीवन दशाओं की अभिव्यक्ति करते हुए संघर्ष, आस्था, जिजीविषा, प्रेम, न्याय और स्वतंत्रता जैसे जीवन-मूल्यों की व्यंजना करते हैं । ....घटनाओं की कविता हमारे सामने की वास्तविकता का बोध कराती है, इसलिए वह जल्दी मन को छूती है । मूल्यों की कविता सतह के नीचे छिपी सच्चाईयों को पहचानने की अंतर्दृष्टि देती है, इसलिए वह पाठकों से धैर्य की माँग करती है, धीरे-धीरे विवेक को प्रभावित करती है । यही कारण है कि त्रिलोचन की कविता कुछ देर से पाठकों को प्रभावित करती है, मन में जगह पाती है ।’9 

दरअसल अपनी कविताओं के लिए त्रिलोचन का प्रयास ‘अनाहत शब्दों’ की ओर रहा – ‘कैसे और कहाँ से शब्द अनाहत पाऊँ’। अनाहत शब्द से उनका आशय- ‘वह शब्द जो कहीं से आहात (विशेषकर राजनीति) न हुआ हो ।’ शायद इसीलिए ‘ठेठ राजनीतिक कविता’ की ओर उनका झुकाव थोड़ा कम ही देखने को मिलता है । इसकी वजह से उन्हें अपने कवि-मित्रों की उपेक्षा, डांट-डपट सबकुछ सहना पड़ा । कवि और उसकी कविताओं को वह लोकप्रियता न मिली जिसका वह हकदार था । लेकिन त्रिलोचन ठहरे ‘शास्त्री’ । उन्होंने न स्वयं को बदला और न अपनी कविताओं को । नामवर जी ने इस प्रसंग को विस्तार से समझाया है – ‘नागार्जुन की स्पष्ट राय है कि कविता में स्पष्ट राजनीति के अभाव ने त्रिलोचन को काफी नुकसान पहुँचाया । नुकसान से आशय यदि नामयिक लोकप्रियता से है तो नागार्जुन की बात ठीक है । त्रिलोचन को नागार्जुन जैसी लोकप्रियता तो निश्चय ही न मिली । लेकिन यदि काव्य के स्तर पर देखें तो स्पष्ट राजनीति के प्रभाव से नुकसान तो नागार्जुन को ही हुआ है, त्रिलोचन से अधिक; बल्कि त्रिलोचन बहुत कुछ बच गए हैं । फिर भी हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ राजनीतिक कविताएँ अगर किसी ने लिखी हैं तो नागार्जुन ने ही । नागार्जुन की तरह यदि त्रिलोचन की स्पष्ट पक्षधरता हर क्षण प्रकट नहीं होती और वे गुस्सा करने के अवसर पर गुस्सा पी जाते हैं तो एक तरह से वे भारतीय किसान के अधिक निकट हैं । इस मामले में वे प्रेमचंद के होरी की परंपरा में हैं । सहिष्णुता और धैर्य के आगार । करुणा उनका स्थायी भाव है । संघर्ष के गहरे अनुभव से ही यह पीड़ा बोध, यह त्रासद चेतना उपलब्ध होती है ।’10 यही वजह है कि नामवर जी उनकी कविताओं को देखने-समझने के लिए एक अलग ‘काव्य-दृष्टि’ की माँग करते हैं ।

छायावाद के बाद हिन्दी में प्रगतिशील कविता (प्रगतिवाद) का दौर आया । प्रगतिशील कविता अपनी वैचारिक खुराक ‘मार्क्सवाद’ से ग्रहण करती है । मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक जीवन-दर्शन है, जो जीवन के साथ-साथ साहित्य के अवलोकन-मूल्यांकन के लिए भी दृष्टि देती है । लेकिन दिक्कत तब होती है जब कोई रचनाकार या आलोचक जीवन से बड़ा ‘दर्शन’ को समझने लगता है । दर्शन जीवन के लिए है, जीवन दर्शन के लिए नहीं । कोई भी विचार, सिद्धांत, दर्शन, कला ‘जीवन’ से बढ़कर नहीं । सब जीवन के कारण है । इनके कारण जीवन नहीं । जो लोग अपने आप को मार्क्सवादी कहने का दंभ भरते हैं वह कविताओं में केवल सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोधों की छवियों को उकेरते हैं या ऐसे विषयों को देखना पसंद करते हैं और अपने को कलावादी कहलाने का शौक रखते हैं वे कविताओं को जीवन से अलग ‘शुद्ध कला’ का विषय बताते हैं । लेकिन कविता जीवन से जुड़कर अपना घेरा इतना व्यापक और असीम कर लेती है कि कोई भी सिद्धांत, विचार, दर्शन उसे बांध नहीं पाता । कविता जीवन से जुड़कर ही उसके विविध रंगों को बिखेरती है । एकरस, निष्प्राण होने से बचती है । प्रगतिशील कवि (नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार) जीवन और कविता के इस अन्तःसंबंध को जानता है । इसीलिए यहाँ कविता का एकरस, एकरंग रूप आपको नहीं मिलेगा । रूप, रस, गंध, ध्वनि, स्पर्श से भरी कविता जीवन के उत्सव का गान बनकर यहाँ आती है । प्रगतिशील कविता जीवन में संघर्ष और कर्म करने की प्रेरणा देती है – ‘तुम नष्ट करो सब भेदभाव/ तुम भरो निखिल जग के अभाव/ सब बाधा हर/ होकर तत्पर/ नव साहस भर/ तुम विजयी बन कर अपना नियमन आप करो/ जीवन की संचित व्याकुलता सब ताप हरो/ जग-जीवन तुम पर निर्भर/ तुम अपने बल पर निर्भर ।’11 संघर्ष की इस लड़ाई में जब अकेलापन बढ़ जाता है तो उसे अपनी प्राणप्रिया पत्नी की याद आती है – ‘बांह गहे कोई, लहरों में साथ रहे कोई ।’ प्रेम का यह उदात्त रूप उसमें ‘जीवन का लय’ पैदा करता है, जगत-जीवन का प्रेमी बनाता है – एकांत की ओर नहीं ले जाता –‘मुझे जगत-जीवन का प्रेमी/ बना रहा है प्यार तुम्हारा ।’ 

प्रयोगवाद और नई कविता के दौर में प्रगतिवाद पर गंभीर आरोप लगाए गए । मसलन प्रगतिवादी कविता ‘साहित्य का संकीर्णतावादी आंदोलन है, जिसमें रचनाकार की स्वतन्त्रता का अपहरण कर लिया जाता है और प्रगतिवाद विषय-वस्तु पर अत्यधिक बल देकर विचारधारा की नारेबाजी का फार्मूला अपनाता है । इससे साहित्य की ‘कलात्मकता’ और ‘रूपविधान’ की भयंकर उपेक्षा होती है । प्रगतिशील साहित्य में ‘साहित्येतर मूल्यों’ को स्थान मिला किन्तु प्रयोगवाद कविता को केवल ‘काव्यात्मक मूल्यों’ तक ही सीमित रखना चाहता था । इन आरोपों को पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता । यह सबकुछ एक सुनियोजित अभियान के तहत किया गया । प्रातिशील कवियों को यह समझने में देर न लगी कि ‘शुद्ध कविता’ की बात करना, ‘शुद्ध व्यक्तित्व’ की बात करना उन्हें ‘जनपथ’ से हटाने का एक तरीका है । उनकी चालों की कलई खोलते हुए त्रिलोचन ने लिखा – ‘प्रतिभा नहीं चाहिए, मेरे गुट में आओ/ इधर-उधर मत भटको/ देखो स्वयं जमाना/ बहुत बुरा है, बेकारी छायी है। जाना/ सुना तथ्य है/ जाओ वहाँ जहां सुख पाओ/ अपना है रेडियो, वहाँ बोलो या गाओ/ जगह-जगह शाखाएँ हैं, अब नाम कमाना/ और डूबाना अपनी इच्छा पर है । आना/ चाहो आ जाओ, या चूको फिर पछताओ ।’ लेकिन प्रगतिशील कवियों के लिए ‘जन’ की प्रतिबद्धता, व्यापक जन जीवन की खुशी ही सर्वोपरि है – ‘धन की उतनी नहीं मुझे जन की परवा है ।’ जीवन में कोई भी प्रलोभन, पद उसे इस सिद्धान्त से डिगा नहीं सकता । इसीलिए वह ‘जनकवि’ कहलाता है । यह थाती उसे जीवन में सबसे अधिक प्रिय है, जिसके लिए वह कोई भी मूल्य चुका जाता है – ‘बिस्तरा है न चारपाई है । जिंदगी हमने खूब पाई है ।/ ठोकरें दर-ब-दर की थीं, हम थे,/ कम नहीं हमने मुंह की खाई है ।’12 

त्रिलोचन की कविता में न आपको ‘समाजवाद’ की हुंकार मिलेगी और न ही शिल्प और रूप की चमक-दमक । इन दोनों के बीच जहां कहीं ‘जीवन’ उपस्थित होता है त्रिलोचन की कविता आपको वहीं मिलेगी । त्रिलोचन ‘जीवन के चित्रकार’ हैं, जो समाज में उठने वाली ध्वनियों को ग्रहण कर उसका चित्र बना देने की कला में माहिर हैं । उन्हें यह बात भली-भांति पता है कि – ‘जीवन जिस धरती का है, कविता भी उसकी’, वह चाय की चुस्की और सिगरेट के धुओं के साथ पूरा किया जाने वाला कोई शगल नहीं बल्कि जीवन-साधना और तप है । कविता को रचने की प्रक्रिया जीवन को रचने की प्रक्रिया के साथ जुड़ी हुई है । 

‘धरती’ का यह कवि जीवन के समक्ष विनत है । ‘शब्द-साधना’ उसके लिए ‘जीवन की खोज’ ही है । भाव, विचार, अनुभूति, शैली की स्पष्टता और सरलता उसकी कविता की आत्मा है । साधारण में भी अनिवार्य रूप से ‘असाधारण’ खोज लेना उसकी प्रतिभा है और जीवन की लय को कविता की लय बनाकर ‘समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक’ बनाने का संकल्प उसकी कविता का उद्देश्य है । कुल मिला-जुलाकर यही त्रिलोचन हैं और यही उनकी कविता का शास्त्र है । 

संदर्भ :

1. केदारनाथ सिंह, संपादक, प्रतिनिधि कविताएं त्रिलोचन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण: 2017, पृ. 80
2. रवि रंजन, संपादक, लोकचेतना वार्ता, अंक 8-9, वर्ष 2018, पृ. 255 
3. केदारनाथ सिंह, संपादक, प्रतिनिधि कविताएं त्रिलोचन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण: 2017, पृ. 14
4. वही, पृ. 58
5. गोविंद प्रसाद, संपादक, त्रिलोचन के बारे में, वाणी प्रकाशन, संस्करण: 1994, पृ. 153
6. केदारनाथ सिंह, संपादक, प्रतिनिधि कविताएं त्रिलोचन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण: 2017, पृ. 65
7. रवि रंजन, संपादक, लोकचेतना वार्ता, अंक 8-9, वर्ष 2018, पृ. 197
8. वही, पृ. 198
9. गोविंद प्रसाद, संपादक, त्रिलोचन के बारे में, वाणी प्रकाशन, संस्करण: 1994, पृ. 157-58
10. वही, पृ. 88
11. वही, पृ. 138
12. केदारनाथ सिंह, संपादक, प्रतिनिधि कविताएं त्रिलोचन, राजकमल प्रकाशन, संस्करण: 2017, पृ. 21

लेखक :
डॉ. भैरव सिंह हासिमारा हिंदी हाई स्कूल, अलीपुरद्वार, पश्चिम बंगाल में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। ईमेल : bhairaw.singh490@gmail.com

डाउनलोड पीडीएफ

पंत और छायावाद का घोषणा-पत्र — अभिजीत सिंह


शोध आलेख : पूर्वाभास, वर्ष 1, अंक 1, जनवरी 2022

सुमित्रानंदन पंत
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित काव्य संग्रह 'पल्लव' का प्रकाशन सन् 1928 में हुआ था। इसी काव्य संग्रह की भूमिका को 'छायावाद का घोषणा पत्र' के नाम से जाना जाता है, जिसमें पंत ने भाषा, साहित्य पर पड़ने वाले भाषा के प्रभाव, तत्कालिक समय का भाषा से संबंध, ब्रजभाषा और खड़ी बोली और हिंदी साहित्य में खड़ी बोली के सक्रिय पदार्पण पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए थे।

सुमित्रानंदन पंत ने अपने काव्य संग्रह 'पल्लव' की भूमिका में छायावादी कविता का पक्ष विस्तार से प्रस्तुत किया है। पंत ने सभी छायावादी कवियों का पक्ष लेकर अपनी कविता के वैशिष्ट्य का उद्घाटन किया है और पुरानी कविता से उसकी भिन्नता को उद्घाटित करते हुए उसके महत्व को भी स्पष्ट किया है। 'पल्लव' की इस भूमिका को छायावाद का घोषणा पत्र कहने के पीछे कारण ही यही है कि इसमें छायावाद के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसके भाव भाषा और छंद का सोदाहरण परिचय दिया गया है। साथ ही ब्रजभाषा और खड़ी बोली के बीच हिंदी के काव्य भाषा बनने की प्रक्रिया को भी उजागर किया गया है। स्वर, छंद और व्यंजनों की दृष्टि से पंत का यह विवेचन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें हिंदी कविता के विकास पर प्रकाश डालते हुए ब्रजभाषा के माधुर्य का विवेचन है एवं बिहारी रसखान एवं देव जैसे कवियों का भी मूल्यांकन किया गया है। इस भूमिका में पंत ने भाव और भाषा के तादात्म्य का पक्ष लिया है। साथ ही कविता के लिए चित्र भाषा की आवश्यकता को भी प्रतिपादित किया है । इसके अतिरिक्त पंत ने काव्य में शब्द और अर्थ के सामंजस्य पर भी बल दिया है। उनके अनुसार 'काव्य में शब्द और अर्थ की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं रहती, वे दोनों भाव की अभिव्यक्ति में डूब जाते हैं, तब भिन्न-भिन्न आकारों में कटी छंटी और शब्दों की शिलाओं का अस्तित्व ही नहीं मिलता, राग के लेप से उनकी संधियां एकाकार हो जाती हैं।' तथा भाषा के संबंध में पंत का कहना है कि भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय स्वरूप है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यह भूमिका छायावाद का मानचित्र प्रस्तुत करती है और हिंदी आलोचना की वर्तमान स्थिति पर अपना असंतोष व्यक्त करती है। अतः 'पल्लव' की यह भूमिका न केवल पंत के अपितु समस्त छायावाद के काव्य आदर्शों का प्रतिबिंब है।

'पल्लव' में सन् 1918 से 1925 तक की रचनाएं संकलित हैं। पंत के छायावादी काव्य - व्यक्तित्व का सबसे अच्छा प्रस्फुटन 'पल्लव' में ही हुआ है । प्रेम-गीत, कल्पना प्रधान गीत, भाव प्रधान गीत तथा वे कविताएं जिनमें कल्पना और भावों का उचित सम्मिश्रण है - इसमें संकलित हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मानना था कि - "पंत जी की पहली प्राण रचना पल्लव है जिसमें प्रतिभा के उत्साह या साहस का तथा पुरानी काव्य पद्धति के विरुद्ध प्रतिक्रिया का बहुत बढ़ा चढ़ा प्रदर्शन है। इसमें चित्रमयी भाषा, लाक्षणिक वैचित्र्य, प्रस्तुत विधान आदि की विशेषताएं प्रचुर परिमाण में भरी सी पाई जाती हैं।"1 

पल्लव की यह भूमिका द्विवेदी युग और छायावाद के संधिकाल के दौरान होने वाले परिवर्तनों पर इतना गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि इसकी गहराई में जाने पर अलग से शोध की संभावनाओं को तलाशने जैसा अनुभव होता है। फिर भी इस लेख में उन मुद्दों की एक रूपरेखा भर तैयार करने का प्रयत्न किया गया है जो छायावाद को एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे। पंत के काव्य विकास एवं पल्लव जैसी रचना के पल्लवित होने के संदर्भ में डॉक्टर बच्चन सिंह कहते हैं - "सुमित्रानंदन पंत का काव्य विकास अंतर्मुखता से निरंतर बहिर्मुख होने का इतिहास है। जिस प्राकृतिक परिवेश में उनका जन्म एवं पालन पोषण हुआ वह स्वयं कविता से कम आकर्षक और लुभावना नहीं है।  उनके जन्म भूमि कौसानी ने उनके मन में सौंदर्य और प्रेम का जो बीजवपन किया वह समय पाकर 'पल्लव' के रूप में पल्लवित हुआ।"2

एक स्थान पर लिखते हैं - "हम खड़ी बोली से अपरिचित हैं, उसमें हमने अपने प्राणों का संगीत अभी नहीं भरा ; उसके शब्द हमारे हृदय के मधु से सिक्त होकर अभी सरस नहीं हुए, वे केवल नाम मात्र हैं, उनमें हमें रूप - रस - गंध भरना होगा।"3  दरअसल पंत के इस कथन से यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि जिस समय पंत यह पंक्तियां लिख रहे थे उस समय खड़ी बोली गद्य में प्रेमचंद और प्रसाद तथा पद्य में निराला और प्रसाद जैसी विभूतियां हो चुकी थी, कामायनी की रचना हो चुकी थी जिसे आधुनिक काल का महाकाव्य भी कहा जाता है। फिर वे ऐसे कौन से कारण थे जो खड़ी बोली के ऐसे परिपक्व रचनाकारों व रचनाओं की उपस्थिति के बावजूद पंत को यह कहने पर मजबूर कर रहे थे की खड़ी बोली में प्राणों का संगीत अभी तक नहीं भरा गया है और उसमें रूप, रस और गंध का अभाव है? लेकिन यदि पंत की इस धारणा को मात्र काव्य भाषा के प्रसंग से जोड़कर देखें तो वास्तव में छायावादी कविता में एक उच्च आयाम की ओर अग्रसर होने के बावजूद खड़ी बोली, ब्रज के लावण्य और प्रभाव क्षमता से युक्त नहीं हो पाई थी। निराला या प्रसाद जैसे खड़ी बोली के प्रतिष्ठित कवियों को पाने के बाद भी ब्रजभाषा का सांगीतिक आकर्षण आमजन में बना हुआ था। ऐसे में ब्रजभाषा, खड़ी बोली के सामने किसी चुनौती से कम नहीं थी। और इस चुनौती की भावना पर दृष्टिपात करने पर यह चर्चा स्वत: ही महावीर प्रसाद द्विवेदी की ओर मुड़ जाती है, जिन्होंने खड़ी बोली की समृद्ध परंपरा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और नए कवियों को खड़ी बोली में रचने को निरंतर प्रेरित व प्रबोधित किया। ऐसे में महावीर प्रसाद द्विवेदी को अलगा कर इस मुद्दे पर कोई बात हो ही नहीं सकती। द्विवेदी जी ने गद्य और पद्य की एक भाषा पर विशेष जोर दिया था और भाषाई सुधारों के अलावा रचनाओं के विषयों को भी लेकर सचेत रहे थे। मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत-भारती' और 'साकेत' के पीछे द्विवेदी जी की प्रेरणा भी क्रियाशील थी। यानी हम समझ सकते हैं कि छायावाद के शुरुआत के बाद तक भी उस वक़्त के साहित्य और साहित्यकारों पर उनका पुख्ता प्रभाव रहा है।

ब्रजभाषा के अलंकृत काल के तमाम कवियों - देव, बिहारी, रसखान, पद्माकर, घनानंद और मतिराम आदि की कविताओं पर पंत विशेष रुप से रुष्ट दिखते हैं। ब्रजभाषा के भाषागत और विषयगत सौंदर्य पर न्योछावर होते हुए भी पंत इस अलंकृत काल की भाषा को 'जीर्ण-शीर्ण छिद्रों की झोली', 'अलंकारों के व्यभिचार का काल'4 और 'अनुप्रासों की अराजकता का काल'5 आदि कहने से कतराते नहीं। दरअसल इस तथ्य को समझने के लिए हमें थोड़ा सा पीछे आना होगा। भारतेंदु या महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने समय में भले ही ब्रजभाषा और खड़ी बोली का संघर्ष कहें या विवाद सुलझा लिया हो, लेकिन उस समय की एक अंतर्धारा छायावाद के पूर्वार्ध तक चलती रही है। प्रसाद ने भी शुरू में ब्रजभाषा में रचनाएं लिखी हैं। 'चित्राधार' काव्य संग्रह ब्रजभाषा में ही है। जगन्नाथदास रत्नाकर तो अंत तक ब्रज में ही लिखते रहे। गद्य में तो खड़ी बोली प्रतिष्ठित हो चुकी थी, लेकिन कविता के मामले में अभी भी एक वर्ग ऐसा था जो यह मानता था कि काव्यशास्त्रीय सौंदर्यबोध की परिपाटी को अब भी ब्रजभाषा के माध्यम से ही जीवित रखा या विकसित किया जा सकता है। क्योंकि इस वर्ग का मानना था की भाषा का संस्कार जो है विशेष रूप से कविता में, वह निरंतर प्रयुक्त होते होते परंपरा की नई अर्थ-छायाओं और अर्थ छवियों की सृष्टि करता है, क्योंकि ब्रजभाषा एक विशिष्ट सौंदर्यबोध की ओर संकेत करने के कारण और विशिष्ट संवेदनात्मक वातावरण की निरंतर सटीक अभिव्यक्ति के कारण इस क्षेत्र में मंजी हुई भाषा थी। ब्रजभाषा और खड़ी बोली के इस संघर्ष को यदि 'भक्ति काल के स्वर्ण युग' वाले नजरिए से देखने का प्रयास करें तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि जातीय व राष्ट्रीय निर्माण की मंशा तले खड़ी बोली पर चाहे कितना ही काम क्यों ना हुआ हो लेकिन कुछ एक सशक्त कवियों को छोड़कर आज भी खड़ी बोली की कविताएं ब्रजभाषा की पंक्तियों की तरह जन मन में अपनी जगह कहां बना पाई हैं? समकालीन कविता के वरिष्ठ हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह ने अपने एक वक्तव्य में अपने गांव के एक संस्मरण को सुनाते हुए कहा था की गांव में उनके घर पर काम करने वाली एक गरीब महिला को जब यह पता चला कि केदारनाथ जी कविता लिखते हैं तो उसने यह बताते हुए कि वह आज भी तुलसी, सूर की कविताएं पढ़ती है और उसे वह कविताएं याद रहती हैं, उनसे उनकी कोई पुस्तक मांगी। उसकी इस मांग पर केदारनाथ जी को यह चिंता सताने लगी कि जो महिला रोज सुबह शाम तुलसी, कबीर और सूर की कविताएं गुनगुनाती होगी वह अब उनकी कविताओं को पढेगी और जाहिर तौर पर सूर, कबीर और तुलसी की कसौटी पर ही उनकी भी कविताओं को कसने की चेष्टा करेगी। अपने समय के सबसे बड़े कवि की यह चिंता भाषा की दृष्टि से अवधी या ब्रज की उत्कृष्टता का प्रमाण है। 

पंत भी एक तरफ ब्रजभाषा के सांगीतिक लावण्य पर न्योछावर दिखते हैं तो दूसरी तरफ अलंकृत काल के कवियों को लगभग लगभग खारिज ही कर देते हैं। खड़ी बोली के सामने ब्रज की महत्ता का भी प्रतिपादन करते हैं, लेकिन अंततः खड़ी बोली में राष्ट्रभाषा का गौरव भी देखते हैं - 'हमें भाषा नहीं राष्ट्रभाषा की आवश्यकता है।'6 धारणाओं की इन टकराहटों को यदि सिर्फ काव्य उपकरणों के दृष्टिकोण से देखें तो यहां घोर अंतर्द्वंद दिखाई पड़ता है, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पंत भाषा और काव्य को लेकर अपने जीवन में काफी संवेदनशील रहे थे। लेकिन जब उनकी यह संवेदना उनके युगबोध की चेतना में एकमेक होती थी तो इस मिश्रण का प्रभाव अलग तरीके से पड़ा करता था। इस प्रभाव को लोकवृत्त की अवधारणा से जोड़ें तो समझ आता है कि पंत की कविताओं में प्रकृति अपने खालिस और एकांतिक रूप में दिखती हुई भी लोकचेतना से इतर नहीं थी। इसी युगबोध और लोकवृत्त के बदलते स्वरूप के कारण ब्रज के पराभव या तिलांजलि की आवश्यकता पड़ी। क्योंकि अब ब्रज भाषा में आधुनिक भावों की अभिव्यक्ति संभव नहीं रह गई थी, वह अब सिर्फ एक युग विशेष की काव्य-परिधि का द्योतक भर रह गई थी। ऐसे में भाषा माध्यम परिवर्तित करना एक युगीन आवश्यकता थी - यह बात पंत भली-भांति समझ रहे थे। स्वाधीनता आंदोलन के नजरिए से भी देखें तो ब्रज एक अप्रासंगिक भाषा थी। स्वाधीनता आंदोलन की चेतना को जन जन तक पहुंचाने और तमाम संवादों के लिए खड़ी बोली सर्वाधिक उपयुक्त ठहरती थी। इसीलिए पंत खड़ी बोली में अभिव्यक्ति की उत्कृष्ट संभावनाएं देखते हैं। ऐसे में यदि इन सारी चीजों के बरक्स हम यह कहें कि पंत द्वारा श्रृंगारिक कवियों का विरोध उन्हें खारिज करना नहीं था बल्कि युगबोध व युगीन आवश्यकताओं के मद्देनजर एक प्रतिक्रिया थी तो उचित ही होगा।

'पल्लव' की भूमिका में ब्रज के लावण्य पर बात करते हुए पंत बांग्ला भाषा के उच्चारण के सौंदर्य पर भी काफी कुछ चर्चा करते हैं। यह इसलिए था कि बांग्ला भाषा का उस वक्त तक बड़ा जबरदस्त प्रभाव भारतीय साहित्य पर ही नहीं विश्व साहित्य तक पर पड़ चुका था। 1910 में प्रकाशित गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि को 1913 में नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। हिंदी में भी बांग्ला के प्रभाव से अनुवाद का एक दौर चला था जिसमें बांग्ला के तमाम उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद हुआ था। इसी कारण तत्कालिक हिंदी काव्य परंपरा पर भी बांग्ला का प्रभाव पड़ा था। ऐसे में बांग्ला से किनारा कर लेना किसी कवि हृदय के लिए भला कैसे संभव हो पाता?

बहरहाल, पल्लव की भूमिका में भाषा, उसकी युगीन आवश्यकताओं और उन युगीन आवश्यकताओं के आधार पर भाषा के नए स्वरूप के गठन पर तमाम तकनीकी और विश्लेषणात्मक चर्चाएं की गई हैं। पंत द्वारा लिखित पल्लव की भूमिका के नजरिए से देखें तो छायावाद की व्याख्या के नए आयाम खुलते हैं। छायावादी युग की काव्य भाषा, काव्य में प्रयुक्त अलंकार, बिंब, प्रतीक और तत्कालीन समाज से उनके संबंधों पर अलग नजरिए से देखने में सहूलियत मिलती है। संभवत इसी कारण प्रख्यात आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी ने पंत और पल्लव के बारे में सच ही लिखा था - "छायावाद की पहली पहचान बनाने वाले कवि सुमित्रानंदन पंत हैं।"7

संदर्भ :
1. शुक्ल, आचार्य रामचंद्र, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृ. 364
2. सिंह, डॉ. बच्चन, आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2007, पृ. 207
3. पंत, सुमित्रानंदन, पल्लव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2017, पृ. 50
4. वही., पृ. 31
5. वही., पृ. 31
6. वही., पृ. 23
7. चतुर्वेदी, रामस्वरूप, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, 2010, पृ. 231

लेखक :
डॉ अभिजीत सिंह बानरहाट कार्तिक उरांव हिंदी गवर्नमेंट कॉलेज, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल में असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी विभाग) हैं। ईमेल : abhisingh1985123@gmail.com

डाउनलोड पीडीएफ

आजाद अघोरी साधक : भुवनेश्वर — भारत यायावर


शोध दिशा : पूर्वाभास, वर्ष 1, अंक 1, जनवरी 2022

भुवनेश्वर
पिछले दिनों मई, 1937 में प्रकाशित और बाबुराव विष्णु पराड़कर के द्वारा संपादित ‘हंस’ का ‘प्रेमचन्द-स्मृति-अंक’ पढ़ रहा था. इसमें प्रेमचन्द पर अनेक संस्मरण हैं, किन्तु जैनेन्द्र कुमार का संस्मरण सबसे लम्बा और दिलचस्प है- ‘प्रेमचन्द : मैंने क्या जाना और पाया’. इस संस्मरण में एक जगह जैनेन्द्र ने लिखा है : ‘‘प्रेमचन्द जी ने एक बड़ी दिलचस्प आपबीती सुनाई. एक निरंकुश युवक ने किस प्रकार उन्हें ठगा और किस सहज भाव से वह उसकी ठगाई में आते रहे, इसका वृतान्त बहुत ही मनोहर है. पहले-पहल तो मुझे सुनकर अचरज हुआ कि मानव प्रकृति के भेदों को इतनी सूक्ष्मता से जानने और दिखाने वाला व्यक्ति ऐसा अजब धोखा कैसे खा गया. लेकिन मैंने देखा कि जो उनके भीतर कोमल है, वही कमजोर है. उसे छूकर आसानी से उन्हें ऐंठा जा सकता है. उनकी उसी रग को पकड़कर उस चालाक युवक ने प्रेमचन्द जी को ऐसा मूँड़ा कि कहने की बात नहीं. सीधे-सादे रहने वाले प्रेमचन्द जी के पैसे के बल पर ऐन उन्हीं की आँखों के नीचे उस जवान ने ऐसे-ऐसे ऐश किये कि प्रेमचन्द आँख खुलने पर स्वयं विश्वास न कर सकते थे. प्रेमचन्द जी से उसने अपना विवाह तक करवाया, बहू के लिए जेवर बनवाये, और प्रेमचन्द जी सीधे तौर पर सबकुछ करते गये. कहते थे- भई जैनेन्द्र, सर्राफ को अभी पैसे देने बाकी हैं. उसने जो सोने की चूड़ियाँ बहू के लिए दिलाई थीं, उनका पता तो मेरी धर्मपत्नी को भी नहीं है. अब पता देकर अपनी शामत ही बुलाना है. पर देखो न जैनेन्द्र, यह सब फरेब था. वह लड़का ठग निकला. अब ऊपर ही ऊपर जो दो-एक कहानियों के रुपये पाता हूँ उससे सर्राफ का देना चुकता करता जाता हूँ. उस चतुर युवक ने प्रेमचन्द जी की मनुष्यता को ऐसे झाँसे में पकड़ा और उसे ऐसा निचोड़ा कि और कोई होता तो उसका हृदय हमेशा के लिए हीन और कठिन और छूछा पड़ गया होगा. पर प्रेमचन्द का हृदय इस धोखे के बाद भी मानो और धोखा खाने की क्षमता रखता था. उस हृदय में मानवता के लिए सहज विश्वास की इतनी अधिक मात्रा थी.’’

जैनेन्द्र के प्रेमचन्द पर लिखे गए संस्मरण के इस अंश पर आकर ठिठक गया और कई दिनों तक सोचता रहा कि वह ठग युवक कौन हो सकता है, जिसको प्रेमचन्द ने अपने हृदय में स्थान दिया और उसके लिए इतना अधिक खर्च किया. इतनी आत्मीयता उनकी किस युवक से थी? वह कौन था? ठग, धोखेबाज, नौटंकीबाज- किन्तु इतना प्यारा और प्रतिभाशाली- कौन था वह युवक?

कई दिनों तक यह प्रश्न अन्दर उठता रहा और बेचैन रहा. फिर अचानक एक नाम याद आया- भुवनेश्वर प्रसाद! कोई दूसरा नाम दिमाग में नहीं आया, क्यों?

इसका कारण है. प्रेमचन्द नये प्रतिभाशाली रचनाकारों की हर तरह से मदद करते थे और उनकी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करते थे. उस दौर के अनेक युवा लेखक ‘हंस’ और ‘जागरण’ में पहली बार प्रकाशित हुए. प्रेमचन्द का अन्तरंग संस्मरण लिखते हुए शिवपूजन सहाय ने उनके उदार और तरल व्यक्तित्व का जो रेखाचित्र खींचा है, उसके कुछ वाक्यों के परायण से ही यह बात उजागर हो उठती है : ‘‘किसी के अपराध पर भी वे क्रोध करने के बदले हँसते ही थे. बहुत दिनों तक उनके संपर्क का सौभाग्य रहा, अनेक प्रसंगों पर उनकी उदारता और सहृदयता देखने के सुयोग मिले, पर कभी उन्हें क्रोध करते देखा ही नहीं. साधारण बोलचाल में भी वे सूक्तियाँ कह जाते थे. एक दफा कहा था- ‘गुस्सा पी जाने पर आबे-हयात (अमृत) बन जाता है.’’

ऐसे थे प्रेमचन्द! यहाँ तो ऐसे लेखकों की भरमार है जो एक भी अप्रीतिकर लगने वाली बात पर बातचीत बन्द कर देते हैं या गुस्से में आग-बबूला होकर खड्गहस्त हो जाते हैं.

अपने अराजक व्यक्तित्व के कारण भुवनेश्वर को उनके समकालीन लेखकों ने बहिष्कार कर दिया था, पर कुछ सदाशयी लेखक थे, जिनका स्नेह उनको मिला था. ऐसे लेखकों में प्रेमचन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भुवनेश्वर को सबसे पहले ‘हंस’ में स्थान दिया और उनकी पुस्तक की छपने के साथ ही लम्बी समीक्षा लिखी, जिसके बल पर भुवनेश्वर साहित्य में अपनी रचनाशीलता को लगातार जारी रख सके.

भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा : एक वैवाहिक विडम्बना’ ‘हंस’ के दिसम्बर, 1933 में प्रेमचन्द ने प्रकाशित किया. मार्च, 1934 ई. के ‘हंस’ में उनका दूसरा एकांकी ‘एक साम्यहीन साम्यवादी’ और इसी वर्ष उनका ‘शैतान’ नामक एकांकी. इन तीनों एकांकियों के प्रेमचन्द द्वारा (‘हंस’ में) प्रकाशित होते ही भुवनेश्वर को साहित्य जगत में मान्यता मिल गई. उन्होंने तीन अन्य ‘प्रतिभा का विवाह’, ‘रोमांस-रोमांच’ एवं ‘लाटरी’ नामक एकांकियों को मिलाकर अपना ‘कारवाँ’ नामक एकांकी-संग्रह 1935 ई. में प्रकाशित किया. इसकी भूमिका उन्होंने प्रयाग-प्रवास में 30 मार्च, 1935 ई. को लिखी और पुस्तक अप्रैल महीने में छपी, तो उन्होंने काशी जाकर उसे प्रेमचन्द को दिया. प्रेमचन्द ने उसकी लम्बी समीक्षा लिखी जो मई, 1935 ई. के ‘हंस’ में प्रकाशित हुई. भुवनेश्वर ने ‘कारवाँ’ की भूमिका और ‘उपसंहार’ बिल्कुल नए अंदाज में लिखी है, जिसमें उनकी अद्भुत मान्यताएँ सूक्तियों के रूप में उजागर हुई हैं. नमूने के तौर पर उसकी भूमिका से कुछ सूक्तियाँ यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ  :

1. ‘आत्मज्ञान’ मानव-जीवन की सबसे बड़ी समस्या है और यह तभी संभव है जब वह संसार से ऊपर उठ जाय, क्योंकि मानव-जीवन के चारों ओर सभी वस्तुएँ एक समस्या हैं और सीमाएँ. आदिम मनुष्य ने जब एक शब्द गढ़ा, उसने सोचा, मैंने एक समस्या हल कर दी, पर वास्तव में उसने एक समस्या का सृजन किया.

2. नाटककार का पूर्व विकास तब होता है, जब वह स्वयं अपने असत्य पर विश्वास करने लगता है.

3. विचार-स्वातं॑त्र्य का अर्थ है विचारों का अभाव, जो वर्तमान युग में कोई ट्रेजडी नहीं है.

4. प्रायः समस्त नाटककार जो पेटीकोट की शरण लेते हैं, दो पुरुषों को एक स्त्री के लिए आमने-सामने खड़ा कर संघर्ष उत्पन्न करते हैं. मैंने भी यही किया है, केवल बुलडॉग कुत्ते के मुख से हड्डी निकाल कर अलग फेंक दी है.

5. जिस भांति जीवन असार और निष्फल है, उसी प्रकार कला भी. जीवन एक लजीली मुसकान है, कला एक शुष्क और कठोर हास्य.

कला अपनी चरम सीमा पर पहुँचकर अश्लील हो जाती है. कला में अश्लीलता के अर्थ हैं नग्न पवित्रता.

‘कारवाँ’ की भूमिका ‘प्रवेश’ शीर्षक से लिखी गयी है, अंत में ‘पुनश्च’ लिखकर भुवनेश्वर ने लिखा- ‘‘मैं अपनी इस प्रथम छपी हुई कृति के साथ अमर कथाकार श्री प्रेमचन्द का नाम जोड़कर अपने-आपको उनका आभारी बनाता हूँ.’’

भुवनेश्वर की ‘कारवाँ’ उनकी रचनाशीलता के प्रारम्भिक चरण में ही प्रकाशित उनका इकलौता एकांकी-संग्रह है. उनकी कोई दूसरी पुस्तक उनके जीवन-काल में क्या, उनकी मृत्यु के बाद भी नहीं छपी, जबकि उन्होंने लगातार एकांकी, कहानी, कविता, लेख आदि लिखे, जो पत्र-पत्रिकाओं में बिखरे रह गये. उनकी साहित्यिक दुनिया में चर्चा होती रही, नए एकांकी के प्रारम्भकर्ता के रूप में हिन्दी साहित्य के इतिहास में उनका स्थान भी निश्चित हो गया, अनेक एकांकी-संकलनों में उनके एकांकी संकलित हुए, विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों में उनके कई एकांकी पढ़ाए जाते हैं. तात्पर्य यह कि अपनी अपूर्व रचनाशीलता के बलबूते भुवनेश्वर आज भी जीवंत हैं और अपनी ओर सतत ध्यान खींचते हैं.

भुवनेश्वर का जन्म 1910 ई. में शाहजहाँपुर में हुआ था. वहीं से उन्होंने पढ़ाई की थी. विद्यार्थी जीवन में उन्होंने अंग्रेजी भाषा में दक्षता प्राप्त कर ली थी और उर्दू-हिन्दी में लिखने का अभ्यास किया था. जॉर्ज बर्नाड शॉ के नाटक उनके घोंटे हुए थे. उन्होंने अपने एकांकी ‘शैतान’ के एक दृश्य में शॉ की छाया को स्वीकार भी किया है. कुछ समय तक वे फ्रायड और डी.एच. लारेन्स से भी प्रभावित रहे. इनके अलावा उनपर सबसे अधिक प्रभाव आस्कर वाइल्ड का था. 1933 में वे शाहजहाँपुर से इलाहाबाद आये और उनकी घनिष्ठ मित्रता उर्दू के प्रसिद्ध नवयुवक लेखक और बैरिस्टर सज्जाद जहीर से हुई. नवम्बर, 1932 ई. में सज्जाद जहीर ने उर्दू में ‘अंगारे’ नामक एक संयुक्त संकलन निकाला था, जिसमें उनके अलावा रशीदजहाँ, अहमद अली और महमूद जफर की चार कहानियाँ एवं एक एकांकी संकलित किया गया था. ‘अंगारे’ की कहानियों ने मुसलिम समाज की जड़ता, अंधविश्वास, सड़न और बदबू को उद्घाटित करते हुए उर्दू साहित्य में एक नई कलादृष्टि को जन्म दिया और यही संकलन उर्दू के तरक्की पसंद लेखकों की प्रेरणा का प्रस्थान-बिन्दु माना जाता है. इस संकलन पर बेहद वाद-विवाद हुए और संयुक्त प्रांत की सरकार ने मार्च, 1933 ई. में उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया. उस समय सज्जाद जहीर इलाहाबाद के 38 कैनिंग रोड पर रहते थे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रघुपति सहाय फिराक और अहमद अली प्रायः उनके घर बैठकी करते. भुवनेश्वर भी इसमें शामिल होते. इलाहाबाद में ही उनके दो मित्र और बने- शिवदान सिंह चौहान एवं शमशेर बहादुर सिंह. ये दोनों तब एम.ए. में पढ़ते थे. 12 फरवरी, 1936 ई. को इलाहाबाद के ‘हिन्दुस्तानी एकेडेमी’ में भाग लेने प्रेमचन्द आये थे और 14 फरवरी को सज्जाद जहीर के घर पर एक बैठक हुई जिसमें प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने का निर्णय लिया गया. यह ‘अंगारे’ के लेखकों की मूल संकल्पना थी, जिसके प्रेरक प्रेमचन्द थे. एक-डेढ़ महीने में ही इलाहाबाद में हिन्दी-उर्दू लेखकों का यह सक्रिय मंच बन गया और देखते ही देखते कई शहरों में इसकी शाखाएँ खुल गईं. 10 अप्रैल को लखनऊ में इसका भव्य समारोह हुआ. भुवनेश्वर युवा लेखक के रूप में इसमें शामिल थे. उस समय भुवनेश्वर से जो भी मिला, वह उनकी प्रतिभा से कुछ प्रभावित और ज्यादा आतंकित हुआ. प्रगतिशील लेखक संघ के समारोह के बाद महीनों तक वे लखनऊ में रहे. रामविलास शर्मा से उनकी दोस्ती इलाहाबाद में हो चुकी थी. तब रामविलास जी रिसर्च कर रहे थे और अकेले रहते थे. भुवनेश्वर प्रसाद उनसे मिलने जाया करते.

रामविलास शर्मा से भुवनेश्वर की तीखी बहसें होतीं. अपने निरंकुश स्वभाव के बावजूद भुवनेश्वर में कुछ बातें ऐसी थीं कि रामविलासजी के मन में उनके प्रति सहृदयता थी. उस समय यानी 1936 ई. के दिनों की याद करते हुए रामविलास शर्मा ने लिखा है : ‘‘प्रेमचन्द, फिराक और सज्जाद जहीर के इर्द-गिर्द चक्कर काटने वालों में एक नौजवान लेखक थे भुवनेश्वर. कद में वह प्रेमचन्द से भी छोटे थे. अंग्रेजी और उर्दू अच्छी जानते थे, अपनी ‘विट’ से यूनिवर्सिटी के छात्रों और प्राध्यापकों को प्रभावित करने में वह अद्वितीय थे. उन्होंने कुछ दिन तक लोगों पर यह रोब गालिब किया था कि वह आई.सी.एस. परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुके हैं, पर साहित्य-सेवा के लिए नौकरी नहीं की. दोस्तों से किताबें माँगकर ले जाते, किसी सेकेंड हैंड किताबों की दूकान में या कबाड़ी के यहाँ बेच आते. जान-पहचान वालों से अठन्नी, चवन्नी, रुपया जो मिल जाय, माँगने में उन्हें शर्म न थी. उन्हें कुछ अश्लील लोकगीत याद थे, फुर्सत में कभी-कभी मेरे कमरे में चटाई पर लेटे हुए पैरों में घुँघरू बांधकर ताल देते हुए ये गीत मुझे और नरोत्तम नागर को सुनाते थे. मैं उनसे कहता- ‘‘तुम न्यूरौटिक हो, प्रोग्रेसिव राइटर से तुम्हारा क्या सम्बन्ध?’’ भुवनेश्वर जवाब देते- ‘‘ए प्रोग्रेसिव इज ए न्यूरौटिक शौट थ्रू विद होप.’’

ऐसा था भुवनेश्वर का व्यक्तित्व! अनैतिकता का उन्होंने अपना ऐसा चरित्र बनाया था कि लोग उसे पचा नहीं पाते थे. वे बदनाम बनकर जीना चाहते थे. ठग, धोखेबाज, नशेबाज भुवनेश्वर ने सबसे पूज्य स्थान प्रेमचन्द को दिया था, पर उनसे भी छल करना उन्होंने अपना कर्तव्य समझा. अंग्रेजी साहित्य में जो स्थान आस्कर वाइल्ड का है, वे वही स्थान हिन्दी साहित्य में अपना बनाना चाहते थे. अपनी अद्वितीय साहित्यिक प्रतिभा के सहारे उन्होंने प्रेमचन्द जैसे मानव-आत्मा के शिल्पी कथाकार को अपना मुरीद बना लिया था, जिन्होंने ‘कारवाँ’ की समीक्षा के प्रारम्भ में लिखा था- ‘‘कारवाँ’ हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक नई प्रगति का प्रवर्तक है, जिसमें शॉ और आस्कर वाइल्ड का सुन्दर समन्वय हुआ है. अभी तक हमारा हिन्दी ड्रामा घटनाओं और चरित्रों और कथाओं के आधार पर ही रखा गया है. कुछ समस्या नाटक भी लिखे गए हैं. जिनमें रूढ़ियों का या नए-पुराने विचारों का खाका खींचा गया है, पर सब कुछ स्थूल, घटनात्मक दृष्टि से हुआ है, जीवन और उसकी भिन्न-भिन्न समस्याओं पर सूक्ष्म, पैनी, तात्त्विक, बौद्धिक दृष्टि डालने की चेष्टा नहीं की गयी जो नए ड्रामा का आधार है.’’

प्रेमचन्द को भुवनेश्वर ने कितना प्रभावित किया था इसका प्रमाण हैं उपर्युक्त पंक्तियाँ. भुवनेश्वर एक साथ शॉ और वाइल्ड होना चाहते थे. शॉ होना प्रेमचन्द के लिए अच्छी बात थी, किन्तु आस्कर वाइल्ड की विशेषताएँ वे छोड़ कर आगे बढ़ें, ऐसा प्रेमचन्द चाहते थे. उन्होंने निष्कर्ष देते हुए लिखा- ‘‘भुवनेश्वर प्रसाद जी में प्रतिभा है, गहराई है, दर्द है, पते की बात कहने की शक्ति है, मर्म को हिला देने की वाक्चातुरी है. काश, वह इसका उपयोग ‘एक साम्यहीन साम्यवादी’ जैसी रचनाओं में करते. आस्कर वाइल्ड के गुणों को लेकर क्या वह उसके दुर्गुणों को नहीं छोड़ सकते.’’

प्रेमचन्द ने ‘कारवाँ’ की समीक्षा जितने जोरदार ढंग से लिखी है, उतनी किसी दूसरी पुस्तक की नहीं. जितनी भुवनेश्वर की प्रशंसा की है, किसी लेखक की नहीं. वे भुवनेश्वर को कितना मानते थे, स्नेह करते थे, उनके शब्दों में छलछला रहा है. बस वे चाहते थे कि वाइल्ड के दुर्गुणों को छोड़कर वे आगे बढ़ें. लेकिन ऐसा हो नहीं सका.

प्रेमचंद ने बनारसीदास चतुर्वेदी को लिखे एक पत्र में भुवनेश्वर की रचनात्मक प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए लिखा- ‘‘मेरी समझ में भुवनेश्वर सबसे अधिक प्रतिभा सम्पन्न हैं, शर्त एक ही है कि वह अपनी प्रतिभा को आलस्य, खयाली पुलाव पकाने, सिगरेट फूँकने और इश्कबाजी के चक्कर में बरबाद न कर दे. उसके पास अभिव्यक्ति की असाधारण शक्ति है, आस्कर वाइल्ड और शॉ के रंग में.’’

भुवनेश्वर मानव स्वभाव की पतनशील प्रवृत्तियों को अपने लेखन से ज्यादा अपने जीवन में जगह दे चुके थे और उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे. वे रिश्ते-नाते, घर-परिवार सभी को त्यागकर साहित्य-सेवा में आये और अद्भुत, अश्रुतपूर्व, मौलिक उद्भावनाओं से परिपूर्ण अनेक रचनाओं की सृष्टि की, जिसकी चमक आज भी फीकी नहीं हुई है.

‘कारवाँ’ में संकलित छह एकांकियों के अलावा उनके महत्त्वपूर्ण एकांकी निम्नलिखित हैं- 1936 ई. में ‘मृत्यु’, ‘हम अकेले नहीं’, ‘सवा आठ बजे’, 1938 के ‘हंस’ के एकांकी नाटक विशेषांक में प्रकाशित ‘स्ट्राइक’, जिसका जिक्र रामचन्द्र शुक्ल के ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में है. इसी वर्ष ‘हंस’ में ही ‘ऊसर’ एवं ‘रूपाभ’ के पाँचवें अंक (अक्टूबर, 1938 ई.) में ‘आदमखोर’ नामक नाटक छपा. 1940 ई. में गोगोल के नाटक का एकांकीकरण ‘इन्सपेक्टर जनरल’ प्रकाशित हुआ.1941 ई. में ‘विश्ववाणी’ पत्रिका में ‘रोशनी और आग’ नामक एकांकी छपा. 1942 ई. में प्रतीकवादी शैली में उनका प्रथम एकांकी ‘कठपुतलियाँ’ का प्रकाशन. 1945 ई. में ‘फोटोग्राफर के सामने’ और उनका सर्वाधिक चर्चित एकांकी ‘ताम्बे के कीड़े’ 1946 ई. में छपा. 1948 ई. ‘इतिहास की केंचुल’, 1949 ई. में ‘आजादी की नींव’, ‘जेरुसेलम’, ‘सिकन्दर’, 1950 ई. में ‘अकबर’, ‘चंगेज खाँ’ और अन्तिम एकांकी ‘सींकों की गाड़ी’ का प्रकाशन हुआ. ये भुवनेश्वर के अमर एकांकी हैं, जो विभिन्न पाठ्य-पुस्तकों में संकलित होते रहे हैं और किसिम-किसिम के लिखे हिन्दी साहित्य के इतिहासों में एकांकी विधा के प्रसंग में उल्लेख किये जाते रहे हैं. सभी इतिहासकारों ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि नए ढंग के एकांकी नाटक लिखने की शुरुआत भुवनेश्वर ने ही की. यह ध्यान में रखने की बात है कि हिन्दी में पहला एकांकी-संग्रह जयशंकर प्रसाद का 1929 में प्रकाशित ‘एक घूंट’ है एवं दूसरा 1935 ई. में प्रकाशित ‘कारवाँ’. इस तरह यह निर्विवाद रूप से हिन्दी साहित्य के इतिहास में सर्वसम्मत रूप में दर्ज कर लिया गया कि भुवनेश्वर का एकांकी-साहित्य में अप्रतिम योगदान है.

1936 ई. में भुवनेश्वर लखनऊ में रह रहे थे. वहीं उनकी निराला से अक्सर भेंट हो जाया करती. उसी समय निराला ने अपनी कमर से ऊपर तक नग्न तस्वीर खिंचवाई. यह तस्वीर उनके लम्बे निबन्ध ‘मेरे गीत और कला’, (जो ‘माधुरी’ के तीन अंकों में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था.) की पहली किस्त के साथ ‘माधुरी’ के मार्च, 1936 अंक में प्रकाशित हुई. भुवनेश्वर ने लखनऊ के कैसरबाग में स्थित पुस्तकालय में बैठकर निराला का यह निबन्ध ध्यान से पढ़ा और उनके इस चित्र ने उनको काफी प्रभावित किया. निराला की अर्धनग्न यह तस्वीर भुवनेश्वर को बहुत दिलचस्प लगी. लगा कि उनके ही जैसा अजब, गजब और बेबाक एक तेजस्वी व्यक्तित्व है हिन्दी में, जो शालीनता, सज्जनता, पूर्वाग्रह, नैतिकता की दीवार तोड़कर, अपने ओढ़े हुए सभी आवरण हटाकर, साहित्य में संघर्ष कर रहा है. अक्टूबर महीने के प्रारम्भ में ही भुवनेश्वर ‘माधुरी’ के दफ्तर गये और उसके सम्पादक रूपनारायण पाण्डेय से कहा कि वे निराला पर एक लेख लिखना चाहते हैं, पर पारिश्रमिक तुरंत चाहिए. रूपनारायण पाण्डेय ने इसे स्वीकार कर लिया. भुवनेश्वर ने ‘माधुरी’ के दफ्तर में बैठकर निराला पर एक अद्भुत लेख लिखा, जिसके प्रारम्भ में उन्होंने निराला से बातचीत का एक टुकड़ा रखा, फिर निराला पर अपनी विलक्षण राय रखी- ‘‘निराला बंगाली संस्कृति का कवि है. वह संस्कृति जो ‘टैगोर की द्रुत मैनरिज्म’ से पैदा हुई है, जिसके अति विश्लेषण में कबीर, ब्लेक सभी आते हैं. पंत को उसने बार-बार टैगोर का प्रोटेजे बताया है, पर सत्य यह है कि निराला टैगोर को पचा न सका. वह मैनरिज्म का कवि है, वह उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं का कवि है, वह अपने सर्वोत्तम रूप में भी एक चतुर शिल्पी है. शायद महान भी, पर महान कवि नहीं. निराला में टैगोर की शक्ति नहीं, ‘जुही की कली’, ‘तुम और मैं’ वगैरह में अर्थ की स्थूलता है. निराला मेहनती है, आत्माभिमानी है, विशाल हृदय है, उसकी कविता में साधना है, अध्यवसाय है, कारीगरी है, कोमलता है, पर वही नहीं है जिसके बगैर वह न ब्राउनिंग है, न बर्न्स, केवल निराला है. वह बना सकता है, पर निर्माण नहीं कर सकता. वह जीवन को पचा नहीं सकता. कथाकार की हैसियत से निराला गम्भीर विवेचन का पात्र नहीं है.’’

नवम्बर, 1936 की ‘माधुरी’ में भुवनेश्वर का यह लेख छपा. इस लेख की हिन्दी के साहित्यकारों के बीच काफी चर्चा हुई. इस तरह की भाषा में हिन्दी में लिखी यह पहली आलोचना थी. तब निराला इलाहाबाद के लीडर प्रेस में वाचस्पति पाठक के साथ रह रहे थे. ‘राम की शक्तिपूजा’ उसी समय साप्ताहिक ‘भारत’ में प्रकाशित हुई थी. भुवनेश्वर के इस लेख से वे बहुत दुखी और क्षुब्ध हुए. निराला को लगा कि यह उनकी रचनाशीलता पर भीषण तौर पर किया गया हमला है. 7 नवम्बर को निराला ने रामविलास शर्मा को लिखे पत्र में पूछा- ‘माधुरी’ में मुझपर छपा वह लेख भुवनेश्वर वाला तो देखा होगा? फिर 8 नवम्बर को उन्होंने रामविलास शर्मा को सूचित किया कि माधुरी का उत्तर कल भेज रहा हूँ. साथ दो और आदमियों के संस्मरण हैं भुवनेश्वर पर. फिर 9 नवम्बर को पत्र में लिखा- ‘‘श्री भुवनेश्वर प्रसाद को उत्तर भेज चुका हूँ. मैंने भूमिका भर लिखी है, मुझे ही लिखना था, क्योंकि बातचीत उन्होंने मेरी लिखी है, उनका परिचय मेरे मित्र पं. वाचस्पति पाठक और बलभद्र प्रसाद मिश्र एम. ए. (आपकी तरह प्रयाग विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कालर) ने लिखा है, दोनों पत्र भेज दिये हैं जो बड़े चुभते हुए हैं. वहाँ छपते-छपते पढ़ लीजियेगा. उनके लिये बड़े तिक्त साबित होंगे.’’ पत्र के अंत में उन्होंने रामविलास शर्मा को सुझाव दिया- ‘‘आप साहित्यिक तरीके से एक लेख लिखकर भुवनेश्वर प्रसाद से अंगरेजी और फ्रेंच का ज्ञान थोड़ा-बहुत प्राप्त करने की कोशिश करें तो क्या बुरा है : Morbidity   तो वे आपको बहुत दिनों तक बतायेंगे, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ. उनके उत्तर में मैंने आपका थोड़ा-सा उल्लेख किया है कि ‘‘स्कॉलर कवि मित्र श्री रामविलास शर्मा के यहाँ कला की रूपरेखा लिखी.’’

भुवनेश्वर को साहित्य से खारिज कर देने वाला निराला का यह उग्र लेख वाचस्पति पाठक एवं बलभद्र प्रसाद मिश्र की टिप्पणियों के साथ ‘माधुरी’ के दिसम्बर, 1936 अंक में छपा, जिसमें उनके फरेबी स्वभाव और मनगढंत हाँकने वाला सिद्ध किया. अब तक भुवनेश्वर अपनी प्रतिभा के दम पर अपने आपको प्रगतिशील, नए साहित्य-विवेक और विद्रोही चेतना से सम्पन्न ऊँचाई पर महसूस करते रहे थे, पर इस लेख ने पहली बार उन्हें धराशायी कर दिया था. वे निरीह और हताश नजर आये. उन्होंने निराला को उत्तर दिया, जो जनवरी, 1937 की ‘माधुरी’ में छपा- ‘‘अगर निराला जी का Vindication है तो कुरुचिपूर्ण, अगर Revenge तो बहुत सख्त. मैं फिर कहता हूँ कि इस प्रसंग में कमोबेश मैंने उनके शब्द ही दोहराये हैं और बर्न्स वाली बात उस वक्त मुत्तलक नहीं हुई थी. रहा एम.ए. और आई.सी.एस. का फरेब, मैं अपराधी प्लीड करता हूँ, कर चुका हूँ कई बार. परिस्थितियाँ बलवती मनुष्य से इससे भी जघन्य काम करवाती हैं, मुझसे करवा चुकी हैं. इन्हें संग्राम करते हुए एक कलाकार पर दाग लगाने के लिए प्रयोग करना हलकापन है. खैर! अगर इस बात से जन्म भर के लिए मैं ज्ंइवव किया जा सकता हूँ मेरी बला इसकी परवा करे.’’ अंत में उन्होंने लिखा कि ‘‘अब अपनी ओर से इसे (यानी इस प्रसंग को) समाप्त ही करता हूँ. अगर मैं वाकई मर गया हूँ तो गालिब का एक शेर निराला जी, मिश्र जी, पाठक जी और पसेपर्दा और सज्जन सुन लें-

गर नहीं है मेरे मरने से तसल्ली न सही
इम्तहाँ और भी बाकी हों तो यह भी न सही.

रामविलास शर्मा ने निराला की जीवनी लिखते हुए इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है. मैं इस प्रसंग को जब भी पढ़ता हूँ, मुझे फणीश्वरनाथ रेणु की ‘अगिनखोर’ कहानी की याद आती है, जिसे उन्होंने पटना के दो विद्रोही युवा लेखकों को एक चरित्र में ढालकर ‘अगिनखोरजी’ बनाकर कुछ वैसा ही प्रसंग खड़ा किया था. 1972 ई. में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में जब वह कहानी प्रकाशित हुई थी तब ये दोनों युवा लेखकों (आलोक धन्वा और जुगनू शारदेय) ने उनसे पटना कॉफी हाउस में तीव्र बहस की थी कि उनके चरित्र को आधार बनाकर उन्होंने क्यों वह कहानी लिखी?

रामविलास शर्मा ने इस प्रसंग के अंत में लिखा है- ‘‘भुवनेश्वर कलाकार थे. घिर जाने पर साफगोई से काम लेते थे. अपनी पूँजी बहुत कम थी. दूसरों से उधार लिये हुए माल पर अपनी विट से पालिश ही कर सकते थे. पर बहुत से आई.सी.एस. अफसरों, एम.ए. पास होनहारों और प्रोफेसरों से वह ज्यादा काबिल थे. यही सबब है कि इस वर्ग के लोगों को इतने दिन तक वह चकमा देते रहे, भेद खुल जाने पर भी उनकी प्रतिभा की दाद देनेवाले उसमें दस-पाँच फिर भी बचे रहे.निराला विचलित हुए, अपने साथ दो अन्य व्यक्तियों के लेख लेकर उत्तर देने आये, यह भुवनेश्वर की सफलता थी.’’

खानाबदोश अर्थात् बेघरबार, आवारा, चकमा देने वाला, छली, ठग, जालसाज भुवनेश्वर की अजीबोगरीब दास्तान चलती रही. वे इलाहाबाद, लखनऊ और काशी की गलियों में घूमते-फिरते कई लेखकों को अनायास दिखलाई पड़ते और फिर ओझल हो जाते. भोजन-पानी का इन्तजाम हुआ, फिर किसी पुस्तकालय में पढ़ते नजर आते. वहीं बैठकर कुछ लिखते. कभी पत्र-पत्रिकाओं के दफ्तर में. उनकी रचनाएँ यदा-कदा छपती रहतीं. भुवनेश्वर में इतनी प्रतिभा थी कि कहीं नौकरी कर सकते थे, घर बसा सकते थे, व्यवस्थित जीवन जीते हुए विपुल साहित्य रच सकते थे. किन्तु उन्होंने अपने जीवन को स्वेच्छाचारी बनाया था. उनकी मृत्यु के बाद उनका अन्तिम संस्कार करने वाला न कोई था और न उनकी रचनाओं को सहेजने वाला. उनका जीवन जैसा बिखरा था, उनकी रचनाएँ भी बिखरी रह गई. 2010 ई. में उनके शताब्दी वर्ष में हिन्दी रंगमंच का ध्यान फिर भुवनेश्वर पर गया. मीराकांत ने ‘भुवनेश्वर-दर-भुवनेश्वर’ नामक नाटक लिखा जो भुवनेश्वर के जीवन एवं एकांकियों से टुकड़े लेकर अद्भुत रूप में संयोजित है. इसे सुशील कुमार गौतम ने अपने निर्देशन में 17 अक्टूबर, 2010 को कनक थियेटर ग्रुप के द्वारा लिटिल थियेटर ग्रुप ऑडिटोरियम में प्रस्तुत किया. इसके साथ ‘कंजूस’ नामक एकांकी भी प्रस्तुत किया गया. ‘भुवनेश्वर-दर-भुवनेश्वर’ में यह दिखलाया गया कि भुवनेश्वरवाद क्या है और किस तरह बदनाम भुवनेश्वर का जन्म हुआ, जिसने स्वेच्छा से बदनामी की चादर ओढ़कर भी रचनाशीलता की बुलंदियों को छुआ, वैसा लेखक उग्र थे, निराला थे और फिर स्वयं भुवनेश्वर.

रामविलास शर्मा जिस तरह भुवनेश्वर की प्रतिभा का सम्मान करते थे, उससे भी बढ़कर उनकी कदर करने वाले शमशेर बहादुर सिंह थे. 1958 ई. के जनवरी में जब भुवनेश्वर की मृत्यु की खबर आयी तो वह शमशेर को झकझोर गई और उन्होंने भुवनेश्वर पर एक कविता लिखी जो हरिशंकर परसाई के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘वसुधा’ में छपी. बाद में उस कविता को शमशेर ने संशोधित-परिवर्तित कर ‘कुछ और कविताएँ’ (1961) में शामिल किया. किन्तु, रामविलास शर्मा को उसका पहला प्रारूप ही पसंद था. जब उन्होंने शमशेर की कविताओं पर ‘धर्मयुग’ (27 जून, 1965 ई.) में ‘शमशेर बहादुर सिंह : गहरे बीहड़ संस्कारों वाला काव्य-व्यक्तित्व’ नामक लेख लिखा, तो ‘वसुधा’ में प्रकाशित कविता के पाठ को ही ज्यादा सही बताया. भुवनेश्वर पर लिखी यह शमशेर की एक अमर कविता है, जो उनके जीवन और साहित्य को समझने का एक नया नजरिया देती है. यह पूरी कविता इस तरह है :

आदमी रोटी पर ही जिन्दा नहीं
तुमसे बढ़कर और किसने
हर सच्चाई को अपनी कड़ुई मुस्कराहट भरी भूख
के अन्दर
जाना होगा?

पता नहीं तुम कहाँ किस सदाव्रत का हिसाब
किस लोक में
लिख रहे हो
बगैर खाए-पिए ...
सिर्फ अमरूदों की सी गोरी सुनहरी धूप अंगों की
फ्रेम से उभरती हो कमरे के एकान्त में,
भुवनेश्वर,
जहाँ तुम बुझी हुई आँखों के अन्दर
एजरा पाउण्ड के टुकड़े,
इलियट के बिब्लिकम पीरियड्स
किसी ड्रामाई खाब में,
पॉल क्ली के घरौंदों में, एक फ्रीवर्स की तरह तोड़ देते हो
खाब में ही हंसते हुए!
आह! बदनसीब शायर, नाटककार, फकीरों में
नव्वाब, गिरहकट
आजाद अघोरी साधक!
होठ बीड़ी-सिगरेट की नीलिमा से (चूमे हुए किसी रूप के)
किसी एक काफिर शाम में,
किसी क्रास के नीचे
वो दिन, वो दिन ...
धुंधली छतों में बिखर गये हैं
शराब के, शवाब के, दोस्त एहबाब के वो-
वो ‘विटी’ गुनाह-भरे
खूबसूरत बदमाश दिन
चले गये हैं...
हाँ, तपती लहरों में छोड़ गये हैं वो
संगम गोमती दशाश्वमेध के
सैलानियों की बीच
न जाने क्या
एक टूटी हुई नाव की तरह,
जो डूबती भी नहीं, जो सामने हो जैसे,
और कहीं भी नहीं.

शमशेर ने भुवनेश्वर की जीवंत और यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत की है, साथ ही उनके साथ के अपने लगाव को मार्मिकता से उजागर किया है. भुवनेश्वर अपने अंतिम दिनों में ज्यादातर बनारस में विदेशी सैलानियों के बीच रहते थे. यदा-कदा जब कभी इलाहाबाद आते तो शमशेर के साथ ही रहते. उनकी लिखी हुई अनेक रचनाएँ शमशेर के यहाँ अप्रकाशित पड़ी हुई रहतीं. 1950 के बाद अपनी रचनाओं के प्रकाशन की उनको चिन्ता ही नहीं रह गई थी. शमशेर ने उनकी कुछ रचनाओं को तब इलाहाबाद की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाया था.उन्होंने अंगरेजी में भी काफी कुछ लिखा था. शमशेर ने ‘निष्कर्ष’ के तीसरे एवं चौथे संयुक्त संकलन में, जिसके संपादक धर्मवीर भारती और लक्ष्मीकान्त वर्मा थे और जो जनवरी, 1957 में प्रकाशित हुआ था, भुवनेश्वर की एक अंगरेजी कविता का अनुवाद प्रकाशित करवाया था, जो उनकी अन्तिम प्रकाशित रचना है. कविता का शीर्षक हैः ‘बौछार पे बौछार’-

बौछार पे बौछार
सनसनाते हुए सीसे की बारिश का ऐसा जोश
गुलाबों के तख्ते के तख्ते बिछ गए कदमों में
कायदे से अपने रंग फैलाए मेह से कुम्हलाए हुए
आग आवश्यकता से अधिक पीड़ा का बदला चुकाने को
पीड़ा निर्बीज करने वाली उस आग से भी अधिक
दल के दल बादल
कि हौले-हौले कानाफुसियाँ हैं अफवाह की
जो अपशकुन बन कर फैली हैं
किसी...दीर्घ आगत भयानक यातना की
फौजी धावा हो जैसे, ऐसा अन्धड़
बादलों के परे के परे बुहार कर एक ओर कर रहा
ऐसी-ऐसी शक्लों में छोड़ते हुए उनको
कि भुलाए न भूलें
आदमी पर आदमी का ताँता
और हरेक के पास
बड़े ही मार्मिक जतन अलगायी हुई अपनी
एक अलग कहानी
उसी व्यक्ति को लेकर
जो सदा वही एक कुर्ता पहने
उसी एक दिशा में चला जाता रहा
रहम पर रहम की मार
मरदूद करार देने उसी व्यक्ति को
और उसके साथ उसे मठ के पुजारी को भी
जो शपथ ले-ले के जीतों और मुर्दों की
कम से आधे पखवारे में एक बार तो
झूठ बोलता ही है.

लेखक :
भारत यायावर (1954-2021) हिन्दी के जाने माने साहित्यकार हैं। 'झेलते हुए'  और 'मैं हूँ यहाँ हूँ' (कविता संग्रह), 'नामवर होने का अर्थ' (जीवनी), 'अमर कथाशिल्पी रेणु', 'दस्तावेज', 'नामवर का आलोचना-कर्म' (आलोचना)— इनकी चर्चित पुस्तकें हैं। इन्होंने हिन्दी के महान लेखक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं फणीश्वरनाथ रेणु की खोई हुई और दुर्लभ रचनाओं पर लगभग पच्चीस पुस्तकों का संपादन किया है। 

डाउनलोड पीडीएफ