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रविवार, 27 मार्च 2016

डॉ सुरेन्द्र वर्मा की तीन व्यंग्य रचनाएँ

डॉ सुरेन्द्र वर्मा

वरिष्ठ कवि, चिन्तक और समीक्षक डॉ सुरेन्द्र वर्मा एक सफल व्यंग्यकार के रूप में जाने जाते हैं। डॉ वर्मा का जन्म 26 सितम्बर 1932 को मैंनपुरी, उ.प्र.में हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से दर्शनशास्त्र में 1954 में प्रथम श्रेणी में एम् ए किया। बाद में विक्रम वि.वि. उज्जैन से गांधी दर्शन पर पीएच.डी.। वे इंदौर में शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे, इंदौर विश्वविद्यालय (अब, देवी अहिल्या वि. वि.) में दर्शनशास्त्र समिति के अध्यक्ष तथा कला-संकाय के डीन रहे। वे म.प्र. के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों के प्राचार्य पद से 1992 में सेवानिवृत्त हुए। तदुपरांत उन्होंने अपना सारा समय साहित्य-साधना को समर्पित कर दिया।

डॉ वर्मा के अब तक आधे-दर्जन से अधिक व्यंग्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 'कुरसियाँ हिल रही हैं' काफी चर्चित रहा है और इसके अब तक दो संस्करण, प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली, से आ चुके हैं। इसी तरह उनका एक अन्य संकलन ‘हँसो लेकिन अपने पर' उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ से शरद जोशी पुरस्कार से सम्मानित हो चुका है। प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का कहना है कि सुरेन्द्र वर्मा की 'रचनाएं मेरे लिए इस अर्थ में मूल्यवान हैं कि इनके द्वारा मैं एक ऐसे रचना जगत से परिचित हो सका जो आज के चालू व्यंग्य लेखन के परिदृश्य से कई अर्थों में अलग है।' उनकी रचनाओं में 'उनकी अध्ययनशील पृष्ठभूमि का सहज परिचय मिलता है। फिर भी उनकी यह पृष्ठभूमि उनकी रचनाओं को बोझिल नहीं बनाती। सिर्फ संकेतों से उनके व्यंग्य में बहुस्तरीयता की रंगत पैदा करती है।'
 
प्रकाशित ग्रन्थ : व्यंग्य संकलन – लोटा और लिफाफा, कुरसियाँ हिल रही हैं, हंसो लेकिन अपने पर, अपने-अपने अधबीच, राम भरोसे, हंसी की तलाश में, बंधे एक डोरी से; साहित्य, कला और संस्कृति – साहित्य समाज और रचना (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा निबंध के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार), कला विमर्श और चित्रांकन, संस्कृति का अपहरण, भारतीय कला एवं सस्कृति के प्रतीक, कला संस्कृति और मूल्य, चित्रकार प्रो.रामचन्द्र शुक्ल पर मोनोग्राफ; निबंध संग्रह – सरोकार; कविता – अमृत कण (उपनिषदादि का काव्यानुवाद), कविता के पार कविता, अस्वीकृत सूर्य, राग खटराग (हास्य-व्यंग्य तिपाइयाँ), धूप कुंदन (हाइकु संग्रह), उसके लिए (कविता संग्रह) । इसके अतिरिक्त १० और ग्रन्थ, दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान पर।

सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ से डा. सुरेन्द्र वर्मा की पुस्तकें दो बार पुरस्कृत, दर्शन के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध कार्य के लिए म.प्र. दर्शन-परिषद् द्वारा प्रशस्ति पत्र, भारतीय साहित्य सुधा संस्थान, प्रयाग से “भारतीय सुधा रत्न’ तथा विश्व भारतीय कला निकेतन, इलाहाबाद से 'साहित्य शिरोमणि' उपाधि से सम्मानित। विशेष : डॉ वर्मा रेखांकन भी करते हैं और उनके रेखांकनों की एक प्रदर्शिनी इलाहाबाद संग्रहालय में लग चुकी है। कई हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनके रेखांकन प्रकाशित होते रहते हैं। सम्प्रति: स्वतन्त्र लेखन तथा गांधी दर्शन के विशेषज्ञ के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा राजर्षि ओपन वि.वि., इलाहाबाद से सम्बद्ध। संपर्क :
१०, एचआईजी, १, सर्चुलर रोड, इलाहाबाद - 01, (मो) 09621222778, ई-मेल : surendraverma389@gmail.com।

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
1. व्यंग्य विविधा
 
यह तो आप और हम सभी जानते हैं कि व्यंग्य नाना प्रकार के होते हैं / हो सकते हैं. कुछ व्यंग्य मोखिक होते हैं – मुंह से बोलकर सुनाए जाते हैं ; कुछ लिखित होते हैं – पढ़े जाते हैं ; कुछ रेखांकित किए जाते हैं – इन्हें कार्टून के रूप में देखा जा सकता है. अभी तक ऐसे व्यंग्य नहीं बन पाए हैं जो स्पर्श किए जा सकें और ऐसे भी नहीं बन पाए हैं जिन्हें खाया-पिया जा सके. सूंघने वाले व्यंग्य भी नहीं ही हैं. हाँ, कुछ लोग साधारण बातों में भी व्यंग्य ‘सूँघ’ लेते हैं, पर यह तो खुद ही व्यंजना है. इसी तरह चुभते व्यंग्य को लोग कभी कभी गटक जाते हैं, पी लेते हैं और चुप रहते हैं. यह भी वयंजना में ही कही गयी बात है. वस्तुत: व्यंग्य खाया-पीया नहीं जा सकता. कभी कभी हास्य लेखक अपनी हास्य रचना में व्यंग्य का हलका सा स्पर्श दे देते हैं, आप चाहें तो इसे ‘स्पर्श’ मानिए न मानिए. मर्जी आपकी. लेकिन यह हल्का स्पर्श भी ‘चुभ’ सकता है!

मैं वस्तुत: साहित्यिक व्यंग्य की बात कर रहा था, जो छपता है, प्रकाशित होता है. यह कई विधाओं में लिखा जाता है. व्यंग्य कविता, व्यंग्य नाटक, व्यंग्य कहानी, व्यंग्य उपन्यास आदि. इनमें भी हर विधा में व्यंग्य के अनेक रूप हैं. कविता में हंसिकाएं हैं, क्षणिकाएं हैं, आदि. कहानी में लघु कहानियां हैं, बड़ी बड़ी व्यंग्य कथाएँ हैं, इत्यादि. और तो और व्यंग्य उपन्यास भी हैं, जिनमें व्यंग्य भले थोड़ा कम हो उपन्यास के तत्व भी थोड़े कम ही रहते है, अभी तक व्यंग्य-महा-काव्य मैंने नहीं देखा. जिस तरह व्यंग्य की आजकल छीना-झपटी हो रही है, मुझे पूरी उम्मीद है की व्यंग्य महा-काव्य का स्वागत करने से भी हम वंचित नहीं रहेंगे. व्यंग्य की क्या बात है! उसके नाटक भी कम नहीं हैं.

अरे हाँ, निबंध की बात करना तो मैं भूल ही गया, जब कि सोचा तो यह था की व्यंग्य निबंधों की विविधता के सम्बन्ध में ही आपकी सेवा में दो शब्द कहूँगा. सच तो यह है कि साहित्यिक व्यंग्य की मूल विधा तो निबंध ही है, भले उसमें कभी कहानी, कभी नाटक और कभी कविता के तत्व आ जाएं. जब आप व्यंग्य लिखते हैं तो ऐसे तत्वों आ जाना गैर-मुनासिब भी नहीं होता. लेकिन इससे एक भ्रम हो जाता है और वह यह कि जिस किसी विधा में भी आपको निबंध-कविता-नाटक-कहानी के तत्व मिल आएं और आप यह निर्णय न ले सकें कि यह वास्तव में कौन सी विधा है तो आप निश्चिन्त रूप से कह सकते हैं कि यह “व्यंग्य-विधा” है ! अब भी क्या व्यंग्य-विधा की परिभाषा ढूँढ़ने की ज़रूरत रह गई है?

तो इसी व्यंग्य विधा को आजकल पत्र-पत्रिकाओं में अधिकतर परोसा जा रहा है. इस विधा ने अनेकों अच्छे-भले व्यंग्य-लेखक हिन्दी जगत को प्रदान किए हैं. आदरणीय महरूम श्रीलाल शुक्ल का कहना था कि आजकल न जाने कितने व्यंग्य लेखक (कुकुरमुत्तों) की तरह उग आए हैं जो व्यंग्य के नाम पर अपनी कलम घसीट रहे हैं. स्वयं स्वर्गीय शुक्ल जी एक कालजई व्यंग्य उपन्यास लिखकर अमर हो गए और कई व्यंग्य लेखकों को अमर हो जाने के लिए व्यंग्य उपन्यास लिखने की प्रेरणा दे गए. लेकिन आखिरी समय तक वे अनेक पत्र पत्रिकाओं के व्यंग्य स्तम्भों में व्यंग्य निबंध लिखते रहे. यह बात दूसरी है.

व्यंग्य निबंध खूब छप रहे हैं. जनता की मांग है. पत्र-पत्रिकाएँ भला उसे कैसे ठुकरा सकती हैं? लेकिन यह सम्पादक की मर्जी है कि पत्रिका में वे कहाँ छापी जाएं. पत्रिका में अपने सुरक्षित स्थान के चलते व्यंग्य की अनेक किस्में बन गयी हैं / बना दी गयी हैं. कुछ का जायज़ा लीजिए –

व्यंग्य-अधबीच – कुछ व्यंग्य अधबीच होते हैं. अर्थात, जो आलेख व्यंग्य बनते बनते व्यंग्य बन नहीं पाते. उन्हें अधबीच कहा जा सकता है. यदि ऐसा है तो सम्पादक को उन्हें छापना ही नहीं चाहिए. नई दुनिया, इन्दौर, ने जब अपना व्यंग्य कालम, ’अधबीच’ शुरू किया था, तो उसमें अधबीच की कसौटी बेशक यह नहीं थी. व्यंग्यात्मक आलेख ही प्रकाशित किए जाते थे. लेकिन स्तम्भ का नाम अधबीच था. उन दिनों अंग्रेज़ी के ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के सम्पादकीय पृष्ठ पर एक हलके अंदाज़ का ‘मिडिल कालम’ बीचोंबीच छपता था, शायद इसी से प्रेरणा लेकर नई दुनिया में अधबीच शुरू किया गया था. यह बात बहुत पुरानी है लगभग ३० -३५ साल पुरानी. तब से लघु व्यंग्य आलेखों पर ‘अधबीच’ नाम ऐसा चस्पां हुआ कि आजतक म. प्र. में व्यंग्य को अधबीच ही समझा जाता है. यह शायद इसलिए भी कि अधबीच है की आत्मा न तो पूरी तरह व्यंग्य में डूबी है और न ही हास्यरस में. इसमें दोनों का एक अद्भुत सम्मिश्रण पाया जाता है. जो लोग हास्य और व्यंग्य के मिलाप को उचित नहीं मानते वे ऐसे आलेखों को व्यंग्य मानते ही नहीं. अधबीच व्यंग्य आकार में भी अपेक्षाकृत छोटे ही होते हैं.

व्यंग्य-हाशिया – इस प्रकार के व्यंग्य आलेखों की शुरूआत सबसे पहले भारत के कभी सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी साप्ताहिक, ‘धर्मयुग’, ने की थी. हास्य-व्यंग्य आलेख उन दिनों बहुत कम छापे जाते थे. पत्रिका के पूरे पृष्ट पर तो उनके छपने का सवाल ही नहीं था. सो मझोले आकार के हास्य-व्यंग्य आलेखों के लिए पृष्ट के दाहिनी या बाईं तरफ का कालम सुरक्षित कर दिया गया. हाशिए पर छपने वाले ये व्यंग्य आलेख एक अच्छे शब्द के अभाव में ‘व्यंग्य-हाशिया’ पुकारे जा सकते हैं. लेकिन धर्मयुग में ही, विडम्बना देखिए, इस ‘व्यंग्य हाशिए’ ने धीरे धीरे पूरा पृष्ठ हथिया लिया और व्यंग्य अपनी पूरी गरिमा के साथ कहीं भी, किसी भी पृष्ठ पर, अपनी पूरी तेजस्विता से प्रकाशित होने लगा. लेकिन समय हमेशा एक सा नहीं रहता. आज कई पत्रिकाओं में ‘व्यंग्य हाशिया’ पुन: प्रवेश पा रहा है.

व्यंग्य चलते-चलते / आख़िरी पन्ना – लीजिए, बहुत जिद करते हैं, छापे देते हैं एक व्यंग्य भी. कुछ इसी भाव से चलते-चलते, पत्रिका का अंतिम पृष्ठ व्यंग्य के लिए सुरक्षित कर दिया गया. यह ‘चलते-चलते व्यंग्य’, या कहें, व्यंग्य के लिए रियायात के तौर पर ‘आखिरी-पन्ना व्यंग्य’ हो गया. कई पत्रिकाओं ने इसे अपना लिया. व्यंग्य ढूँढ़ने में अब पाठक को परेशानी नहीं रही. पत्रिका को पीछे से पढ़ना शुरू कीजिए, सबसे पहले व्यंग्य मिलेगा. अब तो खुश !

और अंत में, “व्यंग्य-लाघव’’ या ‘टिप्पणी व्यंग्य’ – इस छोटे से, नन्हें से व्यंग्य की भला क्या हैसियत ! कहीं भी डाल दो, पढ़ा रहेगा. लेकिन इसकी ख़ास जगह पन्ने के नीचे यदि थोडा सा रिक्त स्थान रह गया है, तो उसे भरने के लिए सुरक्षित की गई है मानों कोई पाद-टिप्पणी हो ! कभी कभी सम्पादक के रहमोकरम से उसे ‘बौक्स” में भी दाल दिया जाता है.

तो ऐ मेरे प्यारे व्यंग्य लेखको, लघुकाय व्यंग्य लिखना बंद कर दो. धीरे धीरे उन्हें विलुप्त हो जाने दो. संपादकों की कृपा रही तो अपनी मौत मर जाएंगे. बड़े बड़े निबंध लिखो. बड़े बड़े नाटक लिखो. बड़ी बड़ी कहानियां लिखो. कुछ नहीं तो छोटे छोटे उपन्यास ही लिख डालो. भले ही इन महान विधाओं में रहकर व्यंग्य चरमरा ही क्यों न जाए ! उसे वहां ढूँढ़ना ही क्यों न पड़े, पर लिखो. व्यंग्य विधा में वही व्यंग्य है!

2. फीतों के रंग
फीतों के रंग जूतों के हिसाब से बदलते रहते हैं. काले जूतों में काला फीता ही फबता है. ब्राउन जूते में ब्राउन फीता ही डाला जाता है. किरमिच के स्पोर्ट्स जूते प्राय: सफ़ेद और पीले रंग के होते हैं, उनमें, ज़ाहिर है क्रमश: सफ़ेद और पीले फीते पड़ते हैं. किस्सा कोताह, जिस रंग का जूता उसी रंग का फीता. असल बात मैचिंग की है. जूते और फीते की यह मैचिंग साड़ी के फ़ाल की तरह कठिन तो नहीं होती, लेकिन उसी की तरह ज़रूरी तो होती ही है. दफ्तर के लिए मैं तैयार हो रहा था. जैसे ही जूता कसने लगा की फीता टूट गया. मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि मुझमें इतनी ताकत कहाँ से आ गई कि वह जूते के फीते जैसी मज़बूत चीज़ तोड़ दे. ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अत: मैंने अनुमान लगाया की हो न हो इस्तेमाल से फीता ही कमजोर पड़ गया होगा. मुझे दफ्तर जाना था सो इस मुद्दे पर सोच विचार ज्यादह नहीं कर सकता था. तात्कालिक समस्या यह थी कि दूसरा काला फीता कहाँ से आए कि उसे डाल कर जूता पहन लिया जाए. मरता क्या न करता, फटे-पुराने ब्राउन जूतों में से ब्राउन रंग का एक फीता निकाला गया और उसी को काले जूते में पिरो कर काम चलाया गया. दफ्तर में खूब भद्द उडी. काले जूते में ब्राउन फीता, वाह! क्या ‘मैच’ है!

कितनी दादागीरी है. अगर जूते के रंग के हिसाब से आपने फीते का चुनाव नहीं किया तो आपकी भद्द होने में कभी कोताही नहीं होगी. आप चाहें इसे ज़बरदस्ती कहें या फीताशाही. लेकिन है तो है !

फीते के रंग तो तरह तरह के होते ही हैं, काम के हिसाब से उसके कई प्रकार हैं. अभी हमने जूते के फीतों की बात की, लेकिन गोटे-किनारों की तरह कपड़ो के हाशिए पर लगने वाले सूत या रेशम की पतली पट्टी के रूप में भी फीते ही होते हैं; और निवाड़ की वह पतली धज्जी भी फीता ही होती है जिससे फाइलें, बांधी जाती हैं. वह दफ्तर ही क्या जिसमें फाइलें न हों और वो फाइल ही क्या जो फीते से न बंधी हो.

इस बात का संकेत पहले ही दिया जा चुका है कि फीते के रंग और प्रकार के साथ आप कोई समझौता नहीं कर सकते. अधिकतर फ़ाइलों में निबाड़ का फीता होता है जो बेहद मज़बूत होता है. उसे खोला तो जा सकता है लेकिन तोड़ा नहीं जा सकता. खोल कर फ़ाइल का आकार बढाया तो जा सकता है लेकिन तोड़ कर फ़ाइल का वज़न कम नहीं किया जा सकता. वैसे भी हर फ़ाइल का अपना वज़न होता है. वह फ़ाइल ही क्या जिसमे वज़न ही न हो ! फ़ाइल के वज़न के हिसाब से ही फीता तोड़ने का जुगाड़ बैठाने के लिए दफ्तरों में पैसा लिया जाता है.

फाइलों के फीते अधिकतर लाल रंग के होते हैं. ये लाल रंग के क्यों होते हैं, ये आजतक किसी को पता नहीं चला. इस पर रिसर्च होनी चाहिए. वे यदि लाल रंग के न भी हों तो भी उन्हें लाल रंग का ही माना जाता है – फाइलों के फीतों के लाल रंग का इतना आतंक है ! इसीलिए तो इसे ‘लाल फीताशाही’ नाम से नवाज़ा गया है. लाल रंग, जैसा कि आप सभी जानते हैं, एक उभयमुखी, क्या कहते हैं उसे अंग्रेज़ी में, ‘अम्बीवलेंट’, रंग है – एक साथ प्रेम का प्रतीक भी है और आतंक का द्योतक भी है. लाल फीते वाली फाइलें दफ्तर को बड़ी प्रिय होती हैं, वे बाबुओं को “प्रसन्न” कर देती हैं. उनमें यह ताकत होती है की वे प्रसन्न कर सके. लेकिन वे डराती भी खूब हैं. उनके मज़बूत फीते को तोड़ने की हिम्मत जुटाना कोई आसान काम नहीं है. बड़ा जोखिम है. लेकिन बहुतेरे ऐसे उत्साही और साहसी लोग होते हैं जो यह जोखिम उठा लेते हैं. पकडे गए तो जोखिम की कमाई की रकम से ही भरपाई भी कर देते हैं. ऐसे लोगों की संख्या आजकल दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है. भारत के विकास में उनका बड़ा योगदान है. सुना है आजकल सरकार सख्त फीतों के साथ बेरहम होती जा रही है और उनका रंग बदलने क पर आमादा है. वह लाल फीताशाही समाप्त करना चाहती है. एक बड़े दफ्तर के बाबू से मेरी मुलाकात हुई. कहने लगे सरकार के चाहने से क्या होता है? लाल फीताशाही तो सनातन है और हमेशा बनी रहेगी. दफ्तर तो आखिर हम चलाते हैं.

दफ्तर बाकायदा चल रहे हैं. फाइलों के फीते आज भी लाल हैं. तथास्तु. 

3.  झाडू के दिन फिरे
 
झाडू कहें या बुहारी, कूचा कहें या झाड़न – सब एक ही परिवार के सदस्य हैं. इस परिवार के दिन कभी न फिरे. यह हमेशा तिरस्कृत ही रहा. दूसरों को साफ़-सुथरा करता रहा लेकिन स्वयं कूड़े से भी बदतर समझा जाता रहा. पर झाडू के दिन अब फिर रहे हैं. जब से एक नव-निर्मित राजनैतिक दल को झाडू का चुनाव-चिह्न मिला है, झाडू इतराने लगी है. इतराने की बात ही है. वैसे झाडू एक छोटा सा उपकरण है. पर है यह बड़े काम का. जहां जहां धूल और गर्द है, वहां वहां इसकी मांग है. इसी मांग के चलते वह राजनीति में घुसपैठ कर सका. राजनीति में भ्रष्टाचार बुहारने का काम अपने सिर ले लिया और इस तरह भ्रष्टन की पोल खोलते-खोलते पोलिंग बूथ तक पहुँच गया.

झाडू चाहे नारियल की हो, चाहे सींकों की, चाहे वह फूल-झाडू ही क्यों न हो – जहां भी गंदगी हो, उसे साफ़ करने में सक्षम है. सुबह उठकर घर-घर में झाडू लगाई जाती है. घर का सारा गर्द इस तरह जनपथ पर आ जाता है. दूकानों और घरों की गंदगी सड़क पर फ़ैल जाती है. यहाँ तक कि महात्मा गांधी मार्ग भी इससे बच नहीं पाया है. कूड़ा तो कूड़ा है, जहां भी जाएगा गंदा ही करेगा.

एक बार मैं अपने एक मित्र के यहाँ गया. काम था, सुबह ही सुबह पहुँच गया. वह सोफे पर धंसे बैठे थे. पास की कुरसी पर इशारा करते हुए बोले, बैठिए. मैं बैठ गया. कहने लगे, आज हमारा सफाई -कर्मी अभी तक नहीं आया है सो कमरे की डस्टिंग नहीं हो पाई. आप कुरसी पर बैठे तो कम से कम कुर्सी तो साफ़ हो गयी. हंसते हुए यह भी जोड़े बिना नहीं रहे कि डर है अगर आप की झाडू राजनीति की कुर्सी पर बैठ गयी तो कहीं राजनीति ही गायब न हो जाए !

जहां तक मुझे याद पड़ता है झाडू का सामाजिक-राजनैतिक उपयोग सबसे पहले भोपाल में हुआ था. वहां घटित गैस-त्रासदी पर अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने के लिए तब एक चम्पा देवी और राशिद बी को अमेरिका का प्रतिष्ठित ‘गोल्ड-मैन’ पुरस्कार दिया गया था. यह पुरस्कार पर्यावरण के क्षेत्र में “नोबेल” का दर्जा रखता है. इन दोनों महिलाओं ने ‘डाड’ एक दिचास्प अभियान छेड़ा था जिसका नाम था, ‘झाडू मारो डाड को ! इसके लिए भोपाल के घरों से पांच हज़ार इस्तेमाल की गई झाडूएँ जमा की गईं थीं और यूनियन कार्बाइड के दफ्तर में दाखिल कर दी गईं थीं. संकेत था, अगर तुम त्रासदी पीड़ितों की ज़िम्मेदारी नहीं लोगे तो हम धरती पर से तुम्हारे कारोबार को भी बुहार देंगे.

झाडू काव्य-क्षेत्रे भी अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कर चुकी है. भारत भूषण स्मृति पुरस्कार (२००४) में जिस कविता को सम्मानित किया गया था वह प्रेमरंजन अनिमेष की कविता थी. शीर्षक था, “इक्कीसवीं सदी की सुबह झाडू देती स्त्री”. कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं –

सुबह सुबह उठकर झाडू देने में जुट गई है स्त्री/ क्या उसे ख्याल है कि यह इक्कीसवीं शताब्दी की सुबह है/ और जिसे वह घर की धूल समझकर/ बुहार रही है उसमें दरअसल है/ एक पूरी शताब्दी... या समूची सहस्राब्दी की धूल.. . सदियों से जमी आखिर इस धूल को कौन बुहारेगा? लगता है जबतक लोग झाडूवाली राजनीति नहीं करेंगे यह धूल साफ़ होने वाली नहीं है! होशियार, झाडूवाली राजनीति शुरू हो गई है. और दिल्ली से आरम्भ हुई है. कूड़े और झाडू में परस्पर शक्ति परीक्षण चालू आहे. देखना है, झाडू कूड़े को हटाती है या कूडा झाडू को कूडा कर देता है. जो भी हो, कूड़े के दिन ही नहीं फिरते, झाडू के दिन भी फिर गए हैं.

Dr Surendra Verma, Allahabad, U.P.

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