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मंगलवार, 16 नवंबर 2010

शिल्प तो रचना की अपनी विशिष्टता है-सत्यनारायण


सुप्रिसिद्ध गीत कवि सत्यनारायणजी


१३ सितम्बर, 1935 को जन्मे श्री सत्यनारायण हिन्दी के सुपरिचित गीतकार है । आपकी रचनाओं में अपनी माटी से जुड़ाव तथा अपने समय की विद्रूपताओं, अन्तर्विरोधों, आकांक्षाओं और कुंठाओं के अक्स प्रतिबिम्बित होते हैं। उनमें जनता की गहरी मनोव्यथा एवं छटपटाहट का कोरस सुनाई पड़ता है। 'नवगीत अर्धशती' में शुमार श्री नारायण की अब तक कई किताबें चर्चित और प्रशंसित हो रही हैं, जिनमें 'तुम ना नहीं कर सकते', 'टूटते जलबिम्ब', 'सभाध्यक्ष हँस रहा है', 'जनता का कोरस' (प्रकाशनाधीन), आदि प्रमुख हैं । इसके अलावा आपकी कविता, नवगीत, संस्मरण आदि विधाओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने एक पत्रिका का संपादन भी किया है । बिहार सरकार का 'विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान' आदि से सम्मानित श्री सत्यानारायण वर्तमान में डी ब्लाक, बी पी सिन्हा पथ, कदमकुआं, पटना (बिहार)-८००००३ में निवास कर रहे हैं । आपका मोबाइल नंबर 9334310250 । नवगीत के इस महान रचनाकार से गीत/नवगीत के अनछुए पहलुओं पर बातचीत की है अवनीश सिंह चौहान ने:-

चित्र गूगल से साभार 
अपने बचपन के बारे में बताएँ?
मेरा जन्म (वर्ष 1934), भोजपुर (तब का शाहाबाद जिला, बिहार) के एक गाँव में हुआ। गाँव सोन नदी से निकली नहर पर था। खेतों में झूमती-लहराती फ़सलों के बीच मटरगस्ती बढ़ी भली लगती। नहर में नहाने-तैरने का अलग मज़ा था। नहर आरा मुख्यालय से जोड़ती थी। आवागमन के दो साधन थे। आरा सासाराम के बीच छोटी रेल चलती थी। नज़दीक के स्टेशन से गाँव लगभग चार कोस था। इसे हम बैलगाड़ी से तय करते। दूसरा साधन नहर में चलने वाला स्टीमर था। इसे हम बोट कहते थे। गाँव आने जाने में दस-ग्यारह घन्टे लग जाते। हम अक्सर बोट से ही आते-जाते। जल का स्तर नियंत्रित करने के लिए हर कोस-डेढ़ -कोस पर ‘लॉक‘ थे। इसे हम ‘लख‘ कहते थे। दोनों ओर बड़े फाटक। बोट के लख में घुसते ही पीछे का फाटक बन्द कर दिया जाता। आगे के फाटक से धीरे-धीरे पानी छोड़ा जाता था। जब पानी का स्तर लेबल पर आ जाता तो आगे का फाटक खोल दिया जाता और बोट चल पड़ता। बन्द लख के बीच बढ़ते-उतरते जल स्तर के साथ बोट का ऊपर-नीचे होना मुझे विस्मयकारी रोमांच और अबूझे भय से भर देता। आज सोचता हूँ, कि मेरे नवगीत-संकलन ‘टूटते जल बिम्ब‘ में जल से जुड़े मेरे अनेक गीत शायद इसी स्मृति से उपजे हैं। फिर, अपने गाँव के वह धनीराम मास्टर की पाठशाला। गोबर लीपी ज़मीन पर बोरियाँ बिछाकर हम बैठते-स्लेट-पेंसिल और ‘मनोहर पोथी‘ के साथ। सामने गज भर की खजूर की छड़ी के साथ ड़ेढ़ हाथ ऊँची, चौकोर चौकी पर मास्टर जी विराजते। धनीराम जी बातों से कम, छड़ी से ज़्यादा काम लेते। प्रार्थना में कुछ छूट गया तो छड़ी, पाठ में चूक हुई तो छड़ी, जोड़-घटाव ग़लत हुआ तो छड़ी। मतलब मास्टर जी को हमारी असावधानी बर्दाश्त नहीं थी। तो रचना के क्षणों में सावधान रहने का कदाचित पहला गुरुमंत्र था यह मेरे लिए।
बचपन और युवावस्था की अनुभूतियाँ जो आपके मन में खदबदायीं और आपने गाना-गुनगुनाना शुरू कर दिया?
सन् 1942 में, मैं पटना आ गया और बिहार के प्रमुखतम विद्यालय पटना कॉलेज में दाखिला लिया। उसी वर्ष काव्य-पाठ प्रतियोगिता में शामिल होने का सुयोग मिला। मैंने ‘जयद्रथ वध‘ की कुछ पँक्तियों का (स्मरण से) पाठ किया और पुरस्कृत हुआ। हमारे हिन्दी शिक्षक थे (स्व0) डॉ. रामखेलावन पाण्डेय। एम. ए. में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद उन्होंने विष्वविद्यालय ज्वाइन किया और रांची विष्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। यहाँ यह भी बता दूँ कि पाण्डेय जी ने स्कूल शिक्षक रहते हुए प्राइवेट छात्र के रूप में आई.ए.बी.ए. और एम.ए. किया। यह वही रामखेलावन पाण्डेय हैं जिन्होंने हिन्दी में गीति साहित्य की पहली प्रामाणिक और महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। उनका स्नेहाशीश मुझे निरन्तर मिलता रहा। उन्होंने मेरे प्रथम काव्य-संकलन ‘तुम ना नहीं कर सकते‘ की भूमिका लिखी। पाण्डेय जी के जाने के बाद गीत के सुकंठ और सुपरिचित कवि रामगोपाल ‘रुद्र‘ हमारे शिक्षक हुए। उनकी प्रेरणा से मैं तुकबन्दी करने लगा और वे बड़े स्नेह से रचनाएँ सुधारते-सलाह देते थे। गीत के व्याकरण का प्रथम पाठ मैंने उन्हीं से सीखा। यह दौर स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक दौर (1942-46) भी था। आज़ादी के तराने हमारे होठों पर होते थे। कॉलेज के दिनों में आकस्मिक रूप से बच्चन जी को सुनने का सुयोग मिला था। वे हमारे प्राध्यापक से मिलने कॉलेज आए थे। हम लोगों ने उन्हें घेरा और कविता सुनाने की ज़िद की। क्लास रूम में ही बच्चन जी ने अपने दो गीत सुनाए थे-‘प्रिय, षेश बहुत है रात अभी मत जाओ‘ तथा ‘कौन हंसिनिया लुभाए हैं तुझे, जो मानसर भूला हुआ है।
एक समर्थ रचनाकार के रूप में आपकी पहचान कब और कैसे बनी?
वर्ष 1963-65 के बीच छोटी पत्रिकाओं के अतिरिक्त ‘लहर‘ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ में मेरी कविताएँ और गीत समय-समय पर आते रहे। वह साठोत्तरी लेखन का दौर था। इनमें कई रचनाओं की नोटिस ली गई। लघु और बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरी काव्य-रचनाएँ (इस जनतंत्र में ‘आदमखोर‘,‘शहंशाह सुनो‘ आदि) पढ़कर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया (पटना) के तत्कालीन ब्यूरो चीफ़ पत्रकार-साहित्यकार (स्व.) जितेन्द्र सिंह ने ‘पोयट ऑफ़ प्रोटेस्ट‘ शीर्षक से एक लम्बा आलेख लिखा था। उमाकान्त मालवीय ने मेरे नवगीतों की नोटिस ली। ‘वासन्ती‘ की संगोष्ठी में उन्होंने मेरे एक नवगीत-‘‘अब नहीं मिलता कहीं भी लहर का संकेत‘‘-की विषद विवेचना प्रस्तुत की थी। काम आगे बढ़ा और मैं लिखता रहा। ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, शम्भुनाथ सिंह, रमानाथ अवस्थी का स्नेह सानिध्य अनायास मिलता रहा।
आपकी रचनाओं में अपनी माटी से जुड़ाव तथा अपने समय की विद्रूपताओं, अन्तर्विरोधों, आकांक्षाओं और कुंठाओं के अक्स प्रतिबिम्बित होते हैं। उनमें जनता की गहरी मनोव्यथा एवं छटपटाहट का कोरस सुनाई पड़ता है। यह कला कहाँ से आई?
देखिए, यह कोई कला नहीं है। दरअसल, यह निरन्तर क्रूर और हिंसक होता हुआ हमारा समय है। आज भूख और बीमारी से हुई मौत पर सन्देह होता है कि कहीं यह हत्या तो नहीं है। चीन से मिली शर्मनाक हार (1962) के बाद भारतीय जनमानस का पूरी तरह मोहभंग हो गया। तब राजनीति के फलक पर राममनोहर लोहिया सर्वाधिक प्रासंगिक होकर उभरे। उनकी सोच और भाषा ने साठोत्तरी लेखन को भी प्रभावित किया। हालात बद से बदतर होते रहे। कुछ ही अन्तराल के बाद बिहार आन्दोलन (1974) घटित हुआ। इसे जे.पी.मूवमेन्ट भी कहा गया। जन उभार के अजीब दिन थे वे। हम कवि,-कलाकार फणीश्वरनाथ रेणु की अगुआई में सड़कों-चौराहों पर उतर आए। यह कविता की सर्वथा नई, अनूठी भूमिका थी-जनता की बोली-बानी में जनता से सीधा संवाद। ‘‘जुल्म का चक्कर और तबाही कितने दिन?/सच कहने की मनाही कितने दिन?/यह गोली, बन्दूक, सिपाही कितने दिन?‘‘ जैसी मेरी गीत-पँक्तियाँ नुक्कड़-चौराहों, जुलूसों, सभाओं और जेल की दीवारों के भीतर गूंजने लगी थीं। यह आकस्मिक नहीं है कि मेरे इस तेवर के गीतों का स्वतंत्र संकलन ‘प्रजा का कोरस‘ शीर्षक से शीघ्र आने वाला है।
नई कविता और गीत के बीच वह कौन-सी विभाजक रेखा है जो उनके बिम्ब विधानों, प्रतीकों और उपमानों का विशिष्ट स्वरूप निर्धारित करती हैं और उनकी अलग विधाओं के रूप में पहचान बनाती हैं?
मुझे समझ में नहीं आता कि विभाजक रेखा की बात बार-बार क्यों की जा रही है। पचास के दशक में नई कवितावादियों ने गीत की अस्मिता पर सवाल खड़े किये तो हम गीत के कवियों ने नई-कविता पर प्रहार किया। नतीज़ा यह निकला कि कविता वाले ‘कवि‘ और गीत वाले ‘गीतकार‘ हो गए। देश के विभाजन के बाद साहित्य में यह विस्मयकारी बंटवारा हुआ। हम गीतधर्मी आल्हादित हैं कि हमें हमारी ‘टेरीटरी‘ मिल गई। क्या गीत कविता नहीं है? कोई मुझे बताए कि गीत के शिखर निराला ही क्यों? नरेन्द्र शर्मा, अंचल, नेपाली, जानकीवल्लभ, आर.सी.बाबू को गीतकार कहकर सम्बोधित किया गया क्या? क्या समकालीन गीत और कविता की अन्तर्वस्तु में कन्टेन्ट में कोई बुनियादी अन्तर है? फ़ार्म (छन्द और छन्दमुक्त) को छोड़कर इनके बिम्ब, प्रतीक अलग-अलग नहीं होते। शिल्प तो रचना की अपनी विशिष्टता है। रचना कथ्य के अनुरूप अपना शिल्प गढ़ती है।
आज के कठिन समय में कविता-गीत (रचना) एवं पाठक/श्रोता के बीच सेतु के रूप में बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक तन्तुओं का प्रयोग हो रहा है। ऐसे में गीत-कविता की स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया कहाँ तक प्रभावित होगी?
हाँ, आज का समय कठिन से कठिनतर होता जा रहा है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर कई तरह के बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक दबाब हमें अपनी चपेट में ले रहे हैं। सामाजिक संरचना, आर्थिक परिदृश्य, राजनीतिक उथल-पुथल सब संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं। ऐसे में रचना की स्वतःस्फूर्त प्रक्रिया मायने नहीं रखती। आज का रचनाकार सबकुछ खुली आँखों से देख रहा है और रचना के स्तर पर उसकी चुनौतियों को पूरी चेतना से झेल रहा है। गीत का कवि अपनी रागदीप्त संवेदना के साथ सार्थक हस्तक्षेप कर रहा है। नईम की पँक्तियाँ हैं-‘‘दिन जो दीनइलाही होते/तब भी सघन तबाही होते/आलमगीर जेठ शासक है/समझदार मरते दारा से‘‘। क्या इन पँक्तियों का अन्तरंग इस कठिन होते समय में पाठक या श्रोता को संवेदित नहीं करता?
आज के साहित्य में मानवीय आयामों को किस तरह से परिभाशित किया जा रहा है और यह अतीत से कितना भिन्न है?
आज के साहित्य में मानवीय आयाम (मानवीय सम्बन्ध) अलग-अलग सन्दर्भों में परिभाशित हो रहे हैं। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श साहित्यकार की चिन्ताओं में प्रमुखता से शामिल हैं। भूमण्डलीकरण, ग्लोबल मार्केट, विश्व ग्राम के स्वर साहित्य में दिखाई पड़ रहे हैं। यह सब इस तरह पहले नहीं था।
आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का उपयोग बढ़ रहा है। कई पत्रिकाएँ इंटरनेट पर अपनी पहचान बना रहीं हैं। कई साहित्यकारों ने अपने ब्लॉग खोल रखे हैं। प्रिंट मीडिया को इससे क्या-क्या चुनौतियाँ होंगी?
इसको लेकर मैं कतई चिन्तित नहीं हूँ। यह एक फ़ेज़ है। क्या समाचार पत्रों के बाज़ार में मंदी आई? पत्र-पत्रिकाओं और साहित्य का प्रकाशन हो ही रहा है। पाठक वर्ग बना हुआ है। सो प्रिंट मीडिया की जरूरत है, और बनी रहेगी।
क्या आपको युवा गीतकारों में कोई विशिष्ट चिंतन दिखाई पड़ता है? उनमें कितनी सम्भावनाएँ हैं?
मेरी चिन्ता वस्तुतः यह है कि आज हिन्दी में ग़ज़लों की बाढ़ आई हुई है। युवा मानस ही क्यों, अनेक बुजुर्ग-गीत कवि भी ग़ज़लों को लोकप्रियता का शार्टकट मानकर अपना पाला बदल चुके हैं। फिर भी ऐसे ढेर सारे युवा कवि हैं जो पूरी निष्ठा से गीत लिख रहे हैं। उनका गीत-विवेक, उनकी गीत-भाषा बहुत आश्वस्त करती है।
नई पीढी के लिए आपका संदेश।
संदेश क्या दूँ। मेरी वक्रत भी नहीं। बकौल केदारनाथ अग्रवाल नई पीढ़ी से इतना ही कह सकता हूँ-‘‘टूटें न तार कभी जीवन सितार के/ऐसे बजाओ इन्हें प्रतिभा के ताल से/किरणों के कुमकुम से, सेनुर, गुलाल से/लज्जित हो युग का अंधेरा निहार के।”


अवनीश सिंह चौहान
ग्राम/पो.-चन्दपुरा (निहाल सिंह),
जनपद-इटावा (उ.प्र.)-206127
 मो.- 09456011560,
ई-मेल- abnishsinghchauhan@gmail.com

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 Avaneesh Singh Chauhan Ke Saath 
Shree Satyanarayan Kee Batcheet


6 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी ब्लॉग्गिंग में आपका स्वागत है !!

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  2. सत्यनारायण जी से वार्ता अच्छी लगी.. साथ में उनके कुछ गीत भी प्रस्तुत करते तो वार्ता और भी सार्थक और प्रासंगिक हो जाती ! शब्द पुष्टिकरण हटायें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी..

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  3. वार्ता अच्छी लगी ..ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है ..
    चलते -चलते पर जरुर पधारें

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  4. क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत किया है?


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  5. सत्यनारायण जी को दैनिक जागरण की पत्रिका में पढ़ा था. अब साक्षात्कार पढ़ रहीं हूँ. बड़ी साफगोई से सब-कुछ कह दिया है आपने. बधाई

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