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बुधवार, 14 अगस्त 2013

आलेख: प्रेम के निवेदन में अपनी धुरी पर नतमस्तक पृथ्वी : डॉ. महेंद्र भटनागर

डॉ. मनोज श्रीवास्तव

ऊर्जावान रचनाकार डॉ. मनोज श्रीवास्तव का जन्म 8 अगस्त 1 9 7 0 को वाराणसी, उत्तरप्रदेश, भारत में हुआ। शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. एवं पीएच.डी.। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं तथा वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रकाशित कृतियाँ: कविता संग्रह- पगडंडियाँ, चाहता हूँ पागल भीड़, एकांत में भीड़ से मुठभेड़। कहानी संग्रह- धर्मचक्र राजचक्र और पगली का इन्कलाब। व्यंग्य संग्रह- अक्ल का फलसफा। अप्रकाशित कृतियाँ: दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), परकटी कविताओं की उड़ान (काव्य संग्रह) सम्मान: 'भगवत प्रसाद स्मृति कहानी सम्मान-२००२' (प्रथम स्थान), रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान-2012, ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक घोषित, राजभाषा संस्थान द्वारा सम्मानित। लोकप्रिय पत्रिका "वी-विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक और दिग्दर्शक। नूतन प्रतिबिंब, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक। आवासीय पता: सी-६६, नई पंचवटी, जी०टी० रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत। सम्प्रति: भारतीय संसद (राज्य सभा) में सहायक निदेशक (प्रभारी- सारांश अनुभाग) के पद पर कार्यरत। मोबाईल नं: ०९९१०३६०२४९। ई-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

डॉ. महेंद्र भटनागर
हिंदी-काव्य साहित्य में चुनिंदा चतुर-चितेरे कवि ऐसे हैं जिनकी काव्य चेतना इतनी प्रबल-प्रगामी है और कविताई की विषय-वस्तु इतनी विस्तीर्ण-व्यापक है कि उन्हें समीक्षक-आलोचक आसानी से आत्मसात कर, अपनी कोई एक सुनिश्चित राय नहीं बना पाते। जब उनकी रचनाओं में इम्प्रेशन्स की बाढ़ उमड़ती है तो उनमें से किसी एक पर दृष्टि जमा पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है और उनमें अनुभूतियों तथा भावों-अनुभावों के उमड़ते ज्वार को मन-मस्तिष्क में समेटना भी एक दुष्कर कार्य हो जाता है। जितनी विविधता उनकी वैचारिक और भावनात्मक संप्रेषणीयता में होती है, उतनी ही विविधता उनकी भाषा-शैली में भी होती है। बेशक! जहाँ जटिल मनोभावों का प्रस्फुटन होगा, ज़ाहिर है कि वहाँ भाषा-शैली का लालित्य भी बड़ा जिज्ञासापूर्ण होगा। अस्तु, ये विविधताएं उबाऊ न होकर अत्यंत दिलचस्प भी होती हैं जिन्हें पाठक जानने-समझने के लिए उतावला हो उठता है। यह उतावलापन एक तरफ तो उन रचनाकारों के व्यक्तिगत जीवन को जानने के लिए होती है तो दूसरी तरफ उनके द्वारा सृजित शब्द-संसार में विचरण करने के लिए भी होती है। इस प्रकार जब हम निराला, प्रसाद, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, नरेश मेहता, नागार्जुन से गुजरते हुए इस समकाल पर अपने कदम अवस्थित करते हैं तो बदलते काव्य परिदृश्यों में, जहाँ रोमांटिक, हालावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी आदि रचनाकारों ने विभिन्न काल-खंडों पर अपने-अपने मील के पत्थर स्थापित किए, एक ऐसी शख़्सियत उभरकर अपनी पूर्णता में मुखर होती है जिसकी रचनाधर्मिता को महत्वांकित किए बिना हिंदी काव्य साहित्य को पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। यहाँ ऐसे कवि को स्वर्णाक्षरों में रेखांकित करना अत्यंत आवश्यक है जिसने लगभग सात दशक के अपने दीर्घ रचनाकाल में कविता के सभी सोपानों और उच्चावचों से गुजरते हुए अथक सृजन किया है और प्रतिनिधि कवियों के घनिष्ट संपर्क में रहते हुए, शब्द-साधना की है।

निःसंदेह, यहाँ मेरा सीधा इशारा डॉ. महेंद्र भटनागर की ओर है, जो अपनी लंबी रचनात्मक यात्रा में आज भी अपनी पूर्ण सृजनशीलता के साथ हमारे बीच गा-गुनगुना रहे हैं और मौज़ूदा भ्रमित नवरचनाकारों की काव्य चेतना को झंकृत करते हुए एक अनुकरणीय युगद्रष्टा के रूप में हमारे बीच प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। दरअसल, कविता की रचना करना और कविता को सम-विषम जीवन की तरह जीना दो भिन्न-भिन्न बातें हैं। इसप्रकार, अब तक के अपने सृजनकाल के दौरान यदि यह कहा जाए कि उन्होंने सिर्फ़ कविताएं रची हैं तो यह उनकी काव्य साधना के प्रति बड़ा अन्याय होगा। सच्चाई यह है कि अपने पूरे जीवन काल में वह कविता को जीते रहे हैं। उस कविता को जीते रहे हैं जिसमें हर समाज के हर वर्ग की आह और आवाज़ मौज़ूद है। जहाँ छायावादी और रोमांटिक कवियों की भाँति उनकी कविताओं में उनका 'मैं' बाह्य तौर पर दिखने वाली एकांतितता और वैयक्तिकता से ऊपर उठकर पूरे मानव समाज को स्वयं में समेट लेता है, वहीं उनका 'मैं' पीड़ितों और शोषितों के एक विश्वसनीय संबल की भाँति वरद हस्त बनकर पूरी दुनिया को त्रासदियों और कष्टों से मुक्ति प्रदान करने के लिए तत्पर है। इस तरह वह इस धरा पर ऐसे जीवन की कामना करते हैं जो निष्पाप, निर्विघ्न, निर्भय, निरंतर और निष्कंटक चलता रहे, चलता रहे--अनन्त असीम काल तक...। क्योंकि जीवन की निरंतरता ही मानव इतिहास की दिलचस्प गाथा सुनाती रहेगी--
"जीवन अबाधित रहे
जन की कहानी कहे।" 


इतने दीर्घकाल से अविरल प्रवाहमान यह जीवन अभिशप्त कभी नहीं हो सकता। वास्तव में, यह जीवन और इसके उन्नयन और नैरंतर्य हेतु इसके साथ संलग्न सभी छोटी-बड़ी इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं, आवश्यकताएं, भौतिक-अभौतिक कोशिशें ही सत्य है; शेष सारी बातें भ्रम हैं, मिथ्या हैं। यदि इस जीवन को कभी विरामावास्था में लाने की कोशिश भी की गई तो वह कभी संभव नहीं हो सकेगा। तभी तो वह एक दार्शनिक की भाँति बुदबुदा उठते हैं-
"बद्दुआओं का असर
होता अगर;
वीरान
यह आलम
कभी का
हो गया होता।" 


ऋषि-कवि, डॉ. भटनागर सृजनहार के इस सृजित संसार की विलक्षणताओं पर मुग्ध हैं। इसके सौंदर्य की अनुभूतियों पर वह रीझ गए हैं। वह इसे कभी खोना नहीं चाहेंगे। यदि खो भी जाय तो उनकी हार्दिक कामना है कि वह इसे बार-बार जीएं। जीवन को विविधीकृत रूप में जीने की उनकी इच्छा उनकी अपनी न होकर पूरे मानव-समाज के लिए है; इसकी प्रेरणा वह पूरे समाज को दे रहे हैं--
"इस ज़िंदगी को
यदि पुनः जीया जा सके —
तो शायद
सुखद अनुभूतियों के फूल खिल जाएँ!
हृदय को
राग के उपहार मिल जाएँ!"


निःसंदेह, इस जीवन को सर्वांगीण रूप में जीने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य में सभी के प्रति आत्मीयता का समभाव हो, जन-जन में कामनाओं की ख़ुशबू हो--
"आत्मा में मनोरम कामनाओं की
सुहानी गंध बस जाए
दूर कर अंतर
परायापन
कि सब हो एकरस जाएँ!"


मानव-मात्र में प्रेम की बस एक ही गंगा सदैव प्रवाहमान होती रहे। यदि इस पीड़ित धरा पर इतने सुंदर जीवन का परिपाक है तो इस जीवन की नींव प्रेम ही है। प्रेम के उपांगों जैसे अपनापन, आसक्ति, स्नेह, सहानुभूति, साहचर्य आदि के सीमेंट-गारे से निर्मित इस जीवन की बहुमंजिली इमारत खड़ी है। सृष्टि में सृजनहार की जीवन की इस अति महत्वपूर्ण परियोजना में कविता की भूमिका अमूल्य है। साधक कवि, डॉ. भटनागर कविता के सर्वशक्तिमान और सार्वत्रिक होने की इच्छा रखते हैं--
"उसके स्वर
मुक्त गूँजे आसमानों में,
उसके अर्थ ध्वनित हों
सहज निश्छल
मधुर रागों भरे
अंतर-उफ़ानों में!
आदमी को
आदमी से प्यार हो,
सारा विश्व ही
उसका निजी परिवार हो!" 

जीवन की बाढ़ को सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता। यह चर और अचर, जीव और अजीव संसार तक विस्तीर्ण है तथा इन सभी में परस्पर साहचर्य और अपनापन भी विद्यमान है। चूंकि जीवन के सौष्ठवीकरण में मनुष्य की भूमिका अतुलनीय है, इसलिए उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह इन सभी से प्रेम करे क्योंकि उसका धर्म सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम करना है--
"प्यार करना
मानवों से
मूक पशुओं से,
पक्षियों, जल-जन्तुओं से
वन-लताओं से
द्रुमों से
आदमी का धर्म है।" 


यह पृथ्वी मानव समाज को बस एक धर्म--प्रेम को अपनाने के लिए निवेदन करते हुए अपनी धुरी पर झुकी हुई है, नतमस्तक है। इस प्रेम के अतिरिक्त, स्वयं की भौतिक और अभौतिक इच्छाओं की तुष्टि के लिए कुछ भी करना इस सृजन के प्रति अपराध है। इसी भावना से ओतप्रोत होकर प्रेमयोगी डॉ. भटनागर उन (अ)भद्रजनों को धिक्कारते हैं जो दुनियाभर के सपने पालते-पोसते हुए सिर्फ़ अपने लिए ही जीते हैं-- 

"...सपने नयन-आकाश में छाते रहें,
अपने लिए ही गीत हम गाते रहें..." 


इस बात मे तनिक भी संशय नहीं है कि जिन बहुआयामी इम्प्रेशनों पर डॉ. भटनागर काव्य-सरिता में डूबते-उतराते रहे हैं, उनमें प्रेम का भाव इतना प्रबल है कि अन्य भाव उतने अभिभावी प्रतीत नहीं होते। वह प्रेम शुरू-शुरू में व्यक्तिगत-सा प्रतीत होता है जहाँ वह अपनी प्रियतमा के साथ पुनर्मिलन की उत्कट और अनियंत्रणीय इच्छा का बार-बार विस्फ़ोट करते है; किंतु, वह शीघ्र ही व्यक्तिगत भावों से ऊपर उठकर मानव-मात्र के प्रति प्रेम का संदेश देने को व्यग्र हो उठते हैं। उनका रचना-संसार अत्यंत व्यापक है। अपनी कविताओं में वह जीवन के हर पक्ष पर सहानुभूतिपूर्वक दृष्टि ही नहीं डालते अपितु उसकी बेहतरी के लिए जन-जन से आह्वान करते हुए संकल्प लेते हुए प्रतीत होते हैं। सकारात्मक भावों और विचारों का जो उन्माद उनकी रचनाओं में छाया हुआ है, वह अन्य रचनाकारों में उतनी प्रचुरता से नहीं मिलता। उनका यह उन्माद जटिल मनोभावों और अभिव्यक्तियों से भी मुक्त है। वह जन-जन के लिए इतने सहज, सरल और सुलभ होना चाहते हैं कि उनकी इस स्थित पर विस्मय-सा होता है। क्या जीवन को अक्षुण्ण बनाए रखने और इसके लिए प्रेम को एक प्रमुख घटक बनाने के लिए किसी अन्य कवि की इतनी उन्मत्त याचना कहीं और सुनाई देती है?

An Article on Dr Mahesndra Bhatnagar by Dr Manoj Sreevastav

1 टिप्पणी:

  1. बहुत समय बाद यह आलेख पढ़ा और आज फ़ेसबुक पर भी शेयर कर दिया। आलेख सचमुच पठनीय है।

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