पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

पाँच कविताएँ: कवि- कुमार मुकुल

 कुमार मुकुल

कविप्रवर कुमार मुकुल जी से मेरी पहली मुलाक़ात बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में हुई थी। वरिष्ठ रचनाकार आदरणीय अनिल जनविजय जी के साथ । ५ अगस्त २०११ को। वही पर सबसे पहले मुकुल जी ने अपनी कवितायें- 'ग्यारह सितम्बर', 'अंतरिक्ष में विचार', 'प्रेम के बारे में'  सुनाईं थी । अनिल जी ने जब मेरा उनसे परिचय कराया तब कहा भी था कि मुकुल जी बहुत अच्छे कवि हैं; रचनाएँ सुनकर यह बात प्रमाणित भी हो गई।  जब हम लोग जयपुर पहुंचे तब प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह से पहले वाली रात में वरिष्ठ कवि आदरणीय नरेश सक्सेना जी, पूनम तुषामाड़ और मैं पुनः श्रोता बने मुकुल जी के। जब मुकुल जी ने अपनी 'आज' कविता सुनाई तो सक्सेना जी ने कहा कि इस कविता के कथ्य में ताज़गी है; अति सुन्दर; ऐसे ही लिखते रहियेगा। यह सब सुनकर मुझे भी अच्छा लगा। आज कई महीनों बाद मुकुल जी का कविता संग्रह पढ़ रहा था तब मन हुआ कि अपने पाठकों से इस विशिष्ट कवि की रचनाओं को साझा किया जाय। मुकुल जी का जन्म हुआ १९६५ में आरा, भोजपुर (बिहार) के संदेश थाने के तीर्थकौल गांव में। शिक्षा: एम.ए. (राजनीति विज्ञान) । १९८९ में अमान वूमेन्स कालेज फुलवारी शरीफ पटना में अध्यापन से आरंभ कर १९९४ के बाद अब तक दर्जन भर पत्र-पत्रिकाओं- अमर उजाला, पाटलिपुत्र टाइम्स, प्रभात खबर आदि में संवाददाता, उपसंपादक और संपादकीय प्रभारी व फीचर संपादक के रूप में कार्य। आपकी कुछ प्रमुख कृतियाँ: समुद्र के आंसू (1987), सभ्‍यता और जीवन (1989), परिदृश्य के भीतर (2000), ग्यारह सितंबर और अन्य कविताएं (2006)। कविता की आलोचना पर 'कविता का नीलम आकाश' नाम से एक किताब प्रकाश्‍य। देश की तमाम हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा और आलेखों का नियमित प्रकाशन। संपादन: 'संप्रति पथ' नामक साहित्यिक पत्रिका का दो सालों तक संपादन। वर्तमान में 'मनोवेद' त्रैमासिक पत्रिका के कार्यकारी संपादक। मोबा. 09213143392 । ई-मेल- kumarmukul07@gmail.com। आपकी पाँच कविताएँ यहाँ प्रस्तुत हैं:-

यह चित्र गूगल से साभार 

१. आज 

अशोक राजपथ, सिकंदर लेन
शाहजहाँ पथ 
कभी मुल्क होता था 
जिन सम्राटों- शहंशाहों के नाम 
आज
जोगा रहे हैं वो
एक-एक सड़क ...

२. ख़ुशी

दृश्यों के विस्तार में 
सिमटी रहती है
सपाट जल-तल के नीचे
बस एक कंकड़ी
और किल्लोल लहरों का 
छू लेता है तट 
फिर 
वही एकालाप
लम्बा-सफ़ेद-स्याह ...

३. लोकायत

शरीर
तू है
तो आत्मा की
जय जय है

जो तू न हो तो
कोई कैसे कह सकता है
कि आत्मा
क्या शै है ...

४. हर चलती चीज

चेक करता हूं
तो मेल में
एक शिखंडी [ एन्‍वयमस ] मैसेज मिलता है -
कानून के हाथ लंबे होते हैं ...
अब क्‍या करेंगे आप ...

क्‍या करूंगा मैं
भला क्‍या कर सकता है एक रचनाकार
उजबुजाकर जूते फेंकने के सिवा

हां जूता तो फेंक ही सकता है वह
अब वह निशाने पर लगे या नहीं लगे
पर जब वह चल जाता है
तो खुद को बचा ले जाने की
सारी कवायदों के बावजूद
दुनिया के इकलौते कानूनाधिपति का चेहरा
गायब हो जाता है
और जूता चला जाता है
डॉलर में बदलता हुआ

इस पूंजीप्रसूत तंत्र की
यही तो खासियत है
कि हर चलती चीज
यहां डॉलर में बदल जाती है

अब कानून के हाथ
कितने भी लंबे हो
पर जीवन बेहाथ चलता है
बेहाथ चलता है जीवन ...

५. जो हलाल नहीं होता

मेरे सामने बैठा
मोटे कद का नाटा आदमी
एक लोकतांत्रिक अखबार का
रघुवंशी संपादक है

पहले यह समाजवादी था
पर सोवियत संघ के पतन के बाद
आम आदमी का दुख
इससे देखा नहीं गया
और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में
इसका नाम आने से रह गया है
यह खुशी इसे और मोटा कर देगी
इसी चिंता में
परेशान है यह
क्‍योंकि बढ़ता वजन इसे
फिल्‍मी हीरोइनों की तरह
हलकान करता है
और टेबल पर रखे शीशे में देखता
बराबर वह
अपनी मांग संवारता दिखता है

राज्‍य के संपादकों में
सबसे समझदार है यह
क्‍योंकि वही है
जो अक्‍सर अपना संपादकीय खुद लिखता है
मतलब
बाकी सब अंधे हैं
जिनमें वह
राजा होने की
कोशिश करता है

राजा,
इसीलिए
गौर से देखेंगे
तो वह शेर की तरह
चेहरे से मुस्‍कुराता दिखता है
पर भीतर से
गुर्राता रहता है

पहले
उसके नाम में
शेर के दो पर्यायवाची थे
समाजवाद के दौर में
एक मुखर पर्यायवाची को
इसने शहीद कर दिया
पर जबसे वह मानवधतावादी हुआ है
शहीद की आत्‍मा
पुनर्जन्‍म के लिए
कुलबुलाने लगी है
जिसकी शांति के लिए उसने
अपने गोत्र के
शेर के दो पर्याय वाले मातहत को
अपना सहयोगी बना लिया है

यह अखबार
इसका साम्राज्‍य है
जिसमें एक मीठे पानी का झरना है
इसमें इसके नागरिकों का पानी पीना मना है
गर कोई मेमना
(यहां का हर नागरिक मेमना है)
झरने से पानी पीने की हिमाकत करता है
तो मुहाने पर बैठे शेर की आंखों में
उसके पूर्वजों का खून उतर आता है
और मेमना अक्‍सर हलाल हो जाता है
जो हलाल नहीं हुआ
समझो, वह दलाल हो जाता है

दलाल
कई हैं इस दफ्तर में
जिनकी कुर्सी
आगे से कुछ झुकी होती है
जिस पर दलाल
बैठा तो सीधा नज़र आता है
पर वस्‍तुत: वह
टिका होता है
ज़रा सी असावधानी
और दलाल
कुर्सी से नीचे...

Five Hindi Poems of Kumar Mukul

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरे सामने बैठा
    मोटे कद का नाटा आदमी
    एक लोकतांत्रिक अखबार का
    रघुवंशी संपादक है

    पहले यह समाजवादी था
    पर सोवियत संघ के पतन के बाद
    आम आदमी का दुख
    इससे देखा नहीं गया
    और यह मनुष्‍यतावादी हो गया

    बेहतरीन प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. शरीर
    तू है
    तो आत्मा की
    जय जय है

    जो तू न हो तो
    कोई कैसे कह सकता है
    कि आत्मा
    क्या शै है ...

    सच है आत्मा का अस्तित्व शरीर से ही है ... पूरक हैं दोनों इक दूजे के ...
    सभी कवितायें बहुत ही प्रभावी ... सामाजिक सरोकार लिए ... शुक्रिया इस परिचय का ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. मुकुल जी का परिचय और उनकी कवितायेँ पढ़कर आनंद की अनुभूति हुई... इस प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय मुकुल जी से अपने मित्र बिनोद भाई के साथ गणेश नगर में पहली बार मिला था | उनकी रचनाएं मेरे लिए प्रेरणाश्रोत रहीं हैं | मैं जब भी किसी रचना में दुविधा में पड़ता हूँ, मुकुल जी का ब्लॉग पढने लगता हूँ और असीम उर्जा से भर जाता हूँ | यहाँ पूर्वाभास में प्रस्तुत पाँचों कवितायें बेहतरीन हैं | कितना ज्वलंत सच है कि:
    इस पूंजीप्रसूत तंत्र की
    यही तो खासियत है
    कि हर चलती चीज
    यहां डॉलर में बदल जाती है

    हमसे ये बाँटने के लिए आभार
    सुशील

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर व अर्थपूर्ण कविताएँ ..... बधाई !
    आभार

    उत्तर देंहटाएं

  7. Mein
    dekhta hoon
    aakash mein
    chamakte
    asankhye, an-ginat sitaare
    apnee hee
    tim-timahat mein magan
    maano
    kaali chadar per
    moti jade hon

    tab
    mein
    tumhaari taraf
    ghoomta hoon,
    teri aankhon mein
    jhankta hoon
    aur
    soch mein
    pad jaata hoon
    ki 'US-NE'
    kis parkar
    is sab kaa
    saman-vay
    kiya hoga.....

    ek jodi aankh
    aur
    asankhye
    tim-timaate
    sitaare

    mein
    fir ghoomta hoon,
    aashcharya ke
    saagar mein
    doob jaata hoon
    aur sochta hoon
    ki
    'WOH'
    jise hum
    sarav kalaa sampooran
    sarav-gun sampann
    maante hain
    jis-ne apni srishtee ko
    sunder banaane ke liye
    aakash mein
    asankheye
    jag-magaate
    sitaaron ki
    rachnaa kee

    kis parkaar....kyun...
    itnee badi
    bhool 'WOH'
    kar baitha
    aur

    tumhaari
    aankho mein
    jyoti daalnee
    bhool gaya
    aur tumhen
    andhaa banaa diya

    anarth....ghor anarth

    mein
    fir ghoomta hoon
    aur apne antarman mein
    jhaankta hoon
    sochta hoon
    is
    vi-sangatee ke prati
    kya hum
    kuch naheen........
    kuch bhee naheen....
    kar sakte....


    yeh shareer to
    nashwar hai
    naa sahee abhee
    marno-praant to
    netra (aankhein) daan kar

    ek naheen
    do andhon ko
    jyoti pradaan kar
    'US-KI' bhool ka
    sudhaar kar sakte hain

    aao
    netra daan ka
    sankalp lein

    उत्तर देंहटाएं

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