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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

‘मरुधरा सूं निपज्या गीत’ और ‘क़लम ज़िन्दा रहे’ का लोकार्पण


दिनांक : 30 अगस्त 2017, समय: सायं 5:30 बजे
स्थान : हिन्दी भवन, 11, विष्णु दिगम्बर मार्ग, राउज एवेन्यू, नयी दिल्ली-110002


विख्यात गीतकार एवं आकाशवाणी के मान्यता प्राप्त गायक, समाचार-वाचक, लोकगायक और उद्घोषक इकराम राजस्थानी के हिन्दी और राजस्थानी भाषा में दो ग़ज़ल संग्रह ‘मरुधरा सूं निपज्या गीत’ और ‘क़लम ज़िन्दा रहे’ का हिन्दी भवन, 11, विष्णु दिगम्बर मार्ग, राउज एवेन्यू, नयी दिल्ली-110002 में बुधवार, 30 अगस्त 2017 को सायं 5:30 बजे लोकार्पण के साथ-साथ दोनों पुस्तकों पर ग़ज़ल गोष्ठी भी होगी। इस ग़ज़ल गोष्ठी में आमन्त्रित अतिथि हैं-बालस्वरूप राही, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, लीलाधर मंडलोई, नरेश शांडिल्य, राजेन्द्रनाथ रहबर और रहमान मुसव्विर।

वरिष्ठ गीतकार और अन्य अनेक उपाधियों से अलंकृत इकराम राजस्थानी ने ‘मरुधरा सूं निपज्या गीत’ और ‘क़लम ज़िन्दा रहे’ के अतिरिक्त ‘तारां छाई रात’, ‘पल्लो लटके’, ‘गीतां री रमझोल’, ‘शबदां री सीख’, ‘खुले पंख’ और ‘पैगम्बरों की कथाएँ’ इत्यादि पुस्तकों की रचना की है। उन्होंने हज़रत शेख सादी के ‘गुलिस्तां’ का राजस्थानी भाषा में प्रथम काव्यानुवाद और रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वप्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ का राजस्थानी भाषा में काव्यानुवाद (अंजली गीतां री) भी किया है। वह विश्व के प्रथम कवि हैं, जिन्होंने ‘कुरान शरीफ़’ का राजस्थानी और हिन्दी भाषा में भावानुवाद किया है।

‘लोकमान’ उपाधि से सम्मानित इकराम राजस्थानी को ‘राष्ट्रीय एकता पुरस्कार’, ‘महाकवि बिहारी पुरस्कार’, ‘राष्ट्र रत्न’, ‘वाणी रत्न’, ‘तुलसी रत्न’ और ‘समाज रत्न’ के साथ-साथ अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं।

‘मरुधरा सूं निपज्या गीत’ विख्यात गीतकार इकराम राजस्थानी के रसीले राजस्थानी गीतों का नज़राना है। राजस्थानी मिट्टी और संस्कृति से आत्मीय लगाव के चलते इन्होंने अपना उपनाम ही ‘राजस्थानी’ रख लिया है। इनकी इस रचना में संकलित गीत राजस्थानी भाषा की मिठास के साथ-साथ राजस्थान की मिट्टी-पानी-हवा की सोंधी गन्ध से भी सुवासित हैं। इन गीतों में राजस्थान की क्षेत्रीय विशेषताओं के आत्मीय चित्रण के अलावा वैयक्तिक शैली में वहाँ की प्राकृतिक तथा भौतिक सम्पदा का भी वर्णन है।

‘मरुधरा सूं निपज्या गीत’ में कुछ ऐसे गीत भी हैं, जो पुरुष और स्त्री के संवादों के रूप में रचे गये हैं। इस गीत-संग्रह में ‘गाथा पन्ना धाय री’ जैसे लम्बे गीत भी हैं, जो गायन के साथ-साथ मंचन की ख़ूबियों से युक्त हैं। कुल मिलाकर इस अनुपम कृति में लक्षित की जाने वाली अन्यतम विशेषता है जातीयता का उभार और लोकगीत की प्रचलित शैली का पुनराविष्कार।

‘कलम ज़िन्दा रहे’ इकराम राजस्थानी की हिन्दुस्तानी ग़ज़लों, रुबाइयों, अशआर और दोहों की एक मुकम्मल किताब है। उनकी इन बहुरंगी तेवर की रचनाओं में कथ्य और रूप के समन्वय के साथ-साथ भाव तथा भाषा की आज़ादी और ख़याल एवं चित्रण का खुलापन भी मिलता है। इस संग्रह की रचनाओं में तन-मन, घर-परिवार, नाते-रिश्ते, समाज-परिवेश, देश-दुनिया, गाँव-परदेस, ख़्वाब-हक़ीक़त और ग़म-खुशी के व्यापक दायरों को समेटा गया है। उनकी इन विविध रचनाओं में ज़िन्दगी का एक गहरा फलसफ़ा मिलता है।

इकराम राजस्थानी की भाषा में एक सहज प्रवाह और रवानगी है। इन रचनाओं में उन्होंने आम जन-जीवन और बोलचाल की भाषा का रचनात्मक प्रयोग इस तरह से किया है कि बोलचाल और साहित्यिक भाषा का अन्तर मिट गया है। अपने कथ्य और भाषा के सौन्दर्य के कारण ये रचनाएँ हर तरह के पाठकों के लिए बारम्बार पठनीय हैं।
रपट :
  अदिति माहेश्वरी-गोयल

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