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सोमवार, 14 सितंबर 2015

विनम्र श्रद्धांजलि: श्रीकांत मिश्र कांत नहीं रहे

श्रीकांत मिश्र कांत

11 सितम्बर 2015, लखनऊ
मेरे परम प्रिय मित्र श्रीकांत मिश्र कांत जी का निधन हो गया। वह काफी समय से कैंसर से पीड़ित थे। लखनऊ के कमांड हॉस्पिटल के कैंसर वार्ड में आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। लेखन एवं पर्यटन में विशेष रुचि रखने वाले कांत जी ने इंटरनेट पर न केवल साहित्यिक पत्रिकारिता की, बल्कि आदरणीया पूर्णिमा जी द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित नवगीत महोत्सव में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपका जन्म १० अक्तूबर १९५९ को उत्तर प्रदेश के जनपद लखीमपुर खीरी स्थित गाँव बढ़वारी ऊधौ में हुआ। आपने विद्युत इंजीनीयरिंग में डिप्लोमा और कैमरा व कलम से बचपन का साथ निभाते हुये मल्टीमीडिया एनीमेशन, विडियो एडिटिग में विशेषज्ञता के साथ कम्प्यूटर एप्लीकेशन में स्नातक शिक्षा प्राप्त की। वायुसेना मे सूचना प्रोद्यौगिकी अनुभाग में वारण्ट अफसर के पद पर कार्य करते हुए आपको वर्ष १९९४ में कीव (यूक्रेन) में प्रवास के दौरान पूर्व सोवियत सभ्यता संस्कृति के साथ निकट संपर्क का अवसर मिला। तदुपरान्त अन्य अवसरों पर ओमान, ईरान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान तथा भूटान की यात्रा से वैश्विक विचारों में संपुष्टता हुयी। असम के जोरहाट से, गुजरात में जामनगर, दक्षिण में बंगलौर, चेन्नेई से लेकर नागपुर, कानपुर, आगरा, चण्डीगढ, कोलकाता, लखनऊ सहित सारे भारत में लम्बे प्रवास से आपके भीतर अखिल भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ, जिसकी स्पष्ट छाप आपके सामाजिक- साहित्यिक क्रियाकलापों में स्पष्ट दिखाई पड़ती थी। मेरे इस प्यारे मित्र की जीवनोपरांत सुखद यात्रा के लिए अनंत शुभकामनायें। विनम्र श्रद्धांजलि।
 
मृत्यु की पदचाप - श्रीकांत मिश्र कांत
 
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ
कौन हो, कैसे, नहीं मैं जानता हूँ
किन्तु एक अभिनव महा उत्साह से
मैं आ रहा हूँ
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ
  धूल जाने चरण किसके छू मेरे माथे लगी
अतुल अनजानी अनल से वसन सारे जल गये
थी मलिन बस्ती डगर पा आज
तुम तक आ रहा हूँ
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ


स्रष्टि का अविचल महामंडल घिरा प्रतिछोर से
दिव्य आभालोक मण्डित चकित हूं चहुंओर से
सत्य सलिला सरित तट पर
लो ... आज मैं भी आ रहा हूं
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ


शून्य में पग चिन्ह फिरता खोजता
गहन गह्‍वर तमस में अनभिज्ञ धुंधले मार्ग पर
ओ बटोही अनत अंतस के सुनो
निसर्ग चलना ही पथिक का धर्म
चलता जा रहा हूँ
अव्यक्‍त मेरे युग बटोही ठहर
मैं भी आ रहा हूं.
मृत्यु की पदचाप सुनता जा रहा हूँ। 

विधान केसरी, मुरादाबाद, 14 अक्टूबर 2013

कला दीर्घा, नवगीत महोत्सव, लखनऊ

नवगीत महोत्सव, लखनऊ

Unexpected Death of my dear friend Srikant Mishra Kant

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