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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

यादों के बहाने: मैं, आखाड़ा और मौसा जी

अमरेश सिंह चौहान


सेना में ब्लैक कमांडो रहे परम श्रद्देय श्री अमरेश सिंह चौहान सूबेदार पद से रिटायर होने के बाद अब गांव मछरिया, जनपद मुरादाबाद, उ प्र में रहते हैं। उम्र लगभग 65 वर्ष। सिद्धांतप्रिय, ईमानदार, कड़क मिजाज फौजी अमरेश सिंह जी रिश्ते में तो मेरे सबसे छोटे मौसा जी हैं, किन्तु उनका परिचय सिर्फ इतना ही नहीं है।

बात कुछ इस तरह से है। मेरे गृह जनपद में उन दिनों अंग्रेजी से एम ए करने के लिए कोई महाविद्यालय न था। परिस्थितियां भी प्रतिकूल थीं। मौसा जी ने मुझे मुरादाबाद बुला लिया और मेरा दाखिला हिन्दू कॉलेज, मुरादाबाद में करा दिया। मैं मौसा जी के घर पर रहने लगा। संयुक्त परिवार था उनका । दादा-दादी जी, ताऊ-ताई जी, भैया-भाभीजी, बच्चे-बड़े सब एक साथ रहते । हिल-मिलकर, बड़े प्यार से। घर के सभी सदस्य मुझे भी बहुत चाहते, स्नेह देते।

मौसा जी और उनके परम सनेही मित्र पहलवान अंगद सिंह, जिन्होंने उस क्षेत्र में पहलवानी का अलख जगा रखा है और अब उनके सुपुत्र सुमित प्रताप सिंह उनकी विरासत को (सेना में बतौर पहलवान) आगे बढ़ा रहे हैं, कभी मुरादाबाद के हाथी अखाड़ा में जोड़ किया करते थे। घर-परिवार के बच्चों पर भी उनका असर था ही। जब मैं मुरादाबाद पहुंचा तो उन्होंने मेरे ढ़ीले-ढाले शरीर को देखकर कहा कि तुम्हे परिवार के बच्चों के साथ अखाड़ा करना चाहिए। फिर क्या था अगले ही दिन मेरा लगोंट सिलवाकर उन्होंने मुझे ट्रैनिंग देना प्रारम्भ कर दिया। मौसा जी मेरे खाने-पीने का विशेष ध्यान रखते; शरीर थकने पर मालिश करते, मेरे साथ दौडने जाते, अखाड़ा करते, शाम को दूर नदी पर टहलने भी जाते। (मौसी जी भी दिन भर अलग-अलग तरह के पौष्टिक व्यंजन बनाने में लगी रहतीं क्योंकि मौसाजी खाने के बहुत शौकीन रहे)। यही क्रम छुट्टियों भर चलता और जब मौसा जी की छुट्टियां खत्म हो जाती, वे देश सेवा के लिए वापस अपनी यूनिट लौट जाते।


उनकी प्रेरणा और सत्प्रयासों से मछरिया में मुझे लम्बे अरसे तक अखाड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। खूब कसरत करना और मन लगाकर पढ़ना। बस दो ही काम। कसरत ऐसी कि मैं 250 दंड और 250 बैठक तक लगाने लगा; और पढ़ाई भी ठीक-ठाक रही- 20 वर्ष की आयु में एम ए कर महाविद्यालय में अंग्रेजी विभाग से सेकेंड टॉपर बना। कालांतर में विवाह हुआ ; लेखन भी करने लगा तो कसरत-वसरत भी छूट गयी। लेकिन वह घर न छूटा, गांव न छूटा, माटी न छूटी, रिश्ता बना रहा। अटूट।

अब जब भी अपने दोंनो बेटों को गांव लेकर जाता हूँ, तब मौसा जी और पहलवान ताऊ जी बस यही पूछते, "क्यों अवनीश, बच्चे बड़े हो रहे है, इन्हें अखाड़े में डाला कि नहीं। बुद्धि के साथ तंदुरस्ती भी जरूरी है।" और जब मैं उस अखाड़े की माटी को प्रणाम करता हूं (जोकि अब खेत में तब्दील हो गयी है , क्योंकि वहां के पेड़ कट गए, कुआ पट गया और उनके बीच में अखाड़ा जुत गया), तब वह भी मुझसे कई सवाल पूछती है, जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता!

- अवनीश सिंह चौहा

Amresh Singh Chauhan, Machariya (Railway Station), Moradabad, U.P.

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