पूर्वाभास (www.poorvabhas.in) पर आपका हार्दिक स्वागत है। 11 अक्टूबर 2010 को वरद चतुर्थी/ ललित पंचमी की पावन तिथि पर साहित्य, कला एवं संस्कृति की पत्रिका— पूर्वाभास की यात्रा इंटरनेट पर प्रारम्भ हुई थी। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।
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रविवार, 11 अक्टूबर 2026

डॉ अवनीश सिंह चौहान ‘आउटस्टैंडिंग लीडरशिप अवार्ड’ से सम्मानित


पुणे : डी. वाई. पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (DYPIU), आकुर्डी, पुणे के स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज़, स्कूल ऑफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन स्टडीज़ तथा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस – इंडियन नॉलेज सिस्टम के निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान को ब्लू वॉटर, रावेत, पुणे में 10 अक्टूबर, 2026 को आयोजित एक समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनीष भल्ला द्वारा ‘आउटस्टैंडिंग लीडरशिप अवार्ड’ (Outstanding Leadership Award) से सम्मानित किया गया।

यह पुरस्कार डॉ. चौहान के अनुकरणीय नेतृत्व, दूरदर्शी दृष्टिकोण तथा विश्वविद्यालय के विकास, शैक्षणिक उत्कृष्टता, सामूहिक कार्य-संस्कृति और अंतर्विषयी सहयोग में उनके महत्वपूर्ण योगदानों के लिए प्रदान किया गया। तीनों शैक्षणिक एवं शोध इकाइयों में उनके नेतृत्व से मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान, मीडिया एवं संचार अध्ययन तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली को आगे बढ़ाने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता परिलक्षित होती है।

इस उपलब्धि पर आभार व्यक्त करते हुए डॉ. चौहान ने प्रो. अनुपमा पाटिल, प्रो. माधवी देशपांडे, डॉ. बीरन मोइद्दीन बी.एम., डॉ. अनुराग पांडेय, प्रो. रमेश चंद्र पांडेय, डॉ. प्रमोद शर्मा, श्री विट्ठल एम. धूमल तथा DYPIU के सभी निदेशकों, विभागाध्यक्षों, संकाय सदस्यों और विद्यार्थियों के प्रति उनके सहयोग, प्रोत्साहन और समर्थन के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया।



प्रस्तुति :
सोम चौहान गुरु घासीदास विश्वविद्यालय (सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी), बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में बीएएलएलबी पाठ्यक्रम के छात्र हैं। 

Keep Reading in English: Honoured with the 'Outstanding Leadership Award' by VC of DYPIU

बुधवार, 30 सितंबर 2026

आईजीएनसीए में डीवाईपीआईयू के विद्यार्थियों ने समझी भारतीय ज्ञान परंपरा


पुणे, 30 सितंबर 2026: सेंटर ऑफ एक्सीलेंस–इंडियन नॉलेज सिस्टम (CoE–IKS), डी. वाई. पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (DYPIU), पुणे के 20 विद्यार्थियों और दो संकाय सदस्यों ने 22 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली में आयोजित इमर्शन कार्यक्रम में भाग लिया। IGNCA के कला निधि प्रभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध बौद्धिक, कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ ज्ञान संसाधनों के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रसार की समकालीन विधियों से प्रत्यक्ष रूप से परिचित होने का अवसर प्रदान किया।

यह कार्यक्रम CoE–IKS के संस्थापक निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान के नेतृत्व में तथा DYPIU के कुलपति प्रो. मनीष भल्ला के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कक्षा-कक्ष की शिक्षा को व्यापक बनाना तथा विभिन्न शैक्षणिक विषयों से जुड़े विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतर्विषयक प्रकृति से परिचित कराना था। DYPIU का CoE–IKS भारत की बौद्धिक परंपराओं को समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और अंतर्विषयक अध्ययन से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।

DYPIU और IGNCA के बीच बढ़ते शैक्षणिक सहयोग के संदर्भ में यह इमर्शन कार्यक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। अप्रैल 2026 में दोनों संस्थानों ने भारतीय कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान पर विशेष ध्यान देते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली के क्षेत्र में सहयोगात्मक अनुसंधान, अकादमिक आदान-प्रदान, दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रसार को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

कार्यक्रम का शुभारंभ परिचय एवं स्वागत सत्र से हुआ, जिसके बाद विद्यार्थियों को IGNCA के कार्यों और उसके विभिन्न प्रभागों की गतिविधियों से परिचित कराया गया। प्रो. सुधीर कुमार लाल, डीन, IGNCA, ने प्रतिभागियों को भारत की सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधान, संरक्षण, पुनर्स्थापन और दस्तावेजीकरण के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। डॉ. के. अनिल कुमार, विभागाध्यक्ष, IGNCA, ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक व्यापक और अंतर्विषयक क्षेत्र के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें दर्शन, कला, साहित्य, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, भाषा और पारंपरिक ज्ञान पद्धतियाँ शामिल हैं।

इसके बाद कला कोष के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यार्थियों को IGNCA में संरक्षित और अध्ययन किए जा रहे भारत के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों को समझने का अवसर मिला। चर्चा ने विद्यार्थियों को यह समझने में सहायता की कि भारतीय ज्ञान परंपराओं को केवल ऐतिहासिक या सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखने के बजाय व्यवस्थित अकादमिक अनुसंधान के माध्यम से भी समझना आवश्यक है।

अगले सत्र में संरक्षण एवं परिरक्षण प्रबंधन पर चर्चा हुई। डॉ. अचल पांड्या, प्रोफेसर एवं प्रमुख, संरक्षण विभाग, ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और सांस्कृतिक सामग्रियों के संरक्षण तथा दीर्घकालिक परिरक्षण में प्रयुक्त वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी। विद्यार्थियों ने दुर्लभ और संवेदनशील विरासत संसाधनों की सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली भौतिक उपचार, दस्तावेजीकरण और संरक्षण प्रक्रियाओं को समझा।

इसके बाद डॉ. ऋचा नेगी, प्रमुख, आदि-दृश्य, ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा की अभिव्यक्ति के रूप में प्रागैतिहासिक शैल कला से परिचित कराया। सत्र में शैल कला की परंपराओं, उनके दस्तावेजीकरण और संरक्षण तथा भारतीय उपमहाद्वीप में प्रारंभिक मानव अभिव्यक्ति एवं सांस्कृतिक प्रथाओं को समझने में उनके महत्व पर चर्चा की गई।

स्लाइड यूनिट के सत्र में श्री वीरेंद्र बांगरू ने भारतीय कला के दृश्य दस्तावेजीकरण से संबंधित जानकारी दी। विद्यार्थियों ने समझा कि दृश्य सांस्कृतिक संसाधनों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण उन्हें संरक्षित करने तथा भविष्य के शोध के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

चाय अवकाश के बाद कार्यक्रम पांडुलिपि इकाई में आगे बढ़ा। डॉ. सरवरुल हक, सहायक प्रोफेसर एवं प्रभारी, पांडुलिपि इकाई, ने विद्यार्थियों को IGNCA में संरक्षित दस्तावेजीकृत पांडुलिपियों के संग्रह से परिचित कराया। सत्र में भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को संरक्षित करने तथा युवा पीढ़ी को इसके दस्तावेजीकरण, संरक्षण और अकादमिक अध्ययन से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।

रिप्रोग्राफी इकाई द्वारा पांडुलिपियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए रिप्रोग्राफी एवं माइक्रोफिल्मिंग तकनीकों पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। श्री सुब्रतो दास, श्री अशोक डोगरा और श्री संजय ने दुर्लभ एवं नाजुक पांडुलिपियों के दस्तावेजीकरण तथा उनकी विषय-वस्तु को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में प्रयुक्त तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी दी। विद्यार्थियों ने समझा कि वैज्ञानिक और तकनीकी विधियाँ पारंपरिक विरासत संरक्षण के प्रयासों को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकती हैं।

इसके बाद डॉ. शिल्पी रॉय, सहायक प्रोफेसर, सांस्कृतिक अभिलेखागार, ने विद्यार्थियों को IGNCA सांस्कृतिक अभिलेखागार से परिचित कराया। सत्र में बताया गया कि सांस्कृतिक अभिलेखागार ज्ञान और कलात्मक अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों, जिनमें संगीत तथा अन्य अमूर्त सांस्कृतिक संसाधन भी शामिल हैं, के बहुविषयक भंडार के रूप में कार्य करते हैं।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को विरासत अनुसंधान में प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका से भी परिचित कराया गया। सांस्कृतिक सूचना-विज्ञान प्रयोगशाला में श्रीमती कामना चौधरी, वरिष्ठ विश्लेषक, ने प्रयोगशाला के अनुसंधान एवं अनुप्रयोगों के बारे में जानकारी दी। विद्यार्थियों ने जाना कि डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ भारत की सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण, संरक्षण, संगठन, अनुसंधान और प्रसार में किस प्रकार सहायक हो सकती हैं।

इमर्शन कार्यक्रम के अंतिम चरण में प्रतिभागियों ने कला निधि संदर्भ पुस्तकालय का दौरा किया। श्रीमती श्वेता सिंह, LIO, संदर्भ पुस्तकालय, ने विद्यार्थियों को पुस्तकालय के संग्रह और सेवाओं से परिचित कराया। विद्यार्थियों को दुर्लभ पांडुलिपियों और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संसाधनों को देखने तथा अकादमिक अनुसंधान में विशिष्ट पुस्तकालयों की भूमिका को समझने का अवसर मिला। पुस्तकालय स्वचालन पर डॉ. जसबीर सिंह, सहायक प्रोफेसर, कला निधि, ने प्रतिभागियों को शैक्षणिक संसाधनों तक पहुँच और उनके प्रबंधन में प्रयुक्त तकनीकी प्रणालियों की जानकारी दी।

निर्धारित अकादमिक सत्रों के साथ-साथ इस यात्रा ने DYPIU और IGNCA के विशेषज्ञों के बीच भविष्य में सहयोगात्मक अनुसंधान की संभावनाओं पर संवाद का अवसर भी प्रदान किया। डॉ. गरिमा शर्मा, गतिविधि समन्वयक एवं समन्वयक, CoE–IKS, ने शैक्षणिक यात्रा को संभव बनाने के लिए IGNCA के प्रति आभार व्यक्त किया। डॉ. पथिक साहू, गतिविधि समन्वयक, CoE–IKS, ने DYPIU और IGNCA के बीच अंतर्विषयक सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर चर्चा की। 

इस इमर्शन कार्यक्रम में लिबरल आर्ट्स, अर्थशास्त्र, मीडिया एवं संचार अध्ययन, डिजाइन, सिविल इंजीनियरिंग तथा इंजीनियरिंग मैनेजमेंट एवं रिसर्च सहित विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमियों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। विद्यार्थियों की यह विविधता भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतर्विषयक प्रकृति को रेखांकित करती है और यह दर्शाती है कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान का अध्ययन समकालीन अकादमिक विषयों के विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है।

इस यात्रा ने विद्यार्थियों को कक्षा-कक्ष की शिक्षा से आगे बढ़कर पांडुलिपियों, अभिलेखीय संग्रहों, दृश्य कला, शैल कला, संरक्षण प्रयोगशालाओं, डिजिटल सांस्कृतिक संसाधनों और विशिष्ट पुस्तकालय संग्रहों के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने का अवसर दिया। इस अनुभव ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, विरासत संरक्षण, सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण और अंतर्विषयक अनुसंधान से जुड़े अकादमिक एवं व्यावसायिक अवसरों की संभावनाओं पर विचार करने के लिए भी प्रेरित किया।

इस अवसर पर CoE–IKS, DYPIU के संस्थापक निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को इमर्शन कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्रदान करने के लिए DYPIU के कुलपति प्रो. मनीष भल्ला के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम के समन्वय के लिए डॉ. गरिमा शर्मा और डॉ. पथिक साहू को बधाई दी तथा विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अनुभवात्मक अधिगम के अवसर विद्यार्थियों में भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत की समझ विकसित करने तथा समकालीन अकादमिक दृष्टिकोणों और अनुसंधान के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

विद्यार्थियों ने दुर्लभ पांडुलिपियों, कलाकृतियों, अभिलेखीय सामग्रियों और अन्य सांस्कृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्रत्यक्ष रूप से देखने के अवसर के प्रति उत्साह व्यक्त किया। IGNCA के विशेषज्ञों के साथ उनकी बातचीत ने उन्हें विरासत संरक्षण के वैज्ञानिक, तकनीकी और अंतर्विषयक आयामों को समझने में सहायता की तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली को अकादमिक और अनुसंधान के उभरते क्षेत्र के रूप में देखने में उनकी रुचि को और मजबूत किया।

IGNCA की टीम ने भारतीय ज्ञान परंपराओं के प्रति DYPIU के विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों द्वारा प्रदर्शित गहरी रुचि की सराहना की। इस अवसर पर IGNCA द्वारा डॉ. गरिमा शर्मा और डॉ. पथिक साहू को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।

भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रति विद्यार्थियों की भागीदारी और योगदान को प्रोत्साहित एवं सम्मानित करने की दिशा में CoE–IKS, DYPIU ने 29 सितंबर 2026 को ‘प्रमाण-पत्र वितरण समारोह’ भी आयोजित किया। समारोह में CoE–IKS के निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान और CoE–IKS के सलाहकार सदस्य डॉ. प्रमोद शर्मा उपस्थित रहे, जबकि डॉ. रमेश चंद्र पाठक ने मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. गरिमा शर्मा, समन्वयक, CoE–IKS, ने डॉ. पथिक साहू, गतिविधि समन्वयक, CoE–IKS के सहयोग से किया।
















प्रस्तुति :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात करने वाले डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून 1979) हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक एवं संपादक हैं। वे ‘पूर्वाभास’ और ‘क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म’ के संपादक तथा आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत ‘नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति’ के मास्टर ट्रेनर भी हैं।

सोमवार, 7 सितंबर 2026

जन उत्थान न्यास ने डॉ. प्रियंका चौहान को किया सम्मानित


ग्वालियर, 6 सितंबर। जन उत्थान न्यास द्वारा जीवाजी विश्वविद्यालय के अटल सभागार में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में सांदीपनि शासकीय मॉडल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, डीडी नगर, ग्वालियर की संस्कृत की उच्चतर शिक्षिका डॉ. प्रियंका चौहान को उनके शैक्षणिक योगदान के लिए प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। समारोह में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के शिक्षक-शिक्षिकाओं को भी उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वैष्णवी वाजपेयी एवं वाणी पाठक द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत किया गया और शिक्षक सम्मान समारोह की औपचारिक शुरुआत हुई। समारोह के मुख्य अतिथि जीतू पटवारी ने शिक्षकों की भूमिका पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ संस्कारों और जीवन मूल्यों से जोड़ने का माध्यम भी है। उन्होंने समाज के निर्माण और विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में शिक्षकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम के आयोजक जन उत्थान न्यास के अध्यक्ष एवं विधायक डॉ. सतीश सिकरवार ने कहा कि शिक्षक भावी पीढ़ी को शिक्षित और संस्कारित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। शिक्षकों का सम्मान उनके समर्पण, परिश्रम और समाज के प्रति योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। महापौर डॉ. शोभा सिकरवार और कोटा उत्तर के पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल ने भी शिक्षकों के योगदान की सराहना की।

चर्चित लेखिका एवं उच्चतर माध्यमिक शिक्षिका डॉ. प्रियंका चौहान ने सम्मान प्राप्त करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा की समृद्ध भाषा है। संस्कृत के शिक्षण के माध्यम से विद्यार्थियों को देश की सांस्कृतिक विरासत, जीवन मूल्यों और समृद्ध ज्ञान परंपरा से परिचित कराने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने इस सम्मान को अपने शैक्षणिक दायित्वों के प्रति प्रेरणा देने वाला बताया। डॉ. प्रियंका चौहान को मिले सम्मान पर क्षत्रिय महासभा, मिहोना के अध्यक्ष कुँवर सौरभ सिंह राजावत ने बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान शिक्षा के प्रति उनके दायित्वबोध और समर्पण को रेखांकित करता है। कुँवर गौरव सिंह राजावत ने इसे संस्कृत भाषा के सम्मान से भी जोड़कर देखा।

समारोह में विधायक हेमंत कटारे, विधायक साहब सिंह गुर्जर, विधायक महेश परमार, डॉ. देवेंद्र शर्मा, प्रभुदयाल जौहरे तथा पूर्व विधायक सत्यपाल सिंह सिकरवार ‘नीटू’ सहित अन्य गणमान्यजन मंचासीन रहे। कार्यक्रम का संचालन मेयर-इन-काउंसिल के प्रभारी सदस्य अवधेश कौरव ने किया। सम्मान समारोह के पश्चात अतिथियों, शिक्षक-शिक्षिकाओं और अन्य गणमान्यजनों ने सहभोज में भाग लिया।

प्रस्तुति :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात करने वाले डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून 1979) हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक एवं संपादक हैं। वे ‘पूर्वाभास’ और ‘क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म’ के संपादक तथा आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत ‘नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति’ के मास्टर ट्रेनर भी हैं।


गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

आईजीएनसीए और सीओई–आईकेएस, डीवाईपीआईयू के बीच समझौता ज्ञापन


नई दिल्ली, 2 अप्रैल, 2026: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), संस्कृति मंत्रालय, नई दिल्ली, और डी वाई पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (DYPIU), पुणे के अंतर्गत सेंटर ऑफ एक्सीलेंस – इंडियन नॉलेज सिस्टम (सीओई–आईकेएस) के बीच आज आईजीएनसीए में आयोजित एक औपचारिक समारोह में समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस एमओयू (MoU) पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर डॉ. सच्चिदानंद जोशी, माननीय सदस्य सचिव, आईजीएनसीए, तथा प्रो. मनीष भल्ला, माननीय कुलपति, डीवाईपीआईयू द्वारा किए गए। इस अवसर पर प्रो. रमेश सी. गौड़, डीन, आईजीएनसीए, तथा प्रो. माधवी देशपांडे, डीन, फैकल्टी ऑफ नॉन- इंजीनियरिंग, डीवाईपीआईयू उपस्थित रहीं, जबकि प्रो. अवनीश सिंह चौहान, संस्थापक निदेशक, सीओई–आईकेएस, डीवाईपीआईयू ने समारोह में वर्चुअल माध्यम से भाग लिया।

समारोह में आईजीएनसीए के वरिष्ठ अधिकारी प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहे, जबकि डीवाईपीआईयू के प्रतिनिधि एवं वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें डॉ. बीरन मोइदीन बी. एम., रजिस्ट्रार; श्री विक्रम बरारा, परीक्षा नियंत्रक; तथा डॉ. माणिक राजोपाध्ये शामिल हैं, वर्चुअल माध्यम से कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।

यह एमओयू सहयोगात्मक अनुसंधान, शैक्षणिक आदान-प्रदान, तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखता है। इसके अंतर्गत भारतीय कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्रों में अंतर्विषयक अध्ययन, प्रलेखन और क्षमता निर्माण हेतु संयुक्त पहल की परिकल्पना की गई है।

यह सहयोग भारतीय ज्ञान परंपरा में शैक्षणिक साझेदारी को सुदृढ़ करने तथा अंतर्विषयक सहभागिता को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के संरक्षण एवं प्रसार के प्रति साझा प्रतिबद्धता को और मजबूत करता है।






समाचार प्रस्तुति :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले द्विभाषी साहित्यकार डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून, 1979) आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वे वर्तमान में मास्टर ट्रेनर (नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति), भारतीय ज्ञान परंपरा–विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत हैं। 

अंग्रेजी में पढ़िए : MoU Signed Between IGNCA and CoE-IKS, DYPIU

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

यूजीसी–आईकेएस मास्टर ट्रेनर्स के लिए एक दिवसीय ओरिएंटेशन प्रोग्राम लखनऊ विश्वविद्यालय में आयोजित


लखनऊ, 07 दिसंबर 2025: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) प्रभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यूजीसी–आईकेएस मास्टर ट्रेनर्स के लिए एक दिवसीय ओरिएंटेशन प्रोग्राम, रविवार को उत्तर प्रदेश स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय के मदन मोहन मालवीय शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र (MMTTC) में सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन से हुई। दीप प्रज्ज्वलन करने वालों में माननीय कुलपति एवं मुख्य अतिथि प्रो. मनुका खन्ना, विशिष्ट वक्ता श्री प्रफुल्ल केतकर (संपादक, ऑर्गेनाइज़र साप्ताहिक), विशिष्ट वक्ता डॉ. रुचिका सिंह (कोऑर्डिनेटर, IKS डिविजन, शिक्षा मंत्रालय) तथा प्रो. कमल कुमार, निदेशक - MMTTC एवं कार्यक्रम संयोजक शामिल थे। इसके पश्चात लखनऊ विश्वविद्यालय गीत का सामूहिक गायन किया गया।

अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. मनुका खन्ना ने प्रतिभागियों को शुभकामनाएँ देते हुए भारत की ज्ञान परंपरा की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारत के पास ज्ञान और विवेक की अत्यंत समृद्ध धरोहर है। इसे 21वीं सदी की युवा पीढ़ी तक पहुँचाना हमारा महत्वपूर्ण कर्तव्य है।”

कार्यक्रम संयोजक प्रो. कमल कुमार ने सभी मास्टर ट्रेनर्स का स्वागत करते हुए भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन आत्म-खोज की अनंत यात्रा— “मैं कौन हूँ?” पर आधारित है, जो भारतीय अध्यात्म का मूल है।

विशिष्ट वक्ता श्री प्रफुल्ल केतकर ने अपने विचारोत्तेजक सत्र में “भारत” की अवधारणा को विस्तार से समझाया और मास्टर ट्रेनर्स के लिए ऐतिहासिक दृष्टि की स्पष्टता पर बल दिया। उन्होंने भारत की सभ्यतागत यात्रा का वर्णन करते हुए प्राचीन काल, पारंपरिक गुरुकुल व्यवस्था, विदेशी आक्रमण, ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली, और भारतीय ज्ञान परंपरा की सतत निरंतरता पर चर्चा की।

इसके उपरांत डॉ. रुचिका सिंह ने “आईकेएस के माध्यम से पाठ्यक्रम की पुनर्कल्पना" विषय पर अपना सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने एक प्रायोगिक कार्यशाला भी आयोजित की, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा में प्रभावी रूप से एकीकृत करने की विधियों का व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया। उन्होंने वैश्विक ज्ञान में भारत के योगदान पर भी प्रकाश डाला।

देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग चार दर्जन मास्टर ट्रेनर्स ने पूरे उत्साह के साथ इस कार्यक्रम में भाग लिया। प्रतिभागियों ने यूजीसी अध्यक्ष श्री विनीत जोशी, यूजीसी सचिव डॉ. मनीष जोशी, यूजीसी संयुक्त सचिव डॉ. मंथा श्रीनिवासु, तथा कार्यक्रम संयोजक प्रो. कमल कुमार और उनकी टीम, विशेषकर डॉ अंश शर्मा, डॉ अनिल कुमार एवं संजीव कुमार श्रीवास्तव, को उत्कृष्ट सहयोग और व्यवस्थाओं के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक राष्ट्रगान के साथ हुआ।










डॉ पथिक रॉय तथा डॉ अवनीश सिंह चौहान 


समाचार प्रस्तुति :
डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) वृंदावन के द्विभाषी साहित्यकार और आभासी दुनिया  में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। ‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को जीवन में आत्मसात करने वाले डॉ. चौहान वर्तमान में बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के बीआईयू कालेज ऑफ ह्यूमेनिटीज़ एंड जर्नलिज्म में आचार्य और प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

रविवार, 14 सितंबर 2025

डॉ. एच. के. प्रेमी को भावभीनी श्रद्धांजलि


बरेली : 14 सितम्बर 2025, बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के परीक्षा नियंत्रक एवं रोहिलखंड मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल के पूर्व प्राचार्य, परम श्रद्धेय डॉ. एच. के. प्रेमी जी का आज स्वर्गवास हो गया। वे पंचतत्व में विलीन होकर इस नश्वर संसार को सदा के लिए अलविदा कह गए।

डॉ. प्रेमी जी अपने जीवन में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और विद्वता की जीवंत प्रतिमूर्ति रहे। उन्होंने शिक्षा और चिकित्सा, दोनों क्षेत्रों में अनुकरणीय योगदान दिया तथा संस्थागत विकास को नई दिशा प्रदान की। उनका संपूर्ण जीवन ज्ञान, सेवा और मानवता को समर्पित रहा, जिसे सदैव आदरपूर्वक स्मरण किया जाएगा।

माननीय कुलाधिपति, उपकुलाधिपति, कुलपति, उपकुलपति, कुलसचिव तथा विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों ने कहा कि डॉ. एच. के. प्रेमी का निधन शैक्षिक जगत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है। 

विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों ने गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करते हुए परमात्मा से प्रार्थना की कि दिवंगत आत्मा को शांति प्राप्त हो और शोकाकुल परिवार को धैर्य एवं शक्ति मिले।


अमृत विचार, पृष्ठ 4

समाचार प्रस्तुति :
वंदे ब्रज वसुंधरा' सूक्ति को आत्मसात कर जीवन जीने वाले वृंदावनवासी डॉ अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) का नाम वेब पर हिंदी नवगीत की स्थापना करने वालों में शुमार है। वर्तमान में वे बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के मानविकी एवं पत्रकारिता महाविद्यालय में प्रोफेसर व प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

हिन्दुस्तानी एकेडेमी में कवि-दिवस का आयोजन


प्रयागराज। 3 अगस्त 2025, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की स्मृति में हिन्दुस्तानी एकेडेमी में कवि-दिवस का आयोजन गरिमामय ढंग से किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रकवि के चित्र पर माल्यार्पण से हुई। इसके उपरांत सम्मानित कवियों का स्वागत शॉल, पुष्पगुच्छ एवं प्रतीक-चिह्न प्रदान कर एकेडेमी के सचिव डॉ. अजीत कुमार सिंह और कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने किया।

स्वागत भाषण में डॉ. अजीत कुमार सिंह ने बताया कि 1987 में, राष्ट्रकवि की जन्मशताब्दी वर्ष पर, एकेडेमी ने उनके जन्म दिवस 3 अगस्त को ‘कवि-दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। उसी वर्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने 26 अप्रैल को घोषणा की कि प्रतिवर्ष 3 अगस्त को कवि-दिवस मनाया जाएगा। तभी से यह परंपरा निरंतर जारी है।

कवि सम्मेलन की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि वीरेंद्र आस्तिक (कानपुर) ने की और संचालन डॉ. श्लेष गौतम ने किया। सम्मेलन में डॉ. प्रकाश खेतान, डॉ. विजयानंद, शैलेन्द्र, डॉ. रेखा शेखावत, डॉ. विनम्रसेन सिंह, जितेन्द्र ‘जलज’, शिवम् भगवती और कुमार विकास सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कवियों ने कविता के सभी रसों का संगम प्रस्तुत किया और समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार भी किया। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी विविध रंगों की रचनाओं ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

रचनाकारों की पंक्तियाँ:


हम जमीन पर ही रहते है
अम्बर पास चला आता है 

अपनी बातचीत रामायन
अपने काम-धाम वृन्दावन
दो कौड़ी का लगा सभी कुछ
जब-जब रूठ गया अपनापन

हम तो खाली मंदिर भर है
ईश्वर पास चला आता है

,— वीरेंद्र आस्तिक

ऐ सावन दिन रात तू, बरस चुका है खूब
अब विनती थम जा यहीं, लोग रहे हैं डूब

— डॉ. श्लेष गौतम

पानी के रंग मे घुले, बूंदो के बान चले
धूप कुछ ढीली हुई दिन भी कुछ भीग
लाल तावे सा भा सूरज रंग कुछ पीला हुआ
घिर गये बादल घनरे, खेतों में धान पले

— जितेन्द्र ‘जलज’

प्रेम का अधिकार माँगा,
तुमसे केवल प्यार मांगा,
लुट गए हैं इस जनम में,
इसलिए हर बार मांगा।

— शिवम् भगवती

जिन्दगी के रास्ते पर जब सफर करना जरूरी है,
लोग कहते हैं करो मत पर, अब तो डरना भी जरूरी है।
हैं बहुत नकली यहाँ रिश्ते, इसलिए ये याद रखना तुम,
हो कोई कितना भी नज़दीकी, पर उचित दूरी जरूरी है।

— डॉ. विनम्रसेन सिंह

जिंदगी जैसे कोई थियेटर और अदने से किरदार हम हैं
सारी दुनिया हमें पढ़ रही है, इक अधूरे से अख़बार हम हैं

— कुमार विकास

अपनी अनकही गीतों में गाती, दिनभर की थकान को
चंद लम्हों में भुलाती, घर की चक्की में पिसते-पिसते
खुद में ही रिसते-रिसते, प्रेम की तिलांजलि
साड़ी तक साबन बिताती औरतें

— डॉ. रेखा शेखावत

मकरन्द बना करती कविता, जय हिन्द बना करती निर्भय
वन्देमातरम हुआ करती कविता, भारत माता की जय

— डॉ. विजयानंद

हाँ, मैंने आवाज दी थी
पर रोका नहीं था
तुम मुड़कर देखोगे
पर सोचा न था

— शैलेन्द्र

पड़ गये पांव में छाले पे छाले
भरी दोपहरी में
जमीन, उम्र, दौलत सब गँवा दो
कचहरी में

— डॉ. प्रकाश खेतान

कार्यक्रम के अंत में कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह, संजय पुरुषार्थी, वजीर खान, रघुनाथ द्विवेदी, मनोज गुप्ता, डॉ. संजय कुमार सिंह, डॉ. प्रतिमा सिंह, नज़र इलाहाबादी, एम.एस. खान सहित कई शोधार्थी एवं शहर के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।




समाचार प्रस्तुति :
वंदे ब्रज वसुंधरा' सूक्ति को आत्मसात कर जीवन जीने वाले वृंदावनवासी डॉ अवनीश सिंह चौहान (जन्म 4 जून, 1979) का नाम वेब पर हिंदी नवगीत की स्थापना करने वालों में शुमार है। वर्तमान में वे बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली के मानविकी एवं पत्रकारिता महाविद्यालय में प्रोफेसर व प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

Hindustani Akedemi Mein Kavi-Diwas Ka Ayojan