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सोमवार, 14 नवंबर 2011

यह सौदा मंजूर नहीं: कथाकार- दिनेश पालीवाल

दिनेश पालीवाल


३१ जनवरी १९४५ को जनपद इटावा (उ.प्र.) के ग्राम सरसई नावर में जन्मे दिनेश पालीवाल जी सेवानिवृत्ति के बाद इटावा में स्वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं। आप गहन मानवीय संवेदना के सुप्रिसिद्ध कथाकार हैं । आपकी ५०० से अधिक कहानियां, १५० से अधिक बालकथाएं, उपन्यास, सामाजिक व्यंग, आलेख आदि  प्रितिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। दुश्मन, दूसरा आदमी , पराए शहर में, भीतर का सच, ढलते सूरज का अँधेरा , अखंडित इन्द्रधनुष, गूंगे हाशिए, तोताचश्म, बिजूखा, कुछ बेमतलब लोग, बूढ़े वृक्ष का दर्द, यह भी सच है, दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की, रुका हुआ फैसला, एक अच्छी सी लड़की (सभी कहानी संग्रह) और जो हो रहा है, पत्थर प्रश्नों के बीच, सबसे खतरनाक आदमी, वे हम और वह, कमीना, हीरोइन की खोज, उसके साथ सफ़र, एक ख़त एक कहानी, बिखरा हुआ घोंसला (सभी उपन्यास) अभी तक आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। आपको कई सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। संपर्क: राधाकृष्ण भवन, चौगुर्जी, इटावा (उ.प्र.) संपर्कभाष: ०९४११२३८५५५। यहाँ पर आपकी एक कहानी दी जा रही है-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
यह सौदा मंजूर नहीं

युवा रचनाशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए अपने कॉलिज की मैग्जीन का कहानी विशेषांक निकालने की योजना बनाई। सर्वश्रेष्ठ कहानी को तीन हजार और अन्य कहानियों को एक-एक हजार के पुरस्कारों की घोषणा की।

निर्णायक मण्डल में महिला प्राध्यापिका से लेकर विज्ञान तक के प्राध्यापक रखे। शोध छात्र-छात्राओं को प्रथम चक्र में कहानियां पढ़कर दस सर्वश्रेष्ठ कहानियां चुनने की जिम्मेदारी दी जिससे युवा भावनाओं की भी सहभागिता हो जाए।

सर्वश्रेष्ठ कहानी ''कैक्टस और कांटे''। वनस्पति विज्ञान में एम.एस.सी. कर रही छात्रा की यह प्रेम और ममत्व से संबंधित कहानी थी।

कहानी में ममत्व की सूक्ष्म भावनाओं को प्रधानता दी गई थी। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां अधिक भावुक होती हैं। वे बुद्धि और विवेक से कम, भावनाओं से अधिक जीवन के अहं फैसले लेती हैं। कैक्टस के प्रतीक के रूप में बिंबित किया गया था। वह रेगिस्तानों में जीवन की विपरीत स्थितियों में भी हरा रहकर फल फूल जाता है।

महिला प्राध्यापिका को कहानी का भावना-पक्ष बहुत प्रबल लगा तो अंग्रेजी के प्रोफेसर सब्बरवाल को प्रेम और ममत्व का प्रतीक कैक्टस और उसका बिम्ब विधान बहुत पसन्द आया। विज्ञान के प्रध्यापक को कैक्टस का जीवन-विरोधी स्थितियों में फलना-फूलना भाया तो शोध छात्र-छात्राओं को कहानी में बेरोजगारी, अल्प वेतनभोगी वर्ग की हताशा और असहायता ने प्रभावित किया।

रसायन विज्ञान के शोध छात्र को स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त देह, प्रेम और मातृत्व की स्वभाविक कैमिस्ट्री रोचक लगी। मातृत्व को लेकर स्त्री-देह में होने वाली रासायनिक क्रियाओं का मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी न करने की युवा पीढ़ी की मानसिक दृढ़ता ने बेहद प्रभावित किया।

लेखिका ने कहानी टीवी के एक विज्ञापन से शुरू की थी- ''सपने वे नहीं होते जो नींद में आते हैं, सपने वे होते हैं जो नींद उड़ाते हैं।''

बड़ी बहन सुमति एक प्रसिद्ध प्राइवेट अस्पताल में पैथालॉजी टैक्नीशियन थी। सुमति सुबह आठ से लेकर शाम आठ बजे तक अस्पताल में ड्‌यूटी देती थी। बारह घण्टे की जानमारू ड्‌यूटी के बाद उसे तनखा के रूप में कुल छः हजार रूपये मिलते थे। पेईंग-गेस्ट के रूप में उसे तीन हजार रूपये रहने-खाने के देने पड़ते थे। सुबह रोज आलू की सूखी सब्जी और परांठे टिफिन में संग लाती थी। शाम का खाना कमरे में वापस आने पर ही खा पाती थी। उसका यह रोज का बेहद उबाऊ रूटीन था। जिससे वह मुक्ति के लिए बहुत छटपटाती थी।

सुमति के पिता की मृत्यु हार्ट अटैक से हो गई थी। बड़ी बहन होने के नाते परिवार की जिम्मेदारियाँ उसे भी उठानी पड़ रही थीं। अपनी तनखा से दो हजार रूपये महीने अपनी माँ को छोटे भाई बहनों के लिए भेजने पड़ते थे।

माँ हर बार फोन पर सुमति से दबाव डाल रही थी कि अपनी छोटी बहन को भी अपने संग उस महानगर में रखे और आगे उपयुक्त कोर्स करवाए जिससे उसकी भी नौकरी लग जाए।

'छोटी' ने सुमति से एकबार हँसकर पूछा था- दीदी उस बड़े शहर में जहाँ तुम काम करती हो, तमाम डाक्टर, नर्स, लैब टैक्नीशियन, मरीजों के सम्पन्न और सुंदर तीमारदार सम्पर्क में आते होंगे, तुम्हारी खूबसूरती पर उनमें क्या कोई अब तक नहीं रीझा या तुम्हें ही उनमें कोई अपने लिए पसंद नहीं आया?

सुमति ने छोटी को झटक दिया था- ''मैं वहाँ नौकरी करती हूँ या इश्क-विश्क करती डोल रही हूँ? आजकल लोग छूंछा प्रेम-वेम नहीं करते। बहुत सोच-समझकर, नफा-नुकसान का मीजान बैठाकर प्रेम का ढोंग अपना मतलब साधने के लिए करते हैं। आज की जिंदगी में भावनाओं की नहीं, पैसे की कद्र है। वह है तो सब है, नहीं तो कुछ नहीं।''

डॉक्टर सूद ने सुमति को बुला एक सज्जन से मिलाया- ''ये हैं मिस्टर दयाल। इनकी वाइफ अस्पताल तक आने की स्थिति में नहीं हैं। इनके साथ जाकर उनका ब्लड सैंपल ले आओ। उन्हें यूरेटस कैंसर था। हमने यूरेटस निकाल दिया। बच्चा नहीं हो सकता इसलिए डिप्रेशनग्रस्त हो गई हैं। ये वापस तुम्हें यहीं अपनी गाड़ी से छोड जाएंगे।''

सुमति कार में मिस्टर दयाल के साथ जा रही थी। रास्ते में उन्होंने सुमति के परिवार के बारे में पूछा। उसने जो सच था, बता दिया। पर वह सोचती भी रही कि आखिर ये महाशय उसके बारे में व्यक्तिगत रुचि क्यों ले रहे हैं? दयाल ने अपने बारे में बताया- ''हमारे पास सब कुछ है, अच्छा बिजनेस, निजी बढ़िया फ्लैट, सुंदर और बड़े घर की बीवी पर बिना बच्चे के सब बेकार! अपने रीतेपन और व्यर्थता के बोझ ने वाइफ को बेहद हताश कर दिया है, डिप्रेशनग्रस्त है। मैं अपने आप को बहुत लाचार पा रहा हूँ। किसी रिश्तेदार का बच्चा गोद नहीं लेना चाहते। कल को वह या उसके माँ-बाप हमारे पैसे पर दाँत गड़ाने लगेंगे। अनाथाश्रम से बच्चा पत्नी लेने को राजी नहीं है। सरोगेट मदर बनने के लिए तैयार किसी युवती से अपना बच्चा पा सकते हैं। सरोगेट मदरहुड के लिए मेरी पत्नी तैयार हो गई है। कहती है, किसी सुशील अविवाहित स्त्री से वह अपने लिए बच्चा चाहेंगी।''

सन्नाटे में आ गई सुमति। ... तो डॉ सूद ने मिस्टर दयाल के साथ ब्लड सैम्पल लेने के बहाने इसी बात के लिए उसे भेजा है? अस्पताल में वह सबसे स्वस्थ और आकर्षक है। अपने हालात की मारी हुई, गरीब और गर्जमन्द। इस कारण वैसे भी अस्पताल स्टाफ के तमाम लोग उसके आस-पास मंडराते रहते हैं पर वह सबको हँसकर टालती रहती है।

मि. दयाल ने उसकी हिचक दूर करने के लिए कहा- ''आप तो अपने अस्पताल में सब देखती और जानती हैं। परखनली-विधि से बिना सम्बंध बनाये भी आप मेरे बच्चे की माँ बन सकती हैं। यह मेहरबानी करेंगी तो मेरी पत्नी जी जाएगी। असल में पत्नी का मुझ पर बहुत एहसान है। बिजनेस मुझे उसी के पिता से मिला है। बदले में आप चाहेंगी तो आपको एक फ्लैट और जीवन भर की सारी सुविधाएं देने को तैयार हूँ। आपको यह जानमारू
नौकरी की भी जरूरत नहीं रहेगी।''

''बच्चे से माँ का आत्मिक सम्बंध बन जाता है मि. दयाल। औरत को आप पुरुष लोग क्या केवल बेजान कठपुतली या मशीन समझते हैं? एक जिंदा औरत अपनी कोख में पल रहे जीते-जागते बच्चे से मन और आत्मा से जुड़ जाएगी। उसकी मातृत्व की भावना का क्या होगा?''

''इस सबसे हम कहाँ इन्कार करते हैं सुमति जी? नौकरी छोड़ कर ठाठ से फ्लैट में रहना। आपकी सारी जिम्मेदारियाँ हमारी। हम कभी-कभार उस बच्चे को आपके पास लिवा लाया करेंगे। आप उसे माँ की तरह प्यार भी कर लिया करेंगी। ...इस बहाने हमें भी आपका संग-साथ और सुख मिल जाया करेगा।''

सारी रात नींद नहीं आई सुमति को। नींद और सपने दोनों उड़ गए। सहेली को मन की कशमकश बताई तो वह बोली- ''क्या फर्क पड़ता है यार! पैसे वाला मूंजी है, ऐसा मौका चूकना मूर्खता है। जिंदगी भर ऐश करेगी।'' रात को ही छोटी का फोन लगाया। सारी स्थिति विस्तार से बताई। अपनी भावनाओं से भी उसे अवगत कराया। छोटी ने भी यही कहा- ''मूंजी फंसा है तो मौका हाथ से मत जाने दो।'' जब सुमति ने माँ से पूछकर उनकी राय लेने को कहा तो छोटी ने बताया- माँ सुनकर चुप रह गई हैं। उन्होंने न हाँ की है, न ना, पर उनकी आँखों की चमक सब कह रही हैं।

मिस्टर दयाल सुमति से सुबह अस्पताल में मिलने आए तो वह उनके सामने कुछ देर चुप बैठी रही। फिर किसी तरह बोली, ''नहीं, मि. दयाल! आपका यह आफर मुझे स्वीकार नहीं है। मुझे आपकी दया की दरकार नहीं है। अपनी देह, ममता और मातृत्व का यह सौदा नहीं कर सकती मैं। उत्पादक मशीन नहीं होती औरत। वह एक जीवित और हाड़मास की बनी हुई भावनाओं की भी पुंज होती है। मुझे क्षमा करें मि. दयाल।''

Yah Sauda Manjoor Naheen: Kathakar- Diesh Paliwal

1 टिप्पणी:

  1. भावनात्मक कहानी है बहुत ... भावनाओं और जीवन की खुशियों में कौन जीतेगा असली कशमकश तो तब पता चलगी जब ये एक आम बात हो जायेगी ... बहुत अच्छा लगा इसको पढके ...

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