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गुरुवार, 10 जुलाई 2014

राकेश चक्र की तीन पुस्तकों का लोकार्पण संपन्न



गाजियाबाद : 26 जून 2014 : गीताभ के तत्वावधान में प्रबुद्ध साहित्यकार श्री राकेश चक्र की तीन पुस्तकों का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर आयोजन के मुख्य अतिथि श्री यात्री सहित प्रसिद्ध गीतकार श्री धनंजय सिंह, वीर रस के प्रख्यात गीतकार श्री कृष्ण मित्र, सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रमा सिंह, गीतकार मधु भारतीय आदि ने शिरकत की। 

श्री चक्र के लघुकथा संग्रह वृक्ष और बीज, चाचा चक्र के हंसगुल्ले कुंडलियां संग्रह एवं योग एवं एक्यूप्रेशर नामक पुस्तकों के विमोचन में बोलते हुए श्री धनंजय सिंह ने कहा कि श्री चक्र का लघुकथा संग्रह में व्यंग्य की प्रधानता के साथ-साथ प्रेरक प्रसंगों को प्रमुखता दी गई है। केवल शब्द जाल नहीं बुना। श्री धनंजय ने इस अवसर पर साहित्य और पाठक के बीच बढती दूरी पर भी चिंता जताई। तत्पश्चात श्रीमती रमा सिंह ने श्री चक्र के कुंडली संग्रह के बाबत बोलते हुए कहा कि वर्तमान में कविता तुकांत से अतुकांत की ओर जा रही है ऐसे में वीर गाथा काल के समय की विधा कुंडली का संग्रह सामने आना निश्चित ही हर्षित करता है। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में 400 कुंडलियां हैं और उनमें सभी विषयों को समेटने का प्रयत्न किया गया है। श्रीमती रमा सिंह ने कहा कि श्री चक्र ने यथार्थ को रसगुल्ले का मीठा व्यंजन बनाकर परोसा है। उन्होंने कहा कि कवि कर्म कोई खेल नहीं है वरन अभावों में भावों की बात है। 

गीताभ के अध्यक्ष श्री ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग जी ने इस अवसर पर श्री राकेश चक्र को बधाई दी और उनके साहित्यिक भविष्य के लिए मंगलकामनाएं प्रेषित कीं। आयोजन के अध्यक्ष श्री यात्री जी ने इस अवसर पर लेखक को बधाई देते हुए कहा कि श्री चक्र जी की पुस्तकें सार्थक पुस्तकें हैं। यात्री जी ने कहा कि श्री चक्र की लघुकथाओं में संवेदना प्रखर है। साहित्य, संस्कृति, मूल्य व पंरपराओं की बात की गई है। 

आयोजन में विमोचन के अतिरिक्त काव्य गोष्ठी का आयोजन भी मुख्य आकर्षण रहा। काव्य गोष्ठी में श्री धनंजय जी के गीत, ’’ मन की गहरी घाटी में क्या उतरेगा कोई, जो उतरेगा वह फिर इससे निकल न पाएगा।’’ ने सभी को भावविभोर कर दिया। डॉ. रमा सिंह के गीत, "ये गीत मेरे बंजारे हैं, पर्वत, नदिया, झरना और सागर को प्यारे हैं, की मधुरता में सभी खूब बहे और खूब झूमे। प्रख्यात साहित्यकार श्री कृष्ण मिश्र जी के गीत, इंद्रप्रस्थ के राजभवन को पा तो गए हो कुंती पुत्रों, गांधारी की संतानों की दुष्प्रवृत्तियां अभी भी जारी हैं।’’

गीताभ के अध्यक्ष श्री पराग जी अपनी गजल "यहां तो जीतकर भी लोग हारों की तरह बैठे, कभी जीता था सबकुछ हारकर पोरस सिकंदर से", सुनाई तो सभी वाह-वाह कर उठे। गीताभ की महासचिव श्रीमती मधु भारतीय जी के मधुर गीत को भी खूब वाहवाही मिली। गीताभ की सचिव श्रीमती तारा गुप्ता ने, "तुम सुनो ना सुनो हम कहें न कहें, इस तरह से मगर बात होती नहीं। शब्दमाला सजाना जरूरी नहीं, शब्द से इतर हम कोई भाषा चुनें। प्रसिद्ध गजलकार श्री कमलेश भट्ट कमल ने वर्तमान में पांव पसारती फ्लैट संस्कृति पर तंज कसते हुए कहा - "कहीं भीतर ही भीतर खाए जाता है, उसे यूं कर्ज का घर खाए जाता है। सुकून अब फलैट में भी तो नहीं मिलता, कि ई,एम, आई का डर खाए जाता है।’’ इसके अलावा गोष्ठी में डॉ. अंजु सुमन, मिथिलेश दीक्षित, वेद शर्मा वशिष्ठ, वीना मिततल, जयप्रकाश मिश्र, अरूण सागर, अल्पना सुहासिनी, विनोद वर्मा आदि ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया।

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