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बुधवार, 16 मई 2012

उमेश चौहान की चार कविताएं

उमेश चौहान

सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह कहते हैं- "उमेश चौहान की कविताओं को पढ़ते समय आज का संसार आदमियों की जगह कुत्ते, सियारों, बंदरों, सांपों, मुरगों जैसे पशु-पक्षियों से भरे एक जंगल की तरह दिखाई पड़ता है, जिन्हें सिर्फ प्रतीक न समझकर एक नए ‘पंचतंत्र’ की तरह पढ़ें तो एक प्रकार के नए सत्य का साक्षात्कार होगा।" उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान) का जन्म 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में हुआ । शिक्षा- एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)। पिता की प्रेरणा से आपमें बचपन से ही लेखन में रुचि रही। छात्र-जीवन में आप विभिन्न स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे तथा आपने कवि-सम्मेलनों में भी भाग लिया। हिन्दी व मलयालम की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर आपकी कविताएं, कहानियाँ व लेख प्रकाशित। प्रेम-गीतों का संकलन, ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ वर्ष 2001 में प्रकाशित हुआ। कविता-संग्रह ‘दाना चुगते मुरगे’ वर्ष 2004 में छपा। वर्ष 2009 में अगला कविता-संग्रह ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ प्रकाशित हुआ। मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताओं के हिन्दी-अनुवाद का एक संकलन भी वर्ष 2009 में ही भारतीय ज्ञानपीठ से छपा। अगला कविता-संग्रह ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ शीघ्र ही भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित होने वाला है। मलयालम के अन्य प्रमुख कवि- जी. शंकर कुरुप्प, वैलोपिल्ली श्रीधर मेनन, चेन्गम्पुड़ा, ओ. एन. वी. कुरुप्प, सुगता कुमारी, राधाकृष्णन तड़करा आदि की कविताओं का भी हिन्दी-अनुवाद किया है। वर्ष 2009 में भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ तथा 2011 में इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ प्रदान किया गया। केरल व भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए यू. एस. ए., यू. के., जापान, जर्मनी, स्विटजरलैन्ड, ग्रीस, यू. ए. ई., सिंगापुर, श्रीलंका, मालदीव्स, दक्षिण अफ्रीका, इथियोपिआ, नामीबिया, केन्या आदि देशों की आपने साहित्यिक यात्राएं की। वर्तमान में आप नई दिल्ली में केरल सरकार के रेजिडेन्ट कमिश्नर के रूप में तैनात हैं। सम्पर्क: डी-I/ 90, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली- 110021 (मो. नं.+91-8826262223), ई-मेल: umeshkschauhan@gmail.com। आपकी चार कविताएं यहाँ प्रस्तुत हैं-

गूगल सर्च इंजन से साभार 
1. युद्ध और बच्चे 

एक माँ बुरका ओढ़े
अपने दुधमुँहे बच्चे को छाती से चिपकाए
बसरा से बाहर चली जा रही है
अनजान डगर पर
किसी इनसानी बस्ती की तलाश में
अपने अधटूटे घर को पलट-पलटकर निहारती
अपने बचपन व जवानी से बावस्ता गलियों को
आँसुओं से भिगोकर तर-बतर करती।

बच्चा गोद से टुकुर-टुकुर आसमान की ओर ताकता है
जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो
ऊपर उड़ते बमवर्षक विमानों की गड़गड़ाहट
चारों तरफ फटती मिजाइलों के धमाकों-
फौजियों की बंदूकों की तड़तड़ाहट-
इन सबसे उसका क्या रिश्ता है
वह नहीं जानता कि उसका बाप
‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगाता कहाँ गुम हो गया है।

बच्चा नहीं जानता कि क्यों जल रहे हैं-
चारों तरफ कीमती तेल के कुएँ
और लोग क्यों बेहाल हैं भूखे-प्यासे
बच्चा अपनी माँ की बदहवासी जरूर पहचानता है
और जानता है कि
उससे बिछुड़कर जी नहीं सकता वह
धूल और धुएँ के गुबार में कहीं भी।

उधर कश्मीर में मार दिए गए पंडितों के परिवार का
जीवित बच गया छोटा बच्चा भी
नहीं जानता कि ‘हे राम’ कहकर कराहते
गोलियों से छलनी उसके माँ-बाप कहाँ चले गए हैं
वह नहीं जानता कि उस दिन गाँव में आए
बंदूकधारियों के चेहरों पर
क्यों फैली थी वहशियत
और क्या हासिल करना चाहते थे
वे तड़ातड़ गोलियाँ बरसाकर ?

वहाँ फ्लोरिडा में माँ की गोद में दुबककर बैठा
मासूम बच्चा
अपने फौजी बाप को एयरबेस पर
अलविदा कहकर लौटा है
वह भी नहीं जानता कि क्यों और कहाँ
लड़ने जा रहा है उसका बाप
और क्यों दिखते हैं टेलीविजन पर
बख्तरबंद टैकों में बैठे अमेरिकी जवान
रेतीले रास्तों में भटकते
‘इन द नेम ऑफ गॉड’
आग का दरिया बहाते
नखलिस्तानों पर निशाना साधते।

दुनिया का कोई भी बच्चा
नहीं जानता कि लोग क्यों करते हैं युद्ध ?
जबकि इस दुनिया में
कल बड़ों को नहीं, इन्हीं बच्चों को जीना है।

युद्ध होता है तो
बच्चे ही अनाथ होते हैं
और आणविक युद्ध का प्रभाव तो
गर्भस्थ बच्चे तक झेलते हैं।

बच्चे यह नहीं जानते कि
क्यों शामिल किया जाता है उन्हें युद्ध में
किंतु वे ही असली भागीदार बनते हैं
युद्ध के परिणामों के।

काश ! दुनिया की हर कौम
युद्धों को इन तमाम बच्चों के हवाले कर देती
और चारों ओर फैले रिश्तों के
बारुदी कसैलेपन को
मुसकराहटों की बेशुमार खुशियों में
हमेशा-हमेशा के लिए भुला देती।

(ईराक-युद्ध के समय लिखी गई एक कविता)

2. कूड़ेदान

शहर के मोहल्लों में
जगह-जगह रखे कूड़ेदान
सुबह-सुबह ही बयां कर देते हैं
इन मोहल्लों के घरों का
सारा घटित-अघटित,
गंधैले कूड़ेदानों से अच्छा
कोई आइना नहीं होता
लोगों की जिन्दगी की
असली सूरत देखने का।

मसलन,
कूड़ेदान बता देते हैं
आज कितने घरों में
उतारे गए हैं
ताजा सब्जियों के छिलके
कितने घरों में निचोड़ा गया है
ताजा फलों का रस
कितने घरों ने पैक्ड फूड के ही सहारे
बिताया है अपना दिन और
कितने घरों में खोले गए हैं
रेडीमेड कपड़ों के डिब्बे।

झोपड़पट्टी के कूड़ेदानों से ही
हो जाता है अहसास
वहाँ कितने घरों में दिन भर
कुछ भी काटा या खोला नहीं गया
यह अलग बात है कि
झोपड़पट्टियाँ तो
स्वयं में प्रतिबिंबित करती हैं
शहर के सारे कूड़ेदानों को
क्योंकि इन्हीं घरों में ही तो सिमट आता है
शहर के सारे कूड़ेदानों का
पुनः इस्तेमाल किए जाने योग्य समूचा कूड़ा।

कूड़ेदान ही बताते हैं
मोहल्ले वालों ने कैसे बिताई हैं अपनी रातें
खोली हैं कितनी विदेशी शराब,
कितनी देशी दारू की बोतलें,
किन सरकारी अफसरों के मोहल्लों में
पी जाती है स्काच और इम्पोर्टेड वाइन,
किस मोहल्ले में कितनी मात्रा में
इस्तेमाल होते हैं कंडोम,
कभी-कभी किसी मोहल्ले के कूड़ेदान से
निकल आती हैं
ए के 47 की गोलियाँ और बम भी,
कभी-कभी किस्मत का मारा
माँ की गोद से तिरस्कृत
कोई बिलखता हुआ नवजात शिशु भी।

अर्थशास्त्रियो!
तुम्हें किसी शहर के लोगों के
जीवन-स्तर के आँकड़े जुटाने के लिये
घर-घर टीमें भेजने की कोई जरूरत नहीं
बस शहर के कूड़ेदानों के सर्वे से ही
चल जाएगा तुम्हारा काम
क्योंकि कूड़ेदानों से हमेशा ही झाँकता रहता है
किसी भी शहर का असली जीवन-स्तर।

3. बिटिया बड़ी हो रही है


बिटिया बड़ी हो रही है
माँ को दिन-रात यही चिन्ता खाए जा रही है कि
बिटिया शादी के लिए हाँ क्यों नहीं करती
और कितना पढ़ेगी अब
ज्यादा पढ़ लिख कर करेगी भी क्या
कमासुत पति मिलेगा तो
ज़िन्दगी भर सुखी रहेगी
इतनी उमर में तो इसको जनम भी दे दिया था मैंने
माँ की खीझ का शिकार नित्य ही होती है बिटिया।

बिटिया जैसे-जैसे बड़ी हो रही है
दिन-रात आशंकाओं में जीती है माँ
जाने कब, कहाँ, कुछ ऊँच-नीच हो जाय
सड़कों पर आए दिन
लड़कियों को सरेआम उठा लिए जाने की घटनाओं से
बेहद चिन्तित होती है माँ
स्वार्थी युवकों के प्रेम-जाल में फँस कर
घर से बेघर हुई तमाम लड़कियों के हाल सुन-सुन
नित्य बेहाल होती है माँ।

माँ चौबीसों घंटे नज़र रखती है बिटिया पर
उसका पहनावा,
साज-श्रंगार,
मोबाइल पर बतियाना,
बाथरूम में गुनगुनाना,
सब पर निरन्तर टिका रहता है माँ का ध्यान
जैसे बगुला ताकता रहता है निर्निमेष मछली की चाल,
माँ जैसे झपट कर निगल जाना चाहती है
बिटिया की हर एक आपदा।

बिटिया बचना चाहती है
माँ की आँखों के स्कैनर से
वह चहचहाना चाहती है
बाहर आम के पेड़ पर बैठी चिड़िया की तरह
वह आसमान में उड़ कर छू लेना चाहती है
अपनी कल्पनाओं के क्षितिज को
इसीलिए शायद बिटिया नहीं करना चाहती
शादी के लिए हाँ
पर उसकी समझ में नहीं आता कि
चारों तरफ पसरी अनिश्चितताओं के बीच
वह कैसे निश्चिन्त करे अपनी माँ को
और आश्वस्त करे उसे अपने भविष्य के प्रति।

4. नारियल की देह

सुघड़ चिकने पय भरे फल,
वक्ष पर ताने खड़ा,
नवयौवना सा,
झूमता है नारियल तरु,

मेघ से रिमझिम बरसते,
नीर का संगीत सुनता,
गुनगुनाता साथ में कुछ,
थरथराते पात भीगे,
शीश पर लटके लटों से,
भर रही आवेश उनमें,
छुवन बूंदों की निरन्तर,

पवन का झोंका अचानक,
खींच लाया उसे मुझ तक,
खुली खिड़की की डगर,
भींच कर के स्निग्धता उसकी समूची,
बाहुओं के पाश में निज,
मैं चरम पर हूँ,
परम उत्तेजना के,

निरत इस आनन्द में ही,
उड़ गया कब संग पवन के,
यह नहीं मालूम मुझको,
झूमता अब मैं वहां,
उस तरु-शिखर पर,
भीगता लिपटा हुआ,
उस नारियल की देह से।

Four Hindi Poems of Umesh Chauhan

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा अनुठा ,.सभी अच्छी लगी पर बिटियाँ बडी हो रही है सचमुच बहुत अच्छी लगी जो यथार्थ से झकझोरती है आभार आपका ,....।

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  2. उमेश जी की कविताएँ जीवन के उन अनुभवों को साहित्य के परिक्षेत्र में लाकर खड़ा करती हैं, जिन्हें अक्सर मुख्य धारा के विमर्श से बहिष्कृत कर दिया जाता है. उन्हें बधाई और आपका आभार

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  3. सभी कवितायें सच्चाई से जीवन का आइना दिखाती हुई बहुत अच्छी लगी umesh kumar chauhaan ji se parichay bahut achha laga ...aabhar

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  4. आपकी पोस्ट 17/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 882:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  5. उमेश चौहान की कविताएँ जीवन के बहुत निकट की कविताएँ हैं, उनकी कविताओं में लोक जीवन के दर्शन होते हैं

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