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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

आगामी विशेषांक 'नवगीत का मूल्यबोध’- सम्पादक: डॉ राधेश्याम बंधु

डॉ राधेश्याम बंधु

महोदय, आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि 'नवगीत के नये प्रतिमान’ पुस्तक के प्रकाशन से हिन्दी कविता की दुनिया में आधुनिक छान्दस काव्य नवगीत का दायरा और उसके सम्मान का कद अब काफी बड़ा हो गया है तथा नवगीत के प्रति पाठकों का आकर्षण भी काफी बढ़ा है । इसकी उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें नवगीत को अपेक्षित आकार और सोददेश्यता प्रदान करने वाले बारह मानकों को प्रस्तुत किया गया है जिसे हिन्दी कविता के समीक्षकों और विद्वानों ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि की संज्ञा दी है । इससे जहां गद्यकविता के आधुनिकतावादियों द्वारा पैदा किये गये गीतकाव्य के रास्ते में भ्रान्तियों के सारे कुचक्र और अवरोध् तिरोहित हो गये हैं वहीं नवगीतकारों की रचनाशीलता की यथार्थवादी जमीन भी काफी पुख्ता हुर्इ है । इस दिशा में 'समग्र चेतना’ ने 1980 में अपना प्रवेशांक,‘नवगीत विशेषांक’ के रूप में 'नवगीत जनमानस के आर्इने में ’ शीर्षक से प्रकाशित किया था और उस की सफलता के बाद जो विशेषांकों का सिलसिला शुरू हुआ वह 2004 में प्रकाशित 'नवगीत और उसका युगबोध’ तक आते-आते नवगीत को पुनप्र्रतिषिठत करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी उसे काफी सफलता मिली, किन्तु इस लक्ष्य को पाने में 'समग्र चेतना’ के सम्पादक मण्डल केा काफी मुश्किलों और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ा है । किन्तु इसके बाद भी न हम रुके और न झुके । हमें यहां यह स्वीकार करने में भी कोर्इ्र संकोच नहीं है कि इस संघर्ष में हमें जहां गीतकारों-नवगीतकारों का सहयोग और समर्थन मिला है वहीं विद्वानो और समीक्षकों का मार्गदर्शन तथा प्रोत्साहन भी समय-समय पर मिला है । डा. नामवर सिंह, डा. विश्वनाथ त्रिपाठी, डा. मैनेजर पाण्डेय, डा. नित्यानन्द तिवारी, डा. शिवकुमार मिश्र, डा. वेदप्रकाश अमिताभ,डा. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर’,  डा. वशिष्ठ अनूप, डा. प्रेमशंकर, डा. प्रेमशंकर रघुवंशी, डा.श्रीराम परिहार, डा.विमल आदि के आलेखों और परिचर्चाओं ने मानकों को चिनिहत करने में हमारा मार्गदर्शन का काम किया हैं । हम इन सबके प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं । 

समकालीन कविता के महान समीक्षक डा. शिवकुमार मिश्र ने 'नवगीत और उसका युगबोध’ के सम्बन्ध् में अपने एक समीक्षात्मक आलेख में लिखा है कि ''अब नवगीत भावुक मन की मध्ययुगीन बोध् की चीज नहीं है बल्कि वह समय की सारी आक्रमकता तथा समय की सारी विसंगतियों, विद्रूपताओं से उसी तरह मुठभेड़ कर रहा है जिस तरह आधुनिक कही और मानी जाने वाली गद्यकविता कर रही है । नवगीत के रचनाशिल्प में भाषा, अलंकार, छंद आदि समूचे रचनाविधान में बदलाव आया है । आज यह जरूरी था कि नवगीत और उसकी परम्परा अपनी पूरी वस्तु निष्ठता तथा प्रामाणिकता के साथ सामने आती और यह काम वही कर सकता था जो नवगीत की पूरी परम्परा से परिचित हो । और यह काम पूरी निष्ठा के साथ डा. राधेश्याम बन्धु ने 'नवगीत और उसका युगबोध’ के माध्यम से पूरा करके दिखा दिया है ।('नवगीत और उसका युगबोध’ की समीक्षा 'सम्यक’ 2009 में डा. शिवकुमार मिश्र) 

इसी प्रकार 'समग्र चेतना’ का 2012 में 'नवगीत के नये प्रतिमान’ शीर्षक से एक और महत्वपूर्ण 'नवगीत विशेषांक’ पुन: प्रकाशित हुआ। इसमें डा. नामवर सिंह ने परिचर्चा के अन्तर्गत नवगीत के बारे में लिखा है कि 'नवगीत ने जनभावना और जनसमस्याओं को अपनी अन्तर्वस्तु के रूप में स्वीकार किया है । इसलिए वह जनसंवाद-धर्मिता की कसौटी पर खरा उतर सका है । समय की चुनौती के अनुसार यदि गीत की अन्तर्वस्तु बदलती है तो उसका सुर और 

कहन की भंगिमा भी बदलती है । नवगीत इसी बदलाव का सुपरिणाम है । (‘नवगीत के नये प्रतिमान’ डा. नामवर सिंह पृष्ठ 108) 

इस पुस्तक को पांच खण्डों में विभक्त किया गया है । प्रथम खण्ड है 'सम्पादकीय खण्ड’ जिसके 100 पृष्ठों में नवगीत के बारह मानकों की विशद व्याख्या की गयी है । इसके प्रतिमानों के शीर्षक इस प्रकार हैं –(1)नवगीत की आलोचना और उसका प्रासंगिक सौन्दर्यबोध (2) नवगीत की वस्तुवादी वर्गीय चेतना और उसका यथार्थवाद (3) प्रयोगवाद और नवगीत के लोकधर्मी प्रयोग (4) इतिहासबोध और नवगीत का उदभव तथा विकास (5) नवगीत की लोकचेतना और वर्तमान समय की चुनौतियां (6) नवगीत के नये रूप और वस्तु की प्रासंगिकता (7)नवगीत के छंद और लय की प्रयोजनशीलता (8) नवगीत की मुल्यान्वेषण की दृषिट और उसका समषिटवाद (9) नवगीत का वैज्ञानिक और वैशिवक युगबोध (10) नवगीत की सामाजिक चेतना और जनसंवादध्र्मिता (11)नवगीत की वैचारिक प्रतिबद्धता और जनचेतना (12) नवगीत 'जियो और जीने दों ’ अवधरणा का समर्थक । 

इसका दूसरा खण्ड है 'परिचर्चा खण्ड’, तीसरा खण्ड है 'समीक्षात्मक आलेख खण्ड’ , चौथा खण्ड है 

'नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर’ खण्ड और पांचवां खण्ड है 'नवगीत के कुछ और हस्ताक्षर’ । 'नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर’ खण्ड में 72 नवगीतकारों के दो-दो नवगीत संक्षिप्त परिचय सहित और 'नवगीत के कुछ और हस्ताक्षर’ में 60 नवगीतकारों के एक -एक नवगीत परिचय सहित दिये गये हैं । 

डा. मैनेजर पाण्डेय ने नवगीत की विशेषताओ की चर्चा करते हुए अपनी परिचर्चा में कहा है कि ''आज नवगीत की पहली विशेषता है सहजता, दूसरी विशेषता है जनसंवादधर्मिता और तीसरी विशेषता है सम्प्रेषणीयता ! हिन्दी कविता में जिन दिनों कला और प्रयोग के नाम पर सिपर्फ काव्याभास और कविता के नाम पर विचित्रता, जटिलता और बौद्धिकता का प्रयोग हो रहा था, उन दिनों नवगीत में सहजता और जनसंवादधर्मिता का विकास 

करके नवगीतकारों ने हिन्दी कविता को पाठकों से जोड़ने का काम किया । यही कारण है कि नवगीत अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने में सक्षम है । (‘नवगीत के नये प्रतिमान’ पृष्ठ 115 डा. मैनेजर पाण्डेय) 

हिन्दी कविता के विद्वानों के उपरोक्त वक्तव्य प्रकान्तर से नवगीत के प्रतिमानों की ओर ही संकेतित कर रहे हैं और यदि इन वक्तव्यों में संकेतित रचनाविधान के तत्व मानकों को आकार प्रदान करने में सहायक हैं तो इनकी सत्यता पर अब किसी को संशय नहीं होना चाहिए । अब सवाल यह उठता है कि यदि ये मानक नवगीत को अपेक्षित आकार प्रदान करने में सहायक हैं तो गीतकारो को अपनी रचनाधर्मिता में इन्हें आत्मसात करने में भी कोई अब हिचक नहीं होनी चाहिए । किन्तु अभी भी बहुत से ऐसे गीतकर हैं जो यथास्थितिवाद और आत्ममुग्धता के शिकार हैं । इसलिए गीत - नवगीत का समुचित विकास नहीं हो पा रहा है । ऐसे में हम निराश होकर बैठ जांय, यह भी उचित नहीं है । हमें इस मुद्दे के औचित्य को स्थापित करने का निरन्तर प्रयास जारी रखना चाहिए । इसी उददेश्य से सम्पादक मण्डल ने 'समग्र चेतना’ का आगामी विशेषांक 'नवगीत का मूल्यबोध शीर्षक से प्रकाशित करने का निश्चय किया है । 

जब तक गीतकार-नवगीतकार इन मानको को अपनी रचना का हिस्सा नहीं बना लेते, तब तक हमारा यह प्रयास अबाध् रूप से जारी रहना चाहिए । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गीतकाव्य की रचनात्मकता का रास्ता अभी भी निरापद नहीं है । क्योंकि आधुनिकतावादी गद्यकविता के कवियों और समीक्षकों द्वारा गीतकाव्य की अब भी उपेक्षा की जा रही है । इसलिए नवगीत के विकास के नाम पर आज भी हमारी कठिनाइयां कम नहीं हुर्इ हैं । दिल्ली के बड़े - बड़े प्रकाशक भी नवगीत के प्रकाशन के सम्बन्ध् में कोई सहयोग या रियायत नहीं करते । प्रकाशन के लिए पूरी लागत लेने के बाद भी वे उतने मूल्य की पुस्तकें ही देते हैं । अब सवाल यह उठता है कि हम इस नवगीत की योजना में भाग लेने वाले अपने सैकड़ों कवियों -विद्वानों को निशुल्क लेखकीय प्रति कैसे दें ? किताब खरीदकर सैकड़ों कवियों को निशुल्क प्रति बितरित की जाय, तो न यह व्यावहारिक है और न आसान ही है । किन्तु इस जटिल समस्या का हल हम अपने सहयोगी ‘कोणार्क प्रकाशन’, दिल्ली की प्रचार-प्रसार की सहयोगी योजना के आधार पर निकाल पाये हैं और कवियो को निशुल्क प्रति देने में सफल भी हो सके हैं । साथ ही उन कवियों और विद्वानों के भी हम बहुत आभारी हैं जिन्होंने 'नवगीत के नये प्रतिमान’ की हमारी प्रचार-प्रसार की योजना में सहयोग देकर और नये पाठक बनाकर नवगीत के इस अभियान को बल प्रदान किया है । हमें विश्वास है कि आगे भी उनका इसी प्रकार सहयोग मिलता रहेगा । 

ज्यों-ज्यों समाज का परिवेश बदला है लोगों की सोच और प्राथमिकतायें भी बदली हैं, साथ ही कविता, कला और ललितकला के प्रति उनका नजरिया भी बदला है । आज महानगरवासी उपभोक्तावादी आधुनिकतावादी संस्कृति के प्रभाव के कारण इतने अवसरवादी हो गये है और अभिजात्य वर्ग के लोग भी कविता और गीतकाव्य के प्रति इतने उदासीन हो गये है कि वे अपने सांस्कृतिक और सामाजिक दायित्व को ही भूल गये है। किन्तु हमें निराश होने की जरूरत नहीं है। समाज में इस प्रकार के संवेदनाहीन कुछ लोग हमेशा रहे हैं। फिर भी हर युग में मनुष्य की आदिम प्रवृतितयों में गीतात्मक कविता की अनुगूंज बराबर महसूस की गयी हे। इसलिए बदलते समय के अनुरूप हमें 

नवगीत की नयी भाषा,मुहावरा,नये छंद,नये शिल्प और नयी यथार्थवादी अन्तर्वस्तु की तलाश जारी रखनी चाहिए, और कविता,गीत,कला के संरक्षण के इस दायित्व को हमें अपने कंधों पर उठाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए । तमाम प्रतिकूलताओं के बाद भी आज गीत - नवगीत लिखे जा रहे हैं और गीत-संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं । हमें मनुष्यता को बचाये रखने के लिए भी कला,कविता और गीतकाव्य को बचाये रखना है । यह सांस्कृतिक,सामाजिक, साहित्यियक सृजन के संरक्षण के दायित्व का सवाल है और इसका निर्वाह कोर्इ भी अकेले नहीं कर सकता । इसे हम आप सबको मिलकर ही सफल बनाना है । 

अत: आप से विनम्र निवेदन है कि 'समग्र चेतना’ के आगामी विशेषांक 'नवगीत का मूल्यबोध’ के लिए अपने पांच मौलिक नवगीत,परिचय, फोन नम्बर और पासपोर्ट की फोटो के साथ अबिलम्ब भेजने की कृपा करे । रचनायें प्रेषित करने के पहले निम्न प्रावधनों पर अवश्य ध्यान देने की भी कृपा करें- 

1. 'नवगीत का मूल्यबोध’ में इस बार नवगीत संचयन के दो ही खण्ड होंगे । पहला खण्ड है-'नवगीत की विरासत खण्ड’ और दूसरा है 'नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर खण्ड’ ।'नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर खण्ड’ में हर स्वीकृत नवगीतकार के दो नवगीत संक्षिप्त परिचय और फोटो के साथ प्रकाशित होंगे । 

2, नवगीत भेजने के पहले उसके भाषिक,शैलिपक,छांदसिक और यथार्थवादी अनतर्वस्तु की संरचना पर एक बार अवश्य गौर करलें जिससे सम्पादक मण्डल को रचनायें स्वीकृत करने में कोर्इ असुबिधा न हो । आप रचनायें प्रेषित करने के पहले एक बार 'नवगीत के नये प्रतिमान’ पुस्तक को नवगीत के अपेक्षित स्वरूप तथा मानकों को समझने के लिए अवश्य पढ़ने की कृपा करें । पुस्तक न हो तो 'नवगीत के नये प्रतिमान’ की प्रति 'कोणार्क प्रकाशन’, दिल्ली-53 के फोन 011 22914666 पर या 09868444666 पर सम्पर्क करके रियायती मूल्य पर मंगा सकते हैं । 

3. नवगीत के छंद का निर्वाह भी शुद्ध होना चाहिए । गतिभंग और रबड़छंद वाला नवगीत मान्य नहीं है । नवगीत तीन बन्द वाले और टंकित होने चाहिए । हर रचनाकार को प्रकाशनोंपरान्त एक प्रति निशुल्क मिलेगी । 

4. आप रचना के साथ अपना एक आश्वासन पत्र भी संलग्न करनें की कृपा करें कि आप नवगीत अभियान की इस प्रचार - प्रसार योजना से सहमत हैं और उसके समर्थक भी हैं । इससे इस नवगीत योजना की सफलता को सुनिशिचत करने में हमें सहायता मिलेगी । 

5. 'नवगीत का मूल्यबोध्’ में भाग लेने वाले कवि और विद्वान एक-एक नवगीत का पाठक भी बनाने का प्रयास करें । इस प्रकार इस योजना को सफल बनाने में जो कवि सक्रिय सहयोग देंगे, उन्हें सदैव एक स्थार्इ सदस्य एवं सहयोगी के रूप में प्राथमिकता और वरीयता दी जायेगी । 

मुझे पूरा विश्वास है कि 'नवगीत का मुल्यबोध्’ के इस सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आयोजन में आप का सक्रिय और सकारात्मक सहयोग और समर्थन अवश्य प्राप्त होगा । आप अपने टंकित पांच नवगीत परिचय, फोन नम्बर, फोटो के साथ 30 अप्रैल 2014 तक अवश्य प्रेषित करने की कृपा करें । 

'नव वर्ष 2014 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ’

- डा. राधेश्याम बन्धु 
सम्पादक 'समग्र चेतना’

4 टिप्‍पणियां:

  1. जानकारी तथ्यात्मक है तथा सूचना सर्वसमाही है.
    हार्दिक धन्यवाद अवनीशजी.

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  2. etna shudhya navgeet kaise likha javega sr geet to geet hote hai

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