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मंगलवार, 15 मार्च 2011

तीन कविताएँ: कवियित्री- विशाखा तिवारी

विशाखा तिवारी
जन्म: १०-१२-१९४६
शिक्षा:
एम.ए. (हिंदी), संगीत प्रभाकर (गायन एवं वादन), संगीत प्रवीण

सम्प्रति: प्रवक्ता (संगीत) पद से सेवानिवृत्ति  के पश्चात स्वतंत्र लेखन
सम्मान: मुरादाबाद में संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु 
विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत 
संपर्क: ब.म.-४८, नवीन नगर, 
कांठ रोड, मुरादाबाद
दूरभाष:
०५९१-२४५०७३३


हिन्दी कविता में विशाखा तिवारी जी का नाम जाना-पहचाना भले ही न लग रहा हो, भले ही उन्होंने किसी कविता के मंच से अपनी कविताओं को प्रस्तुत न किया हो और भले ही हिन्दी काव्य सृजन के लिए उन्हें सम्मानित न किया गया हो, किन्तु उनका योगदान कमतर नहीं आका जा सकता. एक तो इसलिए कि वह स्वयं मूर्धन्य साहित्यकार माहेश्वर तिवारी जी की धर्मपत्नी हैं, दूसरा इसलिए कि उन्होंने अपनी संगीत कला के माध्यम से कई गीतों-नवगीतों को सार्वजनिक रूप से गाया है और तीसरा इसलिए कि जीवन के उत्तरार्द्ध में लिखी गयीं उनकी रचनाएँ अपने आप में सशक्त हैं. उन्होंने गीत तो नहीं लिखे, किन्तु उसकी रागात्मकता को अपने जीवन में सदैव जिया है. और यही कारण है कि उनका खिलखिलाता चेहरा और मीठे बोल तो हम सबका मन मोह ही लेते हैं, उनकी कविताएँ भी पूरी तरह से लयात्मक होने के कारण भावक के मानस-पटल पर अपनी गहरी छाप छोड़तीं हैं.

जिजीविषा से ओत-प्रोत विशाखा जी ने छंदमुक्त कविताएँ लिखी तो, परन्तु उन्हें छपने के लिए नहीं भेजा. कभी-कभार दादा तिवारी जी की उपस्थिति में आनंद कुमार 'गौरव', योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' और मैं स्वयं उनके घर पर एक साथ मिल बैठे, तो उन्होंने अपनी रचनाएँ हमें पढ़कर सुना दीं. कई बार हम लोगों ने उनसे अपनी रचनाओं को छपवाने का आग्रह भी किया, किन्तु वह टाल गईं. बार-बार कहने पर उन्होंने अपनी तीन महत्वपूर्ण कविताएँ मुझे दीं, जिन्हें यहाँ पर आपके साथ साझा कर रहा हूँ:-



रेखांकन  - ओम

१. सपने बुनती है माँ
सपने बुनती है
माँ
सपने जो अनेक हैं
रिश्तों की तरह
गुथे हुए एक दूसरे से
सपने बुनती है
माँ
तन-मन के भीतरी कोनों में
छिपी छोटी-छोटी 
इच्छाओं की तरह
सपने बुनती है 
माँ
दूध से लेकर
रोटी तक
अपने को तपाती हुई
माँ 
प्रार्थनाएं करती है
अपने बुने सपनों के
वयस्क और सचेत
होने की
यही तो देती है माँ 
अपने बच्चों को
सपने, केवल सपने
जो उनके आज को
आगामी कल से 
जोड़ते हैं
और फिर माँ
खुद एक सपना
बन जाती है
लेकिन सपना
नहीं है माँ 
वह तो उनकी 
जननी है
सर्जक है
सपने भी उसके लिए
बदल जाते हैं
बच्चों में
और
बच्चे सपनों में
और वह 
हर क्षण
हर स्थिति में
हर सृजन में 
जीती है बनकर
माँ 

२. बुद्ध हो गए 

पहली-पहली बार 
जब तुमने स्पर्श किया 
धरती का
तुम्हारी खुली मुट्ठी में थे
कुछ शब्द 
मसलन वात्सल्य 
स्नेह 
और श्रद्धा 
जो आयु के 
रसायनिक घोल में 
पड़कर 
बदल गए 
केवल एक शब्द 
प्रेम में 
जिसे तुमने जीवन भर 
गाया-गुनगुनाया 
बांटा एक साथ 
मुझमें और 
जन-जन में 
तुम्हारी यही निजता 
एक दिन सार्वभौमिक
चिन्तनों-चिंताओं का 
बोध वृक्ष बन गयी 
तुम बुद्ध हो गए 

३. पहचान

पहचानती हूँ 
तुम्हें 
जैसे गंध से
पहचानते हैं 
फूल  को 
जैसे कच्चे दूध से
पहचानते हैं
उसके उत्स को
पहचानती हूँ
तुम्हें
जैसे ध्वनि से 
पहचानते हैं 
शब्द को
जैसे बूंदों से
वनस्पतियों की प्रसन्नता
अथवा बादलों का रंग
जैसे कोहरे से
धूप की मध्यलय
सरलता से
पहचान लेती हूँ 
तुम्हें
क्योंकि 
तुम्हें पहचानने का
कोई एक अकेला 
माध्यम 
नहीं रह गया है.

Do Kavitayen: Vishakha Tiwari 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया विशाखा तिवारी जी सादर अभिवादन |अगर आप नियमित कविताएं लिखतीं तो बड़े बड़े स्वनामधन्य छन्दमुक्त कवियों महानुभावों की छुट्टी कर देतीं |संगीत के कौशल से तो मैं परिचित था लेकिन भला हो भाई अवनीश चौहान जी जिन्होंने आपकी काव्य प्रतिभा से हमें परिचित कराया |होली की सपरिवार शुभकामनाएं |

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  2. तीनों कविताएँ अच्छी लगी| धन्यवाद|

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  3. विशाखा तिवारी जी की तीनों कविताओं ने मन मोह लिया। बेहद खूबसूरत और प्रभावकारी लगीं। बधाई !

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  4. avinash ji,
    itni sunder kavitaye ham tak pahunchane ka aabhar........

    उत्तर देंहटाएं
  5. क्योंकि
    तुम्हें पहचानने का
    कोई एक अकेला
    माध्यम
    नहीं रह गया है.


    बहुत खूबसूरत लिखा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्योंकि
    तुम्हें पहचानने का
    कोई एक अकेला
    माध्यम
    नहीं रह गया है.


    बहुत खूबसूरत लिखा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. Teeno kavitayee apne aap men sunder ban padi hai. pehli kavita me rekhachitra kisi paripakva artist ki kriti mahsoos hoti hai.rachnakar or chitrakar dono ko badai.

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  8. Aajkal Nai Kavita ke naam par patr-patrikaon main jane kya-kya ool jlool chhap rha hai, aise aakvita ke samay main adarniya Vishkha Tiwariji ki yeh teenon mukt chhand ki kavitayen apni mahatvapoorn upasthiti Zordaar dhang se darz karaane ke sath-sath nai kavita ke kaviyon ko aaina bhi dikhati hain. Rachnakaar aur prastutkarta dono ko dher saari badhaiyan.

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  9. तीनों कविताएँ लाजवाब लगीं ... bahut अच्छी लगी ....

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  10. पहली बार पढ़ा विशाखा जी को बेहद सुंदर !

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