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सोमवार, 13 जून 2016

पिघलती पीर के गायक मनोज जैन ‘मधुर’ - अंजना दुबे

मनोज जैन 'मधुर'

“जब पीर पिघलती है मन की तब गीत नया मैं गाता हूँ
वैभव दुत्कार गरीबी को पग-पग पर नीचा दिखलाए
जुगनू उड़कर के सूरज को जलने की विद्या सिखलाए
तब अंतर्मन में करुणा की घनघोर घटा गहराता हूँ.”

संसार की पीर को देख अंतर्मन में करुणा की घनघोर घटा गहराने वाले युवा गीतकार मनोज जैन ‘मधुर’ की उपरोक्त पंक्तियाँ उनके गीतों के तेवरों को समझने के लिए पर्याप्त हैं. आपका जन्म मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के एक छोटे से गाँव बामौरकलां में २५ दिसम्बर १९७५ को हुआ. अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त मनोज जी सम्प्रति भोपाल के निकट मंडीदीप में ‘सीगल लैब इंडिया(प्रा.) लि. में एरिया सेल्स मैनेजेर के पद पर कार्यरत हैं. आपका एकमात्र गीत संग्रह ‘एक बूंद हम’ २०११ में प्रकाशित हुआ इसके अतिरिक्त ‘धार पर हम-२’ (सं.वीरेन्द्र आस्तिक) एवं ‘नवगीत नई दस्तकें’ (सं.निर्मल शुक्ल) में आपकी रचनाएँ संकलित हैं. आपको म.प्र. के महामहिम राज्यपाल द्वारा सार्वजनिक नागरिक सम्मान(२००९), म.प्र. लेखक संघ का रामपूजन मलिक नवोदित गीतकार सम्मान (२०१०), अ.भा. भाषा साहित्य सम्मेलन का साहित्यसेवी सम्मान (२०१०), साहित्य सागर का राष्ट्रीय नटवर गीतकार सम्मान (२०११) आदि सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है. 

मनोज जी के गीत न सिर्फ आज के समय से, उसकी चिंताओं एवं अनास्थाओं से एवं उसके तमाम छल-प्रपंचों से रूबरू कराते हैं प्रत्युत एक दिशा-निर्देश एवं भविष्य-दृष्टि भी देते हैं. वर्तमान में अनेकानेक जीवन-विरोधी परिस्थितियों ने आम आदमी का जीना दूभर कर रखा है. जब झूठ,छल-कपट,अनय-अत्याचार के डंके के शोर में सत्य, ममता, समता, करुणा, प्रेम, आशा, मर्यादा, निष्ठा की आवाज दबकर रह जाए;जब पाखंड सम्मानित और प्रतिभाएँ निष्काषित होने लगें, वैभव गरीबी का मखौल उड़ाए तब मनोज जी के हृदय की पीर पिघलकर गीतों की सृष्टि करती है-

“सम्मान मिले जब झूठे को सच्चे के मुँह पर ताला हो
ममता को कैद किया जाए समता को देश निकाला हो
सपने जब टूट बिखरते हों तब अपना फर्ज निभाता हूँ.
छल-बल जब होते हैं हावी करुणा को नाच नचाते हैं
निष्काषित प्रतिभा हो जाती पाखंड शरण पा जाते हैं
तब रोती हुई कलम को मैं चुपके से धीर बंधाता हूँ.”[1]

उपरोक्त पंक्तियाँ न सिर्फ मनोज जी की काव्य भूमि की परिचायक हैं वरन अन्य रचनाकारों को अपने कर्तव्यों का स्मरण भी कराती हैं. आज भारतीय समाज अनेक विरोधाभासी परिस्थितियों के बीच खड़ा दुविधा की स्थिति में जी रहा है.एक ओर तो उसे आधुनिक सभ्यता-संस्कृति,जीवनशैली तेजी से आकर्षित कर रही है वहीं दूसरी ओर पुराने का मोह पूरी तरह नहीं छूट पा रहा है.आज भारतीय समाज के सामने सबसे बड़ा खतरा अपनी पहचान खोने का बना हुआ है.पीढ़ियों का अंतराल तेजी से बढ़ रहा है परिणामस्वरूप घर-परिवार में वैमनस्य बढ़ रहा है.पारिवारिक सौहार्द-आत्मीयता-नेह के बंधन टूटते जा रहे हैं.ईट-गारे का मकान पारिवारिक स्नेह-अपनत्व से ही ‘घर’ बनता है आज उस घर को तेजी से मकान बनते देख मनोज जी चिंतित हैं-

“कुछ दिन पहले ही बदला है घर मकान में
वैमनस्य के ठूँठ सबके मन में फूट पड़े
बंटवारे के लिए सभी गिद्धों से टूट पड़े
धीरे धीरे बदल रही है छत मकान में
नफरत चिंता चुभन निरंतर बढ़ती जाती है
शंका अमर बेल-सी ऊपर चढ़ती जाती है
युग भी कम पड़ता है घर के समाधान में.”[2]

सहिष्णुता खोकर हर व्यक्ति कैक्टस में परिवर्तित होता जा रहा है.बाजारवादी संस्कृति के हमले ने सब कुछ बाजारू बना दिया है,पुराने मूल्य टूट रहे हैं किन्तु नए नहीं बन पा रहे हैं.एकल परिवार की धारणा ने संबंधों को अनुपयुक्त बना दिया तो भोगवादी प्रवृत्ति ने व्यक्ति को अतिआत्मकेंद्रित कर दिया है,और वह मानवता खोकर पशुवत व्यवहार कर रहा है.अपनी उदर पूर्ति ही उसका एकमात्र ध्येय है.पहले एक ही घर में अनेक पीढ़ियाँ प्रेम से रहती थीं आज अपने माँ-बाप को ही बच्चे बोझ समझने लगे हैं.अपने ही घर में बुजुर्ग अवांछित-अनुपयोगी वस्तुओं की भांति उपेक्षित पड़े-पड़े एक दिन मर जाते हैं.वर्तमान समाज में बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति का चित्रण करते हुए मनोज जी लिखते हैं- 

“चले गए बाबूजी घर में दुनिया भर का दर्द छोड़कर
शूल सरीखी,नजर बहू की बोली लगती लहू नदी की
बेटा नाजुक हाल देखकर चल देता है,दृष्टि मोड़कर
ताने सुनती,कैसे-कैसे अम्मा शिलाखंड हो जैसे
गहन उदासी अम्मा ओढ़े शायद ही अब चुप्पी तोड़े
चिड़िया-सी उड़ जाना चाहे तन पिंजरे के तार तोड़कर”[3]

हमारे सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है.नई चाल में ढले हम संवेदनहीन हो चुके हैं.मामा-मौसी, चाचा-बुआ,भाई-बहन के मोहक संबंध दूर की बात हो गई है,अब तो हम मरे पड़ोसी को श्मशान घाट पहुँचाने का दायित्व भी नहीं निभाते.इस कटु सत्य को मनोज जी इन शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं-

“नई हवा में भूल रहे हम मामा,मौसी को
मरघट भी हम कब पहुँचाते मरे पड़ोसी को”[4]

दिनोंदिन छीजती संवेदना ने हमें अंदर से बिलकुल ठूँठ कर दिया है.अकेलापन और नीरसता का शिकार मनुष्य आज ऊब,कुंठा और तनाव में जी रहा है.भौतिक सुख जोड़ने की चाह ने मनुष्य की व्यस्तता बढ़ाई है और वह मशीन बनकर रह गया है.सब अपने में ही गुम सुख-दुःख बाँटना ही भूल चुके हैं. पीढ़ीगत अंतराल से आई संबंधों में कटुता घर में अबोलापन बो रही है ऐसे में दिन भी पहाड़ की तरह प्रतीत होने लगे हैं-

“चुप्पी ओढ़े रात बीतती सन्नाटे दिन बुनता
हुआ यंत्रवत यहाँ आदमी नहीं किसी की सुनता
सबके पास समय का टोटा किससे अपना सुख-दुःख बाँटें
दिन पहाड़ से कैसे काटें.

बात-बात में टकराहट है कभी नहीं दिल मिलते
ताले जड़े हुए होठों पर हाँ ना में सिर हिलते
पीढ़ीगत इस अंतराल की खाई को हम कैसे पाटें”[5]

इसका सबसे बड़ा कारण है कि आज का मनुष्य अपनी जड़ से कट चुका है.यह जड़ है-अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति,रीति-रिवाज,परंपराएँ,अपनी धरती और अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान .पाश्चात्य भोगवादी संस्कृति ने हमारे सामाजिक ढाँचे को तोड़ दिया.भाई-भाई,पड़ोसी,नाते-रिश्ते सब बेमानी हो गए हैं.रिश्तों की डोर टूट गई है और आदमी मात्र भीड़ बनकर रह गया है.आज भले ही हम भौतिक रूप से उन्नति के शिखर पर हों पर हमारे मूल्य कहीं खो गए हैं.मनोज जी इस स्थिति को कद में बड़े पर वजन में घटने जैसा बताते हुए लिखते हैं-

“हम जड़ों से कट गए
नेह के वातास की हमने कलाई मोड़ दी
प्यार वाली छाँव हमने गाँव में ही छोड़ दी
मन लगा महसूसने हम दो धड़ों में बँट गए.
खोखले आदर्श के हमने मुकुट धारण किए
बेच कर हम सभ्यता के कीमती गहने जिए
कद भले अपने बड़े हों पर वजन में घट गए.”[6]

पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों के इस बिखराव से दुखी गीतकार मनुष्य को ‘पारे’ जैसी जड़ वस्तु के माध्यम से एक होने की सीख देते हैं.जड़ता मृत्यु का चिन्ह है जबकि लचीलापन जीवंतता का.गीतकार मनुष्य को जड़ नहीं वरन लचीलेपन की सीख देता है. रिश्तों से यह दूरी मनुष्य को कहीं पुन: पशु न बना दे यह चिंता गीतकार को यह कहने को मजबूर कर देती है कि-

“न टूटें हम जड़ों से यूँ कि फिर से जुड़ नहीं पाएँ
सबक पारा सिखाता है बिखर के फिर सिमटने का
समय खुद हल बताता है समस्या से निपटने का
न जड़ता ओढ़ लें इतनी कहीं भी मुड़ नहीं पाएँ”[7]

अति आत्मकेन्द्रिकता ने मनुष्य को स्वार्थी और अवसरवादी बना दिया है.आज सब चढ़ते सूरज को प्रणाम करते हैं. उपयोगितावाद ने मनुष्य की दो श्रेणियाँ बना दी है-उपयोगी और अनुपयोगी. जिससे उसका हित सिद्ध हो रहा हो उससे गुड़ में गड़ी मक्खियों सा चिपक जाता है और उसका भरपूर उपयोग करता है और उपयोग के बाद खाली डिब्बे सा फेंक भी देता है.गीतकार भी अपनी इस नियति को जानते-बूझते हुए भी प्यार बाँट रहा है-

“शहद हुए एक बूंद हम
हित साधन मक्खियाँ आसपास घूमने लगीं
परजीवी चतुर चीटियाँ मुख अपना चूमने लगीं
मतलब के मीत सब हमें ईश्वर-सा पूजते रहे
कानों में शब्द और स्वर श्लाघा के कूजते रहे
मुस्काती आँख रही नम शहद हुए हम

सब कुछ भी जानबूझ कर बाँट रहे प्यार को
बाती से दीप में जले मेट रहे अंधकार को
सूरज-सा पीते हैं तम शहद हुए हम.”[8]

आज हर व्यक्ति दोहरा चरित्र जी रहा है.अंदर से कुछ बाहर से कुछ.हँसी,आँसू,मधुर वाणी,संवेदना सदाचार सब कुछ नकली.सिद्धान्तहीन मनुष्य हवा के बहाव के साथ बहने लगा है.मनुष्य के इस दोहरे चरित्र की बखिया उधेड़ते हुए गीतकार लिखता है-

“शोक सभा का है आयोजन सब कहते हैं,हम बोलेंगे
आँखों में घड़ियाली आँसू कोयल-सी तानें बोली में
दिखे आचरण मर्यादा में घातें ही घातें झोली में
हवा जिधर बहकर जायेगी हम भी उसके संग हो लेंगे”[9]

किस पर विश्वास किया जाए?किस पर श्रद्धा?यहाँ तो एक नागनाथ तो दूसरा साँपनाथ.ऐसे में गीतकार का सबसे मोहभंग हो जाता है और वह कह उठता है-

“चरणों में शीश रखूँ किसके हे देव बता मुझको आकर
धृतराष्ट्र पसारे बाँह मिला मारीच मिला सोना ओढ़े
जस का तस दिखता कोई नहीं जिसके सम्मुख दो कर जोड़ें
जिसको मन सौंपा प्यार भरा चल दिया वही दिल ठुकराकर
कुछ बाने पहने संतों के पर मन में अजगर पाले हैं
क्या कहूँ जगत के लोगों से सब के सब दो मुख वाले हैं”[10]

छल-कपट,झूठ-फरेब,धोखा,लालच,स्वार्थ,द्वेष,ईर्ष्या,मोह-माया,घमंड में फँसा मनुष्य यह भूल जाता है कि जीवन नश्वर है.एक दिन सब कुछ यहीं छोड़ उसे कहीं दूर चले जाना है.काल के गाल से आज तक कोई नहीं बचा है,आने वाला हर पल हमें मृत्यु के और निकट ले जा रहा है यह सब जानते हुए भी वह आजीवन माया-मोह में फँसा अनेक कुकर्म करता रहता है.मनोज जी इस गीत में मनुष्य को जीवन की नश्वरता का संदेश देते हुए प्रकारांतर से उसे सदाचारी बनने की सीख देते हैं-

“कांच के घट हम किसी दिन फूट जायेंगे
देह काठी कट रही है काल आरी काल के हाथों कि प्रत्यंचा हमारी
प्राण के सर देह धनु से छूट जायेंगे देह नौका भव जलधि से तारती है
मोह माया क्रोध को संहारती है उम्र के तट हम किसी दिन टूट जायेंगे.”[11]

आज का परिवेश किसी भी तरह जीवन के अनुकूल नहीं है.सामाजिक विषमताओं,विकृतियों, विरूपताओं के साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में भी तेजी से विकृतियाँ फैल रही हैं.राजनीतिक भ्रष्टाचार ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है.लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ा नेता राजाओं-सामंतों सा व्यवहार कर रहे हैं और आम जनता इनके शोषण चक्र में फँसी कराह रही है.मनोज जी के कई गीतों में राजनीतिक विद्रूपताओं का मुखर चित्रण देखने को मिलता है. चुनाव के पहले नेता जनता को विकास और खुशहाली के खूब दिवास्वप्न दिखाते हैं,वादों की काल्पनिक फसल उगाते हैं;ऐसा लगता है मानो इनके जीतते ही गाँव-ज्वार के सारे दुःख दूर होने ही वाले हैं,विकास रूपी दूध की नदियाँ बहने ही वाली हैं पर नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’.चुनाव जीतते ही ये तोते की मानिंद हाथ से जो उड़ते हैं तो पाँच वर्ष के पहले हाथ नहीं आते-

“रथ विकास का गाँव हमारे आने वाला है
अब भीखू की भूख प्यास मुनिया की जाएगी
नहर हमारे गाँव खेत तक चलकर आएगी
नेता, फिर वादों की फसल उगाने वाला है.

राजपथों से पगडण्डी तक ये जुड़ जाएगा
तोते की मानिंद हाथ से फिर उड़ जाएगा
जनमत नेता जी के पंख लगाने वाला है.”[12]

जनता कितने विश्वास के साथ अपना प्रतिनिधि चुनती है लेकिन चुनाव जीतने के बाद उसका विश्वास टूटने में ज्यादा समय नहीं लगता.चुनाव के पहले वादों का जो लुभावना शीशमहल नेताओं द्वारा बनाया जाता है चुनाव के बाद उसे टूटने में एक क्षण भी नहीं लगता.जनसेवक का मुखौटा पहने नेता घोर तानाशाह हैं.इनका एक इशारा राजा को रंक तो रंक को राजा बनाने के लिए पर्याप्त है.अपने लाभ के लिए दंगे कराना, अपराधियों का संरक्षण करना इन्हें अच्छी तरह आता है.गीतकार को चिंता है कि ऐसे भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं के हाथों में पड़कर कहीं गणतन्त्र का पहिया ही न थम जाए-

“तुम्हारे हाथ में सरकार सौंपी थी समझ अपना
मुझे डर है न थम जाए कहीं गणतन्त्र का पहिया
किसी भी योजना के बीज का अंकुर नहीं फूटा
किया वादा उसी क्षण काँच की मानिंद वह टूटा
मुकदमे फौजदारी के,लगे थे सैकड़ों जिसपर
वही शठ न्याय के हाथों हमेशा जेल से छूटा”[13]

लोकतंत्र के पहरुओं से ही आज लोकतंत्र को सबसे ज्यादा खतरा है.जिस जनता के मत बल से ये चुनाव जीतते हैं सत्ता मिलते ही ये उसे ही सबसे पहले भूलते हैं,सारी विकास योजनाओं का लाभ ये ही लूटते हैं भूखी-प्यासी-नंगी जनता मरे या जिये इन्हें कोई सरोकार नहीं.नेताओं का घोर नैतिक और चारित्रिक पतन देश के लिए खतरा बन चुका है.नेताओं के इस क्रूर यथार्थ की बानगी देखिए-

“एक हाथ में रीना तो दूजी में मीना है
बाकी सबका मरना बाबू,इनका जीना है
लोकतंत्र के बने पहरुए रक्षा करते हैं
जन गन मन का धन साहब जी घर में भरते हैं
कर बँटवारा बन्दर-सा हक सबका छीना है”[14]

देश की शासन व्यवस्था देखकर भ्रम होता है कि यहाँ प्रजातंत्र है या राजतन्त्र या तानाशाही? आजादी के ७ दशक बीतने पर भी आमजन बुनियादी सुविधाओं से वंचित है.आजीवन उसके सामने दो जून का भोजन ही प्रश्न चिन्ह बना रहता है,जो कभी हल नहीं होता.उसे अपने श्रम का उचित परिश्रमिक कभी नहीं मिलता.शोषण के दलदल में धँसा न तो वह जी पाता है न ही मर पाता है.उसका पूरा जीवन वेदना की अंतहीन यात्रा बन कर रह जाता है.आम आदमी के जीवन की इस त्रासदी को मनोज जी ने बड़ी उत्कटता से अभिव्यक्त किया है-

“पूछकर तुम क्या करोगे अब हमारा हाल
उम्र आधी मुश्किलों के बीच में काटी
पेट की ले आग डूबे दर्द की घाटी
वक्त चाबुक खींच लेता रोज थोड़ी खाल

कब हमें मिलती यहाँ कीमत पसीने की
हो गई आदत घुटन के बीच जीने की
हवा खाते हैं जहर के घूँट पीते हैं
रोज मरते हैं यहाँ हम रोज जीते हैं
बन रही मकड़ी समय की वेदना का जाल”[15]

आज भले ही हम इक्कीसवी सदी के कंप्यूटराइज्ड अति आधुनिक युग में पहुँच गए हों फिर भी हमारे समाज में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ होती है.शोषक-शोषित,अमीर-गरीब,नौकर-मालिक वाली मानसिकता अभी भी मौजूद है.सामन्ती प्रवृत्तियाँ आज भी ज्यों की त्यों विद्यमान हैं. फलत: भले ही देश में प्रजा का,प्रजा के लिए,प्रजा के द्वारा चलाया जाने वाला प्रजातंत्र हो पर आज भी प्रजा शोषण का शिकार हो नारकीय जीवन जीने को मजबूर है.निरंतर शोषण का शिकार जनता भी यथास्थितिवादी हो गई है जो किसी भी परिस्थिति में प्रतिकार नहीं करती.यथास्थितिवादी जनता को रुई की गाँठ,चाबी वाले खिलौने,पुल,बियर की बोतल ,रद्दी और लाश कहकर मनोज जी न सिर्फ गहरा व्यंग्य करते हैं वरन उसे संघर्ष के लिए अपरोक्ष रूप से प्रेरित भी करते हैं-

“लहू चूसने वालों ने कब पीर किसी की बूझी है
हक़-हकूक के लिए लाश भी कहीं किसी से जूझी है
घर दफ्तर में रद्दी जैसे बिना मोल तुल जाते हम
नमक उन्हीं का,हड्डी उनकी मर्जी भी सब उनकी है
देह हमारी रुई गाँठ की जब चाहे तब धुनकी है
चाबी वाले हुए खिलौने कैसे हिल-डुल जाते हम?”[16]

गरीबी और ऊपर से मंहगाई!गरीबी में गीले आटे जैसी स्थिति हो गई है.सरकार देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती के कितने भी दावे करे;वस्तुस्थिति यही है कि आमजन मंहगाई की चक्की में पिस रहा है.ऊपर से उपभोक्ता वस्तुओं से पटे बाज़ार,शॉपिंगमॉल और उनका विज्ञापन करते टी.वी.चैनल चाह तो बढ़ा देते हैं लेकिन जब आमजन उन्हें नहीं खरीद पाता तो कुंठाग्रस्त हो उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है.वह कितनी भी मेहनत क्यों न करले उसके हाथ खाली ही रहते हैं.आमजन की इस बेबसी को गीतकार ने सटीकता से उकेरा है-

“सिर के ऊपर कुंठा की तलवार लटकती है
मंहगाई की मार कमर को जमकर तोड़ रही
और पेट को पीट भूख के घुटने जोड़ रही
सुख सुविधा की गंध न अपने पास फटकती है
नींदों में भी विज्ञापन का प्रेत उभरता है
लोहे को सोना,राई को पर्वत करता है
इच्छा को बेबसी बुलाकर रोज हटकती है
मेहनत के क्षण बाजारों की बलि चढ़ जाते हैं.”[17]

मँहगाई ने आमजन की सारी इच्छाओं-चाहों पर कड़ा पहरा लगा दिया है.खाद्य वस्तुओं के रोज चढ़ते भावों ने खाने का स्वाद ही फीका कर दिया यहाँ तक कि ‘अतिथि देवो भव’ की धारणा वाले भारतीय समाज में अतिथि का आगमन शुभ न होकर बोझ बन गया है-

“अकुलाता है प्राण पखेरू बैठा तन की जेल में
जीना दूभर हुआ हमारा मंहगाई के खेल में
मन झरिया का कड़ाही से बतियाने का
चढ़ते भावों ने बदला है स्वाद जमाने का
छोंक लगाना मजबूरी है अब तो रोज डढ़ेल में
नाता-रिश्ता मिलना जुलना सब कुछ छूट रहा”[18]

मनोज जी भाग्यवादी न होकर कर्मवादी हैं,वे इन सब परेशानियों का एकमात्र हल कर्म में खोजते हैं.माना कि हमें ‘विरासत में काँटों वाली डगर ही मिली है’ लेकिन भविष्य तो हमारे हाथ में ही है जिसमें ‘सुख की किरणें’ छुपी हुई हैं.जो जितनी मेहनत करेगा उसे उतना फल मिलेगा,जिस तरह रात के बाद दिन आता है उसी तरह दुःख के बाद सुख भी निश्चित है यह सीधी-सरल बात है; बस जरूरत है तो निराशा को दूर कर मन में धीरज-साहस और दृढ़ता के बीज बोने की. अत: ‘मन के धागे में आशा के मोती पोने’ और ‘कर्म-मथानी से सपनों को बिलोने’ की प्रेरणा देते हुए गीतकार लिखता है-

“काँटों वाली डगर मिली है तुझे विरासत में
सुख की किरणें छिपी हुईं हैं तेरे आगत में
देख यहाँ पर खाई पर्वत सब हैं दर्दीले.

कट जाएगी रात सबेरा निश्चित आयेगा
जो जितनी मेहनत करता फल उतना पाएगा
समय चुनौती देगा तुझको आकर लड़ने की
तभी मिलेंगी नई दिशाएँ आगे बढ़ने की
मन के धागे में आशा के मोती पोया कर
बीज बपन कर मन में धीरज,साहस,दृढ़ता के
छट जाएँगे,बादल मन से संशय जड़ता के
मंजिल तेरे खुद चरणों को आकर चूमेगी
कर्म-मथानी से सपनों को रोज बिलोया कर.”[19]

मनोज जी की ये पंक्तियाँ हमें गीता के कर्मयोग की याद दिलाती हैं.सफलता पाने के लिए गहरे पैठना पड़ता है किनारे पर बैठकर कुछ हासिल नहीं होता.तुलसीदास जी ने भी कहा है-‘सकल पदारथ हैं जग माहीं,कर्म हीन नर पावत नाहीं’.मनोज जी भी कर्महीन प्राणी को कर्म की शिक्षा देते हुए कहते हैं-

“तट पर मत कर शोर जलधि में उतर डूब कर मोती ला
हासिल हुआ यहाँ कब किसको बिना किए कुछ बतला दे
उठा कर्म की ध्वजा हाथ में आलस को चल जतला दे
मन समझाने,भाग्यवाद की मन्दिर से मत पोथी ला”[20]

समाज में तमाम विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने के बाद भी गीतकार के स्वर में कहीं भी निराशा नहीं है.वस्तुत: यह शक्ति हर भारतीय को उसकी विराट आशावादी जीवनीशक्ति से भरपूर संस्कृति, कर्मप्रधान धर्म की अवधारणा से ही प्राप्त हुई है.मनोज जी भी बचपन से ही पिता के साथ जैन दर्शन के प्रवचनों को सुनने जाया करते थे.उन प्रवचनों से जो मानवीय बोध मन में जगा वही गीतों के रूप में बाहर प्रस्फुटित हुआ.हमारे आसपास ऐसे अनेक तत्त्व हैं जो जड़ होकर भी अपने व्यवहार से मनुष्य को महानतम संदेश दे जाते हैं.दीपक ऐसा ही प्रतीक है जो सदियों से अदम्य जिजीविषा,परोपकार,साहस,संघर्ष और आशा का संदेश देता आ रहा है.नदी,हवा,पेड़ सभी परोपकार,निरन्तरता का प्रतीक रहे हैं.मनोज जी भी इनके माध्यम से मनुष्य को कभी न हारने,स्वयं जलकर दूसरों को रोशनी देने और अनथक परिश्रम की प्रेरणा देते हुए कहते हैं-

“जब तक साँसें हैं इस तन में दीपक जैसा जल
रहा सदा संघर्ष दिये का घोर अंधेरों से
आशा की लौ कब डरती है दुःख के फेरों से
मेरे मन मत कम होने दे अंतर का संबल
मंजिल चलने से मिलती है नदिया कहती है
हवा हमेशा प्राणों को सरसाने बहती है”[21]

ऐसी परोपकारी,मंगलकारी,जीवनदायी,प्रेरणादायी प्रकृति का संरक्षण हम सभी का परम कर्तव्य ही नहीं आज की अनिवार्यता भी है.आधुनिकीकरण के फेर में पर्यावरण का घोर नाश हो रहा है.हरे-भरे जंगल काटकर हर जगह कांक्रीट के जंगल बोये जा रहे हैं.ऐसा ही हाल रहा तो एक दिन हम स्वच्छ हवा,पानी,खाद्यान्न के लिए तरस जाएँगे. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच गया है,पारिस्थितिकी तन्त्र के लिए अनिवार्य अनेक पशु-पक्षी तेजी से विलुप्त हो रहे हैं. यही हाल रहा तो एक दिन पृथ्वी से मनुष्य का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा. गीतकार प्रकृति के प्रति मनुष्य के दायित्वों की याद दिलाते हुए लिखते हैं-

“वृक्ष लगाकर इस धरती को आओ स्वर्ग बनाएँ हम
हरा भरा सोना है जंगल इसे न हरगिज काटें
कांक्रीट का जल बिछकर नहीं धरा को पाटे
ये तो शिव का वह स्वरूप जो हरते सदा अमंगल
रहे प्रदूषण मुक्त धरा यह और गगन यह अपना
रोग रहित जीवन जीने का टूट न जाए सपना
पर्यावरण बचा लेने का बीड़ा चलो उठाएं.”[22]

जल ही जीवन है यह सभी जानते हैं फिर भी हम उसी जल को निर्ममता से बर्बाद भी करते हैं.हमारे ही देश में कई ऐसे राज्य,शहर हैं जहाँ लोग पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे हैं;जानवर पानी के आभाव में मर रहे हैं,खेत सूखे पड़े हैं.लोग पलायन को मजबूर हैं.ऐसी संभावना भी जताई जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा,यह सब जानते बुझते हुए भी हम पानी को अभी भी ‘पानी की तरह’ ही बहा रहे हैं.ऐसा कर क्या हम अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हैं?पानी है तो ही जीवन है,जीवन में रंगत है रौनक है,फूल हैं,पँखुरी हैं,चंदा है,सूरज है,बादल हैं,जंगल हैं.रहीम भी कह गए हैं-‘बिन पानी सब सून’ अत: जल संरक्षण आज के समय की पहली और अनिवार्य आवश्यकता है-

“अगर सहेजी आज बूंद तो बचा रहेगा कल
बची रहेगी रंगत,रौनक धरती की हरियाली
फूल,पाँखुरी,डाली,बेलें तितली रंगों वाली
बचा रहेगा खग कुल गौरव बची रहेंगी पाँखें
बची रहेगी धरती अपनी और गगन हम सबका
आने वाले सुख भोगेंगे संचय के इस तप का
बूंद बूंद संचय से हम सब इतना जोड़ सकेंगे
सूरज के गुस्से की गरमी हँस हँस ओढ़ सकेंगे”[23]

संभवतः मनोज जी उस आखिरी पीढ़ी के हैं जिन्होंने गाँव को उसके वास्तविक रूप में देखा. गाँव में पला-बढ़ा व्यक्ति शहर आकर गाँव की सरसता,सरलता,हरियाली,भोलापन,सामासिकता और उन्मुक्तता के लिए तरस जाता है.उसका मन बार-बार गाँव की ओर भागता रहता है-

“मन पाखी उड़ चल रे सुधियों के गाँव
पिहू-पिहू पपीहरा मस्ती में गाए सावन की बूँदों से
तन मन सरसाए गोरी के थिरक उठे मस्ती में पाँव”[24]

इधर पिछले लगभग एक दशक से गाँव आधुनिकता से जिस तेजी से संक्रमित हो रहे हैं उससे उनका स्वरूप पूरी तरह विकृत हो गया है.गरीबी,अशिक्षा से तो गाँव पहले भी पीड़ित थे अब तो शहर की अपसंस्कृति से दूषित हो अपनी स्वाभाविकता भी भूल चुके हैं.राजनीति के कुटिल दांवपेचों ने गाँवों की समरसता,एकता, सौहार्दपूर्ण वातावरण में जहर घोल दिया है.गाँव अपनी अस्मिता खोकर बदरंग हो चुके हैं- 

“लगे अस्मिता खोने अपनी धीरे-धीरे गाँव
राजपथों के सम्मोहन में पगडंडी उलझी
निर्धनता अनबूझ पहेली कभी नहीं सुलझी
अनाचार के काले कौए उड़-उड़ करते काँव
राजनीति की बाँहें पकड़ीं घेर लिया है मंच
बंटवारा बन्दर सा करते सचिव और सरपंच
पश्चिम का परिवेश जमाये अंगद जैसा पाँव”[25]

गीतकार की स्मृति में बसे पुरखों वाले गाँव के बहुत बुरे हाल हो गए हैं.नाते-रिश्ते की मधुरता के स्थान पर वहाँ भी शहरी अजनबीपन ने पैर पसार लिए हैं.बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करने वाले गाँव में अब बुजुर्ग अकेलेपन का संत्रास झेलने को विवश हैं.हँसी-ठिठोली,किस्से-कहानियों के लिए मशहूर चौपालों में सन्नाटा फैला हुआ है.बाजारवादी संस्कृति और विज्ञापनों की चकाचौंध में फँस कर्ज के बोझ में दबते जा रहे हैं-

“बहुत बुरे हालात हुए हैं पुरखों वाले गाँव के
नहीं जड़ों को कोई देता अपनेपन की खाद
घर का बूढ़ा बरगद झेले एकाकी अवसाद
छाले रिस नासूर हुए हैं पगडंडी के पाँव के

चौपालों पर डटा हुआ है विज्ञापन का प्रेत
धीरे -धीरे डूब रहे हैं यहाँ कर्ज में खेत
नई फसल की आँखों में है ‘बॉलीवुड’ की चाल
नहीं सुनाता बोध कथाएँ विक्रम को बेताल
टूट रहे हैं रिश्ते-नाते यहाँ धूप से छाँव के”[26]

शहर- मदारी के इशारों में नाचता गाँव अपना मूल रूप खो चुका है.अब न तो वह पूरी तरह गाँव रह गया है न पूरी तरह शहर ही हो पाया.जब तक गाँव गाँव थे तब तक वहाँ रीति-नीति,लोक-लाज,सच्चाई ,आशा,निष्ठा, धीरज,साहस जैसे मूल्य थे;परंपराएँ थीं,आपसदारी थी,सरोकार थे.अब शहरी अपसंस्कृति से प्रदूषित गाँव जो अपना था उसे खोकर ‘न घर का न घाट का’ जैसे हो गए हैं.सरकार गाँव के इस चितकबरे रूप पर प्रसन्न हो अपने विकास के दावों को सही सिद्ध कर अपनी पीठ थपथपा रही है.वस्तुस्थिति तो यह है कि गाँव पहले से भी अधिक बदहाल हो गए हैं.शोषण,गरीबी,अत्याचार,अशिक्षा के शिकार पहले भी थे अब भी हैं बस तरीका बदल गया है.पहले साहूकार थे तो अब बैंकें हैं,पहले जमींदार थे तो अब पंच-सरपंच आदि हैं.गाँवों की इस दुर्दशा का चित्र देखिए-

“सब कुछ बदला यहाँ गाँव में यह नारा सरकारी है
पहले था गर्दन पर फंदा अब गर्दन पर आरी है
साहूकार खड़े रहते थे तन कर अपनी छाती पर
मुहर लगी है आज बैंक की पुरखों वाली थाती पर
कर्जे के मुँह निगला जाना खेतों की मजबूरी है.

बनी रही पगडंडी जबतक तबतक तो सब अच्छा था
रीति-नीति थी,लोकलाज थी बच्चा-बच्चा सच्चा था
सड़कें लाईं,जादू टोना सचमुच शहर मदारी है
बाँची जाती थी रामायण पावन साँझ-सकारे थे
आशा,धीरज,निष्ठा,साहस सबके बड़े सहारे थे
अनाचार के हाथों लज्जा होती रोज उघारी है”[27]

यही कारण है कि अब गीतकार का मन गाँव जाने से मुकरने लगा है,क्योंकि न तो वहाँ वे नेह के बंधन रहे न अपनापन.आज तो घर-घर में न जाने कितनी दीवारें उठ गई हैं-

“गाँव जाने से मुकरता है हमारा मन
नेह की जड़ काटती रेखा विभाजन की
प्यार घर का बाँटती दीवार आँगन की
द्वार-दर्पण में झलकता है परायापन”[28]

इस प्रकार हम देखते हैं कि मनोज जी के गीत विविधवर्णी हैं जिनमें समसामयिक युग को यथार्थ अभिव्यक्ति मिली है.भले ही मनोज जी की गीतयात्रा लम्बी नहीं पर जितनी भी हैं भावकों के मन में गहरी छाप छोड़ने के लिए पर्याप्त है.ये गीत ही मनोज जी की जीवनीशक्ति हैं,जिनमें वे परम-सुख खोज लेते हैं,दुःख के पार ले जाकर सुख की ठाँव देते हैं-

“गीत मेरे कवि हृदय को पाँव देते हैं
गीत की लय में परम-सुख खोज लेता हूँ
स्वर्ग से सुख का धरा पर मैं विजेता हूँ
गीत मेरे तप्त मन को छाँव देते हैं.”[29]

अपनी इस गीत यात्रा के वे ऐसे धीर पथिक हैं जिन्हें कभी थोथी प्रसिद्धि की चाह नहीं रही.साहित्य जगत में अपना स्थान बनाने के लिए आपने कभी छोटा रास्ता नहीं अपनाया.आज जब सब कुछ बिकाऊ हो गया है यहाँ तक कि साहित्य भी आकाओं के रहमों करम का आकांक्षी हो गया है और पुरस्कार प्रायोजित ऐसे में मधुर जी की छद्म कीर्ति से दूर एकाकी साहित्यसाधना उनके स्वाभिमानी रूप का परिचायक है -

“नहीं जरूरत पड़ी बन्धु रे हमें कहारों की
हमें स्वयं के कीर्तिकरण की बिलकुल चाह नहीं
थोथे दम्भ छपास मंच की पकड़ी राह नहीं
नहीं जरूरत पड़ी कभी रे कोरे नारों की.”[30]

मनोज जी साहित्यजगत के उन तथाकथित पुरोधाओं के थोथे दंभ से भी दुखित हैं जो कब्र में पैर लटकाए भी अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहते,जो नई प्रतिभाओं-नई पीढ़ी को विकसने का मौका नहीं देते.ऐसे लोगों पर व्यंग्य करते हुए वे लिखते हैं-

“किसको दिया पनपने तुमने अरे बरगदो,अपने नीचे
तुमने किसको दिया सहारा किसको धूप जरा सी बाँटी
कब तुमने,नन्हें अंकुर को जमने को दी थोड़ी माटी
लागर के हिस्से की किरणें पिटे रहे आँख को मींचे”[31]

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मनोज जी में गीतों की गहरी समझ है.आपके गीतों के विषय सर्वव्यापी हैं.वरिष्ठ गीतकार श्री देवेन्द्र शर्मा इंद्र जी के शब्दों में –“मनोज जैन ‘मधुर’ के गीत सरल और सात्विक जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं...वह राह में आने वाले काँटों और विषम परिस्थितियों के चाटों के प्रहार सहकर भी आँधियों का रुख मोड़ सकता है.उसे भूमंडलीकरण की बढ़ती हुई भयावहता की चिंता है जिसमें लोग अपनी बोली-बानी को भूलते जा रहे हैं,जहाँ आपसदारी के रंगीन रेशमी धागे टूटते जा रहे हैं,जहाँ अपनी अस्मिता लुप्त होती जा रही है और जहाँ न्याय के नाम पर बन्दर-बाँट हो रहा है.कहने की आवश्यकता नहीं कि कल्पना के आकाशधर्मी उनके ये गीत यथार्थ की धरती पर धीरे-धीरे नयनोन्मेष करते जा रहे हैं.”[32]

सन्दर्भ :
[1] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.११० 
[2] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.४६-४७ 
[3] वही पृ.६६ 
[4] वही पृ.६९ 
[5] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.४८ 
[6] वही पृ.२५ 
[7] वही पृ.७२ 
[8] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.२३-२४ 
[9] वही पृ.९१ 
[10] वही पृ.१०३ 
[11] वही पृ.८३ 
[12] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.५२-५३ 
[13] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.१०५ 
[14] वही पृ.९३ 
[15] वही पृ.६४-६५ 
[16] वही पृ.९८ 
[17] वही पृ.५८ 
[18] वही पृ.११९-१२० 
[19] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.२७-२८ 
[20] वही पृ.२९-३० 
[21] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.३१ 
[22] वही पृ,१०८-१०९ 
[23] वही पृ.३३-३४ 
[24] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.१०७ 
[25] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.६२-६३ 
[26] वही पृ.७३-७४ 
[27] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,पृ.७५-७६ 
[28] वही पृ.६० 
[29] वही पृ.४२ 
[30] वही पृ ८५-८६ 
[31] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११, पृ.९७ 
[32] एक बूँद हम:मनोज जैन ‘मधुर’,पहले पहल प्रकाशन,भोपाल,२०११,आवरण पृ. से उद्धृत

लेखिका :

अंजना दुबे 
जन्म: २८/१२/१९७१ जन्म स्थान: कुंडा जिला-छिन्दवाड़ा(म.प्र.)। शिक्षा: एम.ए.(हिंदी साहित्य), बी.एड.सम्प्रति: परास्नातक शिक्षिका (हिंदी), जवाहर नवोदय विद्यालय, अरनियाकला, जिला- शाजापुर(म.प्र.)मोबाइल: ८४६२८५५७४७


Hindi Article on Manoj Jain 'Madhur' by Anjana Dubey

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