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शनिवार, 8 सितंबर 2012

पुस्तक-परिचर्चा: 'नवगीत के नये प्रतिमान'

डा. राजेन्द्र गौतम

०६ सितम्बर १९५२ को बराह कलां, जींद, हरियाणा में जन्मे  डॉ० राजेन्द्र गौतम हिंदी साहित्य के स्थापित रचनाकार है। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कालेज में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ. गौतम जी की लगभग डेढ़ दर्जन प्रकाशित कृतियाँ हैं वर्तमान में आप हिन्दी नवगीत के उन्नयन, विकास और पुनर्स्थापना हेतु कृतसंकल्प एवं समर्पित हैं।  "बरगद जलते हैं” १९९८ में तथा “गीतपर्व आया है” १९८४ में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कविता-पुस्तक के रूप में पुरस्कृत। संपर्क- बी-२२६, राजनगर-०१, पालम, नई दिल्ली- ११००७७; ई-मेल:  e-mail: rajendragautam99@yahoo.com। आपका यहाँ एक आलेख प्रस्तुत कर रहा हूँ। पाठकों को यह आलेख पक्षपातपूर्ण लग सकता है, किन्तु व्यक्तिगत विचारों का भी स्वागत होना ही चाहिए :- 


समीक्षित पुस्तक:  नवगीत के नये प्रतिमान
सम्पादक:  राधेश्याम बंधु   
कोणार्क प्रकाशन, नई दिल्ली 
मूल्य: 500/-
नवगीत की आलोचना की दयनीय स्थिति जग जाहिर है। उसका परिणाम यह हुआ है कि कभी अप्रामाणिक सम्पादित नवगीत-संग्रह प्रकाशित होते हैं और कभी उसकी हास्यास्पद आलोचना सामने आती है। हाल ही में ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ शीर्षक से श्री राधेश्याम बंधु के सम्पादन में एक अत्यंत विवादास्पद पुस्तक प्रकाशित हुई है लेकिन इसके इस प्रसार में संग्रहीत रचनाकारों का कोई योगदान नहीं है। यह कार्य तो स्वयं सम्पादक का है। इसमें पहला विवाद तो एक सम्पादित पुस्तक को स्वलिखित पुस्तक दिखलाने को लेकर है। कभी प्रो. नामवर सिंह ने कविता के नए प्रतिमान निर्धारित किए थे। उससे पहले श्री लक्ष्मीकांत वर्मा ने नयी कविता के प्रतिमान प्रस्तुत किए थे। पर इन दिग्गजों के मन में यह तथ्य स्पष्ट था कि प्रतिमान निर्धारित करने के लिए विधा विशेष का तथ्यात्मक ज्ञान और इतिहास-बोध का ज्ञान बहुत जरूरी है। बंधु जी ने नवगीत के तथ्यात्मक ज्ञान और इतिहास-बोध के ज्ञान के बिना ही प्रतिमान निर्धारित करने का खोखला दावा किया है। तथ्यों का मनमाने ढंग से किया गया मूर्तिभंजन हैरान कर देने वाला है। बहुत कम ऐसी पुस्तकें देखने में आएंगी जिनमें तथ्य इतनी सम्बन्धी भूलें हों। कोढ़ में खाज यह कि अज्ञानतावश हुई भूलों में के साथ-साथ आत्मप्रतिष्ठा के लिए संग्रहीत लेखकों की रचनाओं में किए गए अनधिकार प्रक्षेपणों नें पुस्तक को पूरी तरह अविश्वसनीय बना दिया है जबकि सम्पादक को पूरे नवगीत समाज का सहयोग मिला है, अंततः सभी का विश्वास आहत हुआ है। इसमें डेढ सौ से अधिक आलोचक और कवि जुटाए गए हैं। दो सौ आठ गीत संकलित किए गए हैं। ठीक एक दर्जन आलोचनात्मक लेख भी हैं। इसमें आलोचक-अष्टक से परिचर्चा की गई है और इन सब के अतिरिक्त बंधु जी के अपने प्रतिमान-निर्धारक वे लेख हैं जिनके बूते पर वे सम्पादक के रूप में नहीं बल्कि पुस्तक-लेखक के रूप में स्वयं को दिखाना चाहते हैं।

पहले हम गीत अनुभाग पर चर्चा करते हैं। पुस्तक में गीत तीन खंडों में संकलित किए गए हैं। पहला खंड स्वर्गीय गीतकारों का है, दूसरा प्रमुख समकालीन गीतकारों का और तीसरा गौण गीतकारों का। क्या इस अशोभनीय स्थिति का कोई उत्तर सम्पादक के पास है कि स्वर्गीय गीतकारों वाले खंड में केदारनाथ सिंह क्यों डाल दिए गए हैं? सम्पादक सभी संकलित गीतों के साथ रचना-तिथि दी है और इन सब गीतों को सन् 2000 के बाद का और ज्यादातर को उनकी 2004 में पिछली सम्पादित पुस्तक के बाद का बताया है जबकि एक नज़र डालते ही उनके इस दावे की कलई खुल जाती है। इस पहेली में भी एक रहस्य छिपा है। रोचक यह है कि गीतकारों ने बंधु जी को स्वयं अपने गीतों की रचनातिथि लिख कर भेजी ही नहीं थी। गीतों की रचनातिथि पर संदेह होने के कारण जब मैंने गीतकारों से बात की तब इस तथ्य का पता चला। स्पष्ट है कि सारा ‘डेटांकन कार्य बंधु जी ने नवगीत के अपने ज्ञान के आधार पर किया है। उनके एक गीत-संग्रह का 2007 में लोकार्पण हुआ था। उसमें उन्होंने अपना वर्षों पहले लिखा गीत ‘कोलाहल और कविता पढा’ था। सम्पादक अपने गीत का ही रचनाकाल भूल गए और इस पुस्तक में उसे 2010 का बताते हैं। सौभाग्य से या दुर्भाग्य से मैंने अधिकांश नवगीत संकलनों को पढ़ा है। मैंने पाया कि इस पुस्तक के पचासों गीत ऐसे हैं जो बहुत पुराने हैं। उदाहरण के लिए विनोद श्रीवास्तव का गीत ‘आज नदी में पाँव डुबोते’ उनके 1987 में प्रकाशित संकलन भीड़ में बाँसुरी से लिया गया हैं। उसे यहाँ 2008 में रचित बताया गया है। बुद्धिनाथ मिश्र ने अपने संकलन ‘शिखरिणी’ की पांडुलिपि प्रकाशन से पूर्व 2000 में मुझे भिजवाई थी। उसका प्रकाशन 2001 में हुआ था. इस पुस्तक के दोनों गीत इसी संकलन के हैं और उन्हें 2010 और 2011 का बताया गया है। ब्रजेश भट्ट का एक बहुत पुराना गीत उनके 2001 में प्रकाशित संकलन ‘नाव में नदी में’ है। प्रतिमान निर्धारित करते हुए उसका भी अद्यतनीकरण हो गया है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ है। कारण बारीकी से खोजा जा सकता है। इस पूरी पुस्तक में एक ध्वनि पैदा करने का प्रयास है कि बंधु जी द्वारा 2004 में सम्पादित पुस्तक ने नवगीत में एक क्रांति पैदा कर दी थी और उसके प्रकाशन से नवगीत में सब कुछ बदल गया था। इसलिए किसी भी गीत को उस पुस्तक से पहले का तो बताना ही नहीं था। कहने की जरूरत नहीं हैं कि पिछली सदी में लिखे मेरे अपने गीतों का रचनाकाल भी मेरे द्वारा नहीं बंधु जी द्वारा निर्धारित किया गया जबकि 2004 में सम्पादित उस पुस्तक की निस्सारता से गीत के आलोचक अवगत हैं। इस संकलन के अनेक गीत पूर्वप्रकाशित हैं और नवगीत का सजग पाठक पहचान सकते हैं कि सम्पादक ने कितने खराब तरीके से उनमें परिवर्तन किए हैं। किसी का सिर गायब है तो किसी का धड़! कहीं परिवर्तन से छंद टूटा है तो कहीं अर्थ विसंगत हुआ है। 

हास्यास्पद से अधिक यह दुखद है कि नवगीत के नये प्रतिमान निर्धारित करने का दावा करने वाली पुस्तक में कम से कम 20 संकलनों के नाम ग़लत दिए गए हैं? यहां गीतों को कवियों के आयुक्रम से रखा गया है। विडम्बना यह है कि अनेक कवियों की जन्म तिथियाँ ही ग़लत दी गई है तो कई कवियों के नाम ग़लत हैं। माहेश्वर तिवारी कोई ऐसे-वैसे गीतकार तो हैं नहीं कि आप को उनकी आयु का अंदाजा न हो। आप उन्हें 1949 में पैदा हुआ बताते हैं। इसे प्रैस की भूल इस लिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि क्रम में भी आपने उनकों वहीं रखा है। इस तरह अनेक कवि भ्रमित इतिहास-बोध के शिकार हुए हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो यह देख कर हुआ कि बंधु जी चले तो हैं नवगीत के नये प्रतिमान निर्धारित करने पर उनको यह तक नहीं पता है कि कौन-सी पुस्तक गीत संग्रह है और कौन-सी नहीं। वे मेरी 1984 में प्रकाशित आलोचना-पुस्तक ‘हिंदी नवगीत: उद्भव और विकास’ को गीत-संग्रह बताते हैं, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र का दोहा-संग्रह भी उनके लिए गीत-स्रग्रह है और रामबाबू रस्तोगी का खंडकाव्य भी गीत संग्रह है। सम्पादक ने यह विधान्तरण और संग्रहों का भी किया है। स्थापित और विस्थापित नवगीतकारों के वर्ग विभाजन के तार्किक आधार की चर्चा का तो यहाँ कोई अर्थ ही नहीं है। ‘नवगीत दशक जैसे ऐतिहासिक संकलन के कुछ गीतकारों को गौण गीतकारों वाले खंड में डाला है जबकि मुख्य खंड में कई ऐसे गीतकार डाल दिए गए हैं, जिनका नगण्य योगदान है।

पुस्तक का आलोचना-खंड बेहतर हो सकता था क्योंकि कई लेखकों ने अपने अच्छे लेख दिए थे लेकिन अधिकांश में सम्पादक ने अनधिकृत हस्तक्षेप कर उन्हें विकृत कर दिया। कुछ में अज्ञानता ने धावा बोला और कुछ में आत्मप्रतिष्ठा के मोह में इतिहास को विकृत कर दिया गया। नवगीत के प्रतिमान-निर्धारक से यह तो अपेक्षा की ही जाती है कि उसे वीरेन्द्र मिश्र और महेश अनघ के गीत का अंतर मालूम हो तथा उसे सुधांशु उपाध्याय और रामकिशोर दहिया के गीतों की अलग पहचान हो। यदि इस सम्पादक को यह ज्ञान होता तो मेरे लेख के साथ यह भयंकर खिलवाड़ न होती कि मूल लेख ले हट कर किसी का गीत किसी के नाम और किसी का किसी के नाम डाल दिया जाता। मैंने अपने लेख को एक ऐतिहासिक बिंदु से जोड़ा है और उसमें केवल 1990 या उसके बाद के संकलनों का उल्लेख किया है। आपने अनधिकृत हस्तक्षेप करते हुए अपनी 1990 से पहले की पुस्तकों को उसमें घुसा दिया है। इससे पाठक के सामने निबंध-लेखक का इतिहास-बोध ही प्रश्नों से घिर जाता है। बिल्कुल यही स्थिति डा. सुरेश उजाला के तथा अन्य लेखकों के लेखों के साथ हुई है। यहाँ तक कि परिचर्चा परिभाग भी इसी हस्तक्षेप का संदेह पैदा करता है। इसमें डा. नामवर सिंह, डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, डा. नित्यानंद तिवारी आदि से बातचीत का दावा किया गया है। पर परिचर्चा में मूल मुद्दों का जिक्र तक न होना उन्हें संदेहास्पद बनाता है। डा. मैनेजर पाण्डेय, डा. मुरली मनोहरप्रसाद और श्री रामकुमार कृषक को छोड़ कर सारी परिचर्चाएँ नवगीत की अपेक्षा बंधुजी की युगबोध वाली पुस्तक पर केन्द्रित हो जाती हैं। तब एक रोचक स्थिति सामने आती है। यदि इतने दिग्गज आलोचक नवगीत को उसी पुस्तक तक रिड्यूस करके देख रहे हैं तो उनकी विश्वसनीयता क्या है? तब उनके द्वारा नवगीत के मूल्यांकन की संभावना भी खत्म जाती है और यदि ऐसा उनका कहना नहीं है तो वर्तमान पुस्तक की विश्वसनीयता क्या है। एक रोचक तथ्य यह है कि डा. विश्वनाथ त्रिपाठी से की गई परिचर्चा में भी और डा. मैनेजर पाण्डेय से की गई परिचर्चा में भी निराला के उत्तरवर्ती यथार्थवादी गीतों का जिक्र आया है। यहां इन गीतों को साठ के बाद का दिखाया गया है। इन दोनों विद्वानों के ज्ञान को प्रश्नांकित नहीं किया जा सकता। वे तो जानते हैं कि निराला ने ऐसे गीत 1949-50-51-52 में लिखे थे, जो अर्चना, आराधना और सांध्यकाकली में आए। उनके साठ के बाद के गीतों की संख्या तो बहुत कम है। निश्चय ही यहां सम्पादकीय अज्ञान के हस्तक्षेप ने दोनो विद्वानों से यह कहलवाया है।

अब रही बात सौ पृष्ठीय उस सम्पादकीय की जिसमें बंधु जी ने नवगीत के नये प्रतिमान निर्धारित करने का प्रयास किया है। नये प्रतिमान तो पूर्व प्रतिमानों की अभिज्ञता से ही निर्धारित किए जा सकते हैं जबकि इस पुस्तक में नवगीत आलोचना की पूर्व परम्परा का कोई उल्लेख नहीं है। प्रतिनिधि संकलनों में भी ‘नवगीत दशक जैसी ऐतिहासिक पहल का कोई मूल्यांकन नहीं है। दिनेश सिंह के सम्पादन में ‘नए पुराने के जो महत्त्वपूर्ण गीत अंक निकले थे उनका कोई जिक्र नहीं है। सौ पृष्ठों में अपनी सम्पादित पुस्तक का जिक्र जरूर दौ सौ बार किया गया है अर्थात् नवगीत के पूरे इतिहास-क्रम की अवज्ञा इसमें है। सम्पादकीय लेखों से नवगीत के नए प्रतिमान तो नहीं निर्धारित हो पाए हैं, हां उनके द्वारा वर्णित छंद-प्रसंग आदि में बंधु जी का शास्त्र और इतिहास का अज्ञान जरूर निर्धारित हुआ है। अंततः बंधु जी से यही प्रार्थना की जा सकती है कि यदि वे नवगीत के हितैषी हैं और उनका दावा है कि वे हैं, तो पुस्तक के इस संस्करण को तुरंत रोक कर उसे संशोधित कर प्रकाशित करें।

Pustak-Paricharcha: Navgeet ke Naye Pratiman

3 टिप्‍पणियां:

  1. राजेन्द्र गौतम8 सितंबर 2012 को 10:46 am

    इस समीक्षा के लिखे जाने के बाद नवगीतकारों से प्राप्त प्रतिक्रियाएं तो और गंभीर स्थिति की ओर संकेत दे रही हैं. पता चला है कि संपादक ने माहेश्वर तिवारी, नचिकेता, मयंक श्रीवास्तव और ऐसे ही अनेक वरिष्ठ कवियों के गीतों को “शुद्ध” कर डाला है. इन वरिष्ठ कवियों की चिंता यही है कि नवगीत विषयक अज्ञान का संक्रमण फैलाने वाली इस किताब से नई पीढी को कैसे बचाएं.

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  2. यह नवगीत के एक यशकामी नादान दोस्त द्वारा किया गया फिजूल का काम है जिसे कोई महत्व नही दिया जाना चाहिए। दुखद यहाँ है कि तमाम मंचो पर बैठे लोग साहित्य की दुनिया मे असली नकली का भेद नही जानते जो जानते हैं वो उसे खुलकर स्वीकार नही करना चाहते। ऐसी विसंगति और साहित्यिक गैरजिम्मेदारी का समय पहले कभी नही आया था।यानी इस किताब को यदि आप पढने लगेगे तो तमाम नई जानकारी आपको मिल जायेगी मसलन राधेश्याम बन्धु नामक कवि /सम्पादक/विचारक न होते तो नवगीत ही न होता और समग्र चेतना जैसी सस्था न होती तो नवगीत का उद्धार न हो पाता। शम्भुनाथ सिंह आदि ने जो नवगीत दशक 1,2,3,आदि निकाले वो सब बेकार का काम था। अब यानी राधेश्याम बन्धु नामक तथाकथित नवगीतकार ने नामवर सिंह से लेकर सभी आलोचको को नवगीत के महान यज्ञ से जोड दिया है। देश भर के तमाम गीतकारो के साथ यहाँ खुला धोखा है।बहुत से कवि तो पैसा भी दे चुके है और ठगे से महसूस कर रहे हैं। अत; मित्रो से निवेदन है कि इस किताब को फेंकने की कोई ऐसी जगह खोज ले जहाँ से फिर इसका जिक्र न हो।

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  3. geet or navgeet mai koi antar kaise hoga dono hi manviya bhavnaon ko pratibibit karte hai hum enhe alag karke dekh rahe hai yah theek nahi hai

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