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रविवार, 24 मई 2015

समीक्षा : नवगीत होने का अर्थ - वीरेन्द्र आस्तिक

पुस्तक: चोेंच में आकाश (नवगीत संग्रह)
रचयिता: पूर्णिमा वर्मन
प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन, 942, आर्य कन्या चैराहा, 
मुट्ठी गंज, इलाहाबाद - 211003
आई.एस.बी.एन: 9789383969364 
प्रकाशन वर्ष : 2014 
पृष्ठ: 112, मूल्य 120/- (पेपर बैक)

पूर्णिमा वर्मन 
नवगीत की सेवा-साधना का पर्याय बन चुकीं श्रीमती पूर्णिमा बर्मन का नाम ‘नेट’ की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम है। उनके सद्यः प्रकाशित नवगीत संग्रह ‘चोंच में आकाश’ से गुजरना एक कुतूहल भरे आनंद से गुजरना रहा। प्रायः ऐसे गीत-नवगीत संग्रह देखने में खूब आते हैं, जिनमें गीत बने-बनाए साँचे में ढाले गए होते हैं। जाहिर है भाषा की कथ्यगत एकरसता भी वहीं होगी। सामान्यतः ऐसे ही संग्रहों पर समीक्षकीय अनुशंसा भी देखी जाती है, किन्तु चोंच में आकाश, ऐसी परम्पराओं से मुझे भिन्न दिखा, बल्कि कहना चाहिए- इसमें परम्परा के नए क्षितिज देखे जा सकते हैं। इसका प्रमुख कारण यह जान पड़ता है कि पूर्णिमा जी संचित अनुभवों की अपेक्षा स्वानुभूतियों को महत्व अधिक देती हैं। इसी से जुड़ी एक दूसरी बात है सोद्देश्यता तथा कथ्य-सामग्री के चयन में बरती गई सावधानी की। मुझे खुशी है कि इन दोनों बातों को लेकर पूर्णिमा जी सतर्कं हैं। 

सच तो यह है कि नवगीत में कथ्य-सामग्री का जैसा प्रत्यक्षीकरण चल रहा है, उससे दूरी बनाते हुए पूर्णिमा जी ने प्राकृतिक और वानस्पतिक उपादानों पर भरोसा किया है। इस तरह संग्रह में मुझे नवगीत का ट्रैक ही बदला हुआ दिख रहा है। वरिष्ठ गीतकवि गुलाब सिंह की माने तो- ‘‘अब प्रकृति की ओर से आँख मूंद कर नव-गीत लिखे ही नहीं जा सकते।‘‘ इस कथन की सही मिसाल है- ‘चोंच में आकाश’।

संग्रह के गीतों को पांच उपशीर्षकों में विभक्त किया गया है, यथा-स्वस्ति गान, फूल पान, देश गाम, मन मान और धूपधान। इन उपशीर्षकों से भी एक मौलिक दृष्टि का परिचय मिलता है।

पूर्णिमा जी फूल-पौधों और वृक्षों की प्रकृति से भलीभाँति परिचित हैं। ये फूल-पौधे उन्हें देश-विदेश घुमाते हैं और पदार्थ जगत के विरूद्ध जीवन के रागात्मक स्वर को बुनने में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करते चलते हैं। एक सामाजिक सच यह है कि जीवन की अधिकांश व्यवहारिकताएं/औपचारिकताएं इच्छा के विपरीत हुआ करती हैं। कुछ से समझौता होता रहता है, कुछ से नहीं हो पाता, उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता है, तो कुछ को विद्रोह तक आना पड़ता है। मुझे ऐसा लगता है कि रचनाकार के अवचेतन में कहीं एक असंतोष है, जिससे अनेक गीतों की प्रकृति तय हुई है। जिससे एक आत्यांतिक उद्देश्य का बोध होता है जो कभी-कभी न केवल स्वयं के प्रति अपितु वर्तमान के प्रति भी प्रश्नाकुल हो उठता है-

कितने कमल खिले जीवन में
जिनको हमनें नहीं चुना
........................ 
जाने कैसी दौड़ थी जिसमें
अपना मन ही नहीं सुना (पृष्ठ: 36)

देश गाम के नवगीतों में अपेक्षित प्रवाह है तो पठनीयता भी है। भाषा न्यूनाधिक सांकेतिक है। राष्ट्र प्रेम, हिन्दी प्रेम, मूल्यहीन परिवेश, अकेलापन, विरक्तिभाव आदि का स्थायी स्वर मौजूद है यहां। एक स्वाभाविक-सी बात यह भी है कि विदेश में कुछ ज्यादा ही शिद्दत से अपनी माटी की याद आती है। शायद यही कारण है कि विदेश में रहते हुए पूर्णिमा जी को हर सागर, हिन्द महासागर, हर पानी, गंगाजल और हर शहर काशी लगता है। ऐसी सार्वभौमिक दृष्टि न केवल कवयित्री को राष्ट्र-भक्त बनाती है। अपितु विश्वबन्धुत्व की स्थापना को सुदृढ़ भी करती है। इससे यह भी साबित होता है कि हमारा परिवेश, हमारी जीवन शैली कितनी ही बदल जाए, हम आत्मिक सुकून तलाश ही लेते हैं- 

हर सागर हिन्द महासागर
हर पानी गंगा जल, हर-हर
हर समय साथ झरने बहते हैं 
- मेरी माटी मेरा देश (पृ. 57)

जो लोग नवगीत के घिसे-पिटे विषयों (आम और खास या राजनीतिक पृष्ठभूमि) में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं उनको इन गीतों से निराश होना पड़ सकता है, किन्तु इसके विपरीत जो विचार-संपदा है... इन्हीं गीतों को वजनदार बनाती है इस दृष्टि से ‘सन्नाटों में’ और ‘जिन्दगी’ जैसे गीत अद्भुत है, तो ‘नाम लो मेरा’, 'ढूंढ तो लोगे', जैसे गीतों में अर्थ का विशेष प्रवाह है। ‘राम भरोसे’ जैसे शीर्षक तो नवगीत के इतिहास में दर्ज हो चुके हैं।
आज की आधुनिकता के कई आयाम हैं। आधुनिकता की अवधारणा ही वैज्ञानिक हैै। वही बाजार में तब्दील हो गई है। ये आधुनिकताएं ही हैं जिनके कारण व्यक्ति की शक्तियों को व्यक्ति के ही स्वार्थ और अहंकार डस रहे हैं। तभी शहरों में मारा-मारी है। सारे मूल्य (मोल) छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। जीवन मूल्यों के अभाव में और सुविधा संपन्नता की अतिशयता से व्यक्ति अकेला पड़ गया है, एक सन्नाटे में आ गया है। वह एक नकारात्मक अतंर्गूंज से विवश है। कभी-कभी ऐसे सन्नाटे अंतर्मन को मथते हैं। इस प्रक्रिया में जो गहरे उतर गए वो रस के सागर मे डूब गए (दृष्टव्य : सन्नाटों में)। कहना चाहता हूूं कि पूर्णिमा जी की अंतर्यात्राएं गीतों में सादृश्य ‘पेंट’ हुई हैं।

‘सन्नाटों में’ का उत्तर है 'जिन्दगी' शीर्षक गीत। आज के जटिल समय की सच्ची कविता। कविता जो अनेक जटिलताओं को तार-तार करके आपके लिए आपके होने का अर्थ करती है। दूसरी तरफ भाषा में एक नवीनता है और एक रागात्मक चेतना भी। क्योंकि पुरानी कलात्मकता-पुराने पड़ गए अर्थ देखते-सुनते एक यथास्थिति आ गई थी। ऐसे गीत हदों के बाहर आकर नवगीत की परिभाषा के नए द्वार खोलते हुए दिखते हैं-

चाहे बांचो, चाहे पकड़ो, चाहे भीगो
एक आवाज है बस दिल से सुनी जाती है
कभी पन्ना, कभी खुशबू, कभी बादल
जिन्दगी वक्त-सी टुकड़ों में उड़ी जाती है। (पृष्ठ: 73)

अपनी एक कविता है - ‘युग की नीव/ खिलौने जेसे/ बच्चे धरते हैं। संस्कृतियों के युद्धों को/ संस्कार जयी करते हैं।’ सवाल है, हम अपने बच्चों को कैसे संस्कार दे रहे हैं? क्या वे अपनी संस्कृति के रक्षण में एक योद्धा के रूप में बड़े हुए हैं? क्योंकि कथित आधुनिकता और बाजारवाद के वायरस हमारी संस्कृति के हितैषी कदापि नहीं हो सकते। नहीं भूलना चाहिए कि विश्व की अनेक संस्कृतियां ऐसे युद्धों में नेस्तनाबूत हो चुकी हे। ‘मन मान’ के गीत इसी जमीन के समर्थ गीत है। ये गीत अपनी आत्मा के निकट बुलाकर पाठक को अपना जिज्ञासु बना लेते हैं। इस कविताई का यही अभीष्ट है। माटी की खुशबू और माॅ-पिता का साया तृप्ति के निश्चित स्रोत होते हैं। जिसके समक्ष बड़े-बड़े कष्ट क्लेश-उड़न छू हो जाते हैं। संबंधों के जिए हुए स्मृति बिम्ब मन मोह लेते हैं -

उठा तर्जनी
दूर कहीं
गंतव्य दिखाते
थक जाने पर गोद उठाते 
धीरे-धीरे कोई कहानी कहते जाते 
साथ-साथ आशीष पिता के। (पृष्ठ: 70)

यों तो एक शाश्वतता को, जीवन मूल्यों को पहचानते रहने का क्रम निरन्तर चलता है किंतु दूसरी तरफ हमारी ही जीवन शैली इस पहचान को धूमिल करने से बाज नहीं आती-ये प्रतिस्पर्धात्मक भागम-भाग, ये आम आदमी की अंतहीन यातनाएं, ये मानवता के मुखौटों का भ्रष्टाचार। क्या हम एक दुष्चक्र में शामिल नहीं हो गए हैं, जहां हमारा ही अस्तित्व संकटग्रस्त है। ऐसी दुनिया के सामने हम किन उपलब्धियों को महत्व दें? किस शांति की बात करें?

खून खराबा मारा मारी
कहां जाए जनता बेचारी
आतंकों में शांति खोजना
केवल पागलपन लगता है। (पृष्ठ: 72)

ऐसे विपर्यस्त समय में पूर्णिमा जी के काव्यात्मक संस्कार प्रबल हो उठते हैं। एक विरक्ति भाव (विकल्प रूप) अतीत की ठोस जमीन पर खड़ा होकर वर्तमान का बल बनता है, अर्थात आत्म शक्ति स्वयं इस मायाबी संसार के समक्ष एक चुनौती के रूप में खड़ी हो गई है, क्योंकि -

अब भी हिन्दी गानों पर
मन विव्हल होता है
अब भी मन का कोई कोना
गांव में होता है। 
भाषा बदली
रामायण सत्संग नहीं बदला। (पृष्ठ: 86)

संग्रह का अन्तिम खण्ड लगता है जैसे ‘फूल पान’ का अगला संस्करण है। अधिकांश गीतों में प्रकृति उत्सवा है। शस्य-श्यामला का रमणीय चित्रांकन हैै। सृष्टि में भी एक प्रकार की वैज्ञानिकता निहित है। कवयित्री को उसका भलीभाॅति बोध है। सच कहा जाए तो नैसर्गिकता इस संग्रह के रचाव की पृष्ठभमि में है। इन गीतों की प्रतिध्वनियों से मुझे ख्यात गीतकार रमानाथ अवस्थी की एक लोकप्रिय गीत-पंक्ति याद आ रही है- ‘‘कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए।’’ मन है तो मौसम है। किन्तु कभी-कभी प्रकृति का श्रृंगार देखते ही मन काव्यानुरागी हो उठता है। प्रकृति का अंग-अंग बाचने में वह भाषा के नए-नए प्रयोग करता जाता है। ‘‘बूंदों के संतूर बजने लगते है।’’ मेघों का ढोल धनकता है। मन, कानों में घुँघरू जैसी कलियों को लटका कर थिरकने लगता है। इसी प्रकार ‘‘ताड़ के करतल, पेड़ों के झंडे, धूप के दोने, बादलों की ओढ़नी, खुशी के नोट, कलकलाते कूप, सीली आंखे, मन की मटकी, दंग सावन, रेशमी नखत आदि ऐसे टटके प्रयोग पूर्णिमा जी की कल्पनाशीलता के द्योतक है। लगता है जैसे प्रकृति के सान्निध्य में उन्होंने अनेकानेक अछूते दृश्यों से बातें की हैं, प्रकृति से एकाकार होकर गीत गाए हैं -

बादलों की ओढ़नी
मन ओढ़ता है
एक घुंघरू
चूड़ियों में बोलता है। (पृष्ठ: 106)
.......................... 
हम थे, तुम थे, साथ नदी थी
पर्वत पर आकाश टिका था
झरनों की गति मन हरती थी। (पृष्ठ: 107)

किसी भी साधना के पीछे देखना यह होता है कि साधक की जिज्ञासा कितनी प्रबल थी। कभी-कभी निर्दिष्ट भाव की स्पष्ट अभिव्यक्ति हेतु विधि-विधान भी रूपान्तरित होते जाते हैं और अन्ततः नवीन कला रूप आकार ग्रहण करते है। इस कसौटी पर यह संग्रह एक सकारात्मक संभावना जगाता है। इसमें स्वानुभूतियों के बेहिचक प्रयोग हुए हैं। हालांकि अभी अटपटेपन से पूरी तरह मुक्त होना शेष है। फिर भी अनकहा कहने के लिए भाषा का जोखिम उठाना ही पड़ता है। ऐसे में प्रायः गीत-रचाव में विसंगत शब्द योजित हो जाते हैं। यह भी हो सकता है कि अमुक शब्द रचनाकार की दृष्टि में उचित हो। कहना चाहता हॅू कि अक्सर शब्द-मोह रचनाकार को उचित शब्द तक पहुंचने ही नहीं देता। इसी प्रकार लय में आई ‘लहर’ को या एकाएक आई ‘उछाल’ को संगीतज्ञ तो सॅभाल लेते हैं किन्तु अक्सर गीत के (अ) मर्मज्ञ उसे दोष के रूप में देखते हैं, जो उचित नहीं। ऐसा नवता के अधिक आग्रह के कारण भी होता है। स्वयं पूर्णिमा जी ने कहा है - ‘‘नवता नए व्याकरण खोले परम्परा के उठे खटोले।" (पृष्ठ: 40)

‘चोंच में आकाश’ पूर्णिमा जी का पहला संकलन है। दरअसल युवा रचनाकारों में विचारों/ कल्पनाओं का एक तूफान होता है। देखना यह होता है कि उस तूफान को कविताई मे कैसे व्यवस्थित किया गया हैै। यहां नवगीतों का भाषाई मुहावरा पके फल की तरह है तो एकाध जगहों पर अभी भाषा को पकने में थोड़ी-सी कसर है। एक अच्छी और जरूरी बात की मुझे प्रसन्नता है कि पूर्णिमा जी के स्वभाव में-उनके अनुभव संसार में भारतीय मनीषा की गहरी पैठ है। इसका प्रमाण है - 'चोच में आकाश।' ऐसी जीवन्त रचनाशीलता को, उसकी गत्यात्मक कल्पनाशीलता को हिन्दी काव्य-जगत द्वारा चिन्हित/रेखांकित किया जाना चाहिए।





समीक्षक :
वीरेन्द्र आस्तिक
एल - 60, गंगविहार, कानपुर, उ. प्र. 
मो- 9415474755

1 टिप्पणी:

  1. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
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