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सोमवार, 5 जनवरी 2015

समीक्षा : कस्बाई अंचल और भाषा की नई शक्तियां - वीरेन्द्र आस्तिक

कृति : संवेदन के बस्ते 
गीतकवि : कृष्णमोहन अम्भोज 
प्रकाशक : नर्मदा प्रकाशन, पचोर (म.प्र.)
मूल्य : 75/-, पृष्ठ : 100/-, वर्ष : 2013 


आजकल जब अनेक गीत-कृतियों की विषयवस्तु और उनकी कहन पद्धतियों पर विचार करते हैं तो उनमें विविधता के बजाय समानता अधिक देखने को मिलती है। विगत में कई नवगीत पुस्तकों की समीक्षा करते हुए, कॉमन कथ्य ओर कॉमन लय पर प्रश्न उठाया था हमने। ऐसा क्यों होता है, इसका सीधा सा अर्थ यही है कि रचनाकार कथ्य और भाषा की नई जमीन को तोड़ने का खतरा उठाना नही चाहता हैं फिर मुजी-मंजाई से न तो मौलिकता की सुगन्ध आती है ओर न ही कोई संप्रेषणीय कुतूहल। कहना यह भी आवश्यक है कि भाषाई लय के घूर्णन से कलात्मकता के स्तर पर शैल्पिक वैशिष्ट्य तो मजबूत होता है, लेकिन यही मजबूती प्रायः यथार्थगत ईमानदारी को गिरा देती है। अतः हमें कलात्मक आग्रहों से सतर्क होते हुए और सपाटबयानी आदि से बचते हुए यथार्थ के धरातल पर लयात्मक भाषा की नई शक्तियों की खोज करनी होगी। इस चुनौती भरे कार्य का एक उपाय यह हो सकता है कि रचनाकार अपनी परिवेशगत मानसिकता से बाहर निकलकर समाज के भिन्न ओैर दूरान्त इलाकों को अपना कार्यक्षेत्र बनाए। उसका भोक्ता बनें।

उपरिकथित विचार मेरे जेहन में तब आए जब मुझे नवगीत पुस्तक 'संवेदन के बस्ते' से गुजरने का अवसर मिला। पुस्तक के रचनाकार हैं श्री कृष्ण मेाहन अम्भेाज जो ग्रामीण ओैर कस्बाई अंचलवासी है।

कृति भाषा की एक स्वाभाविक-सी नवीनता से हमारी पहचान कराती हैं। कवि की अभिव्यक्ति में समकालीन आग्रहों का प्रभाव तो दिखता है वह न्यूनतम रुप में। शायद तभी वह अपने आसपास के सामयिक और सामाजिक सरोकारों की प्रचलित भाषा का नया मुहावरा पकड़ सका है।

श्री अम्भोज ने व्यवस्था के वास्तविक चरित्र को गहराई से समझने का यत्न किया है। इसका प्रमाण है उनके नवगीत। इन नवगीतों में घर, गाँव, शहर , श्रम-श्रमिक, गरीबी-अमीरी मंहगाई आदि के आपसी संबंधो और नाते-रिश्तों की अलग-अलग ढ़ग से अभिव्यंजना हुई और अनेक बार हुई है। उनका कहना सही है कि संवेदना जहां नही होती वहां निरंकुशता पैदा होती है। तब पूरी व्यवस्था एक चारागाह बन जाती है। मनरेगा जैसे योजना भी षोषण का षिकार हो जाती है। समाज जिसकी लाठी उसकी भैंस के रुप में चरितार्थ होता है। लोग ईश्वर से डरते नहीं क्यों कि उनके लिए ईश्वर मर गया होता है। (पृष्ठ 10) राजा यदि अंधा है अर्थात प्रतिभा संपन्न नही है तो समाज की आँखेों पर स्वतः पट्टी बँध जाती है। बुद्धिजीवी अधार्मिक, अनैतिक परिवेष में ऐसे छटपटाते हैं जैसे विदुर कौरवों की बींच :

मिल रहे संकेत
होनी है
कुरुक्षेत्र की तैयारी 
बाँध रही आँखों पर पट्टी 
गांधारी-सी समझ हमारी
बेचारे कुछ युग दृष्ठा अब,
औचक खडे़ विदुर से। (पृष्ठ 11)

समाज के ऐसे अरण्य में कवि अकेला सेवेदना का पर्याय है।

एक दूसरी विशेषता की तरफ संकेत करना चाहूँगा। कवि जब रचना में सच्ची भावना को जीता है, अभिव्यक्ति में ईमानदारी की प्रतीती होती है। जीवन की कैसी भी द्वंद्वात्मक स्थितियां हों। सत्य सत्याभास हो। कवि की विवेकजन्य संवेदना मानवीय पक्ष को ही प्रकाशित करेगी। तात्पर्य ये कि अम्भेाज का कविकर्म निर्णायकबोधी है।

उन विकट स्थितियों में भी : 'जब दीवारों में कानाफूसी / मन देहरी का आहत है / तवे की तेरी / हाथ की मेरी / घर-घर रोज कहावत है / दिशाभ्रम हो गया समझ को / आँगन टेढें लगतें है / मुट्ठी की कीमत याद हमें / फिर बंद कहाँ रखते है / अलगाँवों की / जंजीरों से / बँधी-बँधी सी चाहत है।' बंधन भी जंजीर है तो अलगाव भी, क्योंकि अलगाव में भी बँधने की चाहत अभी शेष है।

पुस्तक के अनेक स्थलों पर बाजार चरित्र अभिव्यक्त हुआ है। रिश्तों का अजनबी होना बाजार की ही देन है। बाजारवाद जो व्यवस्था का एक अंग बन गया हैं। जब चरम पर होता हैं तब आदमी की आत्मा मर जाती है। संवेदना सूखकर पत्ते की तरह झर जाती हैं। बाजारवाद मुखैाटा का खेल है। आत्मा संवेदना न जाने कहां दब गई होती है। कवि व्यवस्था के इस तिलिस्म को जान चुका है। दूसरों को गैरो को ठगने में व्यक्ति स्वंय को भी ठग रहा है : 'चीजें जिन्दा है- व्यक्ति मर चुका है/ भूल गए हम / असली सूरत / मुख आवरण लगा / ओरों से ज्यादा हमने तो खुद को खूब ठगा।' (पृष्ठ 39) बाजारवाद मँहगाई का दूसरा नाम है। कवि उसे अजगर की दाढ़ कहता है क्योंकि बाजार सबसे पहले गरीब को ही निगलता है। ऐसा बाजार तंत्र प्रत्येक घर में घुसकर विखण्डन पैदा कर रहा हैं। विषेश यह कि यहां तक कवि समकालीन रचनाकारों की तरह भूमंडलीकरण की अवधारणा से नहीं, उसके परोक्ष्य प्रभाववश पहुँच पाया है। 

'घर के हिस्से तो सीमित पर / मन के अनगिन हिस्से हैं /शिकवे-गिले तो अनसुलझें से / बैतालों के किस्से हैं / अब शब्दों की अर्थो से ही / लो होने लगी बगावत है।' अर्थात सिद्धांत और व्याख्याएं तो झूठ में बदल चुकी हैं। इन सबको ध्वस्त करके शब्दों के नयें अर्थ तलासने होंगे। जॉक्स देरीदा का यही विखण्डनवाद है।

प्रेम और जीवन का अन्योन्याश्रित संबंध है। इस पवित्र संबंध पर भी कुछ रचनाए हैं। कुछ में युगीन त्रासदी भी व्यंजित हुई है। लोग तो विचारों की कैद से ऊबकर नैसर्गिकता में जीना चाहतें है। (पृष्ठ 87) किन्तु जीने के सारे मापदण्ड जहाँ धुंधला गए हों, वहाँ ढाई आखर के मर्म का विस्मृत हो जाना जीवन की सबसे बड़ी पराजय है। 'भूले दर्पण लिखना' में कवि का श्रेष्टतम मानसिक व्यापार व्यक्त हुआ है- एक तरफ पीड़ा व्यंग्यात्मक बोध है तो दूसरी तरफ दार्शनिक भाव की गहराई भी :

सच पूछो तो / ढाई आक्षर / भूल गया मन लिखना
इतनी पर्तें चढी पर / भूले दर्पण लिखना। (पृष्ठ 96)

कहना चाहूँगा, संग्रह मे नई कथन, नये कथ्य की खनक सर्वत्र विद्यमान हैं किन्तु इन्हे साधने मे कही-कही लय खुरदूरी हुई हैं। इस पर विचार करना होगा। वेसे बिना किसी चमत्कार के युगल बंधियों, मुहावरों और सूक्त वाक्यों के प्रयोग भी कुछ नही, जैसे बादल-सी छतें, आग चूल्हे की जा बैठी हैं पेट में, फूलो में फाग आने कि बात, शब्द डरते से मिले, पसीना मात का टीका, मरहम भी नासूर, नोन लगी बातें, समझ को मोतियां बिन्द, एक जांघ उघारे दूजी ढांके, आदि। समय अनेक प्रकार से व्यंजित हुआ है - समय बदचलन, समय के सुई-धागें, चुभा समय कील की तरह। इसी प्रकार तूकान्तों के नए प्रयोग हुए हैं किन्तु प्रचलित तूकान्त भी भाषा में नई सोच लेकर आए हैं । कुल अर्थ यही कि संक्षिप्त रूपाकार में अन्विति का निर्वाह हुआ हैं। 

शुरूआत में एक संकेत किया गया था, भाषा की नवीनता का, किन्तु यहां कृति अपने पीछें अनेक प्रश्न छोड़ रही है। मसलन संवेदन के बस्ते की अति साधारण साज-सज्जा। प्रश्न उठता हैं, यदि पुस्तक का कलेवर साधारण है। तो क्या उसकी पठनियता भी प्रभावित होती हैं? प्रायः सुनने मे आता है। कि ऐसी कृतियों को समीक्षक आलोचक एक किनारें सरका देते है। पुस्तक से जुड़ा दूसरा प्रश्न है - रचनाकार की आर्थिक स्थिति का, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है, उसके संकल्पित मन का जो पचोर (राजगढ़) म.प्र. जैसे कस्बाई इलाके मे पुस्तक को छपवा लेता है। अभ्भोज जी से पूछने पर पता चला कि कुल 250 प्रतियां ही छपी है। अर्थात वितरण भी सीमित है। ऐसे रचनाकार जो कथित समकालीनता के प्रभाव क्षेत्र से दूर गांवों में है और जो संमय को अपने नजरिये से देख रहें है, उनके रचना कर्म मे जो मौलिक सुगंध मिलती है। क्या उसका अभाव नही दिखता है शहरी समकालीन रचना कर्म में? इतने सारे मुद्दों पर विचार-विमर्श करने को यह कृति आमंत्रित करती है सुधी पाठकों और बुद्धिजीवियों को।

इस दृष्टि से हिन्दी काव्य जगत में इस कृति की और इसके कवि श्री कृष्णमोहन अम्भोज की पहचान बननी चाहिए। विश्वास है कि साहित्य समाज में 'संवेदन के बस्ते' का स्वागत होगा।






समीक्षक : 
वीरेन्द्र आस्तिक
एल- 60, गंगाविहार
कानपुर - 208010

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