पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

अनूदित कविता: माँ - डॉ सुधीर कुमार अरोड़ा

डॉ सुधीर कुमार अरोड़ा

डॉ सुधीर कुमार अरोड़ा भारतीय अंग्रेजी साहित्य (विशेषकर आलोचना विधा) की एक उपलब्धि तो हैं ही, एक कवि के रूप में भी उनकी विशिष्ट पहचान है। उनकी रचनाओं में आज का भारतीय समाज स्पष्ट दिखाई पड़ता है: वर्तमान समाज व्यवस्था और उसकी विकृतियाँ, वर्ग विशेष की गरीबी-भुखमरी, अन्याय एवं अत्याचार और उसके विरुद्ध सजग आदमी का संघर्ष- और इन सबके बीच बहता हुआ अपनत्व, स्नेह- राग। इस बार हम पूर्वाभास पर उनकी चर्चित अंग्रेजी कविता 'मदर' का उनके द्वारा किया गया अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है कि दार्शनिक अंदाज में लिखी इस कविता को आप पसंद करेंगे।  डॉ अरोड़ा का जन्म 5 दिसंबर 196 8 को मुरादाबाद, उ प्र में हुआ। शिक्षा: एम ए, बी एड, पीएच डी, नेट (अंग्रेजी)। अंग्रेजी कविता संग्रह 'ए थर्स्टी क्लाउड क्राइज' सहित आधा दर्जन से अधिक आलोचना पुस्तकें प्रकाशित। देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कई सम्मानों से विभूषित। सम्प्रति: महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद, उ प्र में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर। संपर्क: बी-72, दीनदयाल नगर, फेज़-2, साईं मंदिर के पास, मुरादाबाद-244001 (उ प्र ), ई-मेल: drsudhirkarora@gmail.com

माँ 
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

मैं और यह सर्द हवा
आग और वर्फ की तरह
खुले आसमान के नीचे
रहते है खुलकर!

एक समय था
जब यह सर्द हवा
अपने नुकीले दातों से
मुझे काटती थी

समय का चक्र बदला
प्रकति बदली
आग वर्फ हो गई
वर्फ आग

आज यह वफीर्ली आग
मुझे काटती नहीं
बल्कि
मेरा चुम्बन करती है
अपने प्यार का इजहार
करने के लिए
मेरे आस्थिपंजर में
प्रवेश कर जाती है

मैंने भी एक सच
जान लिया है
कि
हम एक दूसरे के बिना
अधूरे हैं

मैं ही दर्शक हूँ
मैं ही कलाकार
चल पड़ा हूँ, बस चल पड़ा हूँ
बिना जाने
कि कहाँ होगा पड़ाव
बस चल पड़ा हूँ
इस वृत्ताकार पथ पर
जो
मुझे बार-बार ला देता है
जहाँ पर मुझे मिलता हैं
एक भिखारी

मैंने पूछा
तुम यहाँ क्यों आते हो
यहाँ तो भीख भी नहीं मिलती
यह जगह लोगों को
दुखी बना देती है
एहसास कराते हुए
कि
एक दिन तुम्हे भी
यहाँ आना है

वह मुस्कराया
बोला
न मैं बुद्धिमान
न मैं दुखी
मैं तो बस आता हूँ
सिर्फ सर्द हवाओं से
बचने के लिए
ये चिताएँ मुझे गर्माहट देती हैं
मेरे अस्तित्व को
बरकरार रखती हैं
हालांकि
यह बात दूसरी हैं
कि
जब ये चिताएँ चिताएँ नहीं थी
तब भी आग में जलती थी
फर्क सिर्फ इतना हैं
कि तब अन्दर से जलती थी
अब बाहर से

चिंता की आग
किसी काम की नहीं होती
वह अपनों को ही
ठंडा कर देती है
लेकिन
चिता की आग
काम को जलाती है
और
पंछी को मुक्त कराती है

मुझ स्वार्थी के लिए तो बस
इतना है कि
कम से कम मुझे यह आग
बचाती है
अपनी गर्माहट से
मैं जिन्दा हूँ
चिता से
चिंता तो मुझे मार ही डालती

काम आग है
आग ही मेरा काम
और
मैं भलीभांति जान गया हूँ
कि
इस आग का अस्तित्व
बर्फ में छिपा हैं
इसलिए
ये सर्द हवायें मुझे सताती हुई नहीं लगती
क्योंकि
मैं इन्हें अब प्यार करता हूँ
और यह भी सच है
कि
बर्फ और आग के बीच ही
मैं जिन्दा हूँ

एक चिता मेरे अपने की
देख रहा था
निहार रहा था
उस पवित्र आत्मा को जिसने मुझे जन्म दिया
मुझे लगा
वह आत्मा
मुझे आशीर्वाद दे रही थी

बेटे, हरहाल में खुश रहना
चिता की वो लपटें
मुझे झुलसा नहीं रही थी
बल्कि ममता का
गर्म स्पर्श दे रही थी

मैं जान गया
एक सच-
सच उस भिखारी का
उसके बार-बार मिलने का
एक चिता जो मेरे लिए
मेरी माँ की चिता थी
लेकिन
भिखारी के लिए
अस्तित्व की वजह

मैं उसके सामने
नतमस्तक हो गया
सभी चिताएं
ममता का स्पर्श दे रहीं थी
इसलिए वह खुश था

मैं सोचने लगा
कि
भिखारी कौन है
वह जिसके पास कुछ नहीं,
फिर भी खुश है
या मैं
जिसके पास सब कुछ है
फिर भी खुश नहीं हूं।



Dr Sudhir Kumar Arora

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