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रविवार, 27 दिसंबर 2020

'ग़ज़ल, गीत, नवगीत': ओम निश्चल के लेख पर प्रतिक्रिया — अवनीश सिंह चौहान

 


('दैनिक जागरण' के साहित्यिक पृष्ठ- 'पुनर्नवा' (21 दिसंबर 2015) में ओम निश्चल की 'ग़ज़ल, गीत, नवगीत' पर उपर्युक्त टिप्पणी पढ़कर मैंने यह प्रतिक्रिया फेसबुक पर की थी, जिसे जस का तस यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है— अवनीश सिंह चौहान) 

'नवगीत विमर्श' में टिप्पणी करने का मन नहीं हो रहा था। पूर्णिमा वर्मन जी ने स्वयं पहल की है और बात (नव) गीत की है, इसलिए लिखना पड़ रहा है (हालाँकि मेरे कई मित्र/ अग्रज अभी भी चुप बैठे हैं?)। अग्रज ओम निश्चल जी ने दैनिक जागरण में प्रकाशित अपनी इस टिप्पणी में ग़ज़ल को विशेष महत्व देते हुए नवगीत की चर्चा की है। आखिर ऐसा क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में नवगीत के बरक्स ग़ज़ल काफी सशक्त हुई हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि ग़ज़ल में नवगीत की तुलना में अच्छे ग़ज़लकारों की संख्या अधिक हो? यदि ऐसा है तो नवगीत-कवियों को आत्म-मंथन करने की परम आवश्यकता है? पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि नवगीत की 'क्वांटिटी' काफी बढ़ी है, किन्तु नवगीत की 'क्वांटिटी' बढ़ जाने से काम चलने वाला नहीं, इसकी 'क्वालिटी' भी 'इम्प्रूव' करनी पड़ेगी। यहाँ मेरे कहने का आशय यह कतई नहीं है कि ग़ज़ल में 'क्वांटिटी'  नहीं बढ़ी है, इस विधा में लिखने वालों की भीड़ नहीं है या वहाँ पिष्टपेषण नहीं है, वहाँ भी यह सब है। विचार यह करना है कि कहीं ग़ज़लकारों का रचनात्मक योगदान पिछले कुछ वर्षों में नवगीतकरों से बेहतर तो नहीं हुआ है? 

दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है वह यह कि निश्चल जी ने ही यह बात क्यों उठाई और यह क्यों कह दिया कि 'गीत के स्वर्णिम दिन अब तो नहीं रहे, न लौटने वाले हैं'? इसलिए जरूरी है कि निश्चल जी के बारे में भी कुछ बात कर ली जाय। निश्चल जी पहले नवगीत लिखा करते थे (कभी-कभार अब भी उनके नवगीत प्रकाशित हो जाया करते हैं)। जब उनसे नवगीत की साधना नहीं हुई, तब वह साहित्यिक पत्रकारिता करने लगे। साधना अधूरी रहने के कारण उनके भीतर नवगीत के प्रति अविश्वास जाग गया, जिसके परिणामस्वरूप इस तरह की सोच उनके भीतर विकसित हो गयी? इसलिए इसमें उनका भला क्या दोष? एक और प्रश्न पुनः उठता है कि उन्होंने अपने इस संक्षिप्त लेख में पूर्णिमा जी की फुलवारी की बात क्यों की? मेरी दृष्टि में पूर्णिमा जी की फुलवारी (नवगीत की पाठशाला) के प्रति निश्चल जी का आकर्षण अब भी बाकी है। कुछ भी हो, अच्छा तो यह रहेगा कि सभी साहित्यसेवियों एवं साहित्य की सभी विधाओं का यथोचित सम्मान हो। कुलमिलाकर मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं कि दैनिक जागरण के वार्षिकांक में आज पहली बार इस प्रकार से (नव) गीत की चर्चा हुई है और इसलिए निश्चल जी को बधाई तो मिलनी ही चाहिए।

विद्वानों द्वारा फेसबुक पर दी गयीं प्रतिक्रियाएँ 
 
1. "मैंने सुबह में ही देख लिया था अवनीश जी, लेकिन इधर कुछ दिनों से डाटाकार्ड से नेट सही नहीं चल रहा है। लेखक (टिप्पणीकार) को लेकर आपका आकलन सही प्रतीत होता है। मात्र नवगीत शब्द का प्रयोग कर देने से कोई आभारयोग्य नहीं हो जाता। अहंमन्यता के लिये कोई स्थान उचित नहीं। आपकी संवेदना आश्वस्तिकारी है।"  — सौरभ पाण्डेय, इलाहाबाद

2. "क्या कहूं भाई। कुछ कहने का मन नहीं करता। जब ये स्वयम्भू गीतकार नवगीतकार किसी सार्थक विमर्श में हिस्सा ही नहीं लेना चाहते कुछ सुनने को तैयार ही नहीं तो ओम निश्चल जैसों को कहने की गुंजाइश बन ही जाती है। ओम निश्चल ने तो घोषणा कर ही दी है कि गीत-नवगीत की वापसी मुश्किल है तो अब जवाब देने की बारी नवगीत की पाठशाला चलाने वालों की है। नवगीत के ये मठाधीश अपने में मस्त हैं और कविता की मुख्यधारा उन्हें कवि मानने तक को तैयार नहीं। सोचो, सोचो मठाधीशों! और जवाब दो! बहलाने के लिए तो कुछ का नाम ले ही लिया है ओम निश्चल ने! यह क्या कम है? खुश रहो कि नाम तुम्हारा भी अखबार में छप गया है। कोई तुम्हें गाली देकर भी नाम छाप दे तो क्या नाम न होगा? होगा ही। जरूर होगा! ... और जब कुछ न मिले तो अपने बिम्ब प्रतिबिम्ब प्रतीक वगैरह तो दिखा ही देना इन नई कविता के नामुरादों को।शायद इस मामले में उन्हें पिछाड़ ही दो! — रामाकांत, रायबरेली

3. "आदरणीय रमाकान्तजी, आपकी इन बातों से मेरी भी सहमति है कि नवगीत की ओर से उपयुक्त जवाब देना बनता है। परन्तु, सबसे अच्छा जवाब तो सार्थक नवगीत-गीत रचनाएँ ही होंगीं, न कि कोई बहस आदि। लेकिन, सबसे ऊपर, ओम निश्चल की बातें पत्थर पर की लकीर क्यों मानी जायें, यह तथ्य भी तो उचित कारण के साथ साझा हो? क्यों मुख्यधारा में वही माना जाता है जो अपने हिसाब से किसी तरह के बड़े मठ का वाचाल हिस्सा है? उस स्थिति में, आदरणीय, एक मठ का दूसरे मठ से तकरार ही सामने आयेगा? इस तकरार में रचनाएँ और साधक रचनाकार कहाँ है? और, जिस तथाकथित विमर्श में रचनाएँ और रचनाकार नहीं हैं, वे विमर्श तो हैं ही नहीं, चाहे और कुछ अवश्य हों। — सौरभ पाण्डेय, इलाहाबाद

4. "पिछले लगभग दस सालों से बल्कि और ज्यादा सालों से कोई नामवर आलोचक नहीं उभर कर आया। फिर भी आलोचना की रिक्तता में कुछ लोग अपनी अपनी डफली बजा रहे हैं। दूसरी सच्चाई ये है, विधा कोई भी हो, वह कथ्य और कहन की नयी ज़मीन नहीं तोड़ पा रही है। यदि कहीं टूटी भी है तो उसके लिये निष्पक्ष आलोचना नहीं है। तथाकथित आलोचक इतने बड़े महत्वाकांक्षी हैं कि उन्हें मैं-मैं के अलावा कुछ आता ही नहीं। गीत-नवगीत की यात्रा में ओम निश्चल जी हमारे हम सफर रहे हैं। इधर वे गद्य के क्षेत्र में कुछ कर रहे हैं, फ्रीलांसिंग भी कर रहे हैं। सन् 2015 में वह जागरण मैंने भी पढ़ा था। उनके कहे पर तब कोई हलचल नहीं हुई थी। आज भी कोई हलचल नहीं है। मेरी समझ से उनसे हम साहित्यकार बन्धु ज्यादा समझदार हैं। विधाओं में ऊँच-नीच की भावना कोई अच्छी बात नहीं। — वीरेन्द्र आस्तिक, कानपुर 

5. गीत के साथ नवगीत अमर है। मैं यह अनुभव करता हूँ कि अब ग़ज़ल भी नवगीत के तेवर जैसी लिखी जा रही है।  — रघुवीर शर्मा, खण्डवा 

6. अवनीश भाई, नमस्कार। गीत महासागर है। ग़ज़ल तालाब। ग़ज़ल को 'तंग' गली' और 'कोल्हू का बैल' जैसे विशेषणों से उस्ताद शायरों ने नवाज़ा है। नवगीत को उसके जन्म के समय की सीमित सोच से निकलना होगा। हर भाव, हर रस और हर भंगिमा का स्वागत हो। ऐसा न होने से दोहराव और नीरसता हो रही है। नवगीत की पाठशाला ने आरंभ में यही किया, किन्तु गत आयोजन में मठधीशों ने बदमजगी पैदा की। अस्तु पाठशाला का कार्य चलते रहना चाहिए। यह एक नया इतिहास बना रही है। भवष्य में बंधी-बंधाई लीक के नवगीतों के स्थान पर नयी जमीन तलाशते नवगीत ही चर्चित होंगे। — संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर

7. निश्चित ही हर विधा स्वागतेय है, जो भी साहित्य समाज को कुछ न कुछ अवदान दे। कोई भी विधा लुप्त नहीं हो रही। आज हर विधा के परचम लहरा रहे हैं। नवगीत के क्षेत्र में लगातार कृतियाँ आ रहीं हैं, हालांकि प्रकाशकों की रुचि कविताओं में कम हैं। बहरहाल अच्छी चर्चा होती रहना चाहिए। सादर — हरिवल्लभ शर्मा 'हरि', भोपाल 

Gazal, Geet, Navgeet

1 टिप्पणी:

  1. आपने अवनीश अपना काम बहुत फैला लिया है । क्या-क्या तो करते हो । जो निष्ठा हिंदी नवगीत के लिए सुरक्षित और समर्पित होनी चाहिए थी, उसे आपने न जाने कहाँ-कहाँ उलझा रखा है । मनोयोग जब हिस्सों में विभाजित हो जाता है तो किसी एक काम के लिए उतना ज़ज़्बा और समर्पण बच नहीं रहता । आप ऊर्जश्वी तो बहुत हैं, लेकिन, इस ऊर्जा को नवगीत के विकास और संवर्द्धन में लगाते तो कुछ और ही बात होती । जितने भी साहित्य के काम आपने हाथ में ले रखे हैं, मुझे लगता है , संतुष्टि और यश आपको नवगीत ही देगा । इसे सँवारो । नवगीत की वर्तमान स्थितियां आशाजनक रूप से अच्छी नहीं हैं । इसे एकाग्र और संगठित होकर पटरी पर लाओ । कुछ ऐसे प्रयत्न करो कि नवगीत समाज के भीतर की टूट-फूट और बिखराव रुके और सार्थक एवं सर्जनात्मक लेखन की ओर कवियों की उन्मुखता बढ़े । कुछ न सही , आप इन कामों में पहल या हस्तक्षेप तो कर ही सकते हो । सब ठंडे पड़े हैं नवगीत के कवि । उन्हें झखझोरो । यह काम आप ही कर सकते हो । जागो अवनीश।

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