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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

समीक्षा : ‘उधेड़बुन’ की सार्थकता - मधुकर अष्ठाना

कृति : उधेड़बुन (कविता संग्रह)
कवि : राहुल देव
प्रकाशक- अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद
मूल्य : रु 20/-,  पृष्ठ सं. : 112, प्रकाशन वर्ष : 2014 

अंतर्मन के भावोद्रेग का उच्छलन जब शब्दों में ढलकर हमारे समक्ष जब अर्थ का सम्पुट खोलता है तो उस भाव एवं विचार के संतुलित रूप को कविता की संज्ञा दी जाती है, जो प्रकाशित होकर समाज को समर्पित हो जाती है | हमारी भावनाएं आसपास के परिवेश से निश्चित तौर पर प्रभावित होतीं हैं और अपने परिवर्तित रूप में, वास्तव में स्वानुभूत सुख-दुःख, हंसी-रुदन तथा उस जीवनसंघर्ष जो सृजनकर्ता के जीवन का अंश होता है एवं उसकी आकांक्षाएं ही प्रतिफलित होतीं हैं | उसकी व्यक्तिगत आवाज़ एक समानधर्मी समूह की आवाज़ बन जाती है और उसकी व्यक्तिगत सृजनशीलता अपने समूहगत रूप में जागरूकता का प्रसार कर सामाजिक परिवर्तन का आधार बन जाती है | जब सृजन अपने उद्देश्य में सफ़ल हो जाता है तो उसकी उपयोगिता तथा सार्थकता स्वतः सिद्ध हो जाती है | कविता न तो मनोरंजन की सामग्री है और न ही प्रत्यक्ष रूप में दिशा देती है |किन्तु जागरूकता लाकर अपेक्षित बदलाव हेतु प्रेरणा देती है | वास्तव में वर्तमान कविता का यही उद्देश्य है और समसामयिक प्रासंगिकता ही उसकी सार्थकता है | अतः कविता को व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होना चाहिए | वर्तमान में जीना ही कविता की अनिवार्यता है जिसके इतर सृजन कविता न होकर कुछ और हो सकता है | भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है किन्तु उसकी भी एक सीमा है | अभिव्यक्ति ऐसी हो जिससे सामाजिक सद्भाव तथा समरसता अक्षुण्ण रहे | व्यक्तिगत आक्षेपों के लिए यह उपयुक्त प्लेटफ़ॉर्म नहीं है | कविता अभिव्यक्ति का तराशा हुआ रूप है अर्थात यह भाव एवं विचार की संतुलित सुरभि समेटे एक पुष्प है जिसमें कलात्मकता की अपार संभावनाएं हैं और ध्यान रखने का महत्त्वपूर्ण विषय यह है कि ऐसे पुष्प से सुगंध आनी ही चाहिए, वह कागज़ी सुमन बनकर न रह जाये | कविता एक कला है और कला को कलात्मकता विहीन न होने देने के लिए प्रत्येक कवि का प्रतिश्रुत होना आवश्यक है | 


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और कविता मानवता की पाठशाला है | ऐसे में कवि आजीवन छात्र बना रहता है | यदि वह शिक्षक बनना चाहेगा तो कवि का गौरव खो देगा | तात्पर्य यह कि सीखने की, कुछ ग्रहण करने की प्रवृत्ति सदैव बनी रहनी चाहिए और वर्तमान में ही जीना चाहिए | सीखने और नूतनता ग्रहण करने का स्त्रोत हमारे परिवेश और सामाजिक परिवर्तनों में निहित होता है | कवि जो कुछ भी सृजन करता है उसकी प्रेरणा इन्हीं से मिलती है और यही रचनाकार के विषय भी हैं | डॉ नामवर सिंह कहते हैं कि, ‘कविता से लय को बहिष्कृत कर हमने बहुत बड़ी गलती की जिससे आज की लय विहीन कविता हाशिये पर आ गयी है |’ वर्तमान कवि को इसपर भी ध्यान देना है | पुराने कवियों की बनिस्पत नए कवियों में जो उद्भावनाएँ, नये विचार और नये बिम्ब प्रकट हो रहे हैं, उनमें नूतनता के साथ ही सौन्दर्यबोध में ताजापन दिखाई पड़ता है | पुराने कवियों में जो हताशा और दोहराव है, उससे ऊब होने लगी है, जबकि नये कवियों में उर्ज्वस्विता एवं उर्ध्वमुखी जागरूकता तथा साहस है, परिलक्षित हो रही है | ऐसी ही नयी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर भाई राहुल देव हैं जिनकी रचनाओं में हमें नवता का विकासोन्मुखी स्वरुप देखने को मिलता है | उनकी रचनाओं में वह सभी तत्व अन्तर्निहित हैं जो एक उदीयमान प्रातिभ रचनाकार में अनिवार्य हैं और उनका प्रथम कविता संग्रह ‘उधेड़बुन’ वर्तमान में लक्ष्यहीन पीढ़ी के अंतर्द्वंध-ग्रस्त संघर्ष एवं जिजीविषा का परिचय कराता है | यह दिशाहीन पीढ़ी बीमार सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक व्यवस्था के फलस्वरूप भटक रही है और अपना पथ निर्धारित करने में असमर्थ जरूर दिखाई पड़ती है किन्तु उसका आक्रोश एवं विद्रोही स्वभाव निश्चय ही भविष्य की आहट की सुगबुगाहट है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है | यह अर्जुन का युद्धपूर्व मोहाविष्ट अंतर्द्वंध है जिसे एक कृष्ण की तलाश है | इसमें दायित्वबोध तो है पर उसे प्रकट करने की प्रक्रिया ज्ञात नहीं है | सामाजिक सरोकार, संवेदना तथा यथार्थता से परिपूर्ण ‘उधेड़बुन’ से पाठक को विशिष्ट अंतर्ज्ञान का बोध होता है | संग्रह की प्रथम रचना ‘छद्मावरण’ में ही व्यक्ति अनेक सपनों में विचरण करता है, कितनी परिस्थितियों से गुज़रता है, मजदूर से लेकर ईश्वर तक का जीवन जी लेता है परन्तु उसे कहीं भी शांति नहीं मिलती किन्तु सपने का अंत होते-होते उसे सही दिशाबोध हो जाता है | यथा – “अब कहाँ जाऊं ? यह सोचकर/ थोड़ी ही देर बाद तुम्हारे कदम/ उस सड़क की ओर मुड़ गये/ अपने आप ही/ जो तुम्हारे घर की ओर जाती थी/ जहाँ तुम्हारी चिंताओं का हल हो सकता था/ जहाँ तुम अपनी चिंताएं बाँट सकते थे/ वह तुम्हारा अपना घर था/ बाहर इतना भटकने के बाद/ आखिरकार तुम अपने घर आ गये |” 

वस्तुतः अंतर्द्वंध अथवा उधेड़बुन की स्थिति निर्णय से पूर्व की होती है क्योंकि प्रत्येक कार्य करने से पूर्व का यह मानसिक उद्वेलन या तर्क-वितर्क हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करने में सहयोगी की भूमिका निभाते हैं | स्वप्न देखना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है और वस्तुतः स्वप्न से ही भविष्य के सकारात्मक विकास की दिशा में आगे बढ़ा जाता है | इसके अतिरिक्त स्वप्न हमारे कुंठाग्रस्त मन हेतु औषधि का कार्य करते हैं | भौतिक जगत में हम जिससे वंचित रह जाते हैं, उसे स्वप्न में प्राप्त कर लेते हैं | वैज्ञानिकों ने उड़ने का स्वप्न देखा तभी वायुयान का अविष्कार हो सका | वास्तव में हमें आज जो भी प्रगति और विकास दिखाई देते हैं, वे सभी किसी न किसी स्वप्न से ही आविर्भूत हैं | “सपनों में जी लेना/ कितना सुकून देता है |” अथवा “जो आज सच है/ वह भी तो कभी/ सपना रहा होगा |” आदि ऐसी पंक्तियाँ हैं जो स्वप्न की सार्थकता और प्रासंगिकता का बोध कराती हैं | स्वप्न हमें यथार्थ की ओर अग्रसर करते हैं और इस प्रकार स्वप्न ही सच्चाई में तब्दील होते रहते हैं | 

कविता के विषय में राहुल देव की भी अपनी अवधारणा है | इस सम्बन्ध में अपनी भावना व्यक्त करते हुए वे लिखते हैं, “जो मन में घर कर जाये/ सोच जगाये, भाव उठाये/ कल्पना के घोड़े पर सवार/ चलती जाये, मुदित बनाये/ हृदय को निर्मल बनाकर/ भावनाओं को जगाकर/ शांत हो जाये |” तात्पर्य यह कि कविता एक ओर तो चिंतन अर्थात विचार के साथ भावना का तालमेल बिठाकर, ऐसी कल्पना में परिभ्रमण कराये जो यथार्थ के निकट हो एवं तृप्ति तथा संतुष्टि की अनुभूति करा सके | वह ऐसी सकारात्मक एवं रचनात्मक कलात्मकता से युक्त हो जिससे हृदय में अन्तर्निहित विकार नष्ट होकर निर्मलता का बोध कराएँ | जिसे पढ़ने या लिखने के उपरांत अंतर्मन में शांति का आभास हो | इसीलिए तो कविता को ‘विकारों की रेचक’ कहा गया है | जब कविता कागज़ पर उतर जाती है तो अंतःकरण निर्मल एवं शांत हो जाता है | लेकिन एक अच्छे कवि की पहचान है कि अभिव्यक्ति में अधूरापन महसूस होता रहे और उस अधूरेपन को पूर्ण करने हेतु वह सर्वदा अपनी सर्वश्रेष्ठ कविता की खोज़ में निरत रहे | एक प्रश्नकर्त्री ने एक सुप्रसिद्ध श्रेष्ठ कवि से पूछा कि आपकी सर्वश्रेष्ठ कविता कौन सी है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह तो अभी लिखी जानी है, उसी की खोज़ में मैं भी हूँ | जीवन के उत्तरार्ध में भी इस अधूरेपन का एहसास बना रहना ही कवि को प्रगति की ओर अग्रसर करता है | 

राहुल देव की यह विशेषता है कि वह यथार्थ से जुड़ी कल्पनाओं तक ही सीमित रहना जानते हैं और अतीतजीवी न होकर वर्तमान की बात कहते हैं | उनके चिंतन में आज का विरूपित समाज, भ्रष्ट व्यवस्था और विषमताओं-विसंगतियों का नंगा नाच हो रहा है | मानवता के पुजारियों को समाप्त कर दिया जाता है | मानवता, संस्कार तथा मूल्यों का क्षरण हो चुका है | तभी वे कहने को विवश हैं – “मेरे चारों ओर चलता/ वहशियत का नंगा नाच/ मानवता का हो रहा चीर-हरण खुलेआम/ कोई नहीं यहाँ मुझे बचाने को/ सुनो मेरा आर्तस्वर, मेरी पुकार/ मैं हुआ संज्ञाशून्य/xxx/ हाय ! यह कैसा जगत दर्शन/ जहाँ होता राक्षसी नर्तन/ ले चलो मुझे यहाँ से दूर कहीं/ जहाँ हों निर्विकार/ मिले शांति, बाख सकें, सबके प्राण |” जब सम्पूर्ण विश्व में ऐसा निर्विकार स्थान नहीं है तो ऐसी स्थिति में “आये कोई नायक/ करे परिवर्तन, उपसंहार/ मिट्टी की सौंधी खुश्बू लौटे/ लौटे हरियाली/ आये वही बहार |” कभी-कभी दुनिया में ऐसे महानायक अवतरित होते हैं जिनमें समाज को परिवर्तित करने की शक्ति होती है | कवि को उक्त परिस्थितियों में ऐसे ही नायक की प्रतीक्षा है | 

कवि की दृष्टि बड़ी वस्तुओं पर तो पड़ती ही है किन्तु छोटी वस्तुओं पर भी पड़ती है | निष्प्राण-जड़ पदार्थों में भी वह प्राण भर देता है और उनका वर्णन इस प्रकार करता है कि वे जीवंत होकर अपनी परिभाषा ही बदल देते हैं | ‘ओस की वह बूँद’ कविता में हमें क्षुद्र में विराट का बोध होता है | लघुता में प्रभुता दिखाई पड़ने लगती है | प्रतीक बनकर लघुता भी महान बन जाती है | यथा- “रात्रि के अवसान पर/ प्रभात-करों के स्पर्श से/ हर्षातिरेक में झूमना चाहती हो/ बजना चाहती हो वह घुंघरुओं की तरह/ बूँद ! पूर्ण है स्वयं में/ समेट सकती है/ विश्व को स्वयं में/ स्त्रोत है भक्ति का/ नवशक्ति का/ वह ओस की बूँद/ प्रतीक है जीवन का/ गति का !” 

भविष्य के नियामक बच्चे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं किन्तु भारत में अनचाहे खर-पतवारों की तरह बाल दैहिक शोषण, बाल मजदूरी और भिक्षा मंगवाने के लिए प्रयुक्त होते हैं | बच्चों की स्थिति अपने देश में नितांत दयनीय और चिंतनीय है | राहुल का कविमन बच्चों के प्रति विशेष संवेदनशील है और करुणा के वशीभूत ‘बच्चे और दुनिया’ शीर्षक रचना में उनकी लेखनी अपनी पीड़ा प्रकट कर देती है | यथा – “देखना कहीं/ झरने की मानिंद गिरता-चढ़ता/ आसमान को छूने की चाह रखने वाला/ अपनी दुनिया का बादशाह/ कहीं रुक न जाये/ समय का पहिया/ कहीं उसके सपनों को बींध न दे/ एकलव्य की तरह/ कहीं उसकी प्रतिभा/ दबा न दी जाये/ अनंत चेहरे, अगणित रचनाएँ/ हर कोई विशेष है यहाँ/ xxx/ कालखंड/ तुम्हारे स्वागत को प्रतीक्षारत है/ इस दुनिया के कायदे इतने आसान नहीं/ यह छीन लेगा तुमसे तुम्हारी मोहक हंसी |” जहाँ बच्चे खरीद-फरोख्त की जिन्स हैं वहां कवि की यह चेतावनी-सावधानी यद्यपि ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’ लगती है किन्तु इससे उसके करुणाशील अंतर्मन का ज्ञान होता है जिसमें नोबेल पुरुस्कार प्राप्त कैलाश सत्यार्थी तथा मलाला की भावना छिपी है | अंकुर ही एक दिन विशाल वृक्ष बनता है | अभी तो पक्षी के पंख खुले ही हैं जो एक दिन पूरा आकाश नापने लगेगा | इसी प्रकार देश में, हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी वे कटाक्ष करते हुए कहते हैं, “जी हाँ ! मैं भष्टाचार हूँ/ मैं आज हर जगह छाया हूँ/ मैं बहुत खुश हूँ/ और होऊं भी क्यों न ?/ ये दिन मैंने ऐसे ही नहीं देखा/ मुझे वो दिन आज भी याद है/ जब मैंने अपने सफ़ेद होते बालों पर/ लालच की डाई/ और कपड़ों पर ईर्ष्या का परफ्यूम लगाया/ बातों में झूठ और व्यवहार में/ चापलूसी के कंकर मिलाये/ फार्मूला हिट रहा/ xxx/ मैं बदनीयती की रोटी संग मिलने वाला/ फ्री का अचार हूँ/ पॉवर और पैसा मेरे हथियार हैं/ मैं अमीरों की लाठी और गरीबों पर पड़ने वाली मार हूँ |” 

भाववाचक संज्ञाओं का मानवीकरण और अभिनव उपमाओं से अलंकृत राहुल देव की रचनाओं में यदि इतिवृत्तात्मकता पर ध्यान न दें तो कथ्य को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करने की यथेष्ट क्षमता है और उनकी रचनाएँ परिवेश के साथ दूध-पानी की तरह एकाकार हो जातीं हैं | जहाँ तक भाषा का प्रश्न है तो वे समय, परिस्थिति एवं पाठकवर्ग के अनुकूल अधिकतर बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग करते हैं जिसमें उर्दू तथा अंग्रेजी के भी शब्द जो आम आदमी की ज़बान पर रहते हैं, प्रयोग करने में गुरेज़ नहीं करते | इस प्रकार भाषा की सहजता, सरलता, प्रवाह और प्रसाद गुण सम्पन्नता उसे जीवन्तता प्रदान करने के साथ ही सम्प्रेषणीता में अभिवृद्धि करते हैं | 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अभिधात्मक भाषा को सर्वोत्तम कहा था क्योंकि यह एकार्थी होती है और इसे समझने में सरलता होती है | इसके विपरीत लाक्षणिकता और व्यंजनात्मकता में जो उसका वाच्यार्थ होता है, वह उसका वास्तविक अर्थ नहीं होता है जिससे उसका अन्यार्थ शोध हेतु विद्वत्ता की आवश्यकता होती है | राहुल देव भाषा के मोह में नहीं पड़ते हैं और सीधे स्पष्ट शब्दों में अपने मनोभावों को प्रकट कर देते हैं जिसमें सम्प्रेषणीय सफलता असंदिग्ध होती है | भाषा का उदाहरण उनकी प्रत्येक रचना में उपलब्ध है | भाषा के साथ कथ्य की प्रासंगिक सार्थकता रचनाकार की रचना को समसामयिक प्रगतिशीलता से जोड़ती है | अधिकांश कवियों की लम्बी रचनाओं में एक-आध पंक्ति ही कविता की श्रेणी में आती है और शेषभाग केवल भूमिका अथवा घेराबंदी ही होती है किन्तु राहुल देव की रचनाओं में कविता अधिक और भूमिका संक्षिप्त एवं आवश्यकतानुसार ही होती है | यह एक रचनाकार के लिए बड़ी उपलब्धि है | राहुल देव जो कहना चाहते हैं उसे बड़ी साफगोई से स्पष्ट कर देते हैं जिसमें घुमाव-फिराव नहीं होता | महानगर की सड़कों से सभी लोग परिचित हैं जो रात-दिन व्यस्त रहतीं हैं और व्यस्तता भी इतनी सघन कि इस पार से दूसरी ओर जा पाने में ही अधिक समय लग जाता है | ऐसी सड़कों पर प्रतिदिन अनेक दुर्घटनाएं होतीं हैं | स्थिति यह है कि दुर्घटनाओं से मृत्युदर बढ़ती ही जा रही है | इस पारिस्थितिक त्रासदी ने कवि को संवेदित किया और निम्नांकित रचना ‘शहर की सड़कें’ शीर्षक से अवतरित हो गयी | यथा, “सड़के दिन होने पर/ कैसी व्यस्त हो जातीं हैं/ बहुत लोग उसपर दब-कुचल जाते हैं/ बहुत बेमौत मारे जाते हैं/ बहुत घायल होकर/ अपंग हो जाते हैं/ सड़के तेज़ी से भाग रही हैं/ रूकती ही नहीं/ कोई दुर्घटना उसे पिघला नहीं सकती/ शायद यह/ उसकी नियति बन गयी है अब/ सड़कें/ जिन पर चल रहा है/ आज का ज़हरीला आदमी/ रोज़ की तरह/ कल के अख़बार की सुर्खियाँ/ तैयार हो चुकीं हैं !” 

संवेदना हमारे चारों ओर बिखरी पड़ी है, केवल उसे ग्रहण करने के लिए सूक्ष्मदृष्टि की तलब होती है | संवेदना को कलात्मकता के साथ सज़ा देना ही कविता है | अतः कविता के साथ कला का अटूट सम्बन्ध होता है | जो संवेदना को जितनी गहराई तक ग्रहण कर पाता है उसे जितनी सूक्ष्मता एवं कलात्मकता के साथ सहज एवं प्रवाहपूर्ण शब्दखंड में सज़ा पाता है, उसी के अनुरूप साहित्य में प्रतिष्ठित होता है | राहुल देव में श्रेष्ठ कवि बनने के पर्याप्त गुण विद्यमान हैं और उन्होंने अपनी प्रस्तुत कृति में भरसक प्रयत्न किया है कि संवेदना का विस्तार कर उसकी अनुभूति जन-जन तक पहुँचा सकें और बहुत हद तक वे सफ़ल भी हुए हैं | प्रथम कृति की दृष्टि से कविता के क्षेत्र में उनका यह प्रथम सोपान पर कदम, भविष्य की विराट संभावनाओं का संज्ञान कराता है | निश्चित रूप से आने वाला कल उनके नाम होगा | मैं उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ आशा करता हूँ कि साहित्य के क्षेत्र में उनके पदार्पण का समुचित स्वागत होगा।  

समीक्षक : 
मधुकर अष्ठाना 
संपर्क : विद्यायन, एस.एस.-108-109,
सेक्टर- ई, एल.डी.ए. कालोनी 
कानपुर रोड, लखनऊ - 226012 
मो. 09450447579, 0522-2437901




Udherbun by Rahul Dev

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