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रविवार, 5 मार्च 2017

कुण्डलिया छन्द के नये शिखर - इन्द्रेश भदौरिया

इन्द्रेश भदौरिया

जन सामान्य में प्रचलित शब्दों को सुन्दर काव्य में ढालने की कला में पारंगत कवि श्रेष्ठ इन्द्र बहादुर सिंह भदौरिया जी (उपनाम- इन्द्रेश भदौरिया) ने न केवल अवधी में जनोपयोगी एवं सार्थक साहित्य सृजन किया है, बल्कि हिन्दी खड़ी बोली में भी काफी कुछ लिखा है। परन्तु, दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश के गांव-जंवार में रहने वाले तमाम अच्छे साहित्यकारों के रचनाकर्म से साहित्य समाज उस प्रकार से परिचित नहीं हो पाता, जिस प्रकार से होना चाहिए। इसीलिये ऐसे तमाम साहित्यकारों की सर्जना न तो साहित्य की मुख्य धारा में आ पाती है और न ही उन पर चर्चा-परिचर्चा, शोध आदि ही हो पाते हैं। कई बार तो अच्छी पत्रिकाएं भी उन्हें स्पेस नहीं दे पातीं। इसके पीछे कारण कई हो सकते हैं, होने भी चाहिए। परन्तु, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक इन समस्याओं का निराकरण नहीं होता और अच्छे रचनाकारों को जानने-समझने का माहौल नहीं बनता। 24 दिसंबर 1954 ई. को ग्राम- मोहम्मद मऊ, पोस्ट- कठवार, जिला- रायबरेली, उ.प्र. में जन्मे सहज, सौम्य एवं मिलनसार रचनाकार आदरणीय इन्द्रेश भदौरिया जी के पिताश्री शीतला बख्श सिंह भदौरिया साधारण किसान एवं माताश्री स्व श्रीमती ईश्वरी देवी सहज गृहणी थीं; जबकि आपकी सहधर्मिणी स्व. श्रीमती सरला देवी जी का भी कुछ वर्ष पहले निधन हो गया था। शिक्षा: कला स्नातक एवं आयुर्वेद रत्न। प्रकाशित कृतियाँ: चार काव्य संग्रह, यथा- बसि यहै मड़इया है हमारि, पीड़ित मन मधुगान गा रहा, गजब कै अँधेरिया है, कुलटा चरित हास्य भण्डारा। चार काव्य संकलनों, यथा- 'घटाओं के रंग', 'नखत-3', 'वीसवीं सदी के साहित्यकार' एवं 'कुण्डलिया छन्द के नये शिखर' में आपकी रचनाएँ संकलित हो चुकी हैं। सम्मान: कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा लगभग दो दर्जन पुरस्कार, सम्मान, अभिनन्दन एवं प्रशस्ति पत्र। सम्पर्क: ग्राम: मोहम्मद मऊ, पोस्ट- कठवार, जिला- रायबरेली (उत्तर प्रदेश)- 229303, मोब: 9455850858, 9695910632।

गूगल सर्च इंजन से साभार
वन्दन करता शारदे, कर मो पर उपकार।
मन में नित नूतन बसें, सुचि सुन्दर सुविचार।
सुचि सुन्दर सुविचार, कल्पना में नित आओ।
लिखूँ मनोहर काव्य, सुधा रस माँ बरसाओ।
कह कविवर इन्द्रेश, शब्द बन रोली-चन्दन।
करें सुशोभित भाल, आपको शत-शत वन्दन।


जन गण मन रक्षा करो, सबके हरहुँ क्लेश।
विनवत हूँ मैं आपको, शंकर सुवन गणेश।
शंकर सुवन गणेश, मातु गौरी के प्यारे।
सकल मनोरथ पूर्ण, करो हे तात हमारे।
कह कविवर इन्द्रेश, आपको सबकुछ अर्पण।
दीजै बुद्धि विवेक, खुशी हों सारे जन गण।


अवढर दानी जानकर, विनय करौं कर जोरि।
पार्वती गणपति सहित, अब सुधि लीजो मोरि।
अब सुधि लीजो मोरि, दुखों से मोहि उबारो।
विनवत बारम्बार, दया करि मोहि निहारो।
कह कविवर इन्द्रेश, सुनो प्रभुवर मम बानी।
मो पर होउ सहाय, आप हो अवढर दानी।


विनय हमारी आपसे, पवनपुत्र बलधाम।
जिनके हृदय में बसत, निशदिन सीताराम।
निशदिन सीताराम, भक्त वत्सल हितकारी।
मिला राम को नहीं, आप-सा आज्ञाकारी।
कह कविवर इन्द्रेश, आप हैं पर उपकारी।
करो सकल उपकार, यही है विनय हमारी।


नहीं पढ़ा पिंगल कभी, नहिं कवित्व का ज्ञान।
फिर भी मन माने नहीं, लिखता हूँ श्रीमान।
लिखता हूँ श्रीमान, भाव मम उर के सारे।
यही कामना हृदय, लगें सबको अति प्यारे।
कह कविवर इन्द्रेश, सभी निज बुद्धिन गढ़ा।
लेकिन कहता सत्य, कि पिंगल नहीं पढ़ा।


धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, मान और सम्मान।
असहज ही ये ना मिलें, जानै सकल जहान।
जानै सकल जहान, बहुत पापड़ हैं ब्यालत।
करते काम सटीक, बड़े सुख दुःख हैं झ्यालत।
कह कविवर इन्द्रेश, मान है कर्म बदौलत।
अगर मान है नहीं, व्यर्थ सारी धन -दौलत।

जिन्दा में सुख न मिला, आगे जाने राम।
किन्तु कमायें सुयश को, करके सुन्दर काम।
करके सुन्दर काम, नाम रोशन कर जायें।
याद करें सब लोग, युगों तक जाने जायें।
कह कविवर इन्द्रेश, कभी नहिं हों शर्मिन्दा।
मर कर होता नाम, सदा हम रहते जिन्दा।

विष ही विष को काटता, काया होत निरोग।
मैल-मैल मिल गन्दगी, बढ़ती कहते लोग।
बढ़ती कहते लोग, हैं गंगा-यमुना मैली।
मिली परस्पर एक, हो गयी और कुचैली।
कह कविवर इन्द्रेश, बतायें किसको किसको।
मैल मैल अति मैल, काटता विष ही विष को।


राजनीति वैश्या हुई, रही नयन मटकाय।
जानें कैसे कौन सा, फन्दे में आ जाय।
फन्दे में आ जाय, खेल सारे दिखलाते।
वादे करें हजार, निभा पर एक न पाते।
कह कविवर इन्द्रेश,कहत हैं सबसे जुमई।
केवल कुर्सी काज, राजनीति वैश्या हुई।

सबसे भला है आइना, जो कुछ उसे लखात।
बिना भ्रम कहि देत है, साँची मन की बात।
साँची मन की बात, देर नहिं तनिक लगाता।
बुरा लगे या भला, नहीं मन में सकुचाता।
कह कविवर इन्द्रेश, किन्तु ये नेता कबसे।
लाज-शर्म को त्याग, झूँठ बोलत हैं सबसे।

भाई यहि संसार मा, बिना दोष न कोय।
पर दूजे में ढूंढ़ता, आपन लखै न कोय।
आपन लखै न कोय, बल्कि है उन्हें छिपाता।
बिना दोष के दोष, लगाते नहिं सकुचाता।
कह कविवर इन्द्रेश, लोक लीला बतलाई।
आपन ढ्याँढ़र देखि, कहो नहिं काना भाई।

मतदाता अब क्या करे, खुद में है हैरान।
मतलब की सब पार्टी, किसको दे मतदान।
किसको दे मतदान, भरी दुबिधा मन भारी।
सब में दिखती खोंट, सभी में है मक्कारी।
कह कविवर इन्द्रेश, स्वार्थ से सबका नाता।
दो पाटों के बीच, फँसा अब तो मतदाता।

समझौता कर लीजिए, बने नहीं यदि काम।
नहीं तो मित्थक भ्रम में, होती नींद हराम।
होती नींद हराम, हृदय में चैन न आवै।
झुकता बृक्ष फलदार, नीति भी यही बतावै।
कह कविवर इन्द्रेश, स्वर्ण से भरा कठौता।
पूरा यदि नहिं मिले, आध पर कर समझौता।

चाय-पकौड़ी संग पियो, सोचि दिनों का फेर।
जब अच्छे दिन आंयगे, लागी बनत न देर।
लागी बनत न देर, खुशी मन जीवन काटो।
रहौ हमेशा खुशी, खुशी दुसरे़व मा बाँटौ।
कह कविवर इन्द्रेश, जोरिके कौड़ी-कौड़ी।
है रूपिया बनि जात,खाव नित चाय-पकौड़ी।

राजनीति की भंग पी, मन में लेकर खोट।
गंगा - यमुना हैं बने, नेता मांगें वोट।
नेता माँगें वोट, मिले संगम में पानी।
और भी गन्दा होय, सुनो हे औढर दानी।
कह कविवर इन्द्रेश, गन्दगी है अनीति की।
खेल रहे हैं खेल, धरा है राजनीति की।

काम बोलता मित्रवर, ये है सच्ची बात।
किन्तु काम करता नहीं, कहीं भीतराघात।
कहीं भीतराघात, देखकर अजब तमाशा।
खत्म हुआ विश्वास, सभी की टूटी आशा।
कह कविवर इन्द्रेश, सभी को देश तोलता।
देखा चित्र विचित्र, कह रहे काम बोलता।


बहुत घुटाले हो गये, इस पर लगे लगाम।
उसको देंगे वोट हम, करे जो अच्छा काम।
करे जो अच्छा काम, और सेवा सबजन की।
देश बढ़े अविराम, भावना समझे मन की।
कह कविवर इन्द्रेश, दुख जो जन के टाले।
करे काम सम भाव, हो गये बहुत घुटाले।


नेता-अभिनेता सभी, हुए आज पथ भ्रष्ट।
जनता ही होती दुखी, इन्हें न होता कष्ट।
इन्हें न होता कष्ट, सदा हित साधें अपना।
जाये भाड़ समाज, झूँठ की माला जपना।
कह कविवर इन्द्रेश, देश के नर्क प्रणेता।
बदल दिये इतिहास, सभी नेता-अभिनेता।


वेलेंटाइन डे सखे, करो झमाझम प्यार।
देकर फूल गुलाब का, करो प्रेम इजहार।
करो प्रेम इजहार, देखिके सुन्दर लड़की।
दे गुलाब का फूल,बतादो नीयत भड़की।
कह कविवर इन्द्रेश, मैच फिर खेलो वनडे।
यदि चप्पल पड़ि जाँय, कहो वेलेंटाइन डे।

भाई अब कलिकाल में, समझदार सब कोय।
हानि-लाभ जीवन-मरण, सब पर भारी होय।
सब पर भारी होय, समझ कर काम है करना।
सुख दुःख जाओ झेल, कभी ना इनसे डरना।
कह कविवर इन्द्रेश, इसी में है कुशलाई।
सोच समझ कर सभी, काम करना तुम भाई।

आया आज बसन्त है, मनवा लगत अधीर।
तन-मन में उलझन भरी, ज्यों विरहिन की पीर।
ज्यों विरहिन की पीर, पिया बिन रहा न जाये।
सरसिज करे बवाल, सरस शोभा दरसाये।
कह कविवर इन्द्रेश, अजब है इसकी माया।
रैना बीती जात, चैन मन में नहिं आया।


मेकप उतना ही करो, जो मेकप करि जाय।
मेकप उतना ना करो, हँसी उड़ायी जाय।
हँसी उड़ायी जाय, जरा मन माँहि विचारो।
देता चमड़ी जारि, तनिक छन लगतो प्यारो।
कह कविवर इन्द्रेश, करो काया को चेकप।
फिरि वहिके अनुरूप, करो थोड़ा सा मेकप।

होता प्रमुदित है हृदय, लखि शोभा अभिराम।
मात्रुभूमि को कर रहा, शत-शत बार प्रणाम।
शत-शत बार प्रणाम, छटा अद्वितीय है न्यारी।
ऊँचा लिए ललाट, हिमालय मंगलकारी।
कह कविवर इन्द्रेश, पैर नित सागर धोता।
बसें सभी समुदाय, निरखि मन खुश है होता।

कहाँ रही संवेदना, कहाँ रहा अहसास।
हुए लोप सब देश से, मन है बहुत उदास।
मन है बहुत उदास, हुई मतलब की दुनिया।
स्वारथ वस सब प्रीति, करें गुनिया अनगुनिया।
कह कविवर इन्द्रेश, ढूँढ़िके थक गए जहाँ।
मानव पड़ें दिखाय, पर मानवता अब कहाँ।

जाड़ा साजन है बहुत, कटे नहीं दिन - रैन।
तुम तो बसे विदेश मा, जिया बहुत बेचैन।
जिया बहुत बेचैन, रात दिन नींद न आवै।
खान पान सम्मान, राग रंग मनहिं न भावै।
कह कविवर इन्द्रेश, कोहू से लइके भाड़ा।
जल्दी आओ चले, कइसहूँ काटउ जाड़ा।

नहीं अछूता है कोई, हो गृहस्थ या संत।
धीरे से आ द्वार पर, दस्तक दियो बसन्त।
दस्तक दियो बसन्त,सभी में मस्ती छायी।
नूतन पत्रक पुष्प, बृक्ष लेते अँगड़ाई।
कह कविवर इन्द्रेश, बढ़ा सब में बलबूता।
नूतन भरी उमंग, कोई भी नहीं अछूता।

कुचियाये हैं बाग में, जामुन महुआ आम।
सब बृक्षों में फूल हैं शोभा ललित ललाम।
शोभा ललित ललाम, देखके छटा निराली।
कोयल रही है कूक, झूमती डाली-डाली।
कह कविवर इन्द्रेश बसन्ती ऋतु मनभाये।
तन मन ब्यापा हर्ष, देखि बिरवा कुचियाये।

दाता या याचक बड़ा, प्रश्न बहुत गंभीर।
बड़ा धनुष से बाण है, देत कलेजा चीर।
देत कलेजा चीर, किन्तु धनु बिन है हीना।
धनु भी है बेकार, रहत जब बाण विहीना।
कह कविवर इन्द्रेश, समझ में ये ही आता।
बड़ा न कोई छोट, एक सम याचक-दाता।

मित्र सनेही यदि मिले, समझो नित को धन्य।
यह परम सौभाग्य है, इससे बड़ा न अन्य।
इससे बड़ा न अन्य, आपका भाग्य बड़ा है।
है ईश्वर का रूप, सामने आज खड़ा है।
कह कविवर इन्द्रेश, आजकल सुख है ये ही।
जानो सब कुछ मिला, मिला जब मित्र सनेही।

सर्वदा हो स्वच्छता, सुख उपजे चहुँ ओर।
मन प्रशन्न होता सदा, स्वाती लखै चकोर।
स्वाती लखै चकोर, देखि सुचि सुन्दर जगती।
सुन्दरता चहुँओर, छटा अति सुखकर लगती।
कह कविवर इन्द्रेश,उपजती सुख - सम्पदा।
सुचि आभूषण नेक, सफाई रखो सर्वदा।

कीजै नहीं घमण्ड को, करो स्वयं पर गर्व।
सुन्दर मितभाषी बनो, आदर करिहैं सर्व।
आदर करिहैं सर्व, रखो मन में संतोषा।
करते रहो सुकर्म, ईश पर करो भरोषा।
कह कविवर इन्द्रेश, नाम नित प्रभु का लीजै।
करके पर उपकार, जन्म निज स्वारथ कीजै।

माता, बहना, भार्या, बेटी, पोती, नेक।
साली, सलहज, सासु माँ, नारी रूप अनेक।
नारी रूप अनेक, कि चाची, दादी, नानी।
नातिन और भतीजि, बहू, दिवरानि, जिठानी।
कह कविवर इन्द्रेश, विश्व जिसके गुण गाता।
सर्वोपरि सब नारि, कहाती जग में माता।

राम-राम है दोस्तों, बहुत भरी है खोट।
फिर भी आया द्वार पर, दीजै मुझको वोट।
दीजै मुझको वोट, भूल कर अवगुण सारे।
छमौ सकल अपराध, जोड़ता हाथ तुम्हारे।
कह कविवर इन्द्रेश, देय का नहीं दाम है।
कालाधन सब हुआ, बचा बस राम-राम है।

आयेगा वह दौड़ कर भाग्य अगर अनुकूल।
आया भी जाये चला अगर समय प्रतिकूल।
अगर समय प्रतिकूल, जान ईश्वर की लीला।
राई पर्वत करे, बना दे पर्वत ढीला।
कह कविवर इन्द्रेश, कर्मफल पा जायेगा।
चिन्ता होगी दूर, समय अच्छा आयेगा।

कथरी में गुण बहुत हैं, आज लीजिए जान।
रक्षा करती है सदा, जो गरीब इन्सान।
जो गरीब इन्सान, बिछा कर इसको भाई।
सो जाते तत्काल, नींद आती सुखदाई।
कह कविवर इन्द्रेश, खोल कपड़ों की गठरी।
फटे-पुराने जोड़, बनाते सुन्दर कथरी।।

मंगल हो नववर्ष में, छाये खुशी अपार।
सुख समृद्धि परिपूर्ण हो,सबके घर परिवार।
सबके घर परिवार, कहीं नहिं रहे उदासी।
रक्षा सबकी करें, ईश घट-घट के वासी।
कह कविवर इन्द्रेश, कहीं नहिं होय अमंगल।
उपजे मन सद्बुद्धि, काम सब होवे मंगल।।


Indresh Bhadauriya/ Indra Bahadur Singh Bhadauriya

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