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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

चार नवगीत: डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया

डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया

वरिष्ठ कवि डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया मानवीय मन एवं व्यवहार के विभिन्न आलम्बनों और आयामों को बड़ी बारीकी, निष्पक्षता और दार्शनिकता के साथ अपने गीतों में प्रस्तुत करते हैं। उनकी यह प्रस्तुति उनके जीवन के गहन चिन्तन, संवेदनात्मक मंथन और सामाजिक सांस्कृतिक संचेतना को मुखरित करती है। मंच पर उनकी वाणी में उत्साह एवं उमंग, उनके मन की गतिमान विविध तरंगों और रचनाओं के वातानुकूलित प्रसंगों को देख बरबस ही सबका मन मोह जाता है, और जब उनकी इस जीवन्त मेधा को पाठक लिपिबद्ध पाते हैं तो वे 'वाह'-'वाह' की अन्तर्ध्वनि से रोमान्चित हो जाते हैं। उनकी विषयवस्तु का दायरा बड़ा ही व्यापक है-चाहे गांव की माटी हो, खेतों की हरियाली, शहरों की कंकरीट, आसमान में उमड़ती-घुमड़ती घटायें हों या हों जीवन के आधुनिक संदर्भ-सब कुछ बड़ी ही सहजता से गीतायित हो जाता है, उनकी रचनाओं में। देखा जाय तो इस कवि का साहित्य जीवन के सतरंगी अनुभवों का अद्‌भुत गुलदस्ता है। साथ ही डॉ. भदौरिया के गीतों में कभी तो हृदय के टूटते तारों की संताप भरी कराह का मर्मस्पर्शी चित्रांकन दिखाई पड़ता है तो कभी परिलक्षित होती है फूल-पाती से बनी सावनी-सुकून भरी छांव, जिसके तले न केवल कवि स्वयं, बल्कि पाठक भी कुछ पल चैन से ठहर-बसर कर भाव विभोर हो जाते हैं और कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि मानों कवि एक कुशल किसान की भांति क्रांति के बीज बो रहा हो तथा समाज एवं राष्ट्र के विच्छिन्न होते सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, नैतिक और राजनैतिक ढांचे की ओर संकेत कर सोये हुये पतनोन्मुख मानवों को सजग कर रहा हो। जो भी हो कवि की प्रखर संवेदना एवं प्रोत्कंठ भावुकता पाठकों-श्रोताओं को आल्हादित एवं सचेत करने के साथ-साथ उन्हें नीतिपरक और खुशहाल समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में जुट जाने की प्रेरणा भी प्रदान करती है। १५ जुलाई १९२७ को जनपद रायबरेली (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव धन्नीपुर (लालगंज) में जन्मे डॉ शिव वहादुर सिंह भदौरिया हिंदी के स्थापित रचनाकार है। सन १९४८ से अब तक कविताई करने वाला यह नवगीतकार सदैव ऊर्जा एवं ताजगी से भरा रहा है। प्राचार्य के पद से १९८८ में सेवानिवृत होकर आप लालगंज में निवास करते हुए साहित्य साधना करने लगे। आप 'नवगीत दशक' तथा 'नवगीत अर्द्धशती' के नवगीतकार तथा अनेक चर्चित व प्रतिष्ठित समवेत कविता संकलनों में आपके गीत तथा कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। 'शिन्जनी' (गीत-संग्रह), 'पुरवा जो डोल गई' (कविता संग्रह), 'ध्रुव स्वामिनी (समीक्षा) ', 'नदी का बहना मुझमें हो' (नवगीत संग्रह), 'लो इतना जो गाया' (नवगीत संग्रह), 'माध्यम और भी' (मुक्तक, हाइकु संग्रह), 'गहरे पानी पैठ' (दोहा संग्रह) आदि आपके ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, भोपाल, गोहाटी, अहमदाबाद, लखनऊ आदि आकाशवाणी केन्द्रों तथा दिल्ली, लखनऊ आदि दूरदर्शन केन्द्रों से आपकी रचनाएँ प्रसारित की जा चुकी हैं । राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपको अनेको पुरस्कार-सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। संपर्क - ७७-साकेत नगर, लालगंज, रायबरेली (उ.प्र.)। संपर्कभाष- ०९४५००६०७२९ । नवगीत के इस महान शिल्पी के चार नवगीत हम आप तक पहुंचा रहे हैं:-



चित्रकार- आस्ट्रेलियाई कवि पैडी मार्टिन 

१. जीकर देख लिया

जीकर देख लिया
जीने में
कितना मरना पड़ता है

अपनी शर्तों पर जीने की
एक चाह सबमें रहती है
किन्तु ज़िन्दगी अनुबंधों के
अनचाहे आश्रय गहती है

क्या-क्या कहना
क्या-क्या सुनना
क्या-क्या करना पड़ता है

समझोतों की सुइयां मिलतीं
धन के धागे भी मिल जाते
संबंधों के फटे वस्त्र तो
सिलने को हैं सिल भी जाते

सीवन,
कौन कहाँ कब उधड़े
इतना डरना पड़ता है

मेरी कौन बिसात यहाँ तो
सन्यासी भी साँसत ढ़ोते
लाख अपरिग्रह के दर्पण हों
संग्रह के प्रतिबिंब संजोते

कुटिया में
कौपीन कमंडल
कुछ तो धरना पड़ता है

२. पक्के घर में कच्चे रिश्ते

पुरखा पथ से
पहिये रथ से
मोड़ रहा है गाँव

पूरे घर में
ईटें-पत्थर
धीरे-धीरे
छानी-छप्पर
छोड़ रहा है गाँव

ढीले होते
कसते-कसते
पक्के घर में
कच्चे रिश्ते
जोड़ रहा है गाँव

इससे उसको
उसको इससे
और न जाने
किसको किससे
तोड़ रहा है गाँव

गरमी हो बरखा
या जाड़ा
सबके आँगन
एक अखाड़ा
गोड़ रहा है गाँव

३. बदले सन्दर्भ 

लोकरीति की
पगरैतिन वह
अजिया की खमसार कहाँ है

हँसी ठहाके
बोल बतकही
सुन लेते थी
कही अनकही-
वही भेंट अँकवार कहाँ है

लौंग सुपारी
पानों वाली
ढ़ोल मंजीरे
गानों वाली
लय की लोक विहार कहाँ है

बाल खींचते
अल्हड़ नाती
पोपले मुँह
आशीष लुटाती
ममता की पुचकार कहाँ है

४. बैठ लें कुछ देर आओ

बैठ लें
कुछ देर, आओ
झील तट पत्थर-शिला पर

लहर कितना तोड़ती है
लहर कितना जोड़ती है

देख लें
कुछ देर, आओ
पाँव पानी में हिलाकर

मौन कितना तोड़ता है
मौन कितना जोड़ता है

तौल लें
औकात अपनी
दृष्टियों को फिर मिलाकर


Char Navgeet: Dr. Shivbahadur Singh Bhadauriya 

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाई अवनीश जी भदौरिया जी के गीत बहुत अच्छे हैं आपकी प्रस्तुति भी सराहनीय है |

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  2. वरिष्ठ कवि डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया के चारो नवगीत हृदयस्पर्शी हैं...
    बेहतरीन प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

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  3. जीकर देख लिया
    जीने में
    कितना मरना पड़ता है

    सुंदर वैचारिक चिंतन लिए है सभी रचनाएँ....

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