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गुरुवार, 8 जनवरी 2015

कहानीः अंतर्व्यथा - दिनेश पालीवाल

दिनेश पालीवाल 

३१ जनवरी १९४५ को जनपद इटावा (उ.प्र.) के ग्राम सरसई नावर में जन्मे दिनेश पालीवाल जी सेवानिवृत्ति के बाद इटावा में स्वतंत्र लेखन  कर रहे हैं। आप गहन मानवीय संवेदना के सुप्रिसिद्ध कथाकार हैं । आपकी ५०० से अधिक कहानियां, १५० से अधिक बालकथाएं, उपन्यास, सामाजिक व्यंग, आलेख आदि  प्रितिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। दुश्मन, दूसरा आदमी , पराए शहर में, भीतर का सच, ढलते सूरज का अँधेरा , अखंडित इन्द्रधनुष, गूंगे हाशिए, तोताचश्म, बिजूखा, कुछ बेमतलब लोग, बूढ़े वृक्ष का दर्द, यह भी सच है, दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की, रुका हुआ फैसला, एक अच्छी सी लड़की (सभी कहानी संग्रह) और जो हो रहा है, पत्थर प्रश्नों के बीच, सबसे खतरनाक आदमी, वे हम और वह, कमीना, हीरोइन की खोज, उसके साथ सफ़र, एक ख़त एक कहानी, बिखरा हुआ घोंसला (सभी उपन्यास) अभी तक आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। आप कई सम्मानों से अलंकृत। संपर्क: राधाकृष्ण भवन, चौगुर्जी, इटावा (उ.प्र.)। संपर्कभाष: ०९४११२३८५५५। यहाँ पर आपकी एक कहानी दी जा रही है-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

अंतर्व्यथा 

जिन दुखों के चेहरे नहीं होते वही हम सबके लिए अक्सर जानलेवा सिद्ध होते हैं। वे जीवन भर बेचैन रहे। एक बदहवास आदमी की तरह जिए। देश, समाज और अपने जीवन के वर्तमान से पूरी तरह असंतुष्ट। प्रतिकूल परिस्थितियों से हर वक्त जूझते हुए। उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच कर ठहरे हुए जहां न कुछ बदला जा सकता है, न कुछ नया करने का हौसला जुटाया जा सकता है। किया जा सकता है तो सिर्फ मौत का इंतजार। बस किसी तरह दिन को रात, और रात को दिन में बदलते हुए चुपचाप देखना और सहना। हर वक्त एक अंतहीन प्रतीक्षा कि कोई आए और उनकी सुने। उनकी व्यथा, उनकी अंतहीन अंतर्व्यथा, उनके दुख-दर्द, उनकी तकलीफें। लेकिन किसके पास वक्त है इस भागमभाग के जमाने में जो उनकी यह सब कथा सुने? सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं। गमों में मुब्तिला हैं। सबको लगता है, हमारी अपनी क्या कम समस्याएं हैं? अपने क्या कम गम हैं जो हम दूसरों की तकलीफें सुनें?

’पराधीन सपनेहुं सुख नाही!’ की उक्ति उन्हें तब आजादी के लिए प्रेरणा देती रही थी। वे गांधी के आन्दोलनों में कक्षा नौ से ही जुट गए थे। हालांकि तब उन्हें देश, दुनिया, समाज, गुलामी, पराधीनता, परवशता-विवशता, निर्भरता, अर्थतंत्र की लूट, आम आदमी और किसान-मजदूरों के जीवन का लगातार उजाड,़ राजनीति के दांव-पेच, प्रथम-व्दितीय विश्वयुद्धों के कारण और उनकी भयावहता आदि के बारे में बहुत पता नहीं था। नयी उमर थी। नया जोश। कुछ नया करने का हौसला भीे। सो आन्दोलन में कूद पड़े। आगें लगाईं। रेलों की पटरियां उखाड़ीं। पुलिस की लाठियां खाईं। जेल गए। घर से भगा दिए गए। गांव निकाला झेला। आजादी आई। अचानक घर वालों को उनकी याद आ गई। गांव वाले उन्हें इज्जत देने लगे। सबको उनसे आशा और उम्मीद हो गई। लेकिन वे सबसे एकदम तटस्थ और बेजार-से हो गए। परिवार उनकी शादी की फिकर करने लगा। लेकिन वे घर से फिर भाग खड़े हुए।

ऐसा नहीं है कि उन्होंने शादी नहीं की। की, लेकिन जिससे की और जिस तरह की, जिस जाति और मजहब की लड़की से की, उसके बारे में सुन-जान कर न केवल गांव वालों ने उन पर थूका, बल्कि परिवार वालों ने भी उनसे अपना नाता तोड़ लिया। जमीन-जायदाद से बेदखल कर दिए गए। अखबार में पिता ने विज्ञप्ति छपवा दी--'मेरे इस बेटे से मेरा और मेरे परिवार का अब कोई संबंध नहीं है। मैं उसे अपने घर-परिवार, चल-अचल संपत्ति से बेदखल करता हूं। उसके किसी प्रकार के लेन-देन, वायदे या वायदा-खिलाफी से हमारा और हमारे परिवार का अब कोई संबंध नहीं होगा। उससे किसी तरह के लेन-देन करने वाले लोग स्वयं ही जिम्मेदार होंगे। हम पर किसी तरह की जिम्मेदारी नहीं होगी।'

घर-परिवार, जाति-बिरादरी, दीन-मजहब और धर्म सेे बेदखल कर दिए जाने के बाद उन्होंने बहुत तरह के पापड़ बेले। तरह-तरह के काम-धंधे किए। किसी तरह जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश की पर जिंदगी को जितना समेटने की कोशिश करते रहे, जिंदगी उतनी बिखरती चली गई। यहां तक कि दो बच्चों की मां बनी उनकी पत्नी भी उनका साथ छोड़ कर किसी और के साथ चली गई। चली गई तो उसे वापस लाने और जिंदगी और परिवार कोे ढर्रे पर लाने की उन्होंने दुबारा कोशिश नहीं की। अकेले ही जिंदगी काटते रहे। मुझे उनके बारे में पता तो था लेकिन मुलाकात उस वक्त हुई जब देश में इंदिरा जी ने आपातकाल लगाया। पूरा देश दुबारा गुलामी की जंजीरों में जकड़ दिया गया। पत्रकारों के साथ मैं भी जेल में पहुंचा दिया गया था और आचरज तब हुआ जब उन्हें भी उसी जेल में पाया। वे जेल में सबसे अलग रहते। किसी से अधिक बोलते नहीं थे। गुम-सुम और चुप बने रहते। 

'आप तो पुराने कांग्रेसी हैं। गांधी के आन्दोलन में शामिल रहे। जेल गए। पुलिस की लाठियां खाईं। आपको उसी कांग्रेस के राज में आजादी के बाद पुनः क्यों जेल में डाल दिया गया?’ एक दिन जेल में ही जाड़े की धूप में उनके पास आ बैठा था।

’कैसे बेवकूफ पत्रकार हो तुम?’ उन्होंने अचरज से मेरी ओर देखा--’इस कांग्रेस को तुम गांधी वाली कांग्रेस समझ रहे हो? इस आजादी को गांधी के सपनों वाली आजादी समझने की मूर्खता करोगे तुम? यह निजी स्वार्थों के लिए, अपनी और अपने परिवार की निजी सत्ता को बनाए रखने के लिए देश की आजादी का गला घेंटने का घिनौना अपराध है किया गया है बरखुरदार और इसके खिलाफ लड़ने की वैसी ही जरूरत है जैसी गांधी के समय थी। गांधी अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे और हमें इस कांग्रेस के खिलाफ लड़ना पड़ रहा है।’ शायद यही कारण रहा कि जब वे मरे तो श्मशान घाट पर शहर के ज्यादातर लोग आए पर कांग्रेसी नेताओं में कोई जाना-पहचाना चेहरा वहां दिखाई नहीं दिया। और तो और, स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद न उन्हें पेशन दी गई। न अंतिम विदायी के वक्त दी जाने वाली पुलिसिया सलामी का प्रबंध प्रशासन ने किया। पत्रकारों ने अधिकारियों का ध्यान भी इस ओर दिलाया पर प्रशासन इंतजार करता रहा कि ऊपर से आदेश आए तो वे ऐसा कुछ करें! न ऊपर से आदेश आया, न प्रशासन के कानों पर जूं रेंगी। और वे एक साधरण, आम आदमी की तरह पंचतत्व में विलान हो गए।

आपातकाल के दौरान जेल में उनसे होती रही मेरी मुलाकात बाद में भी जारी रही। एक लालच भी मुलाकात के पीछे रहा। उनके पास पुरानी महत्वपूर्ण किताबों और विलुप्त पत्रिकाओं का भारी खजाना था जिन्हें मैं कई बार उनसे मांग कर लाता और पढ़ कर अपने ज्ञान का परिमार्जन करता रहा। आजादी के तत्कालीन आन्दोलन को समझने में उन किताबों-पत्रिकाओं ने मेरी बहुत मदद की। बहुत बार उनसे आन्दोलन के वक्त की बातों पर बहस भी करता रहा। कई बार वे मेरे तर्कों से सहमत होते पर कई बार वे मुझसे तीखी बहस करते हुए मुझे गलत सिद्ध करते और मेरी धारणा को बदलने का प्रयास करते थे। अपनी बात पर अड़ता तो वे बेहिचक मुझे गालियां देते, मूर्ख और बेवकूफ ठहराते। डांट कर चुप कर देते थे।

जिंदगी की गाड़ी खींचने के लिए उन्होंने कई तरह के कामों में अपना भाग्य आजमाया पर सफल किसी में नहीं हुए। एक टाकीज में पान की दूकान खोली। पर वह टाकीज दिनोदिन बैठता गया। बदलते वक्त के साथ लोगों ने टाकीजों में फिल्में देखना बंद कर दिया तो उनकी पान की दूकान भी चलनी बंद हो गई। बाद में एक चौराहे के नजदीक उन्होंने चाट-पकौड़ी का ठेला लगाया लेकिन लोग उसके साथ उनसे चाय का प्रबंध करने के लिए कहने लगे तो एक दूकान किराए पर ले कर उन्होंने चाट-पकौड़ों, समोसों के साथ चाय का होटल-सा डाल दिया। बच्चों को मदरसों में पहुंचा कर पत्नी भी दूकान पर आ जाती। समोसों और पकौड़ियों को बनाने में मदद करने लगी। काम चल निकला। गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह चलने लगी। लेकिन गड़बड़ तब हुआ जब उनकी दूकान पर तमाम कामरेडों, साहित्यकारों और पत्रकारों का जमघट लगने लगा। अखबार आते। शाम तक उन अखबारों की हालत फैंक देने योग्य हो जाती। अक्सर बहसों में वे खुद भी शामिल हो जाते। उनके तर्क लोगों को पसंद नहीं आते पर वे तर्क करने से बाज नही आते थे।

मजदूर संगठनों, बुनकरों, रिक्शे वालों और दिहाड़ी पर काम करने वाले लोगों के संगठनों में वे भाग लेने लगे। वामपंथी पाट्री से तो वे अरसे से जुड़े हुए थे, बाद में उनके प्रदर्शनों, जुलूसों, धरनों में भी शामिल होने लगे थे। अब उनका ध्यान दूकान पर कम, आन्दोलनों में ज्यादा रमने लगा था। नतीजा हुआ, पत्नी को ही दूकान संभालनी पड़ती। पत्नी की इच्छा थी कि आमदनी बढ़े तो वे बच्चों को खैराती मदरसों में पढ़वाने की बजाय शहर के अंग्रेजी स्कूलों की मंहगी पढ़ाई में डालें पर पति की रुचि दिनोंदिन दूकान में कम होती गई। नतीजा हुआ दूकान बैठने लगी। आमदनी बढ़ने की बजाय घटने लगी और पत्नी घर को चलाने में बहुत पेरेशानी अनुभव करने लगी। झगड़े होने लगे। गाली-गलौज की नौबतें आने लगी। अक्सर बच्चों के भविष्य को ले कर कहा-सुनी इतनी अधिक बढ़ जाती कि लोगों को उनके बीच पड़ना पड़ता और उनके झगड़े निबटाने पड़ते।

बाई पास रोड और रेलवे की लाइनें बिछाने के लिए किसानों की जमीनें ओने-पौने दामों में जबरन ली जाने लगीं तो किसानों के साथ मिल कर उन्होंने कई बार धरने-प्रदर्शन किए। उत्तेजक भाषण दिए। नतीजा हुआ, प्रशासन की आंख की किरकिरी बन गए। मौका पा उन्हें सही-गलत धाराएं लगा कर जेल में डाल दिया गया। ऐसे समय ही उनकी पत्नी उनसे परेशान हो कर अपने बच्चों को ले कर किसी और के साथ चली गई। चली गई तो उसे मना कर या कानूनी लड़ाई लड़ कर उन्होंने वापस लाने का प्रयास नहीं किया।

मैंने एक दिन उनसे कहा--‘हाथों रोटी ठेकते हो। दूकान बंद हो गई। पहले पत्नी देखे रहती थी। चलाने में मदद करती थी। बच्चे भी किसी तरह पल रहे थे। अब आप अकेले रह गए तो घर में मनहूसों की तरह एकांत में पड़े रहते हैं। मन होता है तो खाना बना लेते हैं वरना कुछ उल्टा-सीधा खा कर या डबलरोटी-बन वगैरह के सहारे दिन काट लेते हैं। ऐसे कैसे काम चलेगा? कुछ कर नहीं पा रहे। मेरा ख्याल है आप को अपनी पत्नी और बच्चों को मना कर घर वापस ले आना चाहिए।’

देर तक वे अपनी झंगोला खाट पर सिर हाथों पर थामे चुप बैठे रहे फिर एक लंबी सांस ले कर बोले--’औरत को भी आजादी का उतना ही हक है, जितना मर्द को है। वह मेरे साथ रहना नहींे चाहती। उसके बच्चों की मैं ठीक से परवरिश नहीं कर पा रहा। अक्सर आन्दोलनों के कारण जेल यात्रा करता रहता हूं। पीछे उनकी आमदनी का कोई प्रबंध नहीं रह जाता। कहां तक वे लोग मेरे साथ अपनी जिंदगी बरबाद करें? पत्नी चाहती है कि उसके बच्चे भी बड़े लोगों के बच्चों की तरह अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ें। अपना कैरियर बनाएं। अच्छी नौकरी पाने के हकदार बनें। प्रायमरी स्कूलों और खैराती मदरसों की पढाई से उनका क्या भविष्य बनना है? यही सब सोच कर उसने फैसला किया है। जिससे शादी की है, वह विधुर है। उसके बच्चे बड़े हो गए हैं। नौकरी से लग गए हैं। औरत के मरने के बाद उसकी देखरेख लड़के-बच्चे नहीं कर रहे थे तो उसने मेरी पत्नी को पटा लिया। वह उसकी बातों में आ गई। उसके साथ चली गई। उसने पत्नी के बच्चों को अपना लिया। अच्छे स्कूलों में पढ़ने लगे। उसे भी बिना कांय-क्लेश के अच्छा खाना-कपड़ा और रहने को घर मिल गया। कौन औरत यह सब नहीं चाहती? अगर मेरी पत्नी ने इस सबके लिए यह समझौता किया तो क्या गलत किया? मैं उसे यह सब कहां दे पा रहा था?'

'लेकिन आप अकेले रह गए। ठीक से खाते-पीते नहीं। आमदनी का जरिया नहीं रह गया। उम्र बढ़ती जा रही है। दिनोदिन स्वास्थ्य आप का साथ छोड़ रहा है। अक्सर खाट पर पड़े रहते हैं। बीमार पड़ जाते हैं तो कोई पानी देने वाला तक नहीं फटकता आप के पास। ऐसे कब तक जिएंगे? लोगों को अभी भी आपसे कुछ उम्मीदें हैं। उनके काम आते रहते हैं आप। इस तरह जिंदगी क्यों जाया कर रहे हैं? या तो आप अपनी पुरानी दूकान को पुनः जिंदा करिए। लोगों के बीच उठिए-बैठिए। राजनीतिक-सामाजिक बहसों में हिस्सा ले कर अपने आप को जिंदा बनाए रहिए, वरना ऐसे तो आप बेमौत मर जाएंगे।'

'असल बात यह है कि अब जीने से जी ऊब गया है। बहुत जी लिया। चुपचाप मर जाना चाहता हूं।'

साफ लगा, वे जीवन से पूरी तरह हार गए हैं। कहां यह आदमी आजादी के आन्दोलन में गांधी जी के साथ लड़ा था। आजादी के लिए पुलिस से अपनी हड्डियां तुड़वाई थीं। जेल काटी थी। कहां आजादी मिलने के बाद अन्य तमाम इन्हीं जैसे आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले लोग किनारे लगा दिए गए। किसी ने उन्हें नहीं पूछा। जिन्होंने आजादी के दौरान चोरी-चकारी या जेबकटी में जेलें काटी उन तक ने स्वतंत्रता सेनानी का सर्टीफिकेट हासिल कर लिया। पेंशन के हकदार बन गए। दूसरी तरफ उन जैसे सैकड़ों-हजारों लोग रहे जिन्होंने वाकई लड़ाई लड़ी। अपनी जिंदगियां दांव पर लगाई, वे पीछे धकेल दिए गए। किसी ने उन्हें पूछा तक नहीं। और आजकल तो आजादी की फसल काटने वाले तमाम दल राजनीति के घिनौने, स्वार्थ भरे दलदल में आ गए जो जनता को ऊन लदी भेड़ मान कर चल रहे हैं। उन भेड़ों को वे उल्टे उस्तरे से मूड़ रहे हैं। अपनी जेबें और तिजोरियां भर रहे हैं। सातों पुश्तें बैठ कर खाएं, ऐसी टकसालें लगा कर नोट छापे-चांपे जा रहे हैं। जिन्होंने देश की आजादी के लिए कुछ भी नहीं किया, वे इस आजादी की फसलें काट रहे हैं। न केवल खुद, बल्कि अपने पूरे परिवार और कुनबे राजनीति में ला रहे हैं। उनकी पांचों उंगलियां घी में तिर रही हैं। सुरा, सुंदरी और स्वर्ण में नाक तक डूबे हुए हैं। उसके लिए दिन-रात सही-गलत सब करते जा रहे हैं।

यह सब बातें उनसे कहना बेकार थीं। वे गए-गुजरे जमाने के लोग हैं जो देना ही जानते थे। जिन्होंने देश से कुछ लिया नहीं। हां, अलबत्ता जिंदगी की स्वर्ण-उम्र जरूर होम कर दी देश की आजादी के लिए। शहर में ऐसे तमाम लोग हैं जो उन्हें सिरफिरा, सिर्री, बेवकूफ और पूरा पांगा कहते नहीं थकते। पर ऐसे भी तमाम लोग हैं जो उनका आदर करते हैं। नयी पीढ़ी तो उन्हें पहचानती तक नहीं है। उनका नाम तक नहीं जानती। जब पत्रकार पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के अखबारों में ऐसे लोगों पर कोई लेख या इंटरच्यू वगैरह छाप देते हैं तो नयी पीढ़ी अचरज से उन्हें देखती है, जैसे वे आदमी न हों, कोई अजूबा हों। किसी चिड़ियाघर से पकड़ कर लाए गए कोई विचित्र जानवर!

हम तमाम लोग सिर झुकाए चुपचाप श्मशान घाट से लौट रहे थे--उन्हें चिता के हवाले करके। गनीमत रही कि उनकी पत्नी और उनके बच्चे अंतिम समय में उनके पास आ गए थे। उनकी क्रिया-कर्म में शामिल हुए। उन्होंने हिन्दू रीति-रिवाज से उनका संस्कार किया । बाद में उनकी जो भी जमा-पूंजी थी, वह सब अंध-अनाथालय को दे कर वे लोग वापस लौट गए थे, अपने उस परिवार में जहां उन्हें नया और संपन्न जीवन मिला हुआ था। मरने वाले के साथ भला कौन मरता है? और मरे भी तो क्यों मरे? सब एक जैसे सिरफिरे, पागल और बेवकूफ तो होते नहीं। आज के जमाने में लोग बहुत होशियार और समझदार हो चुके हैं। मौका मिल जाए तो दूसरों का सब कुछ हड़प लें और गर्दन रेतने तक में न हिचकें।

तमाम ऐसी ऊल-जलूल बातें सोचता हुआ मैं अपने में डूबा, जमना से वापस लौट रहा था अपने उस दगाबाज शहर के उन चतुर-चालाक-चालबाज लोगों के बीच जो ऐसे पागलों-सिर्रियों-सिरफिरों को गालियां देने में माहिर हैं! उनकी हंसी उड़ाने में सबसे आगे हैं। इन समझदार लोगों का फलसफा है--चूतिया मत बनो। चूतिया बनाओ! ऐसे काठ के उल्लुओं को वहां जाने दो जहां कोई भला आदमी नहीं जाता। ये शैतान की औलादें हैं। ऐसे ही बेमौत मरने को पैदा होती हैं। बरसाती कीड़ों-मकोड़ों के मरने का किन्हें अफसोस होता है आज की धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा की दीवानी दुनिया में? '


Antarvyatha - A Hindi Story of Dinesh Paliwal

1 टिप्पणी:

  1. कहां यह आदमी आजादी के आन्दोलन में गांधी जी के साथ लड़ा था। आजादी के लिए पुलिस से अपनी हड्डियां तुड़वाई थीं। जेल काटी थी। कहां आजादी मिलने के बाद अन्य तमाम इन्हीं जैसे आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले लोग किनारे लगा दिए गए। किसी ने उन्हें नहीं पूछा। जिन्होंने आजादी के दौरान चोरी-चकारी या जेबकटी में जेलें काटी उन तक ने स्वतंत्रता सेनानी का सर्टीफिकेट हासिल कर लिया। पेंशन के हकदार बन गए। दूसरी तरफ उन जैसे सैकड़ों-हजारों लोग रहे जिन्होंने वाकई लड़ाई लड़ी। अपनी जिंदगियां दांव पर लगाई, वे पीछे धकेल दिए गए।......बिल्कुल यही हुआ है। इस सुन्दर कहानी हेतु बधाई दिनेश पालीवाल जी और धन्यवाद डा. अवनीश जी कहानी हम तक पहुँचाने के लिये।

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