पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

अम्बरीश कुमार गर्ग के तीन नवगीत

अम्बरीश कुमार गर्ग

मुरादाबाद में जब कभी संस्कारवान साहित्यकारों एवं कुशल मंच संचालकों का जिक्र होता है, डॉ अम्बरीश कुमार गर्ग का नाम सुधीजनों के जेहन में ससम्मान आ जाता हैं। आपका जन्म 18 दिसम्बर, 1953 को गाँव खामपुर, मेरठ (उ.प्र.) में हुआ। शिक्षा : एम.ए., एम.एड.। प्रकाशित कृति : आदमी का सच (काव्य संग्रह)। आप कविता, मुक्तक, व्यंग्य, समीक्षा, दोहे, पत्र-लेखन, डायरी, लघु कथा आदि विधाओं में रचनाकर्म करते रहे हैं। आपने आकार पत्रिका (अनियतकालीन) का बखूबी सम्पादन किया। अ.भा. साहित्य कला मंच द्वारा 'साहित्य श्री' सम्मान समेत दर्जनों संस्थाओं द्वारा सम्मानित डॉ गर्ग गोकुलदास हिन्दू गर्ल्स कालेज, मुरादाबाद के बी.एड. विभाग में समन्वयक के पद पर कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में स्वाध्याय एवं समाज सेवा से जुड़े हैं। संपर्क : आर्यावर्त, मिलन विहार, लाइनपार, मुरादाबाद (उ.प्र.), मोब : 09897038128

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 
1. लुटने को मजबूर

बीच शहर में, 
बीच बजरिया
भर पसरट्टे में
कुण्डल छीने, चैन लूट ली
एक झपट्टे में

कौन सिपाही, 
कौन लुटेरे
समझ न कुछ पाती
डर के मारे अब ननकी
बाजार नहीं जाती

पर्स छोड़कर, पैसा रखती
बाँध दुपट्टे में

चौकी, थाने, 
कुतवाली की 
इज्जत चकनाचूर
हर पल, 
यहाँ-वहाँ है जनता 
लुटने को मजबूर

या तो अब सिर पड़ा ओखली
या सिलबट्टे में।

2. ईर्ष्या 

राजा की ईर्ष्या का कारण
तो चपरासी है

राजा से पहले नौकर को
करते सभी सलाम
नौकर के ही कहने से
हो जाते सबके काम

कितना दुख पहुँचाती,
ये जो बात जरा-सी है

सभासदों की समझ बड़ी है
दृष्टि बड़ी है पैनी
मंत्री सारे समझ रहे हैं
राजा की बेचैनी

दरबार समूचा कानाफूसी,
का अभ्यासी है

फटी पैण्ट में भी हँसता है
होकर वह निर्द्वन्द
जटिल तनावों में कैदी सा
बैठा राजा बन्द

मुकुट बँधा मस्तक पर,
भीतर भरी उदासी है

3. नगर वधू

नगर वधू दिखती है
सबसे ज्यादा इज्जतदार

जो भी आए परदेसी
सब गए उसी के पास
हमको अपने होने का भी
नहीं रहा अहसास

अपने घर में नही खटोला, 
उसके बन्दनवार

चिट्ठी या सन्देश किसी का
हमें नहीं मिल पाया
राजाओं ने, युवराजों ने
उसको ही बुलवाया

नतमस्तक हैं उसके आगे, 
मंत्री, थानेदार

कालिख में भी उजली-उजली
है उसकी तस्वीर
उसकी बात आज भी जैसे
पाहन खिंची लकीर

उसकी खातिर खुले हुए है, 
बडे़-बड़ों के द्वार।

Ambrish Kumar Garg: Three Hindi Poems- Navgeet

1 टिप्पणी:

  1. कविताएँ बहुत अच्छी हैं।सामाजिक जीवन की समस्याओं को छूती हैं।

    आशा सहाय

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