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रविवार, 22 जनवरी 2012

नवगीत की वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा


लखनऊ: २६-२७ नवंबर, कालिंदी विले, फैज़ाबाद रोड पर स्थित अभिव्यक्ति विश्वम् के सभाकक्ष में पिछले दिनों लंबे अंतराल के बाद संवादहीनता का जाल तोड़ते हुए जाल पत्रिका अनुभूति एवं अभिव्यक्ति के सशक्त संपादन को समर्पित पूर्णिमा वर्मन द्वारा दो दिवसीय ‘नवगीत परिसंवाद एवं विमर्श’ विषयक ऐतिहासिक सत्रों का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न प्रांतों से पधारे नवगीतकारों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। निरंतर दो दिवस चले छह सत्रों में नवगीत के विभिन्न पहलुओं, यथा- नवगीत की वर्तमान स्थिति, नवगीत का उद्गम इतिहास, वर्तमान चुनौतियों एवं नवगीत हेतु आवश्यक मानकों एवं प्रतिबद्धताओं पर विस्तृत सार्थक चर्चा हुई।

२६ नवंबर को पहले सत्र, समय से संवाद के अंतर्गत रायबरेली से पधारे विनय भदौरिया ने ‘नवगीत में राजनीति और व्यवस्था’ विषय पर बोलते हुए कहा- ‘हमारी सामाजिक सुव्यवस्था एवं सद्संस्कार को बल प्रदान करने हेतु साहित्यिक दायित्वों से हम रचनाकार मुँह नहीं मोड़ सकते। रूढ़िवादिता का नाम देकर गीत और नवगीत के बीच खड़ी की जा रही दीवार को अति महत्तव न देकर हमें गीति-काव्य के मर्यादित संस्कारों को आत्मसात करते हुए ही प्रयोगवादिता की बात करनी चाहिए।

कानपुर से पधारे शैलेन्द्र शर्मा ने ‘नवगीतों में महानगर’ विषय पर बोलते हुए कहा- ‘उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते हम अपने संस्कारबोध को विस्मृत कर महानगर की सपनीली दुनिया सजा रहे हैं। यह ऊपरी सजावट हमारी सोच को दीमक की तरह खा रही है। हमारे त्योहार और उत्सव भी इससे अछूते नहीं हैं, जिनमें उमंग, उत्साह या अपनत्व जैसी महक अधिकांशतः शेष नहीं रह गई है। हम गीतकारों, नवगीतकारों को अपने सृजनकर्म में इस चिंता को गंभीरता से लेना चाहिए।

लखनऊ के निर्मल शुक्ल ने ‘क्या आज का नवगीत समय से संवाद करने में सक्षम है’ विषय पर अपना आलेख पढ़ते हुए कहा कि ‘जिस तरह समय के पंखों को बाँधकर नहीं रखा जा सकता, उसी प्रकार नवगीत की समय से संवाद करती सार्थक उड़ान को भी नकारा नहीं जा सकता। समकालीन यथार्थवादी सोच ही नवगीत को निरंतर संभावनावान बनाती आ रही है और यह प्रक्रिया किसी क्रांति के दौर से गुज़रने से कुछ कम नहीं है। वर्तमान में संवाद की सक्षम विधा नवगीत ही है। इस दिशा में नवगीतकारों को निरंतर प्रतिबद्धता स्वीकारने की आवश्यकता है। बिना लोकेषणा, बिना स्वार्थपरता के वैज्ञानिक चकाचौंध से सुरक्षित रहते हुए अपनत्व को जीवंत रखने की इस मुहिम में हमें सहज संप्रेषणीय जागरूकता के साथ सक्रिय रहना है।


रायबरेली के रमाकांत ने ‘नवगीत में जनवाद’ विषय पर बोलते हुए कहा- ‘आत्मपरकता की बास से गीत को उबारने की महकती कोशिश है नवगीत, जो वैयक्तिकता से निकलकर जनसामान्य की त्रासदी को स्वर देने की सामर्थ रखता है।
इस सत्र का समापन करते हुए आयोजिका पूर्णिमा वर्मन ने कहा- ‘अपनी आत्मा और अपनी जड़ों को पहचानने के लिए हमें गीत को पहचानने की ज़रूरत है, गीत की समृद्धि की चिंता करने की ज़रूरत है। हमें केवल लोक से लेना ही नहीं है उसे देना भी है, हमारा दायित्व है कि गीत को लेकर हम लोक तक पहुँचें। इस दिशा में हमारे प्रयास नाकाफी हैं। हमें नुक्कड़ कवि-गोष्ठियों जैसी सबल परंपराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। जिसमें पुस्तकालयों, पुस्तक की दूकानों या रेस्त्रां जैसे स्थानों पर नियमित रूप से गीत पाठ के आयोजन होने चाहिये जिससे कविता जन जन तक पहुँच सके।

भोजन के बाद प्रारंभ हुए दूसरे सत्र ‘नवगीत की पृष्ठभूमि कथ्य-तथ्य, आयाम और शक्ति’ में इटावा से पधारे अवनीश सिंह चौहान ने ‘नवगीत में कथ्य और तथ्य’ विषय पर केंद्रित विचार रखते हुए कहा- ‘रचना की प्रासंगिकता महत्तवपूर्ण है। वर्तमान सामाजिक त्रासदी और परिस्थितियों के जितना निकट नवगीत होगा, वह उतना ही स्वागत का पात्रा होगा, सार्थक होगा और आयुवान होगा। हमें इन तथ्यों को मस्तिष्क ही नहीं, बल्कि हृदय से अनुभूत कर गीत शिल्प तथ्य की मर्यादा को आचरण में लेकर रचनाकर्म साधना करने की परम आवश्यकता है। लोकेषणा मात्रा के भ्रम से बाहर आकर बाज़ारवाद के विरुद्ध लामबंद होना आज के हम नवगीतकारों का नैतिक दायित्व ही नहीं है, बल्कि अपने रचनाकार को जीवित रखने हेतु आवश्यक भी है। अवसरवादिता से परे रहकर रचनाकर्म ही सृजन की पावस गंगा को निरंतर प्रवाहित कर सकेगा।

मुरादाबाद के योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने नवगीत के विविध आयाम विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा- ‘नवगीत लोकजीवन के प्रासंगिक संदर्भों को हृदयांकित कर सहज अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए आम आदमी के जीवन से जुड़े हर्ष, विषाद का चित्रण प्रस्तुत करने की सर्वाधिक सामर्थ्य रखता है। नई पीढ़ी की रचनाएँ समय की आँखों में आँखें डालकर चल रही हैं और निश्चित ही नवगीत को नई पीढ़ी से बहुत प्रबल संभावनाएँ हैं।

इसी सत्र में कानपुर के वीरेन्द्र आस्तिक ने गीत कितना सशक्त कितना अशक्त विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा- ‘नवगीत अपने भीतर एक द्वंद्वात्मक तत्व को जीता रहा है। तथ्यमय नवगीत को अपनी पहचान के लिए बार-बार अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ा है। वह खुलकर कभी भी किसी एक विचारधरा के लोकपक्ष से संबद्ध नहीं हो सका, किंतु नवगीत सशक्तता और अशक्तता की ऊहापोह से विचलित भी कभी नहीं हुआ और आज नवगीत कभी बच्चे के स्वरूप में दिखता है तो कभी दर्शन के तत्व में विचरण करता है। बिंबात्मक बोझ को ढोना भी नवगीत को निरंतर स्वीकार्य नहीं रहा। रूढ़ शब्दों और वाक्यों का संसार नवगीत में प्रयोगवादिता के आगे नतमस्तक हो चुका है। यह प्रतीति आज साक्षात् है। यथार्थ बोध् नवगीत का दर्पण है, जो आम आदमी, समाज और वसुध के त्रासद को चुनौती देने की सामर्थ्य रखता है। यहाँ स्मरण रहे कि ईमानदारी हर विध की बुनियादी आवश्यकता है। इस सत्र के अंत में वरिष्ठ नवगीतकार माहेश्वर तिवारी जी ने नवगीत की पृष्ठभूमि पर बोलते हुए नवगीत के विकास की यात्रा को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि जिस समय नई कविता जन्म ले रही थी उसी समय नवगीत का भी जन्म हो रहा था और निराला इन दोनो प्रकार की नई रचनाओं के पुरोधा माने जाते हैं।

इस दिन का अंतिम सत्र संगीत और पावर पाइंट प्रस्तुति का रहा। लखनऊ की जानी मानी संगीतकार जोड़ी आनंद सम्राट के चार सदस्यों ने चार नवगीतों को अपने मधुर सुर और संगीत से सजाया। इसमें दो नवगीत, "भरी भरी मूँगिया हथेली" और "छोड़ आए हम अजानी घाटियों में" माहेश्वर तिवारी द्वारा, एक नवगीत 'बादल बरसा' कुमार रवीन्द्र द्वारा तथा एक गीत 'सपना कोई' पूर्णिमा वर्मन द्वारा लिखा गया था। पावर पाइंट प्रस्तुति की शीर्षक था - हिंदी की इंटरनेट यात्रा अभिव्यक्ति और अनुभूति के साथ नवगीत की पाठशाला तक। इसमें वेब पर हिंदी के उद्भव और विकास की यात्रा को संक्षेप में बताते हुए अभिव्यक्ति एवं अनुभूति का परिचय दिया गया और वेब पर नवगीत के विकास के क्या क्या कार्य हो रहे हैं उनके विषय में विस्तार से बताया गया। इसके साथ ही पहले दिन के कार्यक्रम का अंत हुआ।

२७ नवंबर २०११, परिसंवाद का दूसरे दिन का पहला सत्र नवगीत वास्तु शिल्प और आयाम पर आधारित था। रायबरेली के डा. ओमप्रकाश सिंह ने अपने आलेख- कहा ‘आलोचना में जो कुछ कहा जाती है, उसे अंतिम नहीं माना जा सकता। अनेक समीक्षक नवगीत की क्षमता से आतंकित होकर नवगीत को समीक्ष्य नहीं मानते। इसके पीछे उनका निजवाद है, जिससे बहुत आगे की बात नवगीत आज कर रहा है, यह भी अन्य काव्य-विधाओं का सरदर्द है। नवगीत व्यापक आयाम लेकर सामर्थ्यवान है, अतः उसे ऐसे समीक्षकों की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। गुटबाज़ी से बचकर, प्रासंगिकता में बने रहकर नवीन समीचीन परिवर्तनों के साथ आगे कार्य करते रहना चाहिए। नवगीत को अमरता प्राप्त होकर रहेगी। नवगीत की दिशा और दशा पर निष्कर्षपूर्ण समाधन खोजते हुए हमें इसके आयाम निर्धरित करने चाहिएँ। हम इस दायित्व से स्वयं को बचा नहीं सकते। चेतना के भीतरी तल से आम जीवन को छूकर गुज़रते हुए नवगीत संवेदना के स्वरों को खंगालकर अभिव्यक्त करते रहने के प्रति संकल्पबद्ध होना चाहिए। गीत का संश्लिष्ट और संक्षिप्त रूप ही नवगीत है। बाह्य आघातों से सुरक्षित रखते हुए हम रचनाकारों को नवगीत की सशक्त विध को प्राणवान बनाए रखने की साधना जारी रखनी होगी।

आनंद कुमार ‘गौरव’, मुरादाबाद द्वारा प्रस्तुत आलेख गीत का प्रांजल रूप है नवगीत में कहा गया- ‘भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ संगीतात्मकता एवं लयात्मक बोध के पारदर्शी उद्बोधक हैं, जहाँ सारा कुछ गेयता के सारतत्व से जुड़ा है। संगीत और लय की सहज लोकस्वीकार्यता ने ही गीत को साहित्य का प्राण माना है। लोकधुनों, लोकमुहावरों तथा लोकसंगीत के आत्मबोध से सिंचित गीतकाव्य ही अपनी पूर्ण सामर्थ्य से जनमानस को आकर्षित और प्रेरित करने में सक्षम बन पड़ता है। गीत के प्रांजल तत्व नवगीत की यही विशेषता है कि वह लोक से जुड़कर आम आदमी की दर्दभरी चीख़ का प्रतिनिधित्व करता है। आज सबसे अधिक ज़रूरत है तो नवगीत से पहले स्वयं के आंतरिक गुण, संस्कार, गरिमा और अस्मिता को पहचानने की।  नितांत बौद्धिक बाज़ीगरी और दुरूह प्रयोगवादिता से हटकर गीत को किसी वाद विशेष में घसीटे जाने की संकीर्णताओं से सुरक्षित रखकर हमें गीत की जीवंतता को संवेदन जगत का एक पारदर्शी दर्पण प्रमाणित करते हुए गीत-नवगीत का सृजन साधनाकर्म निरंतर जारी रखना होगा। नवगीत की प्रासंगिकता ही क्योंकि जनसंवाद्य है, अतः कोई स्वनामध्न्य मठ या मठाधीश इसकी गरिमा को कदापि आहत नहीं कर सकता।

मधुकर अष्ठाना, लखनऊ का कथन था- ‘नवगीत का प्राणतत्व उसकी संवेदना है और सामयिकता उसका आभूषण है। नवगीत का आधर रचनाकार के अंतस में रह रहे तनाव और विद्रूपताओं और बाहरी घटनाक्रमों तथा विषमताओं से उपजा चीत्कार है, जो अन्यतर सर्वथा मौन-सा प्रतीत होता है। नवगीत का रोपण गहन अनुभूति से और सिंचन आँसुओं से होता है। यह मार्क्सवाद और गाँधीवाद की मिश्रित युगबोधीय गंगधारा है और निरंतर प्रगतिशील है। इसके विकास और समृद्धि में कोई बाधा नहीं है, बशर्ते हम रचनाकार मौलिकता और सामयिकता का पूरी ईमानदारी से निर्वहन करें।

जय चक्रवर्ती, रायबरेली का कथन था- ‘बिंबों की पुनरावृत्ति से नवगीतकारों को सचेत रहकर उसका टटकापन बनाये रखना होगा, यह नवगीत की दीर्घायु के लिए आवश्यक है। नवगीत के बिंब और प्रतीक आम आदमी की ज़िंदगी से उठाए गए हैं, अतः नवगीत लोक से वर्तमान में जुड़ी सशक्त विधा है। यथार्थ ग्राह्यता इसका प्रमुख कारण है, जो बिखरते समाज और बिखरती आस्थाओं को सहेजने और सँवारने की ओर सशक्त कर्म के प्रति निष्ठावान है। भाषा का नया सौंदर्यशास्त्र रचने में नवगीत ने प्रणम्य कर्म किया है।

शीलेन्द्र सिंह चौहान, लखनऊ ने आगाह किया- ‘काव्यगत मूल्यों का प्रतिमान नवगीत, परिवर्तन के बोध को आत्मसात करते हुए आगे यात्रा पर बढ़ना है। वर्तमान त्रासदियों/स्थितियों, लूटखसोट तथा परिवर्तन की माँग में उठी आवाज़ों को दबाने और आतंकित करने की विद्रूपताओं के वातावरण में नवगीत का नैतिक दायित्व और विस्तृत हो जाता है, क्योंकि नवगीत काल सापेक्ष काव्य में आज सर्वाधिक प्रगतिशील है और संप्रेषणता का सर्वश्रेष्ठ स्वर है। इस संवेदनर्ध्मिता का दायित्व नवगीतकारों को स्वीकारना ही चाहिए। नवगीत ने एक ऐसे धर्म की कल्पना को साकार किया है, जहाँ जाति-र्ध्म-संप्रदाय जैसी संकीर्णताओं की विचारधराओं के दलदल से उबार कर एक संपूर्ण मानव समाज की एकरसता को बल प्रदान किया गया है। नवगीत को सपाटबयानी से सुरक्षित रखें। सहज संप्रेष्य भाषा में संवेदना की अभिव्यक्ति को ऊर्जावान बनाएँ। समय की धरा के साथ चलते हुए नवगीत की मुख्य गीत गति और पहचान कहीं खो न जाए, इसका ध्यान हमें सदैव रखते हुए सृजनशील रहना है।

दूसरे सत्र में जिसका शीर्षक था- नवगीत और लोक संस्कृति, श्याम नारायण श्रीवास्तव, लखनऊ ने अपने उद्बोधन में नवगीत को परिस्थितिजन्य शुष्कता से रागात्मकता की ओर ले जाने वाला सशक्त माध्यम बताते हुए कहा- ‘अंतःवेदन की सहज अभिव्यक्ति, रचनाकार के लिए भाषा कोई सीख या पाठ से प्रभावित नहीं होती, बल्कि सृजन की प्रक्रिया से उपजी संवेदना प्रमुख होती है। लोकभाषा हमारे भीतर अपनत्व को सिंचित करने की सशक्त प्रक्रिया है, इसे रिक्त नहीं होने देना है। यह दायित्व हम सभी रचनाकारों की प्रतिबद्धता होनी चाहिए। लोकभाषा से नवगीत लोकप्रिय और जनमानस के भीतर उतरकर बातचीत करता है। इसी से लोकभाषा का महत्तव गीत में प्रमुख हो जाता है। हमें लोकभाषाओं, आंचलिक शब्दों को जानना और समझना परम आवश्यक है, ताकि नवगीत की ऊर्जा और शक्तिवान हो सके।

सत्येन्द्र तिवारी, कानपुर का कहना था- ‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारतीय संस्कृति का मूलभाव है, जिस पर हम गर्व करते हैं। आज़ादी का संघर्ष करने वालों के सपनों और वर्तमान त्रासदियों के मोर्चे पर अडिग खड़ा रहकर नवगीत भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत रखने की आवश्यकता की भी कहीं उपेक्षा नहीं करता, वरन् उससे पूरी तरह जुड़ा रहकर बतियाता है, गाता है। हम नवगीत रचनाकारों को इस संकल्पबद्धता को आत्मसात् करना चाहिए। धर्मांधता के विरुद्ध लिखा जा रहा है, वह स्वागत योग्य है, किंतु मर्यादा को भी बिसराया नहीं जाना चाहिए, अन्यथा कल गीत/नवगीत मूल्यहीनता की स्थितियों में आ जाएगा।

कार्यक्रम के संचालक डा. जगदीश ‘व्योम’, दिल्ली ने कहा- ‘लोकगीतों की समृद्धि में फिल्मों का भी कहीं न कहीं योगदान रहता है। लोक हम सबके भीतर बैठा है, जाग्रत है और वह कभी निकालकर फेंका नहीं जा सकता। लोक इतना व्यापक है कि वह गीत/नवगीत की महती आवश्यकता है और रहेगी। हम रचनाकारों को लोक शब्दों, साहित्य में लोक इतिहास को अपने साथ लेकर चलना ही होगा, यदि हमें जन-जन के समीप गीत को उतारना है। हीरामन हार न जाए, यह हम सभी रचनाकारों का दायित्व बनता है और यह दायित्व तभी पूरा होगा जब हम हीरामन का सच अपनी नंगी आँखों देखेंगे और महसूस करेंगे। हमें लोक संपदा के चंदन-वन को जलने से बचाना है और स्वयं को कंकरीट के जंगलों की संस्कृति से बचाना है। अनायास और अवांछित संवादहीनता हमें लोक से दूर कर रही है, जिसे सशक्त सेतु की आवश्यकता है।

इस अवसर पर माहेश्वर तिवारी और वीरेंद्र आस्तिक का मानना रहा कि संवाद के पुलों का बहिष्कार, नई कविता वालों की तरह करने की प्रवृत्ति ने नवगीत को अधिक लोकप्रिय होने से बाधित किया है न कि लोकभाषा के कम प्रयोगों ने...। इतिहास को जान-समझकर ही गीत/नवगीत की आत्मीय गति को आत्मसात करते हुए नवगीत में प्रयोग करें। क्योंकि यदि हम इतिहास से वंचित होते हैं तो कहीं न कहीं हमारी दृष्टि अवश्य ही कमज़ोर रह जाती है। हम इतिहास को जान-समझकर गीत/नवगीत की आत्मीय गति बिंबात्मक सौंदर्य से सजाकर ही नवगीत को समृद्धिवान बनाना सुनिश्चित कर सकते हैं, इसमें किसी संदेह की कोई जगह नहीं है।

निष्कर्षतः यह बात साफ हो गई कि गीत की उपेक्षा करते हुए नवगीत की सृजन साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त नहीं होगी। गीत की तात्कालिक प्रासंगिकता का सौंदर्य निःसंदेह में विश्वास करते हुए सामयिक आवश्यकता के अनुसार नवगीत को लोक से जोड़कर सजाने-सँवारने की ज़रूरत है। प्रयोगवादिता में हमें अपने जनमना गीत-अस्तित्व को न बिसरा कर सृजनकर्म करना चाहिए। गीत के प्रति आस्थावान रहकर अपनी नवगीत सृजनयात्रा गतिमान रखनी चाहिए, इस विश्वास के साथ कि गीत के रास्ते में कोई बाध कदापि नहीं पनपेगी। हमें दुराग्रह और निरी बौद्धिकता से भी परहेज़ करना पड़ेगा। नवगीत आयातित काव्यात्मक प्रभाव से भारतीय कविता को बचाने की महती स्वीकार्य प्रक्रिया का अति सार्थक स्वरूप है। नवगीत ने कविता की आत्मा को पकड़ने की सार्थक कोशिश की है। नवगीत कोई आंदोलन नहीं है, बल्कि कविता की सभ्यता को सुरक्षित रखने की लड़ाई है, नवगीत की संवेदना को बचाए रखने की लड़ाई है। 

नवगीत की संवेदना, विवेचना और समीक्षात्मक बिंदुओं की इस दो दिवसीय सार्थक कार्यशाला की परिणति ऐतिहासिक आयोजन यज्ञ, स्मृति चिह्न प्रदान करते हुए, कविगोष्ठी के स्वरूप में संपन्नता को प्राप्त हुआ। मुख्य अतिथि ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ रहे। सभी साहित्यविदों के प्रति पूर्णिमा वर्मन और डॉ जगदीश व्योम ने आभार अभिव्यक्ति किया और सभी साहित्यविदों ने इस महत्तवपूर्ण आयोजनार्थ उन्हें साधुवाद कहा।
मुरादाबाद से आनंद गौरव की रपट 


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