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रविवार, 17 मार्च 2013

डॉ. दिनेश पालीवाल की दो व्यंग्य रचनाएँ

डॉ. दिनेश पालीवाल

३१ जनवरी १९४५ को जनपद इटावा (उ.प्र.) के ग्राम सरसई नावर में जन्मे डॉ दिनेश पालीवाल जी सेवानिवृत्ति के बाद इटावा में रहकर स्वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं। आप गहन मानवीय संवेदना के सुप्रिसिद्ध कथाकार हैं । आपकी ५०० से अधिक कहानियां, १५० से अधिक बालकथाएं, उपन्यास, सामाजिक व्यंग, आलेख आदि प्रितिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। दुश्मन, दूसरा आदमी , पराए शहर में, भीतर का सच, ढलते सूरज का अँधेरा , अखंडित इन्द्रधनुष, गूंगे हाशिए, तोताचश्म, बिजूखा, कुछ बेमतलब लोग, बूढ़े वृक्ष का दर्द, यह भी सच है, दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की, रुका हुआ फैसला, एक अच्छी सी लड़की(सभी कहानी संग्रह) और जो हो रहा है, पत्थर प्रश्नों के बीच, सबसे खतरनाक आदमी, वे हम और वह, कमीना, हीरोइन की खोज, उसके साथ सफ़र, एक ख़त एक कहानी, बिखरा हुआ घोंसला (सभी उपन्यास) अभी तक आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। आपको कई सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। संपर्क: राधाकृष्ण भवन, चौगुर्जी, इटावा (उ.प्र.)। संपर्कभाष: ०९४११२३८५५५। ई-मेल: paliwaldc@gmail.com।

1. व्यंग्य: रंदाः सलमान रुश्दी, कमल हासन और हुसैन आदि
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

मता बनर्जी ने सलमान रुश्दी को कलकत्ता आने से रोक दिया। वे आधी रात की संताने नामक अपने उपन्यास पर बनी फिल्म के प्रमोशन के लिए आ रहे थे, साथ ही कलकत्ता में विश्व पुस्तक मेला लगा हुआ है। मेला में रुश्दी की किताबें सबसे ज्यादा बिकती हैं, उनके प्रचार-प्रसार के लिए और पुस्तक मेले में होने वाली लेखकों की गोष्ठी में हिस्सा लेने आ रहे थे। लेकिन जैसा कि रुश्दी के साथ अक्सर हमारे देश में हो रहा है, वही फिर हुआ। पहले भी उन्हें जयपुर लेखक सम्मेलन में भाग लेने के लिए नहीं आने दिया गया। विरोध प्रदर्शनों के चलते और कानून-व्यवस्था के सवालों के कारण उन्हें हमारे देश में अक्सर आने से रोक दिया जाता है। वोट बैंक का सवाल है और जन-नाराजी का भी। एक किताब को छोड़ कर रुश्दी ने कोई किताब ऐसी नहीं लिखी जिस पर बहुत विवाद हुआ हो। वैसे विवाद हर सही और समझदार लेखक की किताब पर, कहानी-उपन्यास-कविता पर होता रहता है। कोई नई बात नहीं है। मंटो हों या प्रेमचंद, स्मत चुगताई रही हों प्रेमचंद, कृशन चंदर रहे हों या किशन सिंह बेदी, पाकिस्तानी शाइर रहे हों या दुनिया की अन्य भाषाओं और देशों के रचनाकार, प्रतिबंध, मुकदमा, बंदिश, विरोध प्रदर्शन आदि अक्सर झेलते रहे हैं। 

फिल्में तो अक्सर इन हादसों की शिकार होती रहती हैं। कभी इन फिल्मों के कारण इस्लाम खतरे में आ जाता है तो कभी हिन्दुत्व! मजहबी और धार्मिक लोगों की भावनाएं इतनी नाजुक होती हैं कि वे किसी भी बात पर भड़क जाती हैं। धर्म और मजहब एकदम खतरे में पड़ जाता है। टीवी-अखबारों में हो-हल्ला मच जाता है। हालांकि हल्ला मचाने वालों ने अक्सर उस फिल्म को न देखा होता है, न उसकी कथा पढ़ी होती है फिर भी ऐसा नहीं है कि समझदार लोग यह राजनीतिक खेल समझते नहीं हैं। इसके पीछे की वोट पालिटिक्स से देश की जनता अच्छी तरह वाकिफ है और मजा यह कि फिर कौआ कान ले जाता है और सबके सब लठ्ठ ले कर कौए के पीछे दौड़ने लगते हैं।

कौआ तो हाथ आता नहीं, न कान अपनी कनपटी पर हम देखने की कोशिश करते हैं, बस हाय-हाय करने लगते हैं कि कौआ कान ले गया! अब हम क्या करें! बिना कान के हमारा काम कैसे चलेगा? 

कमल हासन की ताजा फिल्म विश्वरूपम को ले कर इन दिनों जम कर हो-हल्ला मचा। फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कोर्ट के आदेश के बावजूद कमल हासन को मजहबी लोगों को फिल्म दिखानी पड़ी और उनसे हरी झंडी लेने के बाद ही वह फिल्म सिनेमाघरों में जा पाई। हम जरा-जरा बातों पर आहत हो जाते हैं। जरा-जरा बातों पर हमें अपना मजहब-धर्म खतरे में पड़ता दिखाई देने लगता है। कैसा नाजुक है हमारा मजहब, धर्म, संप्रदाय, जाति-बिरादरी कि जरा-जरा बातों पर मिट्टी के खिलौने की तरह टूटने लगती है! टसल मामला वोट पालिटिक्स का है। गोलबंदी का है। अपने वोट खिसकने न देने की चालें हैं। जनता को, आम दर्शकों को , पाठक को इन सब बातों से कुछ लेना-देना नहीं है। पर हमें राजनीतिक फिरकापरस्त यह समझाने लगते हैं कि हमें इन्हीं बातों से मतलब होना चाहिए। न बढ़ते प्याज के दामों से कोई मतलब होना चाहिए, न बढ़ते अपराधों से। न घटती आमदनी और कम होती जीवन की सुविधाओं से कुछ लेना-देना होना चाहिए, न अपने दुख-दर्दों से। हमें तो सिर्फ और सिर्फ मजहब से, संप्रदाय से, धर्म से, जाति से, खाप से ही मतलब होना चाहिए! उन्ही पर जान देनी और लेनी चाहिए! 

हुसैन साहब ने कुछ चित्र बनाए तो हमने उनके सैकड़ों-हजारों चित्रों की परवाह नहीं की, न उनकी विश्व-ख्याति की चिंता की। उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया और वे बहादुर शाह जफर की तरह अफसोस करते हुए दुनिया से कूच कर गए कि अपने बतन में दो गज जमीन नहीं पा सके ! कमल हासन भी इसी तरह व्यथित हुए और कहने को विवश हुए कि वे इस देश को छोड़ देंगे, जहां विचारों की अभिव्यक्ति पर इतनी पावंदियां हैं ।

2 . व्यंग्य: रंदा: जिंदगी उलझी हुई पहेली है 

र आदमी के लिए इस जिंदगी के मायने अलग-अलग हो सकते हैं। हर आदमी जिंदगी जीता भी अलग-अलग तरह है। हर आदमी जीना भी अलग तरह चाहता है। यह दूसरी बात है कि वह अलग तरह जी हुई जिंदगी अक्सर दूसरों जैसी ही होती है। जिंदगी के फलसफे पर दुनिया के तमाम दार्शनिकों, विचारकों, चिंतकों, विव्दानों, लेखकों-कवियों का सोच अलग-अलग हो सकता है।

फिराक गोरखपुरी कहते हैं--जो उलझी थी कभी आदम के हाथों, गुत्थी वो अब तक सुलझा रहे हैं। यानी जिंदगी की पहेली तो आदम-हव्वा के जमाने से ही उलझ गई थी। वह उलझी हुई गुत्थी वे अब तक सुलझा रहे हैं और वह सुलझ नहीं रही है। तब से अब तक लाखों कवि-शायर, लेखक-दार्शनिक, चिंतक हो गए , इस गुत्थी नुमा पहेली को बूझते-सुलझाते पर यह कंबख्त अभी तक वैसी की वैसी ही उलझी हुई है। इसे न कोई अब तक समझा है, न आगे समझ सकेगा। इसीलिए कबीर इसे जतन से ओढ़ने के पक्षधर रहे और जब इस दुनिया से जाने लगे तो इसे ज्यों की त्यों बेदाग रख कर चल दिए! सवाल हम आम आदमियों का है जो इसे जतन से नहीं ओढ़ पाए और इसे दाग-दाग कर लिया है।

बहुतों के लिए जिंदगी एक सुहाना सपना हो सकती है। सुहाना सफर हो सकती है। बहुतों के लिए यह दुःस्वप्न हो सकती है। बहुतों के लिए जीवन कांटों भरा, ऊबड़-खाबड़, ऊंचा-नीचा, अंतहीन दुखों भरा, पथरीला, फिसलन भरा, रपटीला या गरम रेतीला रास्ता हो सकता है, जिसे वह जैसे-तैसे संभल-संभल कर चलने के बावजूद गिरता-पड़ता किसी तरह तय करता है। सजाएं भुगतता है। अनकिए अपराधों के दंड भुगतता है। यातनाएं-यंत्रणाएं भोगता है। अपने अगले-पिछले जन्मों के पाप या दुर्भाग्य समझ कर रोता-झींकता किसी तरह जीता है और जीते-जी मरता रहता है। 

जिंदगी किसी के लिए अर्थवान है तो किसी के लिए निरर्थक, बेतुकी, बेहूदा, बेवफा और न जीने काबिल! किसी के लिए यह विचारपूर्ण यात्रा है, तो किसी के लिए विचारशून्य, व्यर्थ, निरर्थक। वास्तव में जिंदगी किसी रहस्य-रोमांच से भरी एक थ्रिलर टायप उपन्यास की पुस्तक है। जितने लोगों से आप जिंदगी में मिलते हैं, दोस्ती-दुश्मनी करते हैं, प्रेम-नफरत करते है, उन सबके साथ आपके अलग तरह के अनुभव होते हैं, जो एकदम अनजाने, अद्भुत, अचरजपूर्ण और रहस्यमय होते हैं। पृष्ठ दर पृष्ठ लोगों के साथ आपका और आपके साथ लोगों का अजब-गजब व्यवहार होता चलता है और आप चकित होते हुए इसे पढ़ते रहते हैं कि इसके बारे में ऐसा तो आपने कभी सोचा नहीं था, यह सोचते रहते हैं! अमुक आदमी ऐसा निकलेगा, आपके साथ ऐसा करेगा! आप चकित रहते हैं। 

जिंदगी अक्सर कटु-कठोर सच्चाई होती है। इसे आप कुछ बनाना चाहते हैं पर यह योजना के अनुसार नहीं ढलती। अलग तरह की बन जाती है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें जोखिमें बहुत हैं, दुर्घटनाएं ज्यादा घटती हैं और खुश होने के अवसर बहुत कम मिलते हैं। इसीलिए कुछ लोग इसके उलझे पचड़े में नहीं पड़ते। कहते हैं, जैसी है, वैसी जी लो यार! इसमें अर्थवत्ता मत ढूंढो। निरर्थक है सब कुछ। घटने दो जैसा घट रहा है। बीतने दो, जैसी बीत रही है। तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं है। दरअसल जीवन ऐसी चीज ही नहीं है जिसके बारे में कुछ गंभीरता से सोचा जाए। गंभीरता से सोचोगे तो जी नहीं पाओगे! हंसो-हंसाओ और चिंता-फिक्र धुएं में उड़ाते चलो। प्लेटो कहते हैं कि जिंदगी का मकसद उसे उच्चतम मूल्यों की तरफ ढकेलना है। अरस्तू कहते हैं कि जीवन का उद्देश्य अच्छाइयों की ऊंचाइयों पर पहुंचना होना चाहिए। फ्राइड कहते हैं कि जिंदगी सुख, सेक्स और भय-भूख के वशीभूत हो जीनी पड़ती है। यह न वरदान है, न अभिशाप। जैसी है, वैसी है। वैसी ही जीनी पड़ेगी। इसका न कोई उद्देश्य है, न लक्ष्य।

Two Vyangya of Dr. Dinesh Paliwal

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