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सोमवार, 14 मार्च 2011

दो रचनाएँ: डॉ ओम आचार्य

डॉ ओम आचार्य


१५ जनवरी १९४३ को मुरादाबाद (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव दिल्ली-मौजपुर में जन्मे डॉ ओम प्रकाश शर्मा 'ओम आचार्य' के गीत,  मुक्तक, दोहे  आदि अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं ।  सीधे-सरल , जोगिया वस्त्र धरण करने वाले, सन्यासी प्रवृत्ति के डॉ ओम  आचार्य जी  महानगर में वैसे तो ओज के कवि के रूप में चर्चित रहे हैं, आपने भारतीय जीवन के तमाम पहलुओं को अपनी रचनाओं में समेटने का प्रयास किया है। आपके गीत जहाँ राष्ट्र चेतना को मुखरित करते  हैं, वहीं  अध्यात्मिक दर्शन भी दिखाई पड़ता है आपकी सरस रचनाओं में । समवेत कविता संकलनों में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। सुसंगम (गीत-संग्रह), वर्तमान युग में योग, योग कैसे करें,  कीर्तन भजन, बोध गायन  आदि आपकी प्रकाशित पुस्तकें हैं । आप सरस्वती परिवार (मुरादाबाद) संस्था के संचालक हैं।  आपके साहित्यिक अवदान के परिप्रेक्ष्य में आपको कई बार सम्मानित किया जा चुका है। इन्टरनेट के सुधी पाठकों/ विद्वानों के लिए यह नाम नया हो सकता है, किन्तु इनकी रचनाएँ आप सब को पसंद आयेंगीं- ऐसा विश्वास है :-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 


१. फागुन के दिन आये

सखे! फागुन के दिन आये
कण-कण तृण-तृण झूम उठे हैं
और आम बौराये

नैसर्गिक आनंद उमड़ता
नव किसलय भी स्वागत करता
पुष्पों से नवरंग बरसता
मंद पवन में अबीर झरता
दुल्हन बनी नयी कलियों ने
भी घूंघट सरकाये

कठिनाई में भ्रमर फंसे हैं
सभी सुमन सौन्दर्य लसे हैं
नयनों में तो सभी बसे हैं
किन्तु पाएंगे कौन किसे हैं
सीमा नहीं भोग की कोई
मन को रूप लुभाये

शशि वितरित करता शीतलता
लख चकोर का ह्रदय मचलता
चकवे को महती व्याकुलता
मर्यादा में बंधी विह्वलता
ऋतु का रंग चढ़ा सब पर ही
कौन किसे समझाये 

सखे! फागुन के दिन आये
कण-कण तृण-तृण झूम उठे हैं
और आम बौराये

२. तूलिका चाहिये...

गीत हेतु सरस तूलिका चाहिये,
योग की मधुमती भूमिका चाहिये

व्यंग के वाण तो ईर्ष्या में सने,
मन को करुणा भरी गीतिका चाहिये

वीरता छू रही, क्रूरता के चरण,
आज हनुमान की मुष्टिका चाहिये

कर दिया नाम मधुशाला, मदिरालय का,
आज चाणक्य की दंडिका चाहिये

प्रेम ही क्या, धुरी जिसकी हो वासना,
हों समर्पित प्रिय-प्रेमिका चाहिये


.....
Do Rachanayen: Dr Om Acharya
.....

5 टिप्‍पणियां:

  1. नैसर्गिक आनंद उमड़ता
    नव किसलय भी स्वागत करता
    पुष्पों से नवरंग बरसता
    मंद पवन में अबीर झरता.....

    गीत हेतु सरस तूलिका चाहिये,
    योग की मधुमती भूमिका चाहिये ....

    दोनों ही काव्य रचनाएं शब्द-शब्द फागुनमयी सुन्दर अभिव्यक्ति हैं ...हार्दिक बधाई

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. वीरता छू रही, क्रूरता के चरण,
    आज हनुमान की मुष्टिका चाहिये

    बेहतरीन .....
    फागुनी काव्य रचना भी बहुत अच्छी है....

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  4. Dr.Om Achary ko pahali baar poorvabhas par padhna sukhad rahh. Bhai Abnishji ko dhanybad.
    - Yogendra Verma Vyom

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  5. शशि वितरित करता शीतलता
    लख चकोर का ह्रदय मचलता
    चकवे को महती व्याकुलता
    मर्यादा में बंधी विह्वलता
    ऋतु का रंग चढ़ा सब पर ही
    कौन किसे समझाये ....

    लाजवाब अभिव्यक्ति

    .

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