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रविवार, 12 अगस्त 2012

अर्चना ठाकुर की एक लघुकथा

अर्चना ठाकुर

अर्चना ठाकुर का जन्म ०५ मार्च १९८० को कानपुर, उ.प्र. में हुआ। शिक्षा: एम.ए. एवं एम. फिल. ( मनोविज्ञान)। आपने कुछ वर्ष पूर्व ही रचनात्मक लेखन प्रारम्भ किया। आपकी रचनाएँ नव्या सहित कुछ अन्य पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित। आपकी कविताओं की एक पांडुलिपि प्रकाशन के इंतज़ार में हैं। व्यवसाय- गृहणी। सम्पर्क: तेजपुर (एयर फोर्स स्टेशन), जिला- सोनितपुर, असम-७८४१०४; ई-मेल: arch.thakur30@gmail.com। आपकी एक लघुकथा यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं:-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
भाई बहन

'मुझसे तमीज़ से बात करो; समझे - मैं कोई ऐरी -गैरी नहीं; एम.एल.ए .त्रिभुवन द्विवेदी की बहू हूँ |' उसने ये बात अपने भाई से कह दी|

भाई भी चुप नहीं रहा | 'होगी तुम किसी की बहू ...पर मैं डाक्टर आनंद तुमसे ये कहता हूँ कि जो तुमसे करते बने तुम कर लो...पर इस जायदाद की फूटी कौड़ी भी मैं तुम्हे नहीं दूंगा |'

'तुम क्या मुझे रोकोगे - इतना याद रखो कि इस जायदाद में मेरा भी हिस्सा है |' बहन ने जवाब दिया |

'जायजाद में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं- मम्मी पापा ने तुम्हारी शादी की- बहुत खर्च किया उसमें,  इतना दान दहेज दिया- वो जीते जी भी तुम्हे हमेशा कुछ न कुछ देते रहे पर अब उनके जाने के बाद तुम्हारा इस घर की जायदाद में कोई हिस्सा नहीं बनता; समझी, और ये बात मैं कह रहा हूँ |' उसका स्वर और बुलंद हो उठा|

दो भाई बहन आपस में देर तक लड़े| वाक युद्ध में एक दूसरे को शब्दों में मात देते रहे | उनकी माँ अपने दोनों बच्चो की शादी कर स्वर्ग सिधार गई और पिता तेरह दिन पूर्व ही सिधारे थे | बहन तेरहवीं  में आई थी | माता पिता जायदाद की कोई लिखा पढ़ी नहीं कर गए  थे | शायद अनभिज्ञ थे या इसकी जरूरत नहीं समझी थी | लगा होगा बेटा डाक्टर है, उसकी पत्नी भी डाक्टर है | बेटी भी पढ़ी लिखी है और अच्छे घर ब्याही है | फिर जायदाद शायद सहमति में बटँ जाएगी पर...|

बहन का चेहरा गुस्से में लाल था | भाई भी किसी कोने में हाथ बांधे अंगारा हो रहा था | पंडित भी आ चुके थे; घर के बाकी के सदस्य भी धीरे-धीरे करके एकत्र  हो रहे थे | वहाँ का माहौल अब शांतिपूर्ण था| पर दो बच्चे पाँच वर्ष का एक लड़का और एक तीन वर्ष की लड़की थी जो शायद इन्ही भाई बहन  के बच्चे थे, वहाँ दौड़ते हुए आते है | उनकी चंचलता  बरबस ही सबका ध्यान अपनी ओर खीच लेती है |

आँगन में पड़े झूले के लिए दोनों बच्चे एक साथ दौड़ लगाते है | लड़का बड़ा था, उस झूले को पहले पा लेता है | लड़की का मुंह बन जाता है| वो लगभग रोने ही वाली थी | लड़का जल्दी से उसकी तरफ मुड़ता है और मुस्कराता है | फिर बड़े प्यार से अपने नन्हे हाथो से सहारा देकर वो उस लड़की को झूले में बैठा देता  है | लड़की खिलखिला कर हंस देती है | लड़का बड़े प्यार से संभालते हुए उसे झूला झूलाने लगता है | अब उन दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी | वो एक दूसरे के जान के दुश्मन भाई-बहन भी उन पर से अपना ध्यान हटा नहीं पाते | वे देखते है कि वे मासूम भाई बहन कैसे प्यार से एक दूसरे के साथ थे | जहां आधिकारों की कोई छीन-झपट नहीं थी वहाँ सिर्फ प्यार का लेन-देन था| वे देखते है कि वो लड़की अब झूले में उस लड़के  को जगह दे देती है और अब दोनों झूले पर एक साथ झूलने लगे| 

उन नन्हें भाई-बहन का प्यार उन बड़े भाई-बहन की अंदर की ज्वाला को झकझोर देता है कि तभी दोनों की नजर एक साथ देखती है कि झूले का बंधन खुल रहा है... बस झूला गिरने ही वाला था | दोनों बिजली की फुर्ती से एक साथ लपकते है और दोनों बच्चो को अपनी गोद में खीचकर अनायास होने वाली घटना से उन दोनों को  बचा  लेते है | दोनों बच्चों को भींचे अब एक-दूसरे को देखते है | अब उन सुर्ख आंखो में दर्द की बूँदें छलक आई थी | मानो जंगल की आग से जली जमीं की राख पर जीवन के फूल खिल आए हों |

Ek Laghukatha- Archana Thakur

10 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर !
    टूटते झूले ने ही सही
    याद दिलाया तो सही
    क्या गलत है क्या सही

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    1. bahut sundar ..katha , avinash ji aap chun chun ke post lagate hai :) badhai dono ko

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    2. sashi jee dhanywad...sach awnish jee key karan rachana ko isthan mila.

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    3. dhanyawad sushil jee,wastivikta ko kabhi kabhi roop badal ker aana padta hai...

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  2. बुद्धिमानी कभी कभी कुटिलता की शुरुआत बन जाती है। अबोध निस्पृहता दिव्य होती है। एक प्रेरक और आत्म-बोध कराने वाली कहानी, रचना धर्म के अनुसार!

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    1. आदरणीय प्रेम मोहन जी हार्दिक धन्यवाद..

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  3. काफी प्रेरक और सत्य के बहुत करीब है आपकी कहानी अर्चना जी - बधाई
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
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