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मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

चार नवगीत : कवि- वीरेंद्र आस्तिक

वीरेंद्र आस्तिक 


वीरेंद्र आस्तिक बाल्यकाल से ही अन्वेषी, कल्पनाशील भावुक-चिन्तक एवं मिलनसार रहे हैं. कानपुर (उ.प्र.) जनपद के एक गाँव रूरवाहार में 15 जुलाई 1947 को जन्मना वीरेंद्र सिंह ने 1964 से 1974 तक भारतीय वायु  सेना में कार्य करने के बाद भारत संचार निगम लि. को अपनी सेवाएं दीं. काव्य-साधना के शुरुआती दिनों में आपकी रचनाएँ वीरेंद्र बाबू और वीरेंद्र ठाकुर के नामों से भी छपती रही हैं. अब तक आपके चार नवगीत संग्रह- परछाईं के पाँव, आनंद ! तेरी हार है, तारीख़ों के हस्ताक्षर, आकाश तो जीने नहीं देता- प्राकशित हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त काव्य समीक्षा के क्षेत्र में भी आप विगत दो दशकों से सक्रिय हैं जिसका सुगठित परिणाम है- धार पर हम (एक और दो) जैसे आपके द्वारा किये गये सम्पादन कार्य. आस्तिक जी के  गीत किसी एक काल खंड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें समयानुसार प्रवाह देखने को मिलता है. उनकी रचनाओं से गुजरने पर लगता है जैसे आज़ादी के बाद के भारत का इतिहास सामने रख दिया गया हो, साथ ही सुनाई पड़तीं हैं वे आहटें भी जो भविष्य के गर्त में छुपी हुईं हैं. इस द्रष्टि से उनके गीत भारतीय आम जन और मन को बड़ी साफगोई से प्रतिबिंबित करते हैं, जिसमें नए-नए बिम्बों की झलक भी है और अपने ढंग की सार्थक व्यंजना भी. और यह व्यंजना  जहां एक ओर लोकभाषा के सुन्दर शब्दों से अलंकृत है तो दूसरी ओर इसमें मिल जाते है विदेशी भाषाओं के कुछ चिर-परिचित शब्द भी. शब्दों का ऐसा विविध प्रयोग भावक को अतिरिक्त रस से भर देता है. संपर्क: एल-60, गंगा विहार, कानपुर-208010. संपर्कभाष: 09415474755. इस विशिष्ट रचनाकार के चार नवगीत आपके साथ साझा कर रहा हूँ:-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 
1. तबियत

जो अपनी तबियत को
बदल नहीं सकते
हम ऐसे शब्दों को
जीकर क्या करते

नये सूर्य को मिलते हैं
फूटे दर्पण
नये-नये पांवों को-
गड़े कील से
मन

ध्वस्त लकीरों के बाहर
आते डरते
हम ऐसे शब्दों को
जीकर क्या करते

कोल्हू से अर्थों में
बार-बार घूमे
बंधे-बंधे मिथकों से
खुलकर क्या झूमे

आत्म-मुग्ध होकर
अपने को ही छलते
हम ऐसे शब्दों को
जीकर क्या करते

कभी नए बिम्बों का
बादल तो बरसे
अपने हाथ बुनी नीड़ों का
मन तरसे

साहस मार-मार कर
लीकों पर चलते

2. सूरज लील लिए

हिरना
इस जंगल में
कब पूरी उम्र जिए

घास और पानी पर रहकर
सब तो, बाघों के मुंह से
निकल नहीं पाते
कस्तूरी पर वय चढ़ते ही
साये, आशीषों के
सर पर से उठ जाते

कस्तूरी के
माथे को
पढ़ते बहेलिए

इनके भी जो बूढ़े मुखिया होते
साथ बाघ के
छाया में पगुराते
कभी सींग पर बैठ
चिरैया गाती
या फिर मरीचिकाओं पर मुस्काते

जंगल ने
कितने
तपते सूरज लील लिए

3. सब के सब धूमिल

दर्पण
सब के सब धूमिल

औंधे मुंह सूरज के हांथों
क़त्ल हुई प्रतिभाएं
कोइ सूरत क्या देखे
सब बिम्बहीन गंगाएं

ताने हुए थे इन्द्रधनुष
बिखर गए कुहरिल-कुहरिल

न्यायों की मृगतृष्णा के
प्यासे
वादी, प्रतिवादी
बंदूकों की छाया में
ऊबे-ऊबे अपराधी

तथाकथित रामों की
गुहराएँ
आज के अजामिल

भीड़ों में रस्ते खोये
अनजानों में पहचानें
खुद की तलाश में
बार-बार
आतीं एक ठिकाने

पंथ-प्रदर्शक
मिलते हैं
जेबों में डाले मंजिल

4. होश में आए

नींद में हम
प्रार्थनाएं कर गए
होश में आए
ठगे-से रह गए

भाषणों में सार्थक
शब्द कुछ जोड़े नहीं
उठ पड़े कुछ प्रश्न तो
मौन थे ओढ़े वही

शून्य-शिखरों की
सभाएं कर गए
होश में आए
ठगे-से रह गए

मूर्तियों-से शब्द हैं
कौन खोले अर्थ को
कुछ तिलक कुछ पोथियाँ
रट रहीं हैं व्यर्थ को

सत्यनारायण
कथाएँ कर गए
होश में आए
ठगे-से रह गए

हम हिमालय पर चढ़े
हाथ खाली आ गए
तीर्थ निकले रेत के
साथ सब भटका गए

छाँइयों की परिक्रमाएँ-
कर गए
होश में आए
ठगे-से रह गए

********************

आपकी दृष्टि:


1. वर्तमान परिवेश की जितनी नोंक नुकनी त्रासद अभिशप्त व्यथाएं हैं वे कहीं न कहीं इनके गीतों में अक्स हैं. माधवधर्मी इस गीतनिष्ठां में कालबोध बाँसुरी-शंख सा थरथराता है. ये थरथराहटें , थरथराहटें न रहकर अंतर्मन की लय-ताल से जुड़ जाए, कवि का यही प्रयत्न है. - डॉ. सुरेश गौतम (दिल्ली)

2. वीरेंद्र  आस्तिक 'चुटकी भर चांदनी'  और 'चम्मच भर धूप' तक सीमित नहीं हैं. उनके कुछ गीतों में आज की त्रासद और भयावह स्थितियों से सीधी मुठभेड़ है. उनका मुहावरा जनगीत के बहुत निकट का है. आम आदमी के समानांतर समता, स्वतंत्रता, सामजिक न्याय आदि जनतांत्रिक मूल्यों के संकट में पड़ जाने की विडम्बना पर उनकी सीधी नजर है. यही वजह है कि उनका परिवेश-बोध जितना प्रासंगिक है, उतना ही उनका मूल्य-बोध विचारोत्तेजक और सार्थक है. सम्प्रेषण के स्तर पर उलझाव और जटिलता से परे रहकर सहज अभिव्यक्ति का प्रयास उनके गीतों को संवेद्य और ग्राह्य बनाता है. - डॉ. वेद प्रकाश 'अमिताभ' (अलीगढ़, उ.प्र.)

3. वीरेंद्र आस्तिक के कवि से हिन्दी संसार सुपरिचित है. उनकी रचनाओं में जहां रचनाकार के मानवीय और सामाजिक सरोकार अभिव्यंजित हैं वहीं जीवनराग और निसर्ग-प्रेम से उनकी रचनाएँ लबालब भरी हुईं हैं. भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस ऊसर भाव-भूमि पर आस्तिक के रचनाकार ने जीवन और जगतराग की जो सरिता बहाई है, उसके रस से मानवीय सृजन संसार रसमय रहेगा. - डॉ. विमल (वर्धमान, प.बं)

Char Navgeet: Kavi- Veerendra Astik
,,,

3 टिप्‍पणियां:

  1. वीरेंद्र आस्तिक जी की चारों ही रचनाएँ बहुत अच्छी हैं और अवनीश जी आपका चयन...आभार

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  2. नवगीत विधा में वीरेंद्र आस्तिक मील के पत्थर की भांति हैं...
    आपके द्वारा प्रस्तुत उनके ये सभी नवगीत बहुत सुन्दर और भावपूर्ण हैं।

    अबनीश जी, इस तरह आप नवगीत विधा की प्रशंसनीय सेवा कर रहे हैं।
    आपको हार्दिक बधाई।

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  3. वीरेंद्र आस्तिक जी के नवगीतों का रसास्वादन कराने के लिए आभार...

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