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सोमवार, 30 मई 2011

चार नवगीत: कवि- मयंक श्रीवास्तव

मयंक श्रीवास्तव


एक साप्ताहिक पत्र के कुशल साहित्य संपादक के रूप में अपनी पहचान बनाने से पहले भी गीत-नवगीत साहित्य में जिस व्यक्ति का नाम ससम्मान दर्ज हो चुका था वह है मयंक श्रीवास्तव (मूल नाम सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव)। "इस शहर में आजकल / हर शख्स सन्नाटा बुने /बन्धु अपने पाँव से कुछ आहटें पैदा करो"- ये चर्चित पंक्तियाँ लिखने वाला और कोई नहीं- मयंक जी स्वयं हैं- एक ऐसा रचनाकार जो आज के कठियाये समय में भी आहटें- टकराहटें पैदा करने हेतु न केवल स्वयं प्रयासरत है बल्कि अपने साथियों-पाठकों का भी सस्नेह आवाहन कर रहा है। आपके गीत तो बोलते ही हैं, आपके गीत-संग्रह अपने शीर्षकों के माध्यम से भी बहुत कुछ कह देते हैं- 'सूरज दीप धरे' (गीत-संग्रह) उजाला और आनन्द का प्रतीक, 'सहमा हुआ घर' (गीत-संग्रह) घर-परिवार के रिश्तों-संबंधों का शब्द-चित्रण, 'इस शहर में आजकल' (गीत-संग्रह) शहरीकरण एवं वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों की सटीक व्यंजना, 'उंगलियाँ उठती रहें' (गीत-संग्रह) फिर वही आहट-टकराहट की बात इस पीड़ा के साथ- "वही महल है वही संतरी/ बंदे वही मिले/ राजा बदला मिला मगर/ कारिन्दे वही मिले''। साथ ही 'प्रेस मेन' का संपादन किया तो ऐसे जैसे 'धर्मयुग' को विस्तार दिया जा रहा हो; शायद तभी जो लोग 'धर्मयुग' में छप चुके थे उनको भी इस पत्र में छपना उतना ही सुखद और गौरवशाली लगा और जो लोग 'धर्मयुग' में छपने से रह गये थे उन्हें भी इसमें छपकर वैसा ही संतोष हुआ। ऐसा इसलिए भी हुआ क़ि मयंक श्रीवास्तव जी के पास साहित्यिक समझ तथा कार्य करने की क्षमता के साथ-साथ 'कोर्डिनेशन' का भी भरपूर अनुभव है। जन्म उ.प्र. के आगरा जिले की तहसील फिरोजाबाद (अब जिला) के छोटे से गाँव 'ऊंदनी' में 11 अप्रेल 1942 को हुआ। वर्ष 1960 से माध्यमिक शिक्षा मंडल, म.प्र. भोपाल में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए दिसंबर 1999 में सहायक सचिव के पद से सेवानिवृत्त। वरिष्ठ गीतकार के रूप में आपको महामहिम राज्यपाल द्वारा सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जा चुका है। म.प्र. लेखक संघ के 'हरिओम शरण चौबे गीतकार सम्मान', कला मंदिर द्वारा 'साहित्य प्रदीप' एवं अभिनव कला परिषद् द्वारा 'अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान' से भी आपको विभूषित किया जा चुका है। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन। संपर्क- 242 - सर्वधर्म कालोनी, सी सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल (म.प्र.)। मो: 09977121221. आपके चार नवगीत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
1. टकराहटें पैदा करो

इस शहर में आजकल
हर शख्स सन्नाटा बुने
बन्धु अपने पाँव से कुछ आहटें पैदा करो

हलचलों के स्त्रोत सारे
सूख कर पत्थर हुए
कल तलक जो बोलते थे
बंद सारे स्वर हुए

अब मुझे ये चुप्पियाँ
खामोशियाँ भाती नहीं
लोग चिल्लाने लगें, घबराहटें पैदा करो

हर गली बैठी हुई है
एक गूंगापन लिए
शोरगुल की चिट्ठियां
लाते नहीं हैं डाकिये

फिर नया तूफ़ान आए
फिर नयी आंधी चले
तुम विचारों में नयी टकराहटें पैदा करो

आँख में आँसू नहीं हैं
किन्तु चेहरा सुन्न है
राम जाने किस व्यथा से
अनमना मन खिन्न है

आदमी बेचैन होकर
ख़ुद लगे कुछ बोलने
तुम अकारण ही सही, झुंझलाहटें पैदा करो।

2. गाँव नंगा कर दिया है

गाँव नंगा कर दिया है
कारखानों ने
और खुशियाँ छीनकर
रखली सयानों ने

अब नहीं देता दिखाई
सुख नहर में है
पेट की खातिर हमें
जाना शहर में है

रख दिया है तोड़कर
बोझिल थकानों ने

अब खिली सरसों
नहीं मन बाँध पाती है
भूख चिमनी के धुंए को
सर नवाती है

झोपड़ों को खा लिया
पक्के मकानों ने

वक्त ऐसा रंग
हम पर छोड़ता जाता
आदमी ही आदमी को
तोड़ता जाता

रोंद डाला है चटाई
को मचानों ने।

3. हैं ऐसे हालात

हाथों में हर समय
नुकीला पत्थर लगता है
हमें आदमी की छाया से
भी डर लगता है

ऊब गया है मन
अलगावों की पीड़ा सहते
कुटिल इरादों को
मुट्ठी में बंद किए रहते

जीवन जंगल के भीतर का
तलघर लगता है

संबंधों का मोलभाव है
खींचातानी है
पहले वाला कहाँ रहा
आँखों में पानी है

रिश्तों वाला सेतु पुराना
जर्जर लगता है

लोग लगे हैं सोने
चाकू रख कर सिरहाने
कविता लिखने वाला
दुनियादारी क्या जाने

हैं ऐसे हालात कि जीना
दूभर लगता है।

4. इसकी चर्चा नहीं

इसकी चर्चा नहीं
तुम्हारी नयी कहानी में
यहाँ हजारों बार लुटी है
नदी जवानी में

चिड़िया बता रही है अपना
दुख रोते-रोते
करते हैं उत्पात शहर के
पढ़े हुए तोते

पगडंडी खो गई सड़क की
आना कानी में

चिमनी के बेरहम धुंए का
इतना अंकुश है
जंगल बनते हुए गाँव से
मौसम भी ख़ुश है

कोयल लगी हुई है
गिद्धों की मेहमानी में

जब अपने ऊपर मडराती
चील दिखाई दी
बूढ़ी इमली की अपराजित
चीख सुनाई दी

लोकधुनें कह रहीं नहीं सुख
रहा किसानी में।


Four Navgeet of Mayank Sreevastav
,,,

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. मयंक श्रीवास्तव जी के नवगीतों को पढ़ना अच्छा लगा.

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  3. mayank ji ko parh kar aisa laga jaise maujuda surate haal par inse batiya rahe hon.navgeet bhi aur dasha-disha bhi.badhai-prerak prastuti ke liye-lekhak,prakashak donon ko.shubhekshu,


    RAGHUNATH MISRA,KOTA

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  4. naugeet,kavitayen,kavyasandhya ki rapat arthat sabhi prasyutiyon mein bligger ki mehnat rang layee hai.yah tareef nahinn,tathyatmak bayan dil se nikalkar blog par aaya hai.bhai avnish h

    indi vangmay ko samriddh karne mein bari mehnat
    kar rahe hain.ve apne vyaktittva-kritittva se sahitya ki utkrist sewa mein leen hain.meri dua unki barhat mein har pal unke saath hai aur rahegi.hamen aise laadle saputon fakhra hona chahiye.barhe chalo-aasmanon se aage bhi unchaiyaan hain jinhe avnish jaise naunihalon ko hi tay karni hain.shubechhu,
    RAGHUNATH MISRA

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  5. mayank ji ke geet manas patal par gahra prabhav chhodte he.manoj jain madhur bhopal

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