पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

रविवार, 31 अगस्त 2014

शचीन्द्र भटनागर के पांच नवगीत

शचीन्द्र भटनागर

मुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय शचीन्द्र भटनागर जी हिंदी के ऐसे साहित्यकार हैं जिनका अब तक समुचित मूल्यांकन नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण उनकी स्वयं की उदासीनता और आलोचकों की उनके साहित्य के प्रति अनिभिज्ञता रहा है। लेकिन इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि उनका साहित्य जहाँ अपने आप में विशिष्ट है, वहीं हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि भी है। समाज, संस्कृति और अध्यात्म के प्रति गहरे लगाव से रचे गए उनके गीत-नवगीत, ग़ज़ल, महाकाव्य, मुक्तक, निबंध, आलेख आदि आज भी अपनी ताजगी एवं समरसता से लैस हैं। वे हमें जीवन को समग्र दृष्टि से देखने के लिए प्रेरित करते हैं। शचीन्द्र भटनागर जी का पूरा नाम महेन्द्र् मोहन भटनागर है। आपका जन्म 28 सितम्बर 1935 ई. को फैजाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। प्रकाशित साहित्य : खंड-खंड चाँदनी (गीत-नवगीत संग्रह 1973), क्रान्ति के स्वर (गीत संग्रह 1999), करिष्ये वचनं तव (गीत संग्रह 2003, पुनर्मुद्रण 2011), हिरना लौट चलें(नवगीत संग्रह 2003), तिराहे पर (ग़ज़ल संग्रह 2006), ढाई आखर प्रेम के (गीत-नवगीत संग्रह 2007, पुनर्मुद्रण 2010), अखण्डित अस्मिता (मुक्तक संग्रह 2008, पुनर्मुद्रण 2010), प्रज्ञावतार लीलामृत (महाकाव्य 2011)। पुरस्कार/ सम्मान : वर्ष 1963 में कादम्बिनी पत्रिका द्वारा कादंबिनी गीत पुरस्कार, वर्ष 1988 में अखिल भारतीय व्रजसाहित्य संगम, आगरा द्वारा व्रज विभूति की उपाधि, वर्ष 1988 में हिंदी प्रकाश मंच संभल द्वारा काव्य मर्मज्ञ की उपाधि से अलंकृत, वर्ष 1998 में अमृत महोत्सव भिंड, मध्य प्रदेश में आचार्य श्रीराम शर्मा शक्तिपीठ पुरस्कार, वर्ष 2006 में हिंदी साहित्य संगम, मुरादाबाद द्वारा महाकवि दुर्गादत्त त्रिपाठी जन्मशताब्दी साहित्य सम्मान, वर्ष 2009 में आर्य समाज मुरादाबाद द्वारा आर्य भूषण सम्मान, वर्ष 2010 में साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संस्था परमार्थ द्वारा साहित्य एवं कला विभूति की मानद उपाधि प्रदत्त, वर्ष 2010 में स्व. राजेश दीक्षित स्मृति साहित्य सम्मान, वर्ष 2011 में विप्रा-कला साहित्य मंच द्वारा साहित्यार्जुन सम्मान, वर्ष 2012 में अखिल भारतीय साहित्य कला मंच द्वारा मंदाकिनी साहित्य सेवा सम्मान, वर्ष 2012 में सरस्वती परिवार मुरादाबाद द्वारा काव्य सिंधु उपाधि, वर्ष 2013 में तूलिका साहित्यिक संस्था, एटा द्वारा साहित्यश्री उपाधि, वर्ष 2014 में अखिल विश्व गायत्री परिवार मुख्यालय शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा युग साहित्य-सृजन सम्मान से विभूषित। अन्य साहित्यिक उपलब्धियाँ : (क) अनुवाद : अनेकानेक गीतों का तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांगला, गुजराती, मराठी, ओडिया, पंजाबी तथा अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है। (ख) शोधपरक ग्रंथ : 1. भक्तिगीत परम्परा और शचीन्द्र भटनागर के भक्ति गीत - संपादक डॉ. नंदकिशोर राय, लखनऊ। 2. शचीन्द्र भटनागर:व्यक्तित्व एवं कृतित्व-डॉ. कंचनलता, बरेली। 3. शचीन्द्र भटनागर के काव्य की अंतर्यात्रा- डॉ. सुनीता सक्सेना, एटा। 4. उत्तरोत्तर- अमृत वर्ष पर प्रकाशित समीक्षात्मक ग्रंथ- संपादक डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल, बिजनौर। संपर्क सूत्र : शचीन्द्र भटनागर, द्वारा-श्री अमित भटनागर, वरिष्ठ सहायक, जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय, कचहरी रोड, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश), पिन संख्या- 244001; शचीन्द्र भटनागर, 13 जनक भवन, शांतिकुंज, हरिद्वार (उत्तराखण्ड) - 249411, मोबाइल-09319836707। इस बार पूर्वाभास (http://www.poorvabhas.in) पर प्रस्तुत उनके पांच गीत उनकी रचनात्मकता की बानगी पेश करते हैं। 

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 
1. क्षमादान 

जी, हम हैं पंडे पुश्तैनी

दर्ज बही में अपनी
देखो परदादा का नाम तुम्हारे
संस्कार करवाने आते
पूर्वज यहीं तुम्हारे सारे
हमें ज्ञान है हर निदान का
पाप- ताप के क्षमादान का

तभी यहाँ आते रहते हैं
बौद्ध, समाजी, वैष्णव, जैनी

हमें पता हर सीधा रस्ता
हम हैं ईश्वर के अधिवक्ता
ऐसा सुगम उपाय पुण्य का
कोई तुमको बता न सकता
कई पीढिय़ों को है तारा
करना यह विश्वास हमारा

कुछ भी करो साल भर चाहे
मन में मत लाना बेचैनी

क्यों चिंता में डूबे रहते हो यजमान
जागते- सोते
थोड़ा जीवन शेष
बिताते क्यों उसको यूँ रोते- धोते
हम ऐसा विनियोग करेंगे
दूर दोष- भय- रोग करेंगे

वहाँ न काम करेगी
गीता, रामायन या कथा, रमैनी

पिछले- अगले कई जन्म का
ऐसा समाधान है हम पर
शांति उन्हें भी हम दे सकते
जिनका है उपचार न यम पर
हम ब्रह्मास्त्र चला सकते हैं
भवनिधि पार करा सकते हैं 

काम न भारी बुलडोजऱ का
करती कभी हथैड़ी-छैनी

कृपा- प्राप्ति के लिए
त्याग भी कुछ करना पड़ता है साधो!
सबकुछ यहीं पड़ा रह जाना
फिर क्यों सिर पर गठरी लादो
जब चाहो गंगातट आना
श्रद्धा से कुछ भेंट चढ़ाना 

पा जाओगे
पुण्य- लाभ की हम से सीधी- सुगम नसैनी। 

2. तीर्थाटन

अबकी बार हुआ मन
हम भी तीर्थाटन करने जाएँगे

गंगाजी के तट पर
होटल कई - कई मंजि़ल वाले हैं
एयरकंडीशंड कक्ष में
टी.वी. हर चैनल वाले हैं
हर प्रकार की सी.डी.मिलतीं
जो कुछ चाहेंगे, देखेंगे,
घूमेंगे, दृश्यों का पूरा हम आनंद वहाँ पर लेंगे

इस अवसर का लाभ उठाकर
हल्का मन करने जाएँगे

कमरों में
हो जाता हैं उपलब्ध वहाँ पर हर सुख- साधन
एक कॉल पर
आ जाता है सामिष तथा निरामिष भोजन
मनचाहा खाने - पीने को
हम होंगे स्वच्छंद वहाँ पर
शब्द स्पर्श रस रूप गंध का
होगा हर आनंद वहाँ पर

इस जीवन पर नए सिरे से
हम मंथन करने जाएँगे

यहाँ दृष्टि में दकियानूसी लोगों की
रहता है संशय
माँ गंगा की सुखद गोद में
बिता सकेंगे जीवन निर्भय
कुछ भी पहनेंगे- ओढ़ेंगे
वहाँ न कोई बंधन होगा
वहाँ पहुँचने पर
हम दोनों वही करेंगे जो मन होगा

मन का भार उतार
वहाँ हम मनरंजन करने जाएँगे

गंगास्नान करेंगे
भीतर वही चेतना भी भर देंगी
वह तो पतित पावनी माँ हैं
हर अपराध क्षमा कर देंगी
जब मंदिर जाकर
श्रद्धा से शीश नवाएँगे हम दोनों
तीर्थाटन का लाभ
सहज ही फिर पा जाएँगे हम दोनों

मनरंजन के संग
सफल हम यह जीवन करने जाएँगे। 

3. कथावाचिका 

रामकथा करने आई हैं 
कथावाचिका मथुरावासी

वह उपवास-निरत रहती हैं
अन्न-त्याग का तप करती हैं
केले, सेब, अनार, आम हों
काजू, किशमिश हों, बदाम हों
दुग्ध संग में हो तो उत्तम
रहती हैं वह सदा उपासी
कथावाचिका मथुरावासी

गंगाजल से स्नान करेंगी
तदुपरांत वह ध्यान करेंगी
जल में दूध-दही मिश्रित हो
पुष्पसार से वह सुरभित हो
ऐसा है व्यक्तित्व
कि लगती हैं पूनम की चंद्रकला-सी
कथावाचिका मथुरावासी

एक पहर में
तीस मिनट की ही केवल वह 
कथा सुनातीं
शेष समय में स्वर-लहरी से
हाव-भाव से रस बरसातीं
भीग-भीगकर जनता फिर भी 
रह जाती प्यासी की प्यासी 
कथावाचिका मथुरावासी

समझाती हैं- कर्म तुम्हारे
ईश्वर आठों याम निरखता
कृपा-अनुग्रह से पहले
वह भक्तों की पात्रता परखता
फिर कहती हैं-
हुई आजकल दुनिया 
धन साधन की दासी 
कथावाचिका मथुरावासी

धन-आभूषण
उन्हें भेंट-में जब कोई देता श्रद्धा से
उसे ग्रहण कर मुस्काती हैं
वह आशीर्वाद-मुद्रा से 
एक पहर सेवा को
उत्सुक रहते ऊँचे भवन-निवासी
कथावाचिका मथुरावासी। 

4. पुण्य पर्व

आने वाली शिवतेरस है

शिव के श्रवणकुमार जा रहे
सजी सुगढ़ काँवड़ काँधे हैं
शॉर्ट कैपरी हैं केसरिया
पाँवों में घुँघरू बाँधे हैं
मुँह में रखे भाँग के गोले
बोल रहे हैं बम बम भोले
कभी नाचते हैं मस्ती में
चलते में लेते हिचकोले

बरस रहा नभ से
बादल बन शिव की 
सरस भक्ति का रस है

भक्तिभाव से
गंगातट पर आकर वे 
जल भर ले जाते
किंतु पुरानी काँवड़, कपड़े
गंगाजी के बीच सिराते
पतितपावनी गंगा मैया
इनका भी उद्धार करेंगी
नहीं सोचते
जल में वे सब कितना 
अधिक विकार भरेंगी

नासमझी से
मिलता गंगामाता को 
कितना अपयश है

भक्त वहाँ कुछ ऐसे भी हैं
जो मन बहलाने को आते
जगह-जगह सत्कार देखकर
मस्ती करते, मौज मनाते
एक जेब में पव्वा रखते
एक जेब में पिसी भाँग है
काँवड़ या केसरिया कपड़े
केवल नाटक और स्वाँग है

तप का भाव नहीं है मन में
करनी उनकी
जस-की-तस है

यह श्रावण का पुण्य पर्व है
चाहो अगर परमपद पाना,
विल्वपत्र के संग-संग तुम
आधा कुंतल दूध चढाऩा
रोगी बच्चा
झोंपड़पट्टी में चाहे भूखा मर जाए
या श्रम करती माँ का
बेटा एक घूँट पय को ललचाए

सबकी अपनी-अपनी किस्मत
नहीं नियति पर चलता वस है। 

5. गुरु - दीक्षा

सद्गुरु गंगातट आए हैं
आओ जीवन धन्य बना लो

जिन्हें न गुरु मिल पाता
उनको कहते हैं सब लोग निगोड़े
ऊपर जाकर सहने पड़ते
उनको यमदूतों के कोड़े

गहकर गुरु की शरण
स्वयं को महादंड से आज बचालो

अहोभाग्य गुरु स्वयं आ गए
करने को कल्याण तुम्हारा
किसे पता है
मिले ना मिले यह अवसर फिर तुम्हें दुबारा

गया समय फिर हाथ न आता
दीक्षा लेकर पुण्य कमालो

देख-देख हर कर्मकांड में
प्रतिदिन होती लूट यहाँ पर
कृपासिंधु गुरु जी ने
दीक्षा में दी भारी छूट यहाँ पर

मिली छूट का
समझदार बन इसी समय शुभ लाभ उठा लो

एक नारियल,
पंचवस्त्र के संग पंचमेवाएँ लेकर
और पंच मिष्ठान्न, पंचफल,
पंचशती मुद्राएँ लेकर 

सद्गुरु के श्रीचरणों पर

अर्पित कर कृपा-अनुग्रह पा लो

शरणागत पा तुम्हें
कान में मंत्र तुम्हारे वह फूकेंगे
तीन लोक में
सात जन्म तक वह तुमको संरक्षण देंगे

सद्गुरु तथा शिष्य का नाता
अपने हित के लिए निभा लो

डरो नहीं
जीते हो जैसे जीवन वैसे ही जी लेना
शिष्यों की जीवनशैली से
उन्हें नहीं कुछ लेना-देना

विगत-अनागत दोनों के ही
सभी कर्मफल क्षमा करालो। 


Five Hindi Lyrics of Shacheendra Bhatnagar

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपकी प्रतिक्रियाएँ हमारा संबल: