पूर्वाभास (www.poorvabhas.in) पर आपका हार्दिक स्वागत है। 11 अक्टूबर 2010 को वरद चतुर्थी/ ललित पंचमी की पावन तिथि पर साहित्य, कला एवं संस्कृति की पत्रिका— पूर्वाभास की यात्रा इंटरनेट पर प्रारम्भ हुई थी। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

चर्चित कवि एवं आलोचक कुमार मुकुल— अवनीश सिंह चौहान


मुरादाबाद की प्रतिष्ठित शायरा मीना नक़वी का एक शेर है— "जब ख़यालों में दबे पाँव वो आ जाता है/ वो मुलाक़ात मुलाक़ात हुआ करती है।" कुछ ऐसी ही मुलाक़ात बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में 5 अगस्त 2011 को कुमार मुकुल से मेरी भी हुई। किसी रचनाकार से इस प्रकार की मुलाक़ात सुखद अनुभूति तो कराती ही है, रचनात्मक ऊर्जा भी प्रदान करती है। हुआ भी यही। उस रात बीकानेर हाउस में मैं और मेरे अज़ीज़ कवि, अनुवादक एवं संपादक अनिल जनविजय जयपुर जाने वाली बस का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी वहाँ पर कुमार मुकुल का आगमन हुआ। अनिल जी ने बड़े प्रेम से परिचय कराते हुए कहा कि कुमार मुकुल अच्छे कवि हैं। अच्छे कवि से मिलकर कविता सुनना कविता पढ़ने से कहीं ज्यादा अच्छा लगता है। इसलिए हमने विचार किया कि कुमार मुकुल से उनकी कुछ कविताएँ सुन लीं जाएँ। बस के आने में समय था ही। आग्रह करने पर मुकुल जी ने प्रसन्न-मुद्रा में 'ग्यारह सितम्बर', 'अंतरिक्ष में विचार', 'प्रेम के बारे में' आदि कविताएँ सुनायीं। विचार विनिमय हुआ। बस आयी। हम सब बस पर सवार हुए और जयपुर के लिए निकल पड़े। सुबह जयपुर पहुँचे। वहाँ हमें एक बड़ी होटलनुमा धर्मशाला में ठहराया गया। 

एक दिन बाद यानी कि 07 अगस्त 2011 को 'प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह' जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में आयोजित किया जाना था। 6 अगस्त की रात को बाहर से आने वाले सभी साहित्यकार-मित्र—  बल्ली सिंह चीमा, नरेश सक्सेना, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', ललित कुमार, प्रतिष्ठा शर्मा, धर्मेन्द्र कुमार सिंह, आदिल रशीद, पूनम तुषामड़ आदि अपने-अपने कमरों में ठहरे हुए थे (बाद में यहीं पर प्रेमचन्द गाँधी, दुष्यंत, माया मृग, मीठेश निर्मोही, बनज कुमार ‘बनज’ आदि से भी मुलाकात हुई थी)। एक कमरे में कुमार मुकुल के साथ मैं ठहरा हुआ था। चारों तरफ खुशनुमा माहौल था। संध्या हो चुकी थी।  लगभग आठ बजे के आस-पास वरिष्ठ साहित्यकार नरेश सक्सेना और युवा कवयित्री पूनम तुषामड़ हम दोनों से मिलने आये। बातचीत हुई और उसके बाद कुमार मुकुल की कविताएँ पुनः सुनने को मिलीं। उस समय मुकुल जी की 'आज' नामक कविता की सराहना करते हुए नरेश सक्सेना ने कहा था कि इस कविता के कथ्य में ताज़गी एवं मौलिकता है। यह सब जान-समझकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा था कि मुकुल जी कविताई करने में सिद्धहस्त हैं। 

चर्चित कवि एवं आलोचक कुमार मुकुल (मूल नाम— अमरेन्द्र कुमार) का जन्म 2 मई 1966 को आरा, भोजपुर (बिहार) के संदेश थाने के तीर्थकौल गाँव में हुआ था। सामान्य जीवन-स्थितियों में अध्ययन एवं मनन करते हुए उन्होंने आरा से ही इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई करने के लिए अपने पिता श्री गंगा प्रसाद सिंह के पास सहरसा चले आये। सहरसा में उनके पिताश्री एक सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे। पिताश्री के सानिध्य में उन्होंने 1986 में सहरसा कॉलेज, सहरसा से राजनीति विज्ञान में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तदुपरांत वे पटना चले आये और स्वाध्याय एवं संघर्ष करने लगे। इसी दौरान 1989 में उन्होंने अमान वीमेंस कॉलेज, फुलवारी शरीफ, पटना में अध्यापन कार्य प्रारम्भ कर दिया। अध्यापन का सुख और संघर्ष कुछ विचित्र होता है। शायद यह सुख और विचित्रता उन्हें रास नहीं आयी और वे अपनी बौद्धिक अभिरुचि के अनुसार लेखन और संपादन में अपने आपको व्यवस्थित करने लगे। 

कॉलेज की नौकरी छोड़ने के बाद  उन्होंने 1994 से 2015 के बीच हिन्दी की आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं, यथा— 'अमर उजाला', 'देशबन्धु', 'पाटलिपुत्र टाइम्स', 'प्रभात खबर', 'कल्पतरू एक्सप्रेस' आदि में संवाददाता, उप संपादक, संपादकीय प्रभारी, फीचर संपादक व स्थानीय संपादक के रूप में सफलतापूर्वक कार्य किया। इसी दौरान 2003 में उनके बेटे की कैंसर की बीमारी के चलते जब उनके जीवन में बाधाएँ आने लगीं, तब वे दिल्ली स्थित ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका— 'नया ज्ञानोदय' में जाने-माने साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय के साथ संपादकीय सहयोगी के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने 2005 से 2007 के बीच द्वैमासिक साहित्यिक लघु पत्रिका— 'सम्प्रति पथ' का दो वर्ष तक संपादन, 2007 से 2011 तक त्रैमासिक पत्रिका— 'मनोवेद' में कार्यकारी संपादक एवं 2011 से 2012 तक आकाशवाणी में 'को-आर्डिनेटर' के रूप में भी कार्य किया है। तदुपरांत नवंबर 2015 से जून 2020 तक उन्होंने 'राजस्थान पत्रिका' (जयपुर) में कंटेंट स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। 

पेशे से पत्रकार और 'पैशन' से लेखक कुमार मुकुल कलम के धनी हैं। उनकी लेखन क्षमता ग़जब की है। उनकी यह विशिष्ट स्थिति उनकी लगन, समर्पण एवं कड़ी मेहनत का प्रतिफल है। कहने का आशय यह भी कि उनकी कविताई एवं आलोचना जनता-जनार्दन को गहरी नींद से जगाने, जागती आँखों से यथार्थ को परखने और बेहतर जीवन के लिए सार्थक सपने बुनने की प्रेरणा एवं उत्साह प्रदान करने में पूरी तरह से सक्षम है। शायद तभी उनकी कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ, लेख आदि 'वसुधा', 'हंस', 'पाखी', 'कथादेश', 'इंडिया टुडे', 'सहारा समय', 'समकालीन तीसरी दुनिया', 'जनपथ', 'जनमत', 'समकालीन सृजन', 'देशज', 'शुक्रवार', 'आउटलुक', 'नवभारत टाइम्स', 'हिन्दुस्तान', 'जनसत्ता', 'दैनिक जागरण', 'कादम्बिनी', 'आजकल', 'समकालीन भारतीय साहित्य', 'प्रथम प्रवक्ता' आदि पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होते रहे हैं। 'परिदृश्य के भीतर' (पटना पुस्तक मेले का ‘विद्यापति सम्मान' से अलंकृत कविता संग्रह, रश्मिप्रिया प्रकाशन, 2000), 'ग्यारह सितंबर और अन्य कविताएँ' (हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा अनुदान प्राप्त कविता संग्रह,  मेधा बुक्स, 2006), 'डॉ लोहिया और उनका जीवन-दर्शन' (जीवन-दर्शन एवं आलोचना, प्रभात प्रकाशन, 2012), 'अंधेरे में कविता के रंग' (काव्यालोचना, नई किताब प्रकाशन, 2012), 'सोनूबीती— एक ब्लड कैंसर सर्वाइवर की कहानी' (मनोवेद संस्थान, 2015), 'एक उर्सुला होती है' (कविता संग्रह, अंतिका प्रकाशन, 2016) आदि उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 2014 में 'हिन्दी की कविता : प्रतिनिधि स्वर' के पाँच कवियों में उन्हें भी शामिल किया गया था। दिल्ली में रचे-बसे कुमार मुकुल वर्तमान में 'कारवाँ' ब्लॉग का संचालन एवं संपादन कर रहे हैं।

यहाँ पर कुमार मुकुल की दस कविताएँ प्रस्तुत की जा रही हैं :-

1. वसंत, चींटियाँ और मनुष्यता

वसंत आ चुका है
यूँ बहुत से पेड़ अब भी नंगे खड़े हैं
पर चींटियों की फ़ौज़ बहराने लगी है
अपने बिलों-दांदरों से
अब मुझे भी बहराना होगा
अपने आलस्य, अपने मौन से

जमने को रखे दूध पर
कैसी पिल पड़ी हैं वे
जैसे माओ की सेना
एक जमात धंस जा रही
तो दूसरी उनके मृत सरों पर सवार
पहुँचना चाह रही
अपनी भूख अपनी प्यास तक

करोडों-करोड़ लोगों
तुम भी उठो अब
बहराओ अपनी दरारों से
और लील जाओ
जो तुम्हारी भूख-प्यास पर कब्जा किये बैठे हैं
कि अब बंटवारा बिल्कुल साफ होता जा रहा
कि अब कोई मुकाबला नहीं
कि गिनती के हैं वे अब
दस, बीस, पचास, सौ, बस
उठो कि फ़ैज़ पुकार रहे—
'कटते भी चलो बढ़ते भी चलो...'

उठो और मनुष्यता की इस
धोखे की टाट से गिरो
पर इस बार शेर बाघ-बघेरों के पाले मे नहीं
कि वे तो निश्चिन्ह हो चुके कब के
गिरो अब चींटियों की पांत में
कि मनुष्यों से बच नहीं पा रही मनुष्यता
चींटियों से बच जाये शायद।

2. कवि और आदमी 

अपने या 
इसके-उसके चाहने से 
कोई कवि नहीं हो जाता 
होते-होते ही 
कवि होता है कोई
जैसे कोई मनुष्य बनता है 
बनते-बनते ही
बना बनाया नहीं होता वह।

3. सुबह 

चांदनी की
रहस्यमयी परतों को दरकाती
सुबह हो रही है

जगो
और पाँवों में पहन लो
धूल मिट्टी ओस
और दौड़ो
देखो-स्मृतियों में
कोई हरसिंगार अब भी हरा होगा
पूरी रात जग कर थक गया होगा
संभालो उसे-उसकी गंध को संभालो

जगो
कि कुत्ते सो रहे हैं अभी
और पक्षी खोल रहे हैं
दिशाओं के द्वार

जगो
और बच्चों के स्वप्नों में
प्रवेश कर जाओ।

4. आज 

अशोक राज-पथ, सिकन्दर लेन, शाहजहाँ-पथ
कभी मुल्क होता था
जिन सम्राटों-शहंशाहों के नाम
आज
जोगा रहे हैं वो
एक-एक सड़क।

5. अंतरिक्ष में विचार 

आजकल विचार
अंतरिक्ष में लटक रहे हैं
जूतों की तरह
विश्वासों की अंधता से बंधे
और हम कुछ नहीं कर पा रहे
सिवाए इसके
कि उन जूतों की टक-टक
अपनी खोपड़ी पर महसूस करें
और एक बुसी हँसी हँसें
जैसी कि
युवा कवि हँसते हैं इन दिनों
मंचों पर अकेला पड़ते ही

कुछ भी खुला नहीं है आज
सिवा मुँह के
कुछ परचूनिए
उसे भी दबा रहे हैं
अपनी घुटी मुस्कराहटों को
बाहर करने की कोशिश में

नहीं
कोई समस्या नहीं
बस देश है, पार्टियाँ हैं, सीमाएँ हैं
और राष्ट्रमंडल के ग़ुलाम देशों का खेल
किरकेट
और उसमें ली गई दलाली है, सट्टे हैं
कहीं कोई प्रतिरोध नहीं
अन्नदाताओं को ओढ़ा दी गई है रामनामी
या तो भरपेटा भजन कर रहे वे
या रामजी-सीता जी की राह पकड़
अपना रामनाम सत कर रहे

इतिहास की प्लास्टिक सर्जरी
की जा चुकी है
मोहक बनाया जा चुका है
उसके छल-कदमों को इरेज करके
द्वारिका ढंढ़ ली है उन्होंने
और अब द्रौपदी का पात्र ढूंढ़ रहे हैं
जिसमें कृष्ण को खिलाया गया था
साग का एक पत्ता
और उसके मिलते ही
जनदुर्वासाओं की मिट्टी
पलीद कर दी जाएगी।

6. ग्यारह सितंबर 

यह उनका अपना ही विशाल माथा था
जो भरभराकर ढहा आ रहा था
ख़ुद उन्हीं के क़दमों में
और भयाक्रांत भाग रहे थे वे
भाग जाना चाह रहे थे
अपने ही माथे की तनी भृकुटी से
व अपनी ही तीसरी आँख के
वैश्विक प्रकोप से

हिरोशिमा-नागासाकी नहीं था वह
वियतनाम-इराक भी नहीं था
यह उनका अपना ही
सर्वग्रासी, महाबलशाली हाथ था
जो अपना ही मुँह जाब रहा था

उनके ही हथियार थे
बारूद भी उनके ही कारखानों की थी
उनकी अपनी ही खोदी खाइयाँ थीं
और सीढ़ियाँ कम पड़ गई थीं
और उनके पाँव
लाचारी के जलजले में
धँसे जा रहे थे

न्यूटन की गति का तीसरा नियम था यह
जिसे असंख्य बार बेच चुके थे वह
पर जो आज उनके ही घर में
लागू हो रहा था पहली बार
बिक रहा था उनके ही हाथों
उनकी अपनी ही सर्वद्रष्टा आँख थी
कैमरे भी उनके ही थे
जो दुनिया को सब-कुछ दिखा रहे थे

अनगिनत त्रासदियों को
फ़िल्मा चुके थे वे
आज वह फ़िल्म
वे ख़ुद देख रहे थे।

7. प्रेम के बारे में 

क्या बता सकता हूं मैं
प्रेम के बारे में
कि मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है
सिवा मेरी आँखों की चमक के
जो जून की इन शामों में
आकाश के सबसे ज़्यादा चमकते
दो नक्षत्रों को देख
और भी बढ़ जाती है

हुसैन सागर का मलिन जल
जिन सितारों को
बार-बार डुबो देना चाहता है
पर जो निकल आते हैं निष्कलुष हर बार
अपने क्षितिज पर

क्या बताऊ मैं प्रेम के बारे में
या कि
उसकी निरंतरता के बारे में
कि उसे पाना या खोना नहीं था मुझे
सुबहों और शामों की तरह
रोज़-ब-रोज़ चाहिए थी मुझे उसकी संगत
और वह है
जाती और आती ठंडी-गर्म साँसों की तरह
कि इन साँसों का रूकना
क्यों चाहूंगा मैं
क्यों चाहूंगा मैं
कि मेरे ये जीते-जागते अनुभव
स्मृतियों की जकड़न में बदल दम तोड़ दें
और मैं उस फासिल को
प्यार के नाम से सरे बाज़ार कर दूँ
आखिर क्यूँ चाहूँ मैं
कि मेरा सहज भोलापन
एक तमाशाई दांव-पेंच का मोहताज हो जाए
और मैं अपना अक्स
लोगों की निगाहों में नहीं
संगदिल आइने में देखूँ।

8. उड़ान हूँ मैं 

चीजों को सरलीकृत मत करो
अर्थ मत निकालो
हर बात के मानी नहीं होते

चीजें होती हैं
अपनी संपूर्णता में बोलती हुयी
हर बार
उनका कोई अर्थ नहीं होता

अपनी अनंत रश्मि बिंदुओं से बोलती
जैसे होती हैं सुबहें
जैसे फैलती है तुम्हारी निगाह
छोर-अछोर को समेटती हुई
जीवन बढता है हमेशा
तमाम तय अर्थों को व्यर्थ करता हुआ
एक नये आकाश की ओर

हो सके, तो तुम भी उसका हिस्सा बनो

तनो मत बात-बेबात
बल्कि खोलो खुद को
अंधकार के गर्भगृह से
जैसे खुलती हैं सुबहें
एक चुप के साथ
जिसे गुंजान में बदलती
भागती है चिडि़या
अनंत की ओर
और लौटकर टिक जाती है
किसी डाल पर
फिर फिर
उड जाने के लिये

नहीं
तुम्हारी डाल नहीं हूं मैं

उडान हूं मैं
फिर
फिर।

9. भला होता है आदमी 

भला होता है आदमी
बुरा होता है
गला होता है आदमी
छुरा होता है
आदमी के वश में होता है
सीधा होना
बेबस होता है
तो वह मुड़ा होता है

मुसीबतों में
टूट भी जाता है आदमी
टूट कर भी
आदमीयत से जुड़ा होता है

छोटी सी ख़ुशी में
फूट पड़ता है आदमी
छोटे से गम में
वह बेसुरा होता है।

10. जूते में 

जूते में अपना पाँव डालते ही
लगता है
कि सिर डाल रहा होऊँ
फिर वही एक आवाज़ गूँजने लगती है
ठक-ठक
ठक-ठक से ऊँचा कोई भी स्वर
हो जाता है असह्य
जिसे उड़ा देना चाहता है जूता
अपनी ठोकरों में
और ऐसा करते
अक्सर वह
मेरे अपने ही सर से
ऊपर उठ जाता है।

A Note on Kumar Mukul by Abnish Singh Chauhan. Ten Hindi Poems of Kumar Mukul

सोमवार, 7 सितंबर 2020

अनिल जनविजय और उनकी दस कविताएँ— अवनीश सिंह चौहान

 


रामगंगा नदी के तट पर स्थित एवं नाथ नगरी के रूप में प्रतिष्ठित बरेली प्राचीन काल से ही ऐतिहासिक महत्व की रही है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक महत्व की इस ऐतिहासिक नगरी की प्रतिष्ठा को बढ़ाने में साहित्य और कला के साधकों का भी बड़ा योगदान है— 'राधेश्याम रामायण' के लोकप्रिय रचनाकार पं. राधेश्याम शर्मा कथावाचक, 'चंदा मामा दूर के' जैसी बाल-कविता के ख्यात कलमकार निरंकार देव सेवक, बरेली पत्रकारिता के जाने-माने स्तम्भ चन्द्रकान्त त्रिपाठी, 'चंदन वन डूब गया' के रस-सिद्ध गीतकवि किशन सरोज, बॉलीवुड फिल्मों की चर्चित अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा, जाने-माने कवि-अनुवादक एवं ऑनलाइन साहित्यिक पत्रकारिता के पुरोधा अनिल जनविजय आदि इसी शहर के ही तो हैं।

28 जुलाई 1957 को भूड़, बरेली (उत्तर प्रदेश) के एक निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे हिन्दी और हिन्दी साहित्य के प्रति जी-जान से समर्पित 'कविताकोश' और 'गद्यकोश' के पूर्व (संस्थापक) संपादक और 'भाषान्तर' के संस्थापक-संपादक अनिल जनविजय सीधे-सरल स्वभाव के ऊर्जावान व्यक्ति हैं। अनिल जी की इस ऊर्जा का विस्तार इतना अधिक है कि वह अनायास ही सोशल मीडिया में अपने सृजन, अनुवाद, प्रतिवाद (कभी-कभी बकवाद भी) के कारण चर्चा में बने रहते हैं। इसका परिणाम यह भी हुआ कि सोशल मीडिया में सक्रिय तमाम लोग उनकी साहित्यिक प्रस्तुतियों को सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं, तो वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो उनकी साहित्येत्तर चीजों को कई बार पूरी तरह से नकार भी देते हैं। कुछ भी हो यह व्यक्ति दिल का अच्छा है और साहित्य सेवा में सच्चा है— जो कहना होता है सो कह देता है, जो करना होता है सो कर लेता है। बाकी सब 'राम जी भला करें।'

कहने का आशय यह भी है कि अपनी माटी—अपनी जड़ों से अगाध प्रेम तथा भारत-रूस के बीच मजबूत पुल का कार्य करते हुए पुश्किन सम्मान के संस्थापक अनिल जी वर्षों से अपनी सर्जना एवं संपादन से हिन्दी के लिए विशिष्ट कार्य कर रहे हैं। उनके इस विशिष्ट सेवाभाव में कोई स्वार्थ नहीं है— वह तो पूरी तरह से निस्वार्थी हैं— न छपने-छपाने की कोई इच्छा, न पुरस्कार-सम्मान की कोई लालसा। इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने कभी किसी की सेवा ही नहीं ली— इसका मतलब तो बस इतना ही है कि वह आग्रह और अपेक्षा से एक सीमा तक मुक्त हैं— कभी किसी ने स्वतः ही अपनी पत्र-पत्रिका में उन्हें 'स्पेस' दे दिया तो ठीक, न दिया तो भी ठीक; किसी ने पूछ लिया तो ठीक, न पूछा तो भी ठीक; किसी ने मान दे दिया तो ठीक, न दिया तो भी ठीक।

जिज्ञासु विद्यार्थी रहे अनिल जनविजय को प्रारम्भिक शिक्षा के लिए बरेली स्थित केन्द्रीय विद्यालय भेजा गया। बचपन में पढ़ाई ठीक चल रही थी; साथ में कहानियों, उपन्यासों का पाठ भी चल रहा था; दिन मजे से गुजर रहे थे कि तभी एक दिन उनकी माँ का निधन हो गया और उन्हें अपने दादा-दादी के पास दिल्ली जाना पड़ा। यात्रा के अपने सुख-दुख होते हैं— उनकी बरेली से दिल्ली की यह यात्रा भी बहुत कुछ इसी प्रकार की ही थी। किन्तु, दिल्ली पहुँचकर उनका पढ़ना-लिखना जारी रहा। 1977 में दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम करने के बाद उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर तो कर लिया, किन्तु पढ़ाई से अब भी मन नहीं भरा था। इसलिए उन्होंने 1980 में पुनः जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रूसी भाषा और साहित्य संकाय से स्नातकोत्तर करने के लिए प्रवेश ले लिया। समय धीरे-धीरे बीत ही रहा था कि उन्हें 1982 में उच्च अध्ययन के लिए सोवियत सरकार की छात्रवृत्ति के रूप में एक सुनहरा अवसर मिल गया। छात्रवृत्ति पाकर वह मास्को विश्वविद्यालय पहुँचे। 1989 में उन्होंने मास्को स्थित गोर्की लिटरेरी इंस्टीटयूट से सर्जनात्मक लेखन में एम.ए. कर लिया। इसी दौरान (1983 से 1992 तक) वह मास्को रेडिओ की हिन्दी प्रसारण सेवा से भी जुड़े गये। कुछ वर्ष और बीते और उन्हें 1996 में मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी में ’हिन्दी साहित्य’ और 'अनुवाद’ का अध्यापन कार्य करने का एक और अवसर मिल गया। फिर क्या था- मास्को में ही विवाह हो गया— एक बेटी और दो बेटे हुए— और इस प्रकार समय के साथ उनकी जीवन-यात्रा में कुछ और पड़ाव भी आते गये।

अनिल जनविजय की जीवन-यात्रा के इन महत्वपूर्ण पड़ावों में कुछ पड़ाव साहित्य सर्जना के भी रहे, जिन्हें यहाँ संक्षेप में रखना उचित ही है— उन्होंने 1976 में पहली कविता लिखी थी, किन्तु पहली बार 1977 में साहित्यिक पत्रिका 'लहर' में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुईं और 1978 में पहली बार 'पश्यन्ती' के कवितांक (विशेषांक) में उनकी कविताएँ सम्मिलित की गयीं। इससे उनका उत्साह बढ़ गया और वह पूरे मनोयोग से कविताई करने लगे। परिणामस्वरूप उनका पहला कविता संग्रह— 'कविता नहीं है यह' 1982 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद उनके दो महत्वपूर्ण कविता-संग्रह—  'माँ, बापू कब आएंगे' (1990), 'राम जी भला करें' (2004) एवं 'दिन है भीषण गर्मी का' (2015) तो प्रकाश में आये ही, अनुवाद पर केंद्रित उनकी लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकें भी अब तक प्रकाश में आ चुकी हैं— 'माँ की मीठी आवाज़/ अनातोली परपरा', 'तेरे क़दमों का संगीत / ओसिप मंदेलश्ताम', 'सूखे होंठों की प्यास / ओसिप मंदेलश्ताम', 'धूप खिली थी और रिमझिम वर्षा / येव्गेनी येव्तुशेंको', 'यह आवाज़ कभी सुनी क्या तुमने / अलेक्सान्दर पूश्किन', 'चमकदार आसमानी आभा / इवान बूनिन' (सभी रूसी से हिन्दी), 'पहाड़ पर चढ़ना चाहते हैं सब / ज्यून तकामी' (जापानी से हिन्दी), 'यूनानी कवि ग्योर्गोस सेफ़ेरिस की कविताएँ', 'फ़्रेंच कवि गैयोम अपोल्लीनेर की कविताएँ' (सभी अँग्रेज़ी से हिन्दी), 'तुर्की कवि नाज़िम हिक़मत की कविताएँ' (रूसी और अँग्रेज़ी से हिन्दी), 'एल सल्वादोर के कवि रोके दाल्तोन की कविताएँ' (स्पानी से हिन्दी), 'अमेरिकी कवि इद्रा नोवे की कविताएँ' (अँग्रेज़ी से हिन्दी) आदि। अनिल जी ने प्रतिष्ठित साहित्यकार लीलाधर मंडलोई के साथ मिलकर 'तार सप्तक' की तर्ज पर 'कवि एकादश' (2008) पुस्तक का बेहतरीन संपादन भी किया है। लब्बोलबाब यह कि हिन्दी, रूसी तथा अंग्रेजी साहित्य की गहरी समझ रखने वाले इस बहुभाषी रचनाकार ने न केवल उम्दा कविताएँ, आलेख आदि लिखे हैं, बल्कि विभिन्न भाषाओँ की रचनाओं को हिन्दी और रूसी भाषा में सलीके से अनुवाद भी किया है।  

यदि हिन्दी और हिन्दी साहित्य के लिये बतौर संपादक महायज्ञ करने वालों की अति संक्षेप में बात की जाय तो आ. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, कन्हैयालाल नन्दन, राजेंद्र यादव, रवींद्र कालिया, दिनेश सिंह, पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, जयप्रकाश मानस, सुमन कुमार घई आदि आधुनिक भारत के विलक्षण हिन्दी-सेवियों की सूची में अनिल जनविजय का नाम भी ससम्मान जोड़ा जा सकता है— ऐसा मेरा मानना है।


1. कविता नहीं है यह

कविता नहीं है यह
बढ़ती हुई समझ है
एक वर्ग के लोगों में
दूसरे वर्ग के खिलाफ़

कविता नहीं है यह
आँखों में गुनगुना समन्दर है
निरन्तर फैलता हुआ चुपचाप
खौल जाने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
बन्द पपड़ाए होंठों की भाषा है
लहराती-झिलमिलाती हुई गतिमान
बाहर आने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
चेहरे पर उगती हुई धूप है
तनी हुई धूप
बढ़ती ही जा रही है अन्तहीन

कविता नहीं है यह
छिली हुई चमड़ी की फुसफुसाहट है
कंकरीली धरती पर घिसटते हुए
तेज़ शोर में बदलती हुई

कविता नहीं है यह
पसीना चुआंते शरीर हैं
कुदाल और हल लिए
ज़मीन गोड़ने की तैयारी में

कविता नहीं है यह
मज़दूर के हाथों में हथौड़ा है
भरी हुई बन्दूक का घोड़ा है
कविता नहीं है यह। 

2. माँ के बारे में 

माँ
तुम कभी नहीं हारीं
कहीं नहीं हारीं
जीतती रहीं
अंत तक निरन्तर

कच-कच कर
टूटकर बिखरते हुए
बार-बार
गिरकर उठते हुए
घमासान युद्ध तुम लड़ती रहीं
द्वंद्व के अनन्त मोरचों पर

तुम कभी नहीं डरीं
दहकती रहीं
अनबुझ सफ़ेद आग बन
लहकती रही
तुम्हारे भीतर जीने की ललक
चुनौती बनी रहीं
तुम जुल्मी दिनों के सामने

चक्की की तरह
घूमते रहे दिन-रात
पिसती रहीं तुम
कराही नहीं, तड़पी नहीं
करती रहीं चुपचाप संतापित संघर्ष
जब तक तुम रहीं

फिर एक दिन तुम
आसमान में उड़ीं
उड़ती रहीं, बढ़ती रहीं
अनंत को चली गईं
खो गईं। 

3. उसकी दुनिया

उसकी दुनिया
बिल्कुल अलग है
मेरी दुनिया से

उसकी दुनिया में सपने हैं प्यार के
कहीं दूर से उसे ब्याहने को आए राजकुमार के
प्रेम है वहाँ, स्नेह है
हृदय में वात्सल्य का अजस्र स्रोत
पक्षियों की उड़ान है उसके भीतर
फूल हैं, हरे-भरे बाग हैं
दूर आसमान को पार कर
सूरज और चाँद तक पहुँच जाने की इच्छा
हेलबोप्प पुच्छल तारे को छूकर
लौट आने की इच्छा

कहीं किसी वन में
हिरणी की तरह दौड़ लगाना चाहती है वह
अपने पीछे नर-हिरण को भगाना चाहती है वह

उसकी दुनिया में सपने हैं यार के
दिन-रात उसके पास रहे, ऐसे दिलदार के
बिल्कुल अलग है उसकी दुनिया
मेरी दुनिया से

उसकी दुनिया में अभी भूख नहीं है
बेरोज़गारी, बेकारी नहीं है
आर्थिक संकट की सूली नहीं है उसकी दुनिया में
घर तो है पर घर का हिसाब नहीं है
बेशुमार बच्चे तो हैं, पर उनका शाप नहीं है
नौकरी की इच्छा, पैसा कमाने की होड़
प्रतिद्वंद्विता, तनाव
अभाव, अक्षमता, बेचारगी
ऋण, सूद, सूदखोर, बेबसी
गिद्ध, साँप, छल-कपट, दगा, धोखा
छाती पर दला मूँग, युद्ध, हत्यारे
विपत्तियाँ, चिंताएँ और परेशानियाँ
खर्चे दुनिया भर के नहीं हैं वहाँ
चर्चे दुनिया भर के नहीं हैं वहाँ

उसकी दुनिया
बिल्कुल अलग है
मेरी दुनिया से। 

4. प्रार्थना 

यह दुनिया
औरतों के हाथों में दे दो

रोटी की तरह गोल और फूली
इस पृथ्वी पर
प्रेम की मधुर आँच हैं
रस माधुर्य का स्रोत हैं
इस सृष्टि में
जीवन की पवित्र कोख हैं औरतें

औरतों के हाथों में
सम्हली रहेगी यह दुनिया
बेहतर और सुन्दर बनेगी

रचना की प्रेरणा हैं औरतें
सूर्य की ऊष्मा हैं
ऊर्जा का उदगम हैं
हर्ष हैं हमारे जीवन का
उल्लास हैं
उज्ज्वल, निर्द्वन्द्व ममता की सर्जक हैं

हे पुरुषो !
एक ही प्रार्थना है तुमसे
यह हमारी दुनिया
औरतों के हाथों में दे दो
अगर तुम सुरक्षित रखना चाहते हो इसे
अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए। 

5. दिल्ली 

बीस बरस पहले की
अपनी वो आश्नाई
मुझे याद है
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

कसमें जो भी
तब तूने मुझे दिलाईं
मुझे याद हैं
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

बिन तेरे
महसूस होती थी जो तन्हाई
मुझे याद है
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

तब मुझसे तूने किए थे
जो वादे
मुझे याद हैं
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

फिर तूने तोड़ दिया था
मेरा शीशा-ए-दिल
मुझे याद है
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

सबके सामने तूने
की थी मेरी रुसवाई
मुझे याद है
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक

तेरी ही वज़ह से
तब हुई थी जगहँसाई
मुझे याद है
मैं भूला नहीं हूँ अब तलक। 

6. नया वर्ष 

नया वर्ष
संगीत की बहती नदी हो
गेहूँ की बाली दूध से भरी हो
अमरूद की टहनी फूलों से लदी हो
खेलते हुए बच्चों की किलकारी हो नया वर्ष

नया वर्ष
सुबह का उगता सूरज हो
हर्षोल्लास में चहकता पाखी
नन्हें बच्चों की पाठशाला हो
निराला-नागार्जुन की कविता

नया वर्ष
चकनाचूर होता हिमखण्ड हो
धरती पर जीवन अनन्त हो
रक्तस्नात भीषण दिनों के बाद
हर कोंपल, हर कली पर छाया वसन्त हो। 

7. तुम भी आओ 

अपने को खतरनाक
घोषित करते हुए
नारे उछालना
मैंने नहीं सीखा

मैंने नहीं सीखा
यूक्लिप्टस का पेड़ हो जाना
जब जंगल के अन्य सारे पेड़
नीम और बबूल बन
महामारी का विरोध कर रहे हों

मैं नदी नहीं हो सका
बढ़ी हुई-चढ़ी हुई / आवेग में-उन्माद में
प्रलय बन खड़ी हुई
तालाब बना रहा / या फिर झील
ठण्डी-गर्म रातों को

मैंने पहाड़ बनने की भी
कोई कोशिश नहीं की
कठिन था मेरे लिए
सूरज को रोज़-रोज़ डूबते देखना
और फिर सारी रात
सुबह की प्रतीक्षा करते रहना
आकाश टटोलते हुए

मैं ज़मीन बना रहा
नीम और बबूल उगाता रहा
तालाब और झील के पानी को
उबालता रहा
सूरज बनाता रहा अपने ही बीच
निरन्तर रोशनी के लिए

आओ
तुम भी
ज़मीन बन जाओ। 

8. आधी रात को 

रात है, आधी रात है
नदी किनारे वन में खड़ा हूँ मैं
सिर्फ़ पूरनमासी के चमचमाते
चाँद का साथ है

साफ़ और चटक इस रात में
बंसवारी के हरे पत्ते
हवा के साथ अठखेलियाँ कर रहे हैं
ऐसा लग रहा है मानो
चाँद कोई रुपहली मछली हो
जिसे पकड़ेने के लिए बाँस की पत्तियों ने
अपना सुनहरा हरा जाल बिछा दिया हो
मैं चन्द्रमा और पत्तियों के इस खेल में डूबा हूँ

नकटिया नदी की कल-कल
गूँज रही है कानों में

तभी कोई अलबेला पक्षी
कू-कू की मीठी आवाज़ करता
मेरे सिर पर से गुज़र जाता है
और रात का यह अलबेला क्षण
मेरे मन में कहीं गहरे उतर जाता है।

9. समय के उस पार

समय के उस पार
खड़ी थीं तुम
मैं समय के इस पार था
बीच हमारे
नभ-वितान अपार था

तुम थीं
उस लोक की वासी
मैं इस लोक में प्रवासी
बीच हमारे
बस स्नेह-दुलार था

तुम गगन
रति-मति की अवतार
मैं अनिल
हठी-गति का विस्तार
बीच हमारे
अब अलंघ्य पहाड़ था। 

10. तुम गाती हो

तुम गाती हो
गाती हो जीवन का गीत
और धूप-सी खिल जाती हो। 

तुम गाती हो
गाती हो सौन्दर्य का गीत
और फूल-सी हिल जाती हो। 

तुम गाती हो
गाती हो प्रेम का गीत
और रक्त में मिल जाती हो। 

मैं चाहूँ यह
तुम गाओ हर रोज़ सवेरे
कोई समय हो
हँसी हमेशा रहे तुम्हें घेरे।

A Note about Anil Janvijay by Abnish Singh Chauhan.

रविवार, 23 अगस्त 2020

इन्द्रेश भदौरिया और उनकी कुण्डलियाँ — अवनीश सिंह चौहान

इन्द्रेश भदौरिया

मृदुभाषी, विनम्र एवं प्रसन्नचित्त साहित्यकार इन्द्र बहादुर सिंह भदौरिया (उपनाम- इन्द्रेश भदौरिया) का जन्म 24 दिसंबर 1954 को ग्राम- मोहम्मद मऊ, पोस्ट- कठवारा, जिला- रायबरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। जन-सामान्य में प्रचलित शब्दों एवं मुहावरों को लोकधर्मी काव्य में परिणित करने की कला में निष्णात इन्द्रेश जी का अवधी साहित्य— 'बसि यहै मड़इया है हमारि' (2010), 'गजब कै अँधेरिया है' (2015), 'कुलटा चरित हास्य भण्डारा' (2015) एवं 'बुढ़उनूँ चुप्पी साधौ' (2017, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से दिसंबर 2018 में 'पण्डित वंशीधर शुक्ल पुरस्कार' से पुरस्कृत) समकालीन सरोकारों को बड़ी बेबाकी से मुखरित करता प्रतीत होता है। इस दृष्टि से अवधी भाषा-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में दया, प्रेम, करुणा, आस्था एवं अहिंसा का पावन सन्देश देने वाले भदौरिया जी का नाम आ. बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस', गुरु प्रसाद सिंह 'मृगेश', वंशीधर शुक्ल, रमई काका, द्वारिका प्रसाद मिश्र, बेकल उत्साही, पारस भ्रमर, विकल गोंडवी, आद्या प्रसाद 'उन्मत्त', जगदीश पीयूष आदि विशिष्ट रचनाकारों की सूची में बड़े सम्मान के साथ जोड़ा जा सकता है।

वैसे तो इन्द्रेश भदौरिया का नाम देश के श्रेष्ठ कुण्डलियाकारों की सूची में भी जोड़ा जा सकता है (ख्यात कुण्डलियाकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला पहले ही 'कुण्डलिया छंद के नये शिखर' संकलन में इंद्रेश जी की कुण्डलियों को स्थान देकर निश्चित ही सराहनीय कार्य कर चुके हैं)। जोड़ा जाना भी चाहिए। परन्तु, 'चाहिए' कहने भर से काम कहाँ चल पाता है? अक्सर देखने में आया है कि हमारे देश के गांव-जंवार में रहने वाले तमाम साहित्यकारों के रचनाकर्म से साहित्य समाज उस प्रकार से परिचित नहीं हो पाता, जिस प्रकार से होना चाहिए। इसीलिये ऐसे तमाम साहित्यकारों की सर्जना न तो साहित्य की मुख्य धारा में आ पाती है और न ही उस पर चर्चा-परिचर्चा, संकलन, शोध आदि ही हो पाते हैं। कई बार तो अच्छी पत्रिकाएँ भी उन्हें स्पेस नहीं दे पातीं। इसके पीछे कारण कई हो सकते हैं, होने भी चाहिए। परन्तु, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक इन समस्याओं का निराकरण नहीं होता और अच्छे रचनाकारों को जानने-समझने का माहौल नहीं बनता। इसके लिए हम सब को सकारात्मक सोच तो रखनी ही होगी, संगठित होकर सहयोगात्मक कार्य भी करने पड़ेंगे। 

आने वाले समय में क्या होगा, क्या नहीं, यह तो समय ही बतलायेगा, किन्तु यहाँ इस रचनाकार के आगामी कुण्डलिया संग्रह— 'कुण्डलियाँ सुमन' के लिए उसे बधाई तो दी ही जा सकती है।

(1)

काली - दुर्गा - शारदा, लक्ष्मी नाम अनेक।
धन, वैभव, सुख, सम्पदा, दाता बुद्धि -विवेक।
दाता बुद्धि - विवेक, भक्त की रक्षा करती।
हरती जन के क्लेश, सभी की झोली भरती।
कह कविवर इन्द्रेश, सर्वे सुख देने वाली।
रक्षा सबकी करो, मातु हे दुर्गा - काली।।

(2)

अटल सत्य है बात ये, होता कर्म स्वतन्त्र।
और बात ये भी सही, फल होता परतन्त्र।
फल होता परतन्त्र, कर्म से इसका नाता।
कर्मों के अनुसार, देत है सुफल विधाता।
कह कविवर इन्द्रेश, आपका सुघर कृत्य है।
फल भी सुन्दर मिले, बात ये अटल सत्य है।।

(3)

अहंकार है रोग इक, रहिए इससे दूर।
घुट घुट मरने के लिए, करता है मजबूर।
करता है मजबूर, लोग लगते हैं कटने।
टूटे कुल परिवार, स्वजन लगते हैं बँटने।
कह कविवर इन्द्रेश, बड़ा अति ये विकार है।
आये कौन समीप, पास यदि अहंकार है।।

(4)

अपने जब देते हमें, प्रेम और सम्मान।
मिलती खुशी अपार है, होता मन अभिमान।
होता मन अभिमान, धरा पर नहीं निरर्थक।
होता है अहसास, हो रहा जीवन सार्थक।
कह कविवर इन्द्रेश, सुघर आते हैं सपने।
मिलता सुक्ख अथाह, प्रेम से मिलते अपने।।

(5)

आया है सो जायगा, बात सभी लें जान।
यही श्रष्टि का है नियम, विधि का यही विधान।
विधि का यही विधान, मृत्यु का दिन जब आता।
राजा हो या रंक, एक ही सम हो जाता।
कह कविवर इन्द्रेश छोड़कर अपनी काया।
जाता है यम धाम, धरा पर जो भी आया।।

(6)

आयेगा वह दौड़कर, भाग्य अगर अनुकूल।
आया भी जाये चला, अगर समय प्रतिकूल।
अगर समय प्रतिकूल, जान ईश्वर की लीला।
राई बने पहाड़, बना दे पर्वत ढीला।
कह कविवर इन्द्रेश, कर्म फल पा जायेगा।
होगी चिन्ता दूर, समय अच्छा आयेगा।।

(7)

आतंकी बन कर रहे सबसे बड़ा गुनाह।
मानव के चिथड़े उड़ें कर नहिं पायें आह।
कर नहिं पायें आह, अरे सोचो गद्दारों।
जो प्राणी निर्दोष, उन्हें तुम क्योंकर मारो।
कह कविवर इन्द्रेश, छोड़ दो ये नौटंकी।
वरना यह सरकार, मार देगी आतंकी।।

(8)

आज उपेक्षित जगत में, है किन्नर समुदाय।
सोचो होते आप भी, करते कौन उपाय।
करते कौन उपाय, पीटना पड़ता ताली।
घर घर लेते नेग, घरैया नहिं घरवाली।
कह कविवर इन्द्रेश, ईश की देन सुपेक्षित।
हैं इज्ज़त के पात्र, न समझें आज उपेक्षित।।

(9)

इनमें उनमें फर्क क्या, कौन ढंग बेढंग।
इत है देशी सभ्यता, उधर विदेशी रंग।
उधर विदेशी रंग, बने देशी परदेशी।
पहन विदेशी वस्त्र, घूमतीं कैसे देशी।
कह कविवर इन्द्रेश, प्रदर्शन अंगक जिनमें।
देश और परदेश, फर्क क्या इनमें उनमें।।

(10)

ईश्वर की लीला अजब, समझ न पाये कोय।
देता सबको है सजा, जैसी करनी होय।
जैसी करनी होय, कर्म यदि अच्छे करते।
होते हैं शुभ कर्म, क्लेश नहिं पास विचरते।
कह कविवर इन्द्रेश, ढहा दें दुख का टीला।
भोगें सुक्ख अथाह, अजब ईश्वर की लीला।।

(11)

ऐसा आयेगा दिवस, सबसे नाता तोड़।
जायेंगे यम धाम को, देंह धरा पर छोंड़।
देंह धरा पर छोंड़, और यश अपयश सारे।
काम क्रोध मद लोभ, कर्म दुष्कर्म हमारे।
रहकर इस संसार, करो तुम चाहे जैसा।
पड़ता कुछ नहिं फर्क, सभी संग होता ऐसा।।

(12)

कपटी साथ न कीजिए, होता है अति तीत।
या के छल प्रपंच से, जीत न पइहो मीत।
जीत न पइहो मीत, बात यह सच्ची जानो।
खुद छानेगा माल, फँसायी तुमका मानो।
कह कविवर इन्द्रेश, चूस लेगा ज्यों चपटी।
करिये नहिं विश्वास, मिले यदि कबहूँ कपटी।।

(13)

कथनी - करनी एक हो, जरा न होवे फर्क।
पारदर्शिता हो जहाँ, कैसा तर्क - वितर्क।
कैसा तर्क - वितर्क, काम सुन्दर सब कीजै।
हो सबका कल्याण, सोच अपने मन लीजै।
कह कविवर इन्द्रेश, सदा सुख पायें धरनी।
चलो समय के साथ, एक हो कथनी - करनी।।

(14)

काला धन है पास यदि, करदो उसको दूर।
बनके रोग असाध्य यह, करता चकनाचूर।
करता चकनाचूर, कलह घर में फैलावे।
रोग दोष बढ़ जाय, राग रंग मन नहिं भावे।
कह कविवर इन्द्रेश, काम सब करिये आला।
देउ तुरन्त हटाय, होय घर में धन काला।।

(15)

काया से तो बहुत कुछ, करते हैं सब लोग।
मेरी एक सलाह है, करो निरंतर योग।
करो निरंतर योग, रोज तुम शाम सबेरे।
होगा स्वस्थ शरीर, कष्ट नहिं अइहैं नेरे।
कह कविवर इन्द्रेश, समझ में मेरी आया।
देती अति आनन्द, निरोगी यदि है काया।।

(16)

कीजै नहीं घमण्ड को, करो स्वयं पर गर्व।
सुन्दर मितभाषी बनो, आदर करिहैं सर्व।
आदर करिहैं सर्व, रखो मन में संतोषा।
करते रहो सुकर्म, ईश पर करो भरोसा।
कह कविवर इन्द्रेश, नाम नित प्रभु का लीजै।
करके पर उपकार जन्म निज स्वारथ कीजै।।

(17)

कुचियाये हैं बाग में, जामुन महुआ आम।
सब बृक्षों में फूल हैं, शोभा ललित ललाम।
शोभा ललित ललाम, देख के छटा निराली।
कोयल रही है कूक, डोलती डाली - डाली।
कह कविवर इन्द्रेश, वसन्ती ऋतु मन भाये।
तन मन ब्यापा हर्ष, देख बिरवा कुचियाये।।

(18)

कंचन काया धारणी लगती बहुत हसीन।
होंठ तुम्हारे हैं मधुर, और नयन नमकीन।
और नयन नमकीन, चढ़ी यौवन की मस्ती।
देखत होवें पस्त, बड़ी हो कितनी हस्ती।
कह कविवर इन्द्रेश, समझ में इतना आया।
होता मन प्रशन्न, देखकर कोमल काया।।

(19)

खामोशी अच्छी नहीं, तोड़ दीजिए मौन।
जो हैं पत्थर फेंकते, वे हत्यारे कौन।
वे हत्यारे कौन, मारकर उन्हें भगायें।
देवें गोली मार, उन्हें जमपुर पहुँचायें।
कह कविवर इन्द्रेश, मार दो जैसे पक्षी।
सीमा रक्षक हेतु, नहीं खामोशी अच्छी।।

(20)

गन्दा जल गन्दी हवा, दूषित भोजन खाय।
मानव रोगी बन रहा, ताकर करो उपाय।
ताकर करो उपाय, सैकड़ों बृक्ष लगाओ।
स्वच्छ हवा शुभ नीर, बदन को सबल बनाओ।
कह कविवर इन्द्रेश, दुखद रोगों का फन्दा।
होगा गर्दन बीच, रखा यदि घर को गन्दा।।

(21)

गोली खाकर आप हित, रहते सीना तान।
सीमा के रक्षक सभी, होते बहुत महान।
होते बहुत महान, सदा रखते निगरानी।
आन बान नहिं जाय, चहै जाये जिन्दगानी।
कह कविवर इन्द्रेश, समझके हँसी ठिठोली।
देश रहा नहिं चेत, खा रहे रक्षक गोली।।

(22)

गंगा सोहैं शीस पर, और चन्द्रमा भाल।
और गले में नाग है, भोलेनाथ दयाल।
भोलेनाथ दयाल, धतूरा भाँग हैं खाते।
आशुतोष भगवान, सभी हैं शीस झुकाते।
कह कविवर इन्द्रेश, वदन है नंग धड़ंगा।
बाघम्बर मृगछाल, शीस पर बहती गंगा।।

(23)

गंगा मैली नहिं हुई, धो पापी के पाप।
गंगा मैली हो गयी, कारण हैं हम - आप।
कारण हैं हम - आप, नगर का गन्दा पानी।
सब गंगा में जाय, बात ये सबने जानी।
कह कविवर इन्द्रेश, करो अपना मन चंगा।
ऐसे करो उपाय, होय नहिं मैली गंगा।।

(24)

चूल्हा-चौका जगत में, जीवन का आधार।
किन्तु कमाई यदि नहीं, सब कुछ है बेकार।
सब कुछ है बेकार, कर्म फल सबसे आगे।
नित कमाय के खात, बहुत सै लोग अभागे।
कह कविवर इन्द्रेश, देख मत चूको मौका।
करिहौ नहिं जो काम, जले कस चूल्हा-चौका।।

(25)

चन्दा - तारे आदि ग्रह, चमक रहे आकाश।
भू का अंधियारा हरे, बिजली करे प्रकाश।
बिजली करे प्रकाश, सगत्तर चमाचम्म है।
रातोदिन निज काम, करत सब झमाझम्म है।
कह कविवर इन्द्रेश मिटाती जग अंधियारे।
बिजली गर गुल होय, करें क्या चन्दा- तारे।।

(26)

चौराहों पर चल रहा, राजनीति का खेल।
जनता बेचारी रही, है रातोदिन झेल।
है रातोदिन झेल, तानते अपनी अपनी।
करते नींद हराम, छूटती मुँह से हफनी।
कह कविवर इन्द्रेश, गली-कूचे-राहों पर।
मिला स्वार्थ चहुँओर, शहर घर चौराहों पर।।

(27)

छप्पर छानी पेंड़ सब, दिन दिन होंय उछिन्न।
देख तमाशा जगत का, मन है बहुतै खिन्न।
मन है बहुतै खिन्न, कहाँ अब रहैं चिरैया।
हुए नदारद गिद्ध, हुई कम हैं गौरैया।
कह कविवर इन्द्रेश, आज की यही कहानी।
पक्के सब घर द्वार, बहुत कम.छप्पर छानी।।

(28)

छोटे कभी न जानिए, कर्ज शत्रु अरु रोग।
पास नहीं आयें कभी, कर ऐसा संयोग।
कर ऐसा संयोग, अगर पल्ले पड़ जायें।
ऐसा करें प्रयत्न, दूर जल्दी हो जायें।
कह कविवर इन्द्रेश, होत हैं प्रतिदिन मोटे।
करते बुद्धि विनष्ट, समझिये इन्हें न छोटे।।

(29)

जग में पूरक हैं सभी, इक दूजे के जीव।
जगत नियन्ता ने किया, सुन्दर काम अतीव।
सुन्दर काम अतीव, छोट बड़ सब बेचारे।
होते सब आहार, एक दूजे के प्यारे।
कह कविवर इन्द्रेश, भटकते हो क्यों मग में।
जन आधारित श्रृष्टि, बनाया विधि ने जग में।।

(30)

जननी जनती कोख से, सुचि सुन्दर संतान।
ममता की समता नहीं, माँ का चरित महान।
माँ का चरित महान, नित्य निज दूध पिलाती।
करती सुत उपकार, स्वयं भूँखी सो जाती।
कह कविवर इन्द्रेश, बची ज्यों चोकर छलनी।
रूखा - सूखा खाय, खुशी रहती है जननी।।

(31)

जाके हृदय विवेक है, जानत है सब कोय।
सास-ससुर, माता-पिता, से बढ़कर नहिं कोय।
से बढ़कर नहिं कोय, लोग जो करते सेवा।
साँची रहे बताय, वही सब खाते मेवा।
कह कविवर इन्द्रेश, देंह मानव की पाके।
करते पर उपकार, भाव भक्ती है जाके।।

(32)

जानो अपने गाँव को, बहुत बड़ा सुख धाम।
बरगद पीपल छाँव है, महुआ जामुन आम।
महुआ जामुन आम, दूध घी की अधिकाई।
लहलहात सब खेत, हवा बहती सुखदाई।
कह कविवर इन्द्रेश, बात यह हमरी मानो।
गाँवन मा है स्वर्ग, नर्क शहरों को जानो।।

(33)

जिन्दा में सुख न मिला, आगे जानें राम।
किन्तु कमायें सुयश को, करके सुन्दर काम।
करके सुन्दर काम, नाम रोशन कर जायें।
याद करें सबलोग, युगों तक जाने जायें।
कह कविवर इन्द्रेश, कभी नहिं हों शर्मिंदा।
मरके रहता नाम, सदा हम रहते जिन्दा।।

(34)

जिनको अति प्यारा लगे, मान और सम्मान।
करते नहीं हैं भूलकर, दूजे का अपमान।
दूजे का अपमान, सभी का आदर करते।
लेंय सुमति से काम, कुमति पर पैर न धरते।
कह कविवर इन्द्रेश, कर रहे वन्दन उनको।
अपनी संस्कृति और, सभ्यता प्यारी जिनको।।

(35)

जीवन एक अमूल्य निधि, जब यम लेंगे लूट।
काया ही रह जायगी, प्राण जांयगे छूट।
प्राण जांयगे छूट, आप हैं नर तन धारी।
करें समय उपयोग, काम कीजै गुणकारी।
कह कविवर इन्द्रेश, सत्य बोले ज्यों दरपन।
करो परम उपकार, सफल हो जाये जीवन।।

(36)

जो आया सो जायगा, राजा हो यि रंक।
यही सत्य है जगत का, जानो इसे निशंक।
जानो इसे निशंक, किन्तु है लगता सपना।
हुआ पराया आज, रहा जो अबतक अपना।
कह कविवर इन्द्रेश, छोड़कर ममता माया।
चिन्ता है बेकार, जायगा जो है आया।।

(37)

झण्डे में हैं तीन रंग, हरा स्वेत अरु लाल।
और बीच में चक्र है, अरि समाज का काल।
अरि समाज का काल, हरा साहस दर्शाता।
हृदय हमारा साफ, स्वेत सबको बतलाता।
कह कविवर इन्द्रेश, सुशोभित है डण्डे में।
केशरिया बलिदान, बताता है झण्डे में।।

(38)

माता, बहना, भार्या, बेटी, पोती, नेक।
साली, सलहज, सासु माँ, नारी रूप अनेक।
नारी रूप अनेक, कि चाची, दादी, नानी।
नातिन और भतीजि, बहू, दिवरानि, जिठानी।
कह कविवर इन्द्रेश, विश्व जिसके गुण गाता।
सर्वोपरि सब नारि, कहाती जग में माता।

(39)

भाई अब कलिकाल में, समझदार सब कोय।
हानि-लाभ जीवन-मरण, सब पर भारी होय।
सब पर भारी होय, समझ कर काम है करना।
सुख दुःख जाओ झेल, कभी ना इनसे डरना।
कह कविवर इन्द्रेश, इसी में है कुशलाई।
सोच समझ कर सभी, काम करना तुम भाई।

(40)

अवढर दानी जानकर, विनय करौं कर जोरि।
पार्वती गणपति सहित, अब सुधि लीजो मोरि।
अब सुधि लीजो मोरि, दुखों से मोहि उबारो।
विनवत बारम्बार, दया करि मोहि निहारो।
कह कविवर इन्द्रेश, सुनो प्रभुवर मम बानी।
मो पर होउ सहाय, आप हो अवढर दानी।। 

शनिवार, 22 अगस्त 2020

कुलटा चरित हास्य भण्डारा— इन्द्रेश भदौरिया


मृदुभाषी, विनम्र एवं प्रसन्नचित्त साहित्यकार इन्द्र बहादुर सिंह भदौरिया (उपनाम- इन्द्रेश भदौरिया) का जन्म 24 दिसंबर 1954 को ग्राम- मोहम्मद मऊ, पोस्ट- कठवारा, जिला- रायबरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। जन-सामान्य में प्रचलित शब्दों एवं मुहावरों को लोकधर्मी काव्य में परिणित करने की कला में निष्णात इन्द्रेश जी का अवधी साहित्य— 'बसि यहै मड़इया है हमारि' (2010), 'गजब कै अँधेरिया है' (2015), 'कुलटा चरित हास्य भण्डारा' (2015) एवं 'बुढ़उनूँ चुप्पी साधौ' (2017, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से दिसंबर 2018 में 'पण्डित वंशीधर शुक्ल पुरस्कार' से पुरस्कृत) समकालीन सरोकारों को बड़ी बेबाकी से मुखरित करता प्रतीत होता है। इस दृष्टि से अवधी भाषा-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में दया, प्रेम, करुणा, आस्था एवं अहिंसा का पावन सन्देश देने वाले भदौरिया जी का नाम आ. बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस', गुरु प्रसाद सिंह 'मृगेश', वंशीधर शुक्ल, रमई काका, द्वारिका प्रसाद मिश्र, बेकल उत्साही, पारस भ्रमर, विकल गोंडवी, आद्या प्रसाद 'उन्मत्त', जगदीश पीयूष आदि विशिष्ट रचनाकारों की सूची में बड़े सम्मान के साथ जोड़ा जा सकता है।

वैसे तो इन्द्रेश भदौरिया का नाम देश के श्रेष्ठ कुण्डलियाकारों की सूची में भी जोड़ा जा सकता है (ख्यात कुण्डलियाकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला पहले ही 'कुण्डलिया छंद के नये शिखर' संकलन में इंद्रेश जी की कुण्डलियों को स्थान देकर निश्चित ही सराहनीय कार्य कर चुके हैं)। जोड़ा जाना भी चाहिए। परन्तु, 'चाहिए' कहने भर से काम कहाँ चल पाता है? अक्सर देखने में आया है कि हमारे देश के गांव-जंवार में रहने वाले तमाम साहित्यकारों के रचनाकर्म से साहित्य समाज उस प्रकार से परिचित नहीं हो पाता, जिस प्रकार से होना चाहिए। इसीलिये ऐसे तमाम साहित्यकारों की सर्जना न तो साहित्य की मुख्य धारा में आ पाती है और न ही उस पर चर्चा-परिचर्चा, संकलन, शोध आदि ही हो पाते हैं। कई बार तो अच्छी पत्रिकाएँ भी उन्हें स्पेस नहीं दे पातीं। इसके पीछे कारण कई हो सकते हैं, होने भी चाहिए। परन्तु, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक इन समस्याओं का निराकरण नहीं होता और अच्छे रचनाकारों को जानने-समझने का माहौल नहीं बनता। इसके लिए हम सब को सकारात्मक सोच तो रखनी ही होगी, संगठित होकर सहयोगात्मक कार्य भी करने पड़ेंगे। 

आने वाले समय में क्या होगा, क्या नहीं, यह तो समय ही बतलायेगा, किन्तु यहाँ इस रचनाकार के आगामी कुण्डलिया संग्रह— 'कुण्डलियाँ सुमन' के लिए उसे बधाई तो दी ही जा सकती है।

श्री गणेश को ध्यान करि सारद सीस नवाय।
कुलटा  का  वर्णन करूँ  माता  होउ  सहाय।1

हंस वाहिनी कृपा करि  सादर या लिखि देउ।
जो कहुँ गलती होय कुछ तुरत ठीक करि देउ।2

नर - नारी  यहि जगत मा  सब हैं एक समान।
आपस मा हिलिमिलि रहैं हो समाज उत्थान।3

नर - नारी  तन  पाइके  करैं  नहीं  अभिमान।
नारी   घर   की  लक्षमी   नर  है  देव  समान।4

आपन   भारत  देश   महाना। 
नारी  को   देवी   सम   जाना।
कबि कोबिद को सकै बखानी।
नारी पूज्य सकल गुण खानी।
सेवा नित करती सब घर की।
नारी  से  सोभा  हर  घर  की।
है पूजित सब घर - घर माहीं।
नारी  से  बढ़िके  कोउ  नाहीं।
वह ही  घर  है  स्वर्ग  समाना।
जहाँ   होय    नारी   सम्माना।
तव समान जग में कोउ नाहीं।
अखिल बिस्व सचराचर माहीं।
तुमही अखिल विस्व की दाता।
सुर समाज तुम्हरौ जस गाता।
तुम्हरौ चरित परम हितकारी।
जो सज्जन पढ़िहैं सुविचारी।
तेहिके  पाप  नसइहैं  सबही।
नारी  पिरेम  जतइहैं  जबहीं।
केहि बिधि स्तुति करौं तुम्हारी।
लघु मति मोरि न सकै बिचारी।

पूजित हर घर में तुम्ही लाखों में हो एक।
माता,  बहना,  पुत्री,  पतनी रूप अनेक।5

तुमसे ही घर स्वर्ग है तुमसे नरक समान।
नारी  देवी  रूप  हैं  नर  हैं  देव  समान।6

लरिका बच्चन का तुम पालौ।
गृह कामन ते समय निकालौ।
घर से बाहर तक तुम जाई।
मन लगाय के करौ कमाई।
कहुँ बाबू तो कहुँ चपरासी।
जग मा नारि महा सुखरासी।
कहूँ सिक्षिका कहुँ अधिकारी।
पी सी एस आइ ए एस नारी।
बनि बैग्यानिक ग्रह पर जाई।
नर संग काज करो मन लाई।
करउ नौकरी बाहर जाकर।
तुमही गृहणी तुमही चाकर।
पति कितना भी हो नालायक।
करि संतोष बनो सुखदायक।
नर  से  भी   उपयोगी   नारी।
सब समाज मा बहु उपकारी।
थी    लक्ष्मी बाई     मरदानी।
घर घर गूँजत कथा किहानी।
इन्दिरा थी भारत की नारी।
ताको जानत दुनिया सारी।
एक नहीं संख्या अधिकाई।
जिनकी जग में होय बड़ाई।
तुमहूँ कर्म करउ सुखरासी।
सुख उपजै हो दूरि उदासी।
तुमसे बढ़िके केहिका जानी।
तुम्ही रक्षिका बनी भवानी।
नमन करौं मैं सत सत बारी।
पुरुसन से भी बढ़िके नारी।
तुमही हौ सबकी कल्याणी।
प्रिय लागै अति तुम्हरी वाणी।
नारी पूज्य हैं अपने करमा।
सबकी सेवा करती घर मा।
सास ससुर की सेवा करती।
पति आग्या सिर माथे धरती।
लरिका बच्चन का नित पालै।
कउनिउ करती नहीं कुचालै।
सुख दुख सब सहती हैं घर मा।
लरिकन के हित करैं सुकरमा।
भारत कै संस्कृति सभ्यता।
जानि करैं न कबौं असभ्यता।
देस की जो भी आन बान है।
नारी    का  भी  योगदान  है।

तुम्ही अग्य मैं मन्द मति केहि बिधि करौं बखान।
नारी  नर  की  खान  है   कहि  रहे   बेद   पुरान।7

नारी में  गुण  हैं  बहुत  निज  मति  के  अनुहारि।
नहीं  जगह  ऐसी  बची    जहाँ  न  पहुँची   नारि।8

हम    सबका    कर्तव्य   दें   नारी   को   सम्मान।
कभी  करें  नहिं   भूलकर   नारी  का   अपमान।9

कवि काका की मति अनुसारी।
जग   में  चार  तरह  की  नारी।
पहली    तुष्टा    दूसरि    रुष्टा।
तीसरि    पुष्टा    चौथी    दुष्टा।
तुष्टा वे निज  पति  अनुसरहीं।
मन को लगा काज सब करहीं।
थोरेन   मा    करती    संतोषा।
मढ़ती   नहिं  दुसरे  पर  दोषा।
रहि घर मा  कर्तव्य  निभउतीं।
पीहर  से ज्यादा  सुख  पउतीं।
घर -  परिवार   सबै  के  संगा।
रखती  हैं  आपन  मन   चंगा।
पति  बुद्धू  हो  या नालायक।
समझैं वहिका सब फल दायक।
अस पतनी मिलती हैं जेहिका।
बड़भागी  नर  समझो वहिका।
अपने  काम से  मतलब  राखैं।
असगुन नाँहि कोहू कर भाखैं।
देखि   परैं  घर  खुसी  हमेसा।
रहइ ना घर मा दुक्ख कलेसा।
अइसि  नारि  पावैं  बड़भागी।
सब बिधि रहैं गुणन ते  पागी।

याको सब अबला कहैं होती गुण की खान।
सुर नर मुनि करते सदा  देवी का  गुणगान।10

ऐसी  नारी  पूज्य  हैं  हर  समाज  हर  देस।
तन मन से सेवा करैं  हरती  सकल  कलेस।11

अब रुष्टा कर करौं बखाना।
जैसा  सुना  व देखा  जाना।
काम धाम सब घर के करिहैं।
पति बिपरीत काम अनुसरिहैं।
पहिला  काम बादि मा करिहै।
पाछे  का  आगे  करि   डरिहैं।
पति जो कहै है  पूरब  जाना।
तब पस्चिम का  करैं पयाना।
पति पर  अपने दोस  लगावैं।
अपने  का   निरदोस  बतावैं।
यहै  दोस  है  उनका  तगड़ा।
ल्यात फिरैं सबहिन ते झगड़ा।
इनका  तुष्टा  से कम जानउ।
पर इनका  अच्छा ही मानउ।
अब पुष्टा का चरित बखानउँ।
पहलवान  नारी  यह  जानउँ।
हट्टा - कट्टा बदन बहु तगड़ा।
देखि कोउ नहिं लेत है झगड़ा।
अवसर  पाइ पतिउ का मारै।
सात पुस्ति  के  पुरिखा  तारै।
सास ससुर अरु जेठ जेठानी।
ननद  अउर   देवर   देउरानी।
सबै   लोग  भय  इनसे  मानैं।
इनहिनि का सरवोपरि जानैं।

पुष्टा नारी  करकसा  होती अति  बलवान।
क्रोधित होती जब कभी देती झापड़ तान।12

डरते ही रहते सदा सारे घर के लोग।
दूर दूर रहते सभी मान इसे दुरयोग।13

अब  दुष्टा  की  बातै   करबै।
उनका चरित हृदयँ मा धरबै।
नर - नारी  सब इससे  डरते।
इनके सम्मुख बात न करते।
पर  पीछे  धिक्कार  लगावैं।
सबसे तुच्छ इनहिं बतलावैं।
हमहूँ बात करित है उनकी।
जगमा हँसी हो रही जिनकी।
मैं  मतिमंद   घोर  अग्यानी।
मत मानो अचरज सुनि बानी।
दुष्टा   को   ही   पुष्टा   माना।
अब इनहिनि का करौं बखाना।
कुलटा चरित हास्य भण्डारा।
यहिमा कुछ नहिं दोष हमारा।
करै काम जो उलटा - पुलटा।
ताको कहत सबै जन कुलटा।
पुरुष  भये  संस्कार  बिहीना।
हुई  नारि  अब  लज्जा हीना।
गुरु आपन अब भूले धरमा।
भूलि गए नेता निज  करमा।
मानवता  नहिं  परै  दिखाई।
अब तो कुसल करैं रघुराई।
एक एक करि सबका भाखौं।
मति अनुसार सबै को राखौं।
ताको वर्णन करन बिचारा।
छमा करौ अपराध हमारा।

सभी देवि अरु देव से कहते सीस झुकाय।
या चरित बहुतै कठिन सबहीं होउ सहाय।14

तुमसे भी बिनती करूँ कुलटा होउ सहाय।
जो भी भूलूँ तव चरित तुरतहिं देव बताय।15

नमो नमो कुलटा महरानी।
नमो देवि हिटलर की नानी।
तुलसी रामायन लिखि दीन्हा।
लेकिन तुम्हरौ ध्यान न दीन्हा।
सूक्ष्म रूप कुछ कियो बखाना।
अवगुण आठ नारि तन माना।
कुलटा चरित मैं गावहुँ नीका।
लागहि सरस या लागै फीका।
यह गलती हम करित है भारी।
अब तो लाज  रखैं  बनवारी।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरा।
सोचि सोचि डरपत मन मोरा।
कुलटा मा हैं बिबिध परकारा।
अगर लिखउँ उनको बिस्तारा।
तो यह महा ग्रंथ होइ जाई।
यहिते सूक्ष्म रूप अपनाई।
सबका मैं कुछ करौं बखाना।
जइसन सुना व देखा - जाना।

सास ससुर देवर ननद पति से झगड़ा लेय।
कुलटा ताहि सराहिये मार तड़ातड़ देय।16

कुलटा देवी की सरण आया है  यह  दीन।
मूसर,  बेलन,  चीमटा अस्त्र तुम्हारे तीन।17

सुर नर मुनि सब तुमसे हारे।
गावत अपयश गान तुम्हारे।
जब से ब्याहि के घर का आई।
रोजुइ झगड़ा  रोजु लड़ाई।
कउन जनम के पाप भवानी।
कीन्हेव नरक सब जिन्दगानी।
बेद पुरान कहत सब अबला।
तुम सम दीख न कोऊ सबला।
चइला - बेलना अस्त्र तुम्हारे।
पटकि पटकि बहुतै जन मारे।
बाहर  जो  नर  सेर  कहावैं।
तव समक्ष गीदड़ बनि जावैं।
हड़क तुम्हारि सुनैं नर जबहीं।
दिल धड़कन बढ़ जाती तबहीं।
पति जो कबहुँ उपद्रव कीन्हा।
झापड़ तुरत गाल पर दीन्हा।
बने सबै कठपुतरी अइसे।
नाच नचाओ चाहे जइसे।
तुम बिन सून सून घर लागै।
तुमका देखि बहुत डेरु लागै।

घर के कारज न करो घूमो हाट बाजार।
कोऊ कुछ न कहि सकै लीला अपरम्पार।18

कोऊ यदि कुउ कहि परै मचा देउ कोहराम।
कलह मची दिनभर रहै रातिउ नींद हराम।19

द्याखन मा तुम बहुत चटक्का।
ख्यालउ हरदम नैन मटक्का।
नौकर लरिका रोजु खेलावैं।
आप गोद  पिलवा  दुलरावैं।
खावो   रोजु   मलाई,  मेवा।
पति ते नित  करवाओ  सेवा।
एकहि धरम औ एकहि नेमा।
नित्तै   टीवी   नित्त   सिनेमा।
अंग  पदरसन  मा  तुम  आगे।
स्याँकत आँखि मिलैं बड़भागे।
नारी  तन  की  सान  दुपट्टा।
घर घर पोंछि रहा सिलबट्टा।
लिहे मोबाइल खुल्लमखुल्ला।
करउ बात बनि बनि रसगुल्ला।
तरह तरह की बातै करतिउ।
घरके काज ध्यान नहिं धरतिउ।
मुँह बाँधे नित घूमो अइससे।
हत्याहरण जाँय सब जइसे।

तन को नहीं उघारिये मन में रखिये ध्यान।
तन उघारि चलती अगर द्याखत सकल जहान।20

अपनी संस्कृति सभ्यता मत भूलो सुकुमारि।
देखि देखि जग है हँसत यह तौ लेउ बिचारि।21

केवल  यह  परदोस  निहारै।
इनसे सदा  रहउ होसियारै।
लच्छन एकउ लगैं न नीका।
बनि आयी जंजाल हैं जी का।
रहैं  रोजु  ई  घर  मा  सनकी।
कोऊ  थाह  न  पावै  मन की।
कटी - कटी  हैं  सबसे रहतीं।
मन कै बात कबौ नहिं कहतीं।
जो  मन मा  आवै  करि  डारैं।
प्रान   सबै   के  रोजुइ   जारैं।
हाट बजार जो कहूँ हैं जाती।
करि मेकप चेहरा चमकाती।
किन्तु सबेरे जब हैं जगती।
तब डाइनि जैसी हैं लगती।

मेकप उतना कीजिए जो मेकप करि जाय।
मेकप इतना नहिं  करो  हँसी  उड़ाई  जाय।22

मेकप में अवगुण बहुत यह भी लेउ बिचारि।
रासायनिक सब तत्व मिल देते चमड़ी जारि।23

सुन्दरता  सब  जात  नसाई।
नहीं काट फिर करत  दवाई।
रूप तुम्हार फिरि सोहै कैसे।
भूत,  परेत,  चुड़ैलन   जैसे।
कंजी आँखि नाक जस सोंटा।
जूड़ा  सिर  लागै  जस  लोटा।
ठुड्ढी का तिल अति सुखदाई।
जस खटमल है बइठ  रजाई।
बने गाल जस सुघर  पकौड़ा।
दाँत  लगैं  जस  धरे  हथौड़ा।
सर्ट - पैण्ट तन सोसत  कैसे।
जंगल  माँहि  ताड़का  जैसे।
पहिरे  मैक्सी   बिना  दुपट्टा।
घूरि   रहे   नर   हट्टा - कट्टा।
सयन वस्त्र नित दिन में धारौ।
सात पुस्ति के पुरिखा तारौ।
लच्छन तुम्हरे बिबिध प्रकारा।
वर्णन करत भाग्य का मारा।
पति अपने को बहुत लगावत।
लेकिन  तुमसे  पार  न पावत।
सासु ननद पर परतिउ तगड़ी।
ससुर की रोजु उछालौ पगड़ी।
खुद तो मस्ती मउज मनाती।
पति से घर के काज कराती।
अपनी संस्कृति नहीं है भाती।
पस्चिम की सभ्यता सुहाती।
धरम करम नहिं भावत तुमका।
मरतिउ जाय बार मा ठुमका।
गाँव, गली, घर, मेला - ठेला।
रहिउ खेलि लाखन का खेला।

खर्चा उतना ही करो जितनी हो औकात।
करजा ले खरचा करो नहीं ठीक है बात।24
कर्ज बड़ा इक मर्ज है मन में करौ बिचार।
इससे चिन्तित होत है पूरा घर - परिवार।25

इसीलिए सुन लो सुमुखि रहा तुम्हें समझाय।
अपनी संस्कृति सभ्यता से बढ़कर कुछ नाय।26

पर लोगन ते नित अठिलाती।
पति को आँखि काढ़ि गुर्राती।
पति की बात न मानउ एकौ।
नित प्रति देती कष्ट अनेकौ।
जौ कउनिउ अनहोनी  होई।
तुमका  बचा न  पइहैं  कोई।
इज्जति माटी मा मिलि जाई।
थाना पुलिस काम न आई।
थाना पुलिस जो कामौ आई।
गै इज्जति वापस नहिं आई।
बड़ी बड़ी तब आँखी कढ़िहौ।
आपन दोस दूजे पर मढ़िहौ।
हरी अकिल नर केरि सयानी।
झेलि रहा तुम्हरी मनमानी।
सुनौ बिनय मम देबी कुलटा।
करौ काम न उलटा - पुलटा।
सुनि पुकार लरिकन की अम्मा।
पत्थर  से  बनि  जाव  मुलम्मा।
निज पति को पति मानउ रानी।
यहिसे सफल होय जिन्दगानी।
नहीं  तौ  फिरिहौ  मारी - मारी।
सबै  जगह क्षजइहौ   दुतकारी।
करउ बिचार  तनिक मन माँहीं।
निज पति से बढ़िके कोउ नाँहीं।
सद्कर्मन   का  करो  कराओ।
नरक   नहीं   बैकुण्ठै   जाओ।

हाथ जोरि बिनती करउँ मम बिनती सुनि लेउ।
अपने भारत देश की तनिक लाज रखि लेउ।27

पति को नहीं सताइये पति से है कल्यान।
जो पति से झगड़ा करै सहै कोटि अपमान।28

आरि बगल घर गांव में हँसी उड़ावैं  लोग। 
आपस में हो प्रेम अति आवै यह संजोग।29

जेहिका समझो तुम सुविचारी।
उनहिनि ते करियो तुम यारी।
 ब्वॉयफ्रेंड  को  भाई  भाखौ।
 दूरी  कुछ  बनाय के  राखौ। 
कामी  कुटिल पड़े  दिखलाई। 
या के पास  कबो  नहिं  जाई।
समय - समय से बाहर जाओ। 
समय से घर को वापस आओ। 
बात  हमारि   यहौ तुम  मानो।
 निज पति का परमेश्वर जानो।
 पहनो वस्त्र न बदन  दिखाऊ। 
जानत तुम  विपरीत  सुभाऊ। 
टॉप - जींस तन  बिना  दुपट्टा। 
इज्जति  मा  लगवउतीं  बट्टा। 
अंग  प्रदर्शन  करो  न  बहना। 
लज्जा  है  औरत का  गहना। 
तंग वस्त्र मत करिए  धारण। 
ये सब हैं  आफत के कारण। 
समय से घरको आना जाना। 
सदाचार  है  परम   खजाना। 
पढ़ो लिखो  मन खूब लगाई। 
नहीं भूलो  आपन   प्रभुताई। 
जग में नारि - मरद  हैं  कैसे।
दायें - बायें    अंग   है   जैसे। 
सुनौ सबै जन  धरिके ध्याना।
 करो सदा  कुलटा गुण गाना। 

नारी का  करते रहो  तुम  सदैव  सम्मान।
कबहुँ बुरा मत सोचिए नारी संग श्रीमान।30

नारी माता बहन है नारी पतनी होय।
नारी बेटी जगत में जिसकी दुनिया होय।31

 होइहैं खुशी प्रेम तब करिहैं।
सात जन्म के पुरिखा तरिहैं। 
जो करिहो तनिको मक्कारी। 
तो फिरि हानि उठाइहौ भारी। 
कही  काह  लोगन की बीवी 
द्याखैं  रोजु   सलीमा - टीवी। 
घर के काम छुवैं नहिं एकौ।
राज रोग होइ  गये  अनेकौ। 
अंग - अंग  मा  चर्बी  चढ़िगै।
कोलेस्ट्रोल और बीपी बढ़िगै। 
डायबिटीज से हँफनी छूटै। 
घाव भरै नहिं कहूँ जो फूटै।
तनिको काम करें मन लाई।
 तौ दिल की धड़कन बढ़ि जाई। 
थायराइड बढ़िगै अति भारी।
निकरि आई सारी  मक्कारी। 
कुछ  नारी  ऐसी  भी  देखी। 
बिना   बीमारी   मारैं  सेखी।
सिर अरु पेट का दरद बतावैं।
बैद - डाक्टर ;पकरि न पावैं।
आवैं  डाक्टर   दियैं  दवाई।
चुप्पे  ;कतहूँ  -दियैं   बहाई।
घर - बाहर  सब  इनसे हारे।
लेकिन का करि सकत बिचारे। 
लाखन कै सब  दवा करावैं।
फिरिउ शांति से रहि ना पावैं।
नहिं पइसा ते प्रीति जतावैं।
निशिवासर तकनीक उठावैं।

करैं कुटिलता नारियाँ समझैं नहिं निज धेय।
वे सब सभ्य समाज में समझी जातीं हेय।32
हो भारत में पूज्य तुम करो ना ऐसे काम। 
घर समाज और देस में होय घोर अपमान।33 

घर का पइसा बाहर जाई। 
बिन पइसा घर अति दुखदाई। 
या से  तुम्हैं  रहेन  समझाई। 
करो नहीं  ज्यादा  कुटिलई। 
अपने घर का तुम पहचानौ।
सास ननद पति देवर जानौ।
जानौ ससुर औ जेठ जेठानी। 
जानौ  देवर  अरु   देवरानी। 
जानौ मातु - पिता सुत दारा।
 जानौ आपन कुल परिवारा। 
सेवा   करो   धरम  अनुहारी।
सब मा  हरदम रहौ  पियारी।
 या ते सबहिं कहौं समुझाई। 
कुलटा ते सुलटा बनि जाई।
अपने घर के काज सम्हारौ।
मन की सबहिंकुटिलता मारो।
छोटी  बचतें  बड़ा  सहारा। 
भविष्य सुरक्षित करें हमारा। 
कर्म लगन अनुसासन निष्ठा।
सदा बढ़ाते मान  प्रतिष्ठा।
घर की अपने करो सफाई।
नहिं घर आवै रोग दवाई।

नारी के हित बहु लिखा निज मति के अनुसार।
अब कुछ नर हित में लिखूँ अपने तुच्छ बिचार।34

नारी से नर कम नहीं जानत है सब कोय। 
नारी कुलटा है अगर नर भी कुलटा होय।35 

चारि तरह की नारि बखाना। 
अब नर के करबै  गुणगाना। 
चारि  तरह  के नर भी होते। 
लायक कुछ नालायक होते। 
लायक नर  सम्मान  हैं पाते। 
बुद्धिमान  सगुंणी  कहलाते। 
इनके चरित परम  सुखदाई। 
सबै  बताय  रहेन  समुझाई।
सज्जन का यह लागी नीका।
दुर्गुणी लोग  बतइहैं फीका। 
फिरिउ कहब हम बारम्बारा। 
सज्जन नमन करौं सतबारा। 
अच्छे नर जग  सोहत  कैसे।
कीचड़ खिला कमल हो जैसे।
नहिं घमंड  इनके  मन  माँहीं।
जिउ जुड़ात जस बरगद छाँहीं।
मातु - पिता का कहना मानैं।
छोट - बड़ा सबका पहिचानैं। 
निज पतनी से  प्रीति जतावैं।
दूजी  को  मन माँहिं न लावैं।
जो  समाज  हित होई कामा।
करिहैं  वहै  काम  अविरामा।
पावैं   सदा   मान - सम्माना।
तुष्टा  नर  इनको  सब जाना।
अब  रुष्टा  की  बात  बताऊँ।
मति अनुसार वहौ समझाऊँ।
घर मा  जातै  नाक  सिक्वारैं।
पत्नी मा सब  कमी  निकारैं। 
उनकै   बात  न  मानैं  एकौ।
लज्जित करते भाँति अनेकौ। 
अपने  घर  के  शेर  कहाते। 
बाहर  हैं  गीदड़  बन  जाते।
घर के सुख-दुख करते भोगा। 
ये  नर  होत  सराहन  जोगा। 
पुष्टा  नर  होते  अति  तगड़े। 
करते    रहते   दंगा   झगड़े। 
नारी   घर  की  महरी  जानैं।
तन सेहत को  ज्यादा  मानैं। 
मारधाड़  मा  रहत  हैं  आगे। 
पुलिस से बचिके रहैं अभागे। 
पुलिस के फंदे जब चढ़ जाते। 
बिना सजा नहिं वापस आते।
अब दुष्टा  की  सुनो  कहानी। 
सबै   जगह  इनकै  मनमानी।

इधर उधर बिचरत फिरैं ले मिजाज रंगीन।
इन पर सब नर थूकते समझत पसु से हीन।36

किंतु लगाते हैं बहुत अपने को श्रीमान। 
लेकिन यह बेशर्म है जानत सकल जहान। 37

कुलटा नर अरु कुलटा नारी। 
दोउ प्रताड़न के अधिकारी।
प्रेम सहित इनका समझाओ।
इन के सब गुण दोष बताओ।
जिनके काम ना लागैं नीका।
ऐसे नर जंजाल  हैं  जी का।
जग में अपनी  हंसी  कराते।
वे नर भी  कुलटा  कहलाते।
करते हैं  ब्यभिचार अनेका।
सोचे  युक्ति  एक  से  एका।
इनके नीकि न  कउनो ढर्रा।
पियत  रोजु  हैं   देसी  ठर्रा।
इंग्लिश भी कुछ पीते भाई।
कुछ गाँजा कै  करैं  पियाई।
गुटखा पुड़िया रोज हैं खाते।
फिर बीड़ी - सिगरेट  मँगाते।
भाँग खाय कुछ आँखी काढ़ैं।
कुछ आपनि बढ़बूती  झाड़ैं।
बिना नसा के चलि नहिं पावैं।
करैं   नसा   उत्पात   मचावैं।
कुछ तो है अफीम के आदी।
बीवी   बच्चन   कै  बरबादी।
तरह - तरह  के  नसा  करते।
बच्चों के हित  ध्यान न धरते।
लरिका बच्चा सुख ना पावत।
घर बाहर  कोहराम  मचावत। 
गंदी - गंदी   आदत   सीखत।
सब मा हैं  असुरक्षित दीखत।

बने मरमहित घूमते सब में है सिरमौर।
अंदर से कुछ और है बाहर से कुछ और।38

 चोरी डाका मार में कबहुँ  न होते बोर। 
ऐसे नर होते सदा ब्यभिचारी अरु चोर।39

इनहिनि का सब कहैं मनचला।
इनसे  नहिं है  नारि का भला। 
जो  तनिको हैं  मौका  पावत।
करत कुकर्म विलंब न लावत। 
इनकै  करैं  सबै  जन   निन्दा।
नारी   का  ई  समुझि   परिंदा।
दुराचार   पहिले   करि    डारैं।
बादि मा वहिका  जान ते मारैं। 
इनका   नारी   बहुत    देरातीं।
मेला -  हाट कतहुँ नहिं जातीं।
अस  बाढ़ी   है   इनके  मस्ती।
करत   नारि  ते   जब्बरदस्ती। 
कबहुँ कबहुँ बनि जात दरिंदा।
देत जलाय  नारि  को  जिन्दा।
इनको सजा मिलत अति भारी।
जो   मनचले   सतावत   नारी।
ब्याझत   घूरु   बैल जस नाटा।
अति  अभद्र  नित  पावैं  चाटा।
कुछ  कानून  नये  अब  बनिहैं।
जइहैं  जेल  जो  बात न मनिहैं।
पायी   पुलिस   टूरि   तब   देई।
चिल्लइहैं   कुछ   ध्यान  न  देई।
तब    होई    पछतावा     भारी।
जबै   पुलिस   की  सुनिहैं गारी।
होय   सुधार   जब   इनमा जाई।
तबहिं   देस   कै   होय   भलाई।

सरम इन्है आती नहीं करैं तुच्छ सब कार्य।
अवगुण कभी समाज को होते नहिं स्वीकार्य।40

अपनी संस्कृति सभ्यता इन्हें न आती रास। 
होते अति बेशर्म है यह अवगुण है खास।41

बिन  अस्तित्व  रहैं   संसारा।
बहैं कीट जस जल की धारा।
जगह-जगह अपमान सहत हैं। 
घूमि -  घूमि  परपंच   करत हैं।
 काम - धाम नहीं इनते सपरत।
चौराहन  पर  नित  हैं  बिचरत।
करत  रोजु   हैं   सिटियाबाजी।
कहत लोग सब  इनको  पाजी। 
निज इज्जति मरजाद गवाँवत।
फिरिउ चेतु नहिं मन मा लावत।
नितप्रति   रहत  उपद्रव  जोते।
ऐसे    नर    नालायक     होते।
इज्जति  अरु  मरजाद न जानैं।
अपनिनि   बात   रहत  हैं ताने।
इनसे   सदा   रहाउ   हुसियारा।
नहीं, बिगड़िहैं।  काम   तुम्हारा।
इनका  साथ  कबौ  नहिं  कीजै।
करहिं   उपद्रव   झापड़   दीजै।
ई   समाज   के  दुस्मन   पक्के।
लच्छन   देखि   रहत भौचक्के।

काम धाम सपरत नहीं दुस्करमन मा लीन।
ऐसे नर हैं जगत में एक टका के तीन।42

यद्यपि इसके हृदय मा भरे हैं दोस तमाम।
डरते  सारे लोग हैं झुक कर करैं सलाम।43

द्याखउ गलत जो इनके धैना।
तुरत डपटि के ब्वालौ बैना।
तनिकौ नहीं तरस मन लाओ।
इनका तुरतै दूरि भगाओ।
जो इन संग ममता दिखलइहौ।
होय हानि पाछे पछितइहौ।
काम काज नहिं एकउ झाँकैं।
नित उठि नारि पराई ताकैं।
गाँव नगर अरु मेला - ठेला।
चलत जहाँ है इनका खेला।
ताकैं बिटिया बहिनि पराई।
बहु अभद्र इनकै कुटिलाई।
निज पत्नी का द्यात न ध्याना।
आपन चहत सकल कल्याना।
ऐसे नर जग में जस कागा।
इनके बुद्धि बिबेक न जागा।
इनके लाज सरम नहिं तनिका।
पुरुस नहीं पुरुसन सम गनिका।
इनसे सदा रहउ होसियारा।
मानो सब जन कहा हमारा।
जो मनिहौ नहिं हमरो बाता.
जस बोइहौ तस कटिहौ ताता।

अवगुन इनमा हैं बहुत सदगुण से हैं हीन।
इनसे नित दूरिनि रहौ मन नहिं करौ मलीन।44

ये हैं कलंक समाज के जीवन करते गर्क।
इनको कोऊ कुछ कहे पड़े न कोई फर्क।45

 इनहुन काहि रहेन समुझाई।
मत ताकउ तुम नारि पराई।
जानउ बात असंभव भाई ।
छ्वाड़ौ मन आपनि कुटिलाई।
तंग वस्त्र ऐसे तन धारौ।
प्रेम से बैठो पलथी मारौ।
नाभी से नीचे कुछ लाई।
पैंट कमर से बाँधउ भाई।
नहिं नितंब पर देउ टिकाई।
पहनौ पैंट महा सुखदाई।
यहि ते न निकरी ज्यादा। 
रहा हमार आपसे वादा।
गलती आपनि मन से मानौ।
हित अनहित आपन पहिचानौ।
ईश्वर का नहिं कबहूँ भूलो।
अवसर पा ऊँचाई छू लो।
जो समाज के अवगुन जानो।
करो नष्ट ऐसे प्रण ठानो।
अनुसासित सज्जन सुविचारी।
आदर पाने के अधिकारी।
करो बचत आगे करि ध्याना।
या ते होय सकल कल्याना।
जाय बैंक मा ख्वालौ खाता।
कुछ तो बचत करौ निज गाता।
राखउ प्रेम से लरिका बच्चा।
करउ प्रेम उनसे अति सच्चा।
राखउ मन ईश्वरहिं भरोसा।
सब प्रकार राखउ संतोसा।
बिन संतोष दुक्ख नर पावत।
आपन बुद्धि बिबेक नसावत।
जो तुम्हरे करमन मा होई।
होई वहै अउर नहिं होई।
सुन्दर सुन्दर कथा किहानी।
पढ़ौ लिखौ नहिं होई हानी।
सत्य अहिंसा के बल गाँधी।
लाये थे स्वराज की आँधी।
भगत सिंह आजाद सुभाषा।
बनो पटेल रचो इतिहासा।
देस क्राँतिह बिगुल बजाइनि।
अंगरेजन का मारि भगाइनि।
तुमहूँ ऐसे करो सुकरमा।
इज्जति पाऔ अपने धरमा।
बनो बिबेका नन्द सरीखे।
कबौ बचन नहिं ब्वालौ तीखे।
सुबयन बोलैं अटल बिहारी।
सुन्दर बात किहिन सुविचारी।

चाय बेंचि फुटपाथ पर मोदी हुए महान।
कर्म करो सुख से जियो बने आपकी सान।46

धीरूभाई ने किया बहुत अनोखा काम।
पाई पाई जोड़कर बन गए जग सरनाम।47

इन सबसे कुछ लइके सिच्छा।
करउ काम नहिं लाव अनिच्छा।
अब तक जो कुछ अवगुण कीन्हा।
दियो बिसारि भूल बस कीन्हा।
मागों छमा कान का पकड़ौ।
चरण कमल पर नकुना रगड़ौ।
अब न करब सब देउ बताई।
अब सब काज करब मनलाई।
निश्चय प्रेम करै सब कोई।
सत्य बचन मानौ खुस होई।
मति बदलौ अब कुलटा भाई।
सुन्दर कर्म करो सुखदाई।
पालौ नहीं तलब का चक्कर।
लेउ सदा अवगुण से टक्कर।
करो कृपा अविलंब सनेही।
रहउ पती निज पत्नी के ही।
स्वच्छता है सबका भूषण।
और गन्दगी विकट प्रदूषण।
रहौ गन्दगी से नित दूरहिं।
जीवन सुख भोगहिं भरपूरहिं।
स्वच्छ राखि आपन घर द्वारा।
सुख पइहैं तुम्हरे सुत- दारा।
स्वच्छता से सब सुख पइहैं।
कोऊ अस्पताल न हिं जइहैं।
यहि होइ बचत बड़ भारी।
नहिं आवति घर मा बीमारी।
कुलटा चरित जो हरदिन गइहौ।
नित प्रति मस्ती मौज मनइहौ।
तब कुलटा का लागी लाजा।
तब करिहैं सब सुन्दर काजा।
या ते सबहिं कहौं समुझाई।
कुलटा चरित पढ़ौ मन लाई।
मेहनत कड़ी सुरक्षा भारी।
अनुसासन सबसे गुणकारी।
गर्व करो नहिं करौ घमण्डा।
सज्जन बनो नहीं उदण्डा।
यक यक दाना धरो संजोई।
पइसा पइसा रुपिया होई।
कुछ बचाय के बैंक मा डारउ।
काज परै जब तबै निकारउ।
लरिका बच्चा सब सुख पइहैं।
सब तुम्हार जसगान सुनइहैं।
नाव तुम्हार आगेव सब लैई।
सब कोउ मन से आदर देई।
नहीं तौ मनई गारी देइहैं।
मन से नाम न कोऊ लेइहैं।
हिलमिल रहैं सबै नर- नारी।
तन - मन से सुन्दर सुविचारी।
तबहिनि पुरई आस हमारी।
तौ समझब कविता गुणकारी।
मन गदगद तब होई मोरा।
नहीं तौ समझब कागद कोरा।

नमो नमो कुलटा नमो विनय मोरि सुनि लेउ।
दम्भ छोंड़ि हिलमिल रहौ जगमा सुख भर देउ।49

निज विचार अर्पित करूँ सुन लो करुण पुकार।
हँसी खुसी अरु प्रेम से  घर को लेउ सवाँरि।50

माध्यम कबिता है बनी कहता जग की बात।
नर-नारी हिलमिल रहैं जानैं निज औकात।51

करते हास्य पसंद हैं कबिता के सौकीन।
खाते हैं अति प्रेम से मीठा संग नमकीन।52

पढ़ करके नर नारि सब होवैं अक्किल मंद।
घर बाहर सब जगह ही रहैं सदा सानन्द।53

तब यह पुस्तक हो सफल मन आनन्दित होय।
जो मन में था लिख दिया हरि इच्छा सो होय।54

शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

चंद्र और उनकी दस कविताएँ — अवनीश सिंह चौहान


21 अप्रैल 1997 को खेरनी काछारी गाँव, ज़िला कार्बी आँगलोंग, असम, भारत में एक अति सामान्य किसान परिवार में जन्मे सौम्य, सहज, स्पष्टवादी युवा कवि चंद्र जी (चंद्रमोहन जी) ने अपनी विलक्षण काव्य प्रतिभा से बहुत ही कम समय में साहित्य जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। हम सब जानते हैं कि ध्यानाकर्षण यूँ ही नहीं होता— इसके लिए तप करना पड़ता है, साधना करनी पड़ती है। चंद्र जी ने भी, काफी-कुछ रमाशंकर यादव 'विद्रोही' जी, दम गोंडवी जी, नचिकेता जी, रामनारायण रमण जी, बल्ली सिंह चीमा जी एवं रमाकांत जी की तरह ही, अपने आप को तपाया और खपाया है— एक विद्रोही कवि के रूप में और गाँव-जवार के मेहनतकश-किसान के रूप में भी। शायद इसीलिये चंद्र जी की कविताओं का आकर्षण क्षणिक नहीं हैं, क्योंकि इनमें मानवीय संघर्ष के साथ दया, प्रेम, करुणा का ऐसा सम्मिश्रण मौजूद है, जो चाहे-अनचाहे 'जन-गण-मन' को सवालों के घेरे में बाँधे रखता है। लब्बोलबाब यह कि भारतीय संस्कृति की गंध, अपनी माटी की सोंधी महक और अनुभवजन्य कटु यथार्थ को प्रभावशाली शैली में व्यंजित करने के लिए जिस प्रकार से दृष्टि की व्यापकता, सृजन की उत्कृष्टता एवं धारदार तेवर की आवश्यकता होती है, वह सब इस कवि में मौजूद है। तभी तो आज नई कविता की नई पीढ़ी में यह कवि एक प्रकाश-पुँज के रूप में आलोकित हो रहा है। सम्पर्क: मोबाईल : 9365909065

वरिष्ठ कवि राम सेंगर जी के सहयोग से प्राप्त चित्र 
1. ज़िन्दगी का मतलब

ज़िन्दगी का मतलब ये नहीं
कि सिर्फ पैदा हो जाना
फिर धीरे-धीरे शिशु संसार का समय जीते हुए 
फिर किशोरावस्था से गुजरते हुए
और फिर यौवन अवस्था में पहुँच कर
आत्महत्या कर लेना!

ज़िन्दगी  का मतलब यह भी नहीं
कि गैरों के कन्धों पर चित्ता की तरह
उम्र भर लदे रहना
सिर्फ अपने दुखों को दुख  कहना
सिर्फ अपने दुख से रोना ,घबराना
औरों के दुखों पर देना लात मार!
न लेना किसी से न देना किसी से
ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं 
कि वफा, ईमान, प्यार सब कुछ भुला देना
स्वाभिमान का तापमान न होना ज़िगर में
सिर्फ अपने फिकर में दिन-रात सोचना
न होना श्रम और सच्ची लगन का
सिर्फ अपने में ही मगन रहना!

ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं
कि ज़िन्दगी भर आन की कमाई पर चान्दी काटते रहना 
पेड़ की टहनियों की तरह कट कर भी 
न प्रेम-सद्भाव का अमृत जल बरसना
बहुत चुप रहना, बहुत बोलना
न होना कला सहनशीलता का!

ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं
कि देह में ज़ाँगर रहते हुये  भी 
कामचोर होना
धीरे-धीरे दरवाजा बन्द करना नेकी का 
न होना सीरत का 
ज़िन्दगी भर गुलाम की तरह सिर्फ नौकरी करते रह जाना
पैसों के लालच में
पैसों को ही बाप, दादा, ईश्वर सब कुछ मानना
सिर्फ अपने ही तड़प में
छटपटाना
आहें भरना
ये न समझना कि 
हमसे भी बहुत दुखिया भरे पड़े हैं संसार में
कि किसी के कोई नहीं दाह-संस्कार करने वाले भी!

ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं 
कि किसी बनिया, व्यापारियों के हाथों बिक जाना 
हिये में लाज, शर्म का न होना 
ज़िन्दा, मुर्दा लाशों की तरह खामोश,
एकदम खामोश
ज़िन्दगी के अन्धेरे कमरे में जहरीली लताओं की तरह
पसर  जाना
आदमीयत के बागों से दूर, बहुत दूर
कहीं सुनसान कंक्रीट के घने जंगलों में छुप जाना
चूहे की मानिन्द
और दुनिया में अच्छे-अच्छे किताबों जैसे लोगों को
दीमक  की तरह
चाट जाना 
बन जाना खुफिया हत्यारा
मिटा देना हृदय से प्रेम और विचारों की अविरल-धारा!

ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं
कि उम्र भर
हिंसक, खूनी, घोर-अशान्ति 
युद्धों को ललकारना
दुनिया में शान्ति को भंग करना
बनाते जाना दिन-पर-दिन नंगी-नंगी तलवारें
तमाम दुनिया को ध्वस्त करने वाली हथियार 
और दुनिया के तमाम मासूम-मासूम बच्चों को 
वक्त-बेवक्त सिखाते जाना अन्तिम दुनिया को नष्ट करने के लिए बहुत-बहुत उपाय
धूल, मिट्टी, वनस्पतियों, अनाजों और औषधियों के बीज सब गायब करते जाना 
किसी अदृश्य सीमेन्ट, बालू और ईंटों से प्लस्तर करते हुए- पृथ्वी पर,
पृथ्वी की हरियाली को खात्मा करने के लिए 
कला और हुनर और विज्ञान और तकनीक के बल पर सिखाते जाना

जिन हाथों में थमाना चाहिए भविष्य के सूरज को, चान्द को, सितारों को, 
श्रमिक हथियार, कलम, कॉपी
और भिन्न-भिन्न अनाजों, सब्जियों और वनस्पतियों के बीज
और अच्छी-अच्छी किताबें 
जिनसे ज़िन्दा रह सकें विश्व की तमाम खेतियाँ 
जिनसे लिखा सके इस पृथ्वी पर जीवन की कहानियाँ, कविताएँ  
जिनसे जान सकें,
समझ सकें 
सच्ची ज्ञान, विज्ञान, भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र 
और महापुरुषों के अनमोल विचार

जिनसे ज़िन्दा रह सकें तामाम भूखे-प्यासे पेट 
जिनसे बना रहे विश्व पर्यावरण के सुन्दर-सन्तुलन
तमाम जीवन के मधुर गान
बची रह सकें ज़िनसे 
पृथ्वी पर प्रेम व परोपकार की वनस्पतियाँ 
श्रम, संघर्ष, स्वाभिमान की हरियालियाँ 
और जीवन की आन-बान-शान

उन नरम-नरम हाथों में
क्षण-क्षण में
थमाते  जाना
विस्फोटक-बम-बारूदों  जैसे  बहुत-बहुत कुछ!
ज़िन्दगी का मतलब यह नहीं, नहीं! नहीं! नहीं!

ज़िन्दगी  का मतलब यह भी नहीं, दोस्त!
कि विश्व के असंख्य-असंख्य नदियों की
असंख्य-असंख्य थनों को असंख्य-असंख्य हाथों से
दुह-दुह कर, कँकड़िला, मुर्दा-मैदान बना देना 
वहाँ पर कल-करखाना और बिजनेस की बड़ी-बड़ी टावरें 
बैठा  देना 
बाँट देना तार-तार 
रिश्ता-रिश्ता को
देश-देश को
गाँव-गाँव को 
जिला-जिला को 
राज्य-राज्य को 
पिसे हुये महीन शीशे के दाने की तरह!

ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं दोस्त!
कि शराब, कवाब, शवाब में ही 
मस्त रहना
धर्म, मन्दिर-मस्जिद, ईश्वर, काला-गोरा, महल-आटारी,
घोड़ा-गाड़ी, सोना-चान्दी, पोथी-पतरी  के 
अन्तहीन झगड़ों के जबड़ो में ऊलझते-पुलझते-
फँसते-लड़ते, मर-मिटते रह जाना 
न सुनना किसी का, न सुनने देना किसी का 
न बोलना किसी से, न बोलने देना किसी से
यदि कोई साँच पर चले तो उसे भी बहकाना
और खुद साँच पर चलने से कतराना
सच को सच कहने में शर्माना 
झूठ को झूठ कहने में ओठ सिल लेना
न किसी को गले में ईमान का माला पहनने देना
न खुद  ईमान और रहम के लीक पर चलना। 

न आँखों देखी देखना 
प्रकृति की अप्रतिम सुन्दरता को 
न महसूस कर सकना 
अपनी भीगी हुई आत्मा में- 
हवा, पानी, आग, मिट्टी और आकाश की गरिमा को, असमिता  को!

न हँसना फूलों की तरह 
न  नदियों की तरह मुस्कुराना
न चिड़ियों की तरह चहचहाना
न भँवरों की तरह गुनगुनाना
न श्रमिकों की तरह रोना, गिड़गिड़ाना
न तितलियों  की तरह फुदफुदाना 
न सुनना किसी के गीत के अमर बोल
न जीने की कला, न संगीत की कला सीख सकना
न बजा सकना मुरली, गिटार, ढ़ोलक 
न सितार की तार झंकृत कर सकना कभी। 

और अन्त में 
पछतावे की आग में 
चुपचाप जलना
खोजना गज भर ज़मीन
और बीता भर कफन

फिर
मिट्टी में मिल जाना!
ज़िन्दगी का मतलब यह भी नहीं 
कि मरने के बाद भी ज़िन्दा न रहना!

2. तब  तो  मुझे  ही मर जाना चाहिए 

यदि मुझ में नहीं है तनिक भी प्यार
यदि मैं आदमी नहीं हूँ मिलनसार 
यदि मैं सीख नहीं सकता तनिक भी ज्ञान
यदि मैं लिख नहीं सकता अपनी लोक भाषा में मधुर गान
यदि मैं पढ़ नहीं सकता और कवियों की कविताएँ 
यदि मैं अपने श्रम का लहू बहाकर
इस धरती पर उपजा नहीं सकता अनाज 
यदि मैं इस धरती पर रोप नहीं सकता एक भी पेड़ का बीज
यदि मैं पीड़ितों की पीड़ाएँ  देख
नहीं सकता भीतर-बाहर पसीज 
यदि मैं दुनिया के अनाथ और मासूम-मासूम
बच्चे-बच्चियों के होठों पर नहीं सकता चूम  
और नहीं दे सकता यदि इन्हें दो जून की रोटी औ' नून 

यदि मैं थोड़ी-सी दुनिया में 
अपने पैरों पर खड़ा हो कर नहीं सकता घूम 
यदि मैं अपने जीवन में कभी भी न करूँ दान पुण्य

यदि मैं बचा नहीं सकता चिड़ियों के सुन्दर घोंसलों के लिए
घास-फूस का घर
यदि मैं बचा नहीं सकता नदी पर्वत झील सरोवर और विश्व  पर्यावरण

यदि मैं सिर्फ अपने ही दुखों को दुख कहूँ, समझूँ 
और औरों के दुखों पर दूँ लात मार 

यदि मेरे जीने से पृथ्वी भी धीरे-धीरे मरने लगे...

तो  मुझे  ही मर जाना चाहिए
मर जाना चाहिए मेरे भाई
थोड़ी-सी सुन्दर पृथ्वी के लिए
मुझे ही मर जाना चाहिए!

3. जिस तरह आदमी की तबीयत ख़राब हो जाती है 

जिस तरह आदमी की तबीयत ख़राब हो जाती है
ठीक उसी तरह कभी-कभार
देश की तबीयत ख़राब हो जाती है

जिस तरह आदमी की तबीयत ख़राब होने के बाद
उस आदमी की देह के अँग-अँग से धधकती हुई
आग की लूत्तियाँ, चिंगारियाँ उड़ने लगती हैं
और पुर्जे-पुर्जे के भीतर
एक अजीब बेचैनी
एक अजीब छटपटाहट
और कुछ आँसू की नमी
कुछ ख़ून की कमी
कुछ कमज़ोरियाँ
हो जाती हैं

उसी तरह समय के हेर-फेर से
देश की तबीयत ख़राब होने के बाद
देश की देह के पुर्जे-पुर्जे के भीतर
कभी जलन
कभी ठण्डक
महसूस होने लगती है
दिखने में लगती है साफ़-साफ़
देश की हज़ारों जोड़ी लाल-लाल अँखियों में!

लेकिन कभी-कभी
आदमी की तबीयत
बहुत ख़राब हो जाती है, बहुत खराब !

इतनी ख़राब तब हो जाती है
जब उस बेबस आदमी के पास
एक फूटी कौड़ी भी न रहती है
किसी भी अस्पताल में इलाज कराने हेतु
न ख़ुद के दम पर कमाने की जाँगर रहती है
कि नून-रोटी भी खा सके
कि बना सके बरखा-बुन्नी से चूती हुई झोपड़ियाँ 
कि ख़रीदकर कफ़न भी 
नँग-धड़ँग तन को ढक सके!

और इस तरह वह बीमार आदमी
गम्भीर, भयावह और खतरनाक रोग-शोक 
घोर दुख के अन्धेरे, 
बहुत अन्धेरे कुआँ जैसी गुफ़ाओं-कन्दराओं में कहीं 
चुपचाप मरने लगता है धीमी मौत

मरते हुए 
करने लगता है ख़ून की अल ल ल ल् उल्टियाँ
और कुम्हलाते छटपटाते कराहते चीख़ते मिमियाते 
घिघियाते 
केवल मुट्ठी भर कृशकाय देह लिए वहीं कहीं 
बंजर भूमि पर दम तोड़ देता, है बिचारा!

जिसकी बदबू देती हुई मुर्दा लाश पर
घृणा-नफ़रत की देसी-विदेशी-पड़ोसी मक्खियाँ
भिनभिनाने लगती हैं इधर-उधर...।

4. कई वर्षों से है 

खेतों और कपिली-नदी के बीच
मेरी माँ की आँखों की नदी का रिश्ता
कई वर्षों से है

मेरे लहू में बहते 
मेरी माँ का क्रन्दन
कई वर्षों से है

दिन भर खटने की आदत पर  
न मिले उधारी में नमक
मुट्ठी-भर पिसान
और खतरनाक खाँसी की टिकिया
तो माँगने की आदत से 
हँसते-हँसते
स्वाभिमान की मौत कुबूलने के लिए  
मेरे ज़िगर के रग-रग में 
कई वर्षों से है

यह अनन्त धरती के निहाई पर
हथौड़ी से पीटते-पीटते
खुरपी, कुदाली
बीत गई मेरे पिता की उम्र!

हथौड़ी से पीटने की
और लोहे की खुरपी-कुदालिओं जैसे पिटाने की सहनशक्ति
मेरी कृशकाय-आत्मा की यातना में शामिल
कई वर्षों से है!

5. सावधान ईश्वरो! हम बन्दूक उठा लेंगे

मैंने आलू बोया बड़ी मेहनत से
और अपनी देह की तरह पाल-पोष कर जवान किया
रोगों, जैसे कीड़े-मकोड़ों से हजार बचाया
जो जाड़ा-पाला से
खत्म हो जाते हैं पूरे-के-पूरे
उन आलू के खेत को बचाया!

मैंने प्याज बोया
मिट्टी के बदन को दही की तरह मुलायम बनाकर
लहसुन बोया
छह ऋतुओं में क से ज्ञ तक की उगने वाली फसलों और सब्जियों को 
इसी भूमि पर उगाया!

लेकिन जब एक किसान की तरह
बाजारों में बेचने गया पैकारी हिसाब
तो लेने वाले कमबख्त व्यापारी टूट पड़े
कम दाम में ही
और मेरे हाथ में बचा एक आलू!

मैं सोचता हूँ कि 
यही कम दाम में लेने वाले लोग 
एक दिन 
आपको भी कम दाम में खरीद लेंगे क्या?
गोदामों को फूँक देंगे क्या?
महँगाई को बढ़ा देंगे क्या?
गर मैं गन्ना उगाऊँगा तो मिट्टी का मोल भी नहीं रहेगा क्या?
और इससे बनने वाली चीनी, चीनी की कीमत को चन्द्रमा तक छुआ देंगे क्या 

भूख से मरने वाले लोगों के लाशों पर आक..थूक देंगे क्या?
नहीं! नहीं!
इन सब काण्डों के होने से पहले
सावधान ईश्वरो! हम बन्दूक उठा लेंगे
और आलू की गोलियाँ भरकर
आपको सीधे पाताल लोक में पहुँचा देंगे!

6. सदानंद चाचा

गेहूँ के खूबसूरत खेतों की तैयारी के लिए
अभी कल ही मिर्च के गाँछों को 
कुदाली से काट रहे थे सदानंद चाचा
संग-साथ कटवा रही थीं सदानंद बो चाची 
सदानंद चाचा के अपाहिज पिता काट रहे थे
सदानंद चाचा का नन्हा यश काट रहा था
छुटकी खुशी काट रही थीं 
लगभग सब अपने-अपने कुदालियों से काट रहे थे
लगभग सब मिर्च के बगानों को दुख के साथ विदा कर रहे थे
और मैं गन्ने के खेत में गन्ना काट रहा था!

अचानक देखा कि
चाचा इस बार पुरजोर देकर मिट्टी में कुदाल मार रहे हैं
फिर अचानक देखा कि
मिर्च के जड़ में न लगकर सदानंद चाचा के पाँव में 
कुदाल का धारदार फाल लग कर आधा पाँव ही कट गया
उफ!वहाँ का माँस कटकर फेंका गया वहीं कहीं 
लाज़मी है कि खून बहेगा ही!
दुख-दरद तो बढ़ेगा ही!

चाचा वहीं मिट्टी को बाहों में कस के पकड़कर बेहोश हो गए
चाची दौड़ी-दौड़ी पानी लाईं 
उनकी आँखों पर छिड़कीं 
चाची अपने आँचल के बेने से हवा आँख पर स्नेह से हाँकीं  
चाची अपने आँचल के छोर को फाड़ कर बाँध दीं 
और अपाहिज पिता करते भी क्या
खेत के इर्द-गिर्द वनतुलसी के पल्लव ढूँढ रहे थे
बहते हुए लाल लहू को बन्द करने के लिए
बाबू यश और बनी खुशी अपनी भूखी आँखों से पिता के आँखों में टुकुर-टुकुर ताक रहे थे सिर्फ!

आज जब सुबह सुबह उठा
पहले आँख नहीं धोया
रात के बहे हुए बर्फीले आँसुओं को भी नहीं पोंछ पाया
बाँस के अलगनी पर रखा हुआ पिता का पुराना धुराना कुर्ता पहना
दीवार के कोने में धरा हुआ दाव लिया 
दाव को रेती से पिजाया और पत्थरों से पिजाया
और लाल गमछा मस्तक पर लिए 
लहराता हुआ चल दिया
दूर गन्ने के खेतों में

कुछ देर बाद देखा कि
बिजली के तारों पर बैठे हुए पँक्तिबद्ध पंछी 
प्रातः के गज़ल-गीत गा रहे थे
इस खुशी में गीत गा रहे थे कि 
एक दो टेटनिस का इंजेक्शन और दस बीस लगे हुए कटे पाँव में टाँके और ढेर सारे बेंडिसों के 
आथाह दर्द का चादर ओढ़े हुए सुबह-सुबह
अपने उसी खेत में लंगड़ाते हुए
हल जोत रहे हैं
गेहूँ के दाने छिट-बो रहे हैं

मैं देख रहा हूँ सामने से
वहाँ से खून रिस कर बह रहा है
और खून के रंग पर छीटे हुए दाने को 
चुग रहें  हैं 
देसी-परदेसी पंछी!

मैं देख रहा हूँ अपनी खुली आँखों से
सदानंद चाचा रो नहीं रहे हैं

रो रही है छाती पीट-पीटकर
पृथ्वी की पसरी हुई अन्तहीन आत्मा!

6. दुखी-देश 

इस देश की हजारों जोड़ी आँखों में 
क्यों इतना गम है ?
आँसू क्यों है इतना हजारों जोड़ी आँखों में?

यह जानने के लिए दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जाने की 
जरूरत नहीं
कोई जरूरत नहीं जाने की शहरों में 
वर्तमान भारत का काला चेहरा 
कहीं भी दिख सकता है!

क्योंकि भारत ईश्वरों का देश है
भारत मज़दूरों और किसानों की हत्याओं
और आत्महत्याओं का देश है
मन्दिर, मस्जिदों का देश है
जाति, धर्मों का देश है 
इसलिए भारत एक दुखी देश है

बलात्कार की बातें छोड़ो
क्योंकि बलात्कार महाभारतकालीन युग से 
चलती आ रही है एक खतरनाक परम्परा है

भारत मुर्दों का देश है 
भारत गूंगों और मूकों का देश है
भारत पिछड़ों का देश है
भारत की कोर्ट-कचहरी की कानून में 
ईमान और इन्सानियत का खून कब का ही खत्म हो चुका!

भारत की संसद सच, इन्साफ और 
अधिकार का संगम नहीं!
बीयर बार है
जहाँ  एक दूसरे नेता करते 
अपने-अपने प्यार के इजहार हैं
कोई मारते आँख तो 
कोई किटकिटाते दाँत हैं

जहाँ एक से बढ़कर एक धुरन्धर
जहाँ एक से बढ़कर एक हिटलर
जहाँ  एक से बढ़कर एक हत्यारे
जहाँ  एक से बढ़कर एक सँपेरे!

भारत, वो भारत नहीं रह गया है अब
जो पहले कभी था
भारत के अर्थ बदल गए हैं अब 
भारत की संस्कृति, सभ्यताएँ बदल गई हैं अब 
भारत के गाँव जिला राज्य सब कुछ बदल गए हैं
और भारत के बदलने के साथ-साथ
भारत के लोग बहुत बदल गए हैं
यहाँ  तक कि भारत  के  नद-नदी 
वन-जंगल पर्वत-अँचल बदल गए हैं 

भारत देश के अन्दर झूठ सच पाप पुण्य 
सब उलट-फेर हो चुके हैं

'मैं मादरे- हिन्द का बेटा हूँ 
कहने में भी शर्म आती है मुझे!'

भारत, सोने की चिड़िया नहीं रह गया है अब 
भारत को  गोबर की चिड़िया कहने में भी
शर्म आती है बच्चों को !

भारत के धरती पर सबसे बड़ा सत्य नाम श्री राम का है
ये ही श्री राम का नाम हत्यारों की खौफनाक हथियार है
भारत के भवनों में, मैदानों में जितने भी 
इस तरह के  संगठन हैं 
लगभग सब के सब मौत के सौदागर हैं 

भारत, जिस शब्द को आज भी सुन रहा हूँ 
और पहले भी सुना था कभी 
गोडसे के मुख से
और श्री राम का नाम आज भी पढ़  रहा हूँ 
और पहले  भी पढ़ा था कभी 
एक बाल किताब में 
कि गांधी धरती पर गिर कर
'हे राम' कहके पुकार रहे थे....

कहीं यही अंतिम शब्द तो नहीं भारत देश!

जिस अंतिम शब्द से तुम्हारा
सर्वनाश होना तय है शायद!

7. बच्चे

बच्चे बहुत अच्छे होते हैं
तन, मन, वचन, आत्मा से बहुत सच्चे होते हैं 
प्रेम-सद्भाव के वृक्ष-आम की कोमल डालियों की तरह
सदा झुके होते हैं
कच्चे-पक्के फलों की तरह लदे होते हैं

यदि मिलनसार की भाषा सीखना है 
तो कोई बच्चों से सीखे
बच्चों से सीखे किसी बच्चे के रोने से रोना
किसी बच्चे के खिलौने से खेलना
फिर वापस दे देना
किसी के रसोई घर में पईठकर 
किसी भी माई के हाथों दूध भात नामू-नामू  खा लेना!

धूल की दीवारों की तरह ढ़हना 
फिर चट्टानों की तरह न हिलना 
किसी भी माँ के आँचल में चिपक जाना
फिर चुप हो जाना चुपचाप
कोई बच्चों से सीखे
किसी आन के बच्चे की आँखों में आँसू 
टप-टप बहते हुए को पोंछना 
चुप कराना स्नेहिल हाथों से
फिर गले लग जाना बेशक 
फिर प्यारा-सा चुम्बन दे देना मासूम की तरह
कोई बच्चों से सीखे

बच्चों से सीखे कोई 
कि कोई भी आँगन 
कोई भी घर
किसी का भी खेत-खलिहान
कोई भी आँगन के फूल
सोन-चिरईयों की तरह उड़न्तू होते हैं

जिनके जाति, धर्म नहीं कोई भी
प्रेम और मर्म के सिवा!

किन्तु कहना यह गलत न होगा
कि  बच्चे
भूत होते हैं, वर्तमान होते हैं, भविष्य होते हैं
भूगोल होते हैं, अर्थशास्त्र होते हैं, इतिहास होते हैं
देश होते हैं, दुनिया होते हैं, संसार होते हैं
किसान होते हैं, मज़दूर होते हैं
बहुत-बहुत कुछ होते हैं

बच्चे वक्त के साथ
बदलते रहते हैं

बच्चे शब्द होते हैं 
बम होते हैं, बारूद होते हैं
बन्दूक होते हैं
तोप होते हैं, तलवार होते हैं
आग  होते हैं, पानी होते हैं
हवा होते हैं
धरती होते हैं 
अनन्त आकाश होते हैं

बच्चे गीत होते हैं, संगीत होते हैं 
ज्ञान होते हैं, विज्ञान होते हैं
सभ्यता होते  हैं 
संस्कृति होते हैं, नदी होते हैं, सागर होते हैं
सागर के सुनामी होते हैं
सिन्धु के ज्वार होते हैं
खेत होते हैं, खदान होते हैं, कल-कारखाने होते हैं
कोटि-कोटि श्रमिक हथियार होते हैं

बच्चे चान्द होते हैं, असंख्य सितारे होते हैं
सूरज होते हैं
सम्पूर्ण प्रकृति के अप्रतिम कलाकृति होते हैं

जिन्हें हत्या नहीं कर सकता कोई  
जिनकी प्रतिभा को कत्ल नहीं कर सकता कोई  भी 
अगर करने की कोशिश करता भी  है 
तो सबसे पहले वह खुद खत्म होगा
उसकी तमाम दुनिया खत्म होगी
उसके तमाम देश खत्म होंगे
उसके तमाम लगाए हुए पेड़ खत्म होंगे
उसके तमाम गाँव जिला, राज्य खत्म होंगे 
उसकी तमाम नदियाँ खत्म होंगी 
उसकी तमाम सुन्दरताएँ खत्म होंगी

क्योंकि
बच्चे वक्त के साथ बदलते रहते हैं...

बच्चे बम होते हैं बारुद होते हैं बन्दूक होते हैं ...
भूख में बहुत, बहुत कुछ होते हैं!

जिनके होने से कोई भी रोक नहीं सकता 
न ईश्वर 
न जाति
न धर्म
न सत्ता
न पोथा-पोथी

कुछ भी नहीं...., नहीं, नहीं 
कुछ भी नहीं!

8. हम मज़दूर दुख की दारू पीते हैं

हम मज़दूर दुख की  दारू पीते हैं!

नशा नहीं होती तब
लाल-लाल आँखों में तड़पती हुई 
नौ-नौ नदियों की मछलियाँ 
दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत के  बाद 
यहीं कहीं रेत  पर 
अन्तहीन थकान की लोकगीत गाती हैं 

हम मज़दूर दुख की दारू पीते हैं!

नशा नहीं होती तब
रक्त से भीगे हुए कन्धे को 
अपने स्नेहिल दुपट्टे से नहीं पोंछना चाहती कोई प्रेमिका
नहीं सुनाना चाहती कोई कविता
कहना नहीं चाहती अपनी बिना हड्डी की जुबानों से
कि मज़दूर 'मेरे गले का हार'!

भारी-भारी ईंटों के बीच
दबकर छिलाई हुई श्रमशील ऊँगलियों में 
नहीं पहनाना चाहती कोई अँगूठी!

हमारी सीमाहीन यातनाओं में शामिल नहीं होना चाहते कोई!

हम मज़दूर दुख की दारू पीते हैं!

नशा नहीं होती तब
किन्तु 
खेत से या खदान से काम कर 
जब  टुघरते-टुघरते  टुअरों की  तरह
लौटते हैं शाम को पैदल

तब बीच रास्ते में
कहीं भी कुम्हलाकर गिर सकते हैं
सूखे पेड़ों की तरह
धूल के दीवारों की तरह
कहीं भी भरभरा कर  ढ़ह  सकते हैं
घर लौटने से पहले
अपने  महबूब  के कन्धे  पर 
मेहनतकश मस्तक धरकर बिलख-बिलख कर रोने से पहले
अपने महबूब के गले मिलने से पहले
अपने महबूब के छाती में चिपक कर दूध पीते हुए मासूम बच्चे बच्चियों के हाथों में
टॉफी चॉकलेट देने से पहले
अपने बीमार माई बाप के जर्जर हाथों में
रक्त से सनी हुई दो  सौ की पगार थमाने से पहले !

हम मज़दूर दुख की दारू पीते हैं!

नशा नहीं होती तब
गन्ने के खेतों में कुदाल चलाते हुए
कुदाल से कटकर फेंका जाते जब आधे पाँव 
कई दिनों की मज़ूरी मर जाती है 

वहाँ की खूनसनी पृथ्वी देखती है 
सीधे आसमान से देखता है सूरज
देखता है रात का शीतल चन्द्रमा
हजारों सितारे देखते हैं

कि केवल एक कुदाली के दम पर 
दस-दस व्यक्तियों के पेट पालने वाले मज़दूर के दुख की 
दारूण-दारू, बाजारू दारू के सात-पैक के नशा नहीं 
सात समुन्दर के अनन्त नमकीन पैकें होती हैं 

जिन्हें पीकर पचाने से पहले 
कोई भी मौत की सजा कबूल कर लेगा मेरे दोस्त!

9. मेरा एक मज़दूर साथी

एक मामूली ऑपरेशन बिना मर गया
मेरा एक मज़दूर साथी

ओह! उसकी आत्मा पत्थर-घाट के श्मशान में
रोती है आज

उसकी कही हुई बातें
मेरी छाती की बाती-बाती में
बार-बार चोट करती हैं

खेतों में कुदाल चलाते समय जब
मुझसे कहता था कि मोहन भाई
दुनिया के किसी भी घर में रहो
पर याद रखना
कि यहाँ कोई पानी भी नहीं देगा
माँगने पर

बिना तने हुए हाथों के
एक फूल भी टूट नहीं सकता

हज़ार शीशों से कटने का खतरा उठाए बिना
एक सुन्दर जीवन गढ़ नहीं सकता
आगे बढ़ ही नहीं सकता दोस्त

अपनी पगड़ी में गाँठ बाँधकर याद रखना
बिना हाड़-तोड़ मिहनत-मज़दूरी किए
कहीं भी धकेले जाओगे

जीने में लज्ज़त एक पैसा का न रह जाएगी
आँसू चुपचाप बहाते जाओगे

तुम्हारे घरवाले क्या
एक पूरा देश भी कदर नहीं करेगा
तुम्हारे लहू-पसीने की

10. रास्ते हम ही ने बनाए

रास्ते हम ही ने बनाए
देश एक रास्ता है
और रास्ते के बीच जितने गहरे गड्ढे हैं
लगभग सब के सब गद्दार हैं
और हम देश के रास्ते पर चलते हुए
गिर जाते हैं बार-बार
गड्ढे में

यह हमारी जीत नहीं
बड़ी हार है,
बड़ी हार
कि रास्ते हम ही ने बनाए। 

Ten Poems of Hindi Poet Chandra