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शनिवार, 14 सितंबर 2019

कहानी: बुकिंग का कुत्ता - धर्मेन्द्र कुमार सिंह

धर्मेन्द्र कुमार सिंह

पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय युवा कवि धर्मेन्द्र कुमार सिंह का जन्म बिहार के भवानीपुर (बढ़ैयाबाग) गाँव में हुआ। शिक्षा: स्नातकोत्तर (दर्शन शास्त्र)‚ नेट‚ बी०एड०। प्रकाशित कृति: कहानी संग्रह - ‘शराबी की बीबी’ (बिहार सरकार के अंशानुदान से)। आपकी कई कहानियाँ और कविताएँ देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकायों में प्रकाशित हो चुकी हैं। सम्पर्क: धर्मेन्द्र कुमार, ग्राम- भवानीपुर (बढ़ैयाबाग)‚ पोस्ट- बाजार समिति तकिया, थाना- सासाराम‚ जिला- रोहतास‚ बिहार‚ भारत- 821115, मोबा: 07209214546, ई-मेल: dharmendra.sasaram@gmail.com।

हमारे यहाँ अमीरों में कुत्ता पालने की एक प्रथा चल पड़ी है। लोगों की स्थिति ज़रा भी अच्छी हुई कि वे पश्चिमी कुत्ता पालना शुरू कर देते हैं। अपने यहाँ का कुत्ता मुफ़्त में मिल जाता है; किन्तु इस देश के अभिमानी, आत्मसम्मान से भरे हुये लोग मुफ़्त लेना अपनी शान के ख़िलाफ समझते हैं। इससे उनकी शान में बट्टा लगता है। आपके दरवाज़े पर कितना भी सुन्दर सींगों वाली दुधारू गाय हो, उसे लोग न देखेंगे; किन्तु एक पश्चिमी कुत्ता बँध जाए तो उसे देखने वालों की भीड़ लग जाती है। एक तरह से वह यह बताना चाहते हैं कि हम भी रईसों में शामिल हो गये हैं। और नहीं तो सुबह—शाम कुत्ता को साथ लेकर घूमते है ताकि जो न जानता हो‚ वह भी जान जाए कि मेरी गिनती रईसों में हो गयी है और अब मेरी शान में ग़ुस्ताखी कदापि बर्दास्त न की जाएगी। एक ज़माना था‚ जब दरवाज़े पर गाय का दर्शन शुभ माना जाता था। उसकी गोबर से घर लीपा जाता था। गाय और गोबर दोनों की पूजा होती थी। यह कहना अनुचित न होगा कि उसका स्थान अब कुत्ता ले रहा है, पछाही कुत्ता।


उन्हीं लोगों में एक है मिस्टर टोनी विलियम‚ जिसे कुत्ता से बहुत प्रेम था; जो हर बार जानदार महंगा कुत्ता ख़रीद लाते। मुहल्ले के लोग कुत्तों को देखकर तारीफ़ ही नहीं करते बल्कि उसकी पीठ थपथपा जाते। जो देखता वही मुग्ध हो जाता। मित्रों में कई महाशय दोगुना दाम देने को तैयार हैं, उनमें से कई चैगुना तक बोल दिये, तुरन्त पैसा लो और रस्सी पकड़ा दो, उधार की फिक्र में कौन मरे ! किन्तु वह किसी की एक न सुनता। नाम की इंसानी भूख उसके अंदर भी है। उसकी प्रसिद्धि किसी और को मिले‚ इसे वह सहन नहीं कर सकता था। लोगों और मित्रों के लाख पूछने पर भी उस कुत्ता के ख़रीदने का ठिकाना नहीं बताया, और न ही उसके जैसा दूसरा कुत्ता औरों के लिए लाने पर राजी ही हुआ। हजारों बहाना बना देता—उसके पास एक ही कुत्ता था। चलते—फिरते मिला था, क्या पता कहाँ का रहने वाला था ? मैंने उसका ठिकाना नहीं पूछा। उसकी शक्ल—सुरत बिल्कुल आदमी की तरह था। महीने दिन में इस कुत्ता से उसने काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। कितने नये दोस्त बन गये। सुबह—शाम जब वह कुत्ता को लेकर टहलने जाता तो कितनी सुन्दरियाँ उसके बारे में पूछ बैठती‚ तब वह बाग—बाग हो जाता; उसका मन बासों उछलने लगता। कुत्ता की क़ीमत वसूल हो जाती।

टोनी जबतक घर पर रहते‚ एक पल के लिए भी उसे नहीं छोड़ते। कुत्ता भी ऐसा पंजा था कि टहलना, घूमना, खाना, सब मालिक के साथ होता। यहाँ तक की दोनों साथ ही नहाते भी थे। उसके घरवाले पूरे वैष्णवी थे। कुत्ते का घर में रहना उन्हें एक आँख नहीं भाता। सदैव किसी अनहोनी की चिंता लगी रहती। घर में किसी को सर्दी—बुखार होता या सिर भी दुखता तो उस निरीह प्राणी के माथे मढ़ा जाता, उसी के गृहप्रवेश का प्रकोप समझा जाता। पर महाशय टोनी का घर पर कुछ ऐसा प्रभाव था कि कोई कुछ बोलता न था। उन्हीं के पुरूषार्थ से घर की अर्थव्यवस्था संचालित हो रही थी। लम्बे क़द के गोरे सुगठित शरीर के मालिक थे। चेहरे की बनावट कुछ ऐसी थी कि प्रसन्नता के समय भी क्रोधवृत्ति का आभास बना रहता। उनके बलिष्ठता और रोबिलता के कारण लोग बगले हट जाया करते। इनके घर पर प्रभाव का एक यह भी कारण था।

महाशय टोनी ज़मीन ख़रीद—बिक्री का काम करते थे। लाख—दो लाख से यह व्यवसाय शुरू कर आज करोड़ों की सम्पत्ति बना लिये हैं। पटना में इनका पुस्तैनी घर है किन्तु अब येलोग बनारस में रहते हैं। उसी पुस्तैनी मकान की मरम्मत करवाना था। उसी के सिलसिले में पटना जाना है। कुत्ते को भी साथ ले जाना उचित समझे। पीछे भी कई बार साथ लेकर ही गये थे। माता ने रोका, पत्नी ने मना किया; किन्तु वे न माने। पिताजी जानते थे‚ करेगा अपनी ही; इसलिए कुछ कहना उचित न समझे। पर भाव—भंगिमा से विलियम सब समझ रहा था। अंततः किसी की कुछ न सुनते हुए कुत्ते को साथ ले चले। टोनी और शेरू दोनों एक—दूजे की भाषा, इशारा और हाव—भाव अच्छी तरह जानते और समझते थे। था तो कुत्ता किन्तु नाम था शेरू। वह टाँमी रखने वाला था‚ किन्तु घर वाले शेरू रख दिये। शेरू अंग्रेजी के बहुत सारे शब्दों को सीख गया था। विलियम अपने को किसी अंग्रेज से कम न आँकता था। उनका नाम, पहनावा, खान—पान, खाने का तरीका, सब अंग्रेजों जैसा था। अंग्रेजी भाषा से उसे विशेष रूचि थी, धड़ल्ले से बोल भी लेता था। यहाँ के दूसरे रईसों की भाँति उसे भी हिन्दी का चलन अच्छा न लगता। जब सारी दुनिया अंग्रेजी बोल रही है तो हम हिन्दी से क्यों लिपटे रहे। उसका हँसना, मुस्कुराना यहाँ तक की दुःख व्यक्त करना भी अंग्रेजी शैली में होता था। इधर कुछ दिनों से रोने, चलने, हँसने और अन्य समप्राकृतिक क्रियाओं की अंग्रेजी शैली की खोज की फिराक में लगा था। उसके वश में होता तो शेरू को अंग्रेजी में भौंकना सिखा देता। शेरू सामान्य आवारा कुत्तों से बड़ा और झबरा था, भारी और तगड़ा, झाड़ीदार पूँछोंवाला।

विलियम घर से निकले तो अंग्रेज को मात दे रहे थे। बूट, पतलून और टाई उसके शरीर पर जँच रहा था। आँखों में काला ऐनक और सर पर हैट रखे, जब वह मोबाइल से बातें करता, छड़ी घूमाता घर से निकलता तो कितनी युवतियाँ अपने दिल को थाम लेती। मुहल्ले के ग़रीब बच्चें जिनके घर में दर्पण न था, दूर से उनके ऐनक में देखकर अपने बाल सँवार लिया करते। टोनी किसी सगे से बात करते हुए अपनी धुन में स्टेशन की ओर चला जा रहा था। शेरू के गले में सिकड़ लपेट दिया गया था। वह मालिक के पीछे—पीछे दुम हिलाते जा रहा था। कई बार ऊँचाई देखकर और सुंधकर अपनी वृत्ति को अंजाम भी दिया। आदतवश सुंधते हुए कुछ दूर तक दूसरी गली में भी चला जाता, किन्तु तुरन्त मालिक के पीछे लौट आता। उसे देख दो—चार कुत्ते दूर से भूँक भी रहे थे। एक गली में धुसा ही था कि चार—पाँच आवारा कुत्तों ने न जाने किधर से आकर इसे घेर लिये। शेरू डर गया। एक—दो होते तो लड़ भी लेता। पाँच—पाँच कुत्तों से लड़ने का मतलब आग में कूदना है। वो भी आवारा कुत्तों से, वर्धा और साँढ़ में अंतर को कौन नहीं जानता ? पहले तो शेरू उन्हें डराकर भगाना चाहा, भौंका, मुँह फाड़ा, दाँत निपोरा‚ लेकिन ये कुत्तें ऐसी हरकतों से पंजे थे। वे आगे ही बढ़ते जा रहे थे। शेरू को पीछे हटने के सिवा सुरक्षा का दूसरा रास्ता नज़र नहीं आया। मालिक भी न जाने बातों के धून में कितनी आगे निकल गये। अपनी पत्नी के होते हुए भी न जाने किस—किस से और कहाँ सारा दिन बातें किया करते रहते हैं। यह मुबाइल भी बुरी चीज़ आ गयी है, उसके आगे किसी दूसरी चीज़ की सुधी ही नहीं रहती। वे आ जाते तो एक—एक की ख़बर लेता। शेरू पीछे हटने के क्रम में नाली में जा गिरा, पूरा शरीर कीचड़ से सन गया। शुक्र यही कि एक ही छलांग में निकल गया। खाया—पीया शरीर था। सुबह में दस रोटी का नास्ता, दोपहर में भरपेट मांस, रात को रोटी के साथ दूध। आसपास के सारे चूहे साफ हो गये थे। इसके अलावा भी ब्रेड, बिस्कुट आदि मिल जाया करता था। नाली से निकलते ही दूम दबाकर घर की तरफ़ भागा। इसे नाली में गिरते देख बाकी कुत्तें आश्वस्त हो गये। उसी का फ़ायदा उठाकर शेरू भाग निकला। आवारा कुत्तें भी पीछे दौड़े, मुहल्ले के और भी कई कुत्तें आ मिले। जिस प्रकार एक फलते—फूलते मनुष्य को देखकर अगल—बगल और मुहल्ले वाले डाह पर उतर जाते है और आपसी शत्रुता भूल कर सभी उस बढ़ते व्यक्ति को नीचा दिखाने, और उसकी उन्नति को रोकने के लिए साथ मिल जाते हैं; उसी प्रकार शेरू की शान—शौकत की ज़िन्दगी, गाड़ियों में घूमना, गद्दों पर सोना, मेवें और बिस्कुट उड़ाना‚ उन्हें एक आँख नहीं भाता। यहाँ तक की उसके घर तक आते—आते पन्द्रह कुत्तों का झूंड उसके पीछ हो गया। संयोग से दरवाज़ा खुला था। शेरू दरवाज़े पर आकर ठिठक गया और भोंकने लगा। कुत्ता अपने दरवाज़े पर शेर होता है। किन्तु यह बात भी तभी लागू होती है‚ जब मालिक या कोई संरक्षक उसके साथ हो या फिर उससे भिड़ने वाला, उसका शत्रु उससे कमज़ोर हो। यहाँ पन्द्रह कुत्तों के झूंड के आगे, जो दरवाज़े पर चढ़े जा रहे थे; उसकी एक न चली। घर के अंदर जाकर शरण लेनी पड़ी। घर को अभी—अभी धोकर सभी छत पर गये थे। गलती से बाहर का दरवाज़ा खुला रह गया था। शेरू के घर में घुसते ही सभी आवारा कुत्तें भी घर के अंदर चले गये। वैसे तो शत्रु के घर में घुसना जान जोख़िम में डालने से कम नहीं, चाहे शत्रु कितना ही अकेला और कमज़ोर क्यों न हो। किन्तु जब विपक्षियों की संख्या अधिक हो, और एक—दूसरे को उत्तेजित कर रहे हों तो फिर किस बात का डर ? धोया हुआ सारा घर नाली के कीचड़ से सन गया। बहुत सारे कुत्तों के भोंकने की आवाज़ सुनकर जबतक लोग छत से नीचे आते, उन्हें भगाते, शेरू भय से विलियम के शयन कक्ष के विस्तर पर चढ़ गया था। नीचे छिपने में हमला होने का भय था। वह भागने की पराकाष्ठा तक भाग लिया था। इस संग्राम में अब लड़ते हुए मरने के सिवा दूसरा रास्ता न था। भागने के सारे रास्ते बंद थे। संयोग की उसी समय छत से उतरकर घर के जन आ पहुँचे। उन्हें देखते ही आवारा कुत्तें घर से निकल भागे। उधर से दौड़ते—हाँफते विलियम भी आ पहुँचा। शेरू घरवालों के साथ दरवाज़े तक आकर भोंककर उन्हें भगाने की कोशिश करने लगा। विलियम क्रोध में दरवाज़े के पीछे का बेड़ा उठाया और उन कुत्तों के ऊपर पील पड़ा। वे दुम दबाकर भागे, शेरू भी मालिक के साथ उनके पीछे दौड़ा। मानों, भागते हुए सैनिकों की संरक्षित टूकड़ियाँ आ जाने से एक बल मिल गया हो‚ और वे पूरे ताकत से अपनी तरफ़ आते सैनिकों पर टूट पड़े हो। वैसे तो वीर योद्धा भी भागते सैनिकों को वहीं तक पीछा करते है, जहाँ तक उनकी अपनी सुरक्षा संरक्षित जान पड़ती है। शेरू तो फिर भी कुत्ता है। धन—वैभव, मान—अपमान, विजय—पराजय की भावना चाहे न हो‚ किन्तु जान—रक्षा की फिक्र होना लाज़िमी है। जब विलियम रूक गया तो दस क़दम आगे जाकर शेरू भी रूक गया और वहीं से भोंकने लगा। उससे आगे जाना सुरक्षित न था। विजय गान और फ़तह के पताका से अपनी जीत की उद्घोषणा कर दी। मुहल्लें वाले यह दृश्य देखकर अंदर—ही—अंदर ख़ूब हँसे और जब हँसी न रोकी गयी तो, घर के अंदर जाकर दिल खोलकर हँसे।

विलियम जब घर आया तो सारा घर नाली की अज़ीब—सी दुर्गन्ध से बसा रहा था। गलियारा, आँगन, विलियम का शयनकक्ष और बिस्तर नाली के बदबूदार कीचड़ से सन गया था। आज पहली बार माँ और पत्नी की कटाक्षयुक्त बातें सुनकर भी कुछ न बोला। उसी समय कपड़े खोला, शेरू को सैम्पू और साबुन से नहलाया। पत्नी ने बेडरूम और बिस्तर साफ की, माता ने गलियारे और आँगन को। करीब तीन घण्टें बाद पुनः उसी रौब और ठाठ से विलियम निकला, अबकी शेरू की गर्दन में लगी पट्टे से बंधी चैन उनके हाथ में थी।

विलियम कुत्ते की बुकिंग कर उसे गार्ड के दराज़ में बंद कराकर ख़ुद शयनयान डब्बा में जाकर सो गया। ट्रेन एक्सप्रेस था; किन्तु इसमें केवल एक ही शयनयान डब्बा था। भीड़ काफी थी, बड़ी मुश्किल से उसे बैठने को जगह मिली। वाराणसी से शाम को आठ चालीस की गाड़ी पकड़े थे। सुबह चार बजे से पहले पहुँचने की उम्मीद न थी। गाड़ी अपने समय से खुली किन्तु मुगलसराय निकलते—निकलते एक घण्टा लेट हो गयी। गर्मियों की रात, खिड़कियों से शीतल समीर आ रही थी। दिन भर के तपे, झुलसे लोगों को राहत मिल रही थी। ट्रेन केवल चुनिंदा स्टेशनों पर ही रुकती थी। गार्ड साहब झपकी ले रहे थे कि कुत्ते की कु कु............की आवाज़ से उनकी नींद टूट गयी। रात के अंधेरे में गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी। कुत्ते की लगातार कु कु से गार्ड साहब परेशान हो गये। उन्हें लगा कुत्ता शायद कोई परेशानी में हो या प्यास से ऐसा कर रहा है। उन्होंने फैसला कर लिया कि गया जंक्शन पर पानी पिला दूँगा। गर्मी का दिन है। जब बनारस से यहाँ तक आने में मैं तीन—चार बोतल पानी पी गया। यह तो बेचारा जानवर ही है।

गाड़ी गया जंक्शन पर खड़ी होते ही गार्ड साहब पानी लाकर कुत्ता को पिलाने के लिए दराज़ उठाये। दराज़ टाइट होने के कारण उठ नहीं पा रहा था। गार्ड साहब ने दोनों हाथों से जोर लगाकर उठाया, दराज़ का पूरा पल्ला बाहर निकल गया। जबतक वे पल्ला उसके घाट में लगाते कुत्ता दराज़ से बाहर निकल गया। उनके पल्ला लगा कर मुड़ते—मुड़ते वह गाड़ी से प्लेटफार्म पर उतर गया। गार्ड साहब मोटे थूलबुल आदमी थे जबतक गाड़ी से उतरते कुत्ता गायब। प्लेटफार्म यात्रियों से खचाखच भरा था। उनकी छाती एक अज्ञात शंका से धड़कने लगी। उन्हें आश्चर्य हुआ, इतनी जल्दी कुत्ता कहाँ चला गया ? चारों तरफ़ देखे, कहीं नहीं दिखा, और आगे बढ़कर देखे‚ कहीं पता नहीं। गार्ड साहब का हाथ—पाँव फुलने लगा। चार्जशीट और नौकरी पर आफ़त तो बाद में आएगी। पहले विलियम का डर सताने लगा। कई रेलवे और कैरेज‚ पार्सल के प्राइवेट स्टाफ को बुलाये और खोजने का भार सौपे, इसके लिए हजार रुपये तक देने को तैयार थे। सबने भरपूर कोशिश की‚ किन्तु वह कुत्ता अलाद्दीन के चिराग की तरह गायब हो गया, मिला ही नहीं। गार्ड साहब को काटो तो ख़ून नहीं। जीवन में पहली बार इस बुरी तरह फंसे थे। कहाँ से पानी पिलाने की सनक सवार हुई। बुरे वक्त में आदमी की मत्ति मारी जाती है। इतना भी न सूझा की बाहर का दरवाज़ा बंद कर दूँ।

पार्सल का एक स्टाफ बोला—“आपको याद है, कुत्ता काला ही था।”

गार्ड साहब उलझन में—“हाँ, भई हाँ ! काला ही था। बुकिंग लेते समय भी देखा था, भागते समय भी देखा।” 

दूसरा बोला— “नीचे उतर के किस ओर गया ?”

गार्ड दुःखी मन से—“यही तो नहीं देख पाया। उतरा तो था सीधे‚ उस समय कई लोग आ—जा रहे थे; उन्हीं से उझल हो गया। जबतक मैं उतरता, पता न किधर को चला गया।”

तीसरा—“उसके मालिक के पास जाकर देखूँ, हो न हो वही चला गया हो।”

“ऐसा ग़ज़ब मत करना ! नौकरी तो जाएगी, मार भी पड़ेगी। सात फूट का ग़ुस्सैल, बलिष्ठ व्यक्ति है। मैं वहाँ गया था, वह सो रहा है। किसी हालत में उसे उसकी भनक न लगनी चाहिए।”

पहला स्टाफ—“सुबह लेते वक्त तो ख़बर लग ही जाएगी, तब क्या करेंगे ?”

“तब की तब देखी जाएगी, अभी से ही क्यों चिंता करूँ। दर्द होता है तो आदमी रो लेता है, कतृत्व का नाम सुनकर ही आदमी रोने ,चिल्लाने नहीं बैठ जाता।”

पार्सल का एक अधेड़ स्टाफ बोला—“साहब यह बताइये, वह सामान्य कुत्तों जैसा ही था या कुछ अलग यानी कि उसके भी चार ही पैर था या कुछ कम ज्यादे भी।”

गार्ड ग़ुस्से में बड़ी—बड़ी आँखें लाल करके देखे; किन्तु इस वक्त क्रोध करना उचित न समझे, जब्त करके बोले—“सामान्य कुत्तों से थोड़ा अलग था, इसके शरीर का बाल बड़ा—बड़ा था, मुँह की बनावट गेंडें जैसा था या ऐसे समझो अपाची बाइक के आगे का लुक जैसा। कान बड़े, पूँछ झाड़िदार।”

“पूँछ कुत्तों की पूंछ जैसा या सीधी ? सुना है, कुछ विलायती कुते की पूँछें सीधी भी आने लगी है। ख़ुफिया से पता चला है कि भारतीय कहावत ग़लत करने के लिए अंग्रेजों की यह चाल है।”

गार्ड साहब अब और जब्त न कर सके‚ उबलकर बोले—“कुत्ता है तो कुत्तें जैसा ही पूँछ रहेगा और नहीं तो क्या साँप जैसा रहेगा !”

सभी चुपचाप ढूँढने निकल गये। पन्द्रह मिनट बाद सभी निराश खाली हाथ लौट आये। स्टेशन के आस—पास कहीं था ही नहीं। पता न किधर को चला गया।

गार्ड साहब खामोश, चिंतित।

दूसरा व्यक्ति—“अब क्या सोचा है ?”

“यही तो फिक्र खाये जा रही है। समझ में नहीं आता क्या करुँ। गाड़ी खुलने का समय भी होने लगा है।”

उसी में पार्सल का तीसरा व्यक्ति एक युक्ति सुझाया—“क्यों न किसी दूसरे कुत्ते को पकड़ कर दराज़ में बंद कर दिया जाए ?”

“मगर सुबह जब वह दूसरा कुत्ता देखेगा तो झल्लाएगा। ज़ाहिर है कम्पलेन भी कर दे। हे ईश्वर किस आफ़त में जान फँसी !“

पहला व्यक्ति—“अनजान बन के कह देना मैं क्या जानूँ, जो रखा था‚ वही है। मैंने कभी खोला ही नहीं।”

गार्ड साहब निराश और दुःखी मन से—“देखिये, अब उनका ही आसरा है। सुना दुखियारों को भव सागर से पार लगाते हैं। न जाने किसका मुँह देखकर घर से निकला था।”

आदमी को मुसीबत में ईश्वर की याद बहुत जल्द आती है।

दूसरा व्यक्ति गार्ड साहब के निराशा भरे शब्द सुनकर सांत्वना भरे शब्दों में बोला—“इतने सालों की उम्र में मेरा यह तज़ुरबा रहा है कि घर से निकलते वक्त लोग आइना देखकर निकलते हैं। पहले माता—पिता का पैर छूकर, डीह को या ईश्वर को याद कर निकलते थे। अब आइने के सामने घण्टों खड़े रहते हैं या फिर पत्नी को गौर से निहारने के बाद घर से निकलते हैं। मज़े की बात यह कि आने के बाद भी पुनः उसी आइने के सामने जाकर खड़े हो जाते हैं, गोया वहीं लौटे हैं या बदल गये हैं।”

गार्ड साहब को ग़ुस्सा तो ऐसा आया कि उसका सिर फोड़ दे। किन्तु ज़ब्त कर रह गये। कमबख़्त‚ मुझे और मेरी देवीजी को ख़ुलेआम कोस रहा है, मनहूस कहता है। इसे तो ऐसा सबक सिखाऊँगा की नानी याद करेगा।

खैर, गार्ड साहब को इसके अलावा दूसरा उपाए न सुझा। गाड़ी खुलने का समय हो गया था। सभी मिलकर स्टेशन पर घूमते एक आवारा‚ काला कुत्ता को पकड़ लाये और दराज़ में बंद कर दिये। वह कुत्ता पीछे खींचता, ना—ना कहता, अपनी निर्दोषिता का दुहाई देता, दुबारा स्टेशन पर न आने की कसमें खाता, पर उसकी सुनता कौन ? जिस प्रकार कोई सीधा और सामान्य व्यक्ति टिकट के रहने पर भी टिकट—संग्राहक हजारों नियम—कानून बताकर उसे दोषी सिद्ध कर देता है। उसके हजार, मिन्नतों, दुहाइयों, मज़बुरियों के बताने के बाद भी उससे कुछ—न—कुछ ऐंठ लेता है। ये लोग भी उस ग़रीब की एक न सूने, दो आगे से खींचते एक पीछे से धक्का देते हुए लाकर दराज़ में बंद कर दिये। इस क्रम में गाड़ी समय से दस मिनट देर से खुली। पाँवर वाकी—टाँकी से बार—बार चलने को कह रहा था। कई बार माइक से अलाऊँस भी कराया गया। पर ये महाशय सब सुनते हुए चुप्पी साधे थे। रात का समय था, अंत में सोया समझ कर पोर्टर को दौड़ाया गया। सिगनल कब से लोअर था। पायलट बार—बार सेट से आवाज़ दे रहे थे और गार्ड से सिगनल आदान—प्रदान की प्रतिक्षा में थे।

जब गाड़ी चली गयी तो पार्सल का पहला व्यक्ति बोला—“आज आया ऊँट पहाड़ के नीचे, रोज़ दूसरों से ऐठता था‚ आज पहली बार थैले का भार कुछ कम कर गया।”

दूसरा—“मैं तो हजार रुपये से कम न लेता, तुमने ही पाँच सौ खोल दिया।”

पहला—“एक ही चंडाल है, इससे एक पैसा अधिक न देता।”

दूसरा—“देता कैसे नहीं, हँस के देता। नौकरी पर बन आयी थी। एक हजार क्या पाँच हजार भी देता।”

तीसरा—“देखना, मौका मिलते ही एक—एक से समझेगा।”

उसी वक्त स्टेशन के माइक से दूसरी गाड़ी की सूचना हुई। सभी प्लेटफार्म दो पर भागे। 

चोरों के लिए चोरी करना सामान्य बात है। वे चोरी करते हैं और पकड़े भी नहीं जाते। पकड़े जाने पर कोई—न—कोई युक्ति निकाल लेते; किन्तु जिसने कभी चोरी नहीं किया हो और एक दिन चोरी कर ले तो उसके दिल में पकड़े जाने का भय बना रहता है। ज़रा—सी आहट या खटका पर चौक जाता, चेहरे पर अपराधिक भाव दिखने लगते । गार्ड साहब गया से चले तो उनका भी यही हाल था। एक ढाल तो मिल गया था‚ किन्तु वह इतना मज़बूत न था कि सच्चाई का एक भी वार सह पाता। उनका अंतःमन एक आंतरिक अशांति और भय से बेचैन हो रहा था। कितने ही स्टेशन पर गाड़ी रूकी और चली, कौन स्टेशन आया और गया इसका उन्हें भान न रहा। यहाँ तक की प्रस्थान—आगमन रजिस्टर पर समय भी न भर पाये। जस—जस पटना निकट आता उनकी धड़कने बढ़ती जाती, व्याकुलता और बेचैनी से उनके हाथ—पाँव काँप रहे थे। कई बार सोचे, कहूँगा यही कुत्ता आपने बुक किया था, मैं क्या जानूँ ? आप अपना कुत्ता ले जाओ। किन्तु सच्चाई की लहरें आती और रेत के घर को तहस—नहस कर जाती। बार—बार पछता रहे थे, नाहक ही पानी पिलाने का बेड़ा उठाया। नेकी कर मारन जाय। चार्जशीट मिलना तय है। वह भी लाखों—हजारों सरकारी कर्मचारियों की भाँति अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर चाहे कितना भी रोब जमाते हो, किन्तु अधिकारियों की एक डाँट पर काँपने लगते थे। चार्जशीट के नाम पर इनकी जान नखों में समा जाती। पुनपुन पहुँचते—पहुँचते कई विचार उनके मन में आया और निकल गया। एक बात जो उनके मन में बैठ गयी‚ वह यह कि दराज़ से इस कुत्ता को मैं न निकालूँगा और न ही किसी और को निकालने दूँगा। कह दूँगा इसके मालिक आकर ख़ुद निकालेंगे, कुत्ता बहुत ही कटाह है। कम—से— कम यह दोषारोपण तो न रहेगा कि मैंने कुत्ता निकालकर बदल दिया है। यह भूल गये कि इससे चोर के डाढ़ी में तिनका का आभास हो सकता है। चाहे कोई कितना भी कुछ कहे मैं एक ही बात कहूँगा कि आपने यही कुत्ता बुक किया था। परसा बाजार पार हो रहा था‚ अगला स्टेशन पटना जंक्शन है। वहीं कुत्ते को उतारना है। गार्ड साहब का कलेजा मुँह को आ रहा था। हजारों दफ़े बजरंग बली से इस संकट को हरने के लिए आमंत्रित कर चुके थे। उनके इस परिश्रम दान के लिए सवा सेर ताज़ा पेड़ा तय कर चुका था। उससे अधिक भी चाहिए तो पूरा करने को तैयार थे; किन्तु इस विपत्ति से उबार दे। 

सुबह के साढ़े चार बजे गाड़ी पटना जंक्शन पर खड़ी हुई। प्लेटफार्म पर पीछे की तरफ़ की दो—चार बिजली बत्तियाँ नहीं जल रही थी। गार्ड साहब ने दरवाज़े से आकर झाँका टोनी अर्धनिंद्र की दशा में चला आ रहा था। गार्ड साहब को फ़ौरन एक उपाए सुझी, उसने अंदर की बत्ती गुल कर दी, जिससे डब्बे में अंधेरा हो गया। उसने पार्सल कुलियों से कहा कि एस. एल. आर. की बत्ती ख़राब हो गयी है। तुमलोग अंदर न जाओ। सुना‚ कुत्ता पागल हो गया है। पागल कुत्ते का काटा आदमी को यमराज भी नहीं बचा सकते। अभी तत्काल कुछ नहीं भी हुआ तो बाद में असर दिखता है। मेरे बगल में एक लड़के को पागल कुत्ता काटा था। उस समय कुछ नहीं हुआ; किन्तु छः महिना बाद कुत्तों की तरह भोंकना शुरू किया, धीरे—धीरे उसके पूरे शरीर में ज़हर फैल गया और कुछ ही दिनों में उसकी कष्टदायक मृत्यु हो गयी। बेचारा भोंकते—भोंकते पागल होकर मर गया। डॉक्टर इलाज करते रहे पर कुछ असर न हुआ। गार्ड साहब के बातों का उन कुलियों पर गहरा असर पड़ा। किसी की हिम्मत न पड़ी कि दराज़ के पास जाए। तबतक टोनी भी आ पहुँचे। गार्ड साहब की छाती धड़—धड़ कर रही थी। पता न अगले पल क्या होता। भेद खूल गया तो यहाँ खड़े कुली मेरा मज़ाक़ उड़ाएँगे। ये लोग यहाँ खड़ा क्या कर रहे है, जाकर अपना काम क्यों नहीं करते ? अकेले दो—चार थप्पड़ खा भी लूँ, या हाथा—बाई भी हो जाए तो कोई बेइज़्ज़ती की बात नहीं। बात अपने तक ही सीमित रह जाएगी। मगर इनलोगों के सामने तो मेरा पानी उतर जाएगा। जो लोग मुझसे रौब खाते हैं, कल से हेय दृष्टि से देखेंगे, बात—बात में मेरी खिल्ली उड़ाएँगे। हे बजरंगबली ! अब मेरी इज़्ज़त आपके हाथों में है। मेरा उद्धार कीजिए; मेरी डूबती नैया को पार लगाइये‚ हे संकटमोचन ! गार्ड साहब उन्हीं ख़यालों में डूबे थे कि विलियम आकर बिल्टी के काग़ज़ उनके हाथ में थमा दिया और बाहर से आती हल्की रौशनी में जाकर दराज़ उठाया। दराज़ का पल्ला कड़ा होने से नहीं उठ रहा था। विलियम अपनी यौवन और बलिष्टा का अपमान समझे और दराज़ को जोर से ऊपर की तरफ़ खींचा, पूरा पल्ला दराज़ से निकलकर उनके हाथों में आ गया। इतने में उस आवारा कुत्ता को भागने का मौक़ा मिल गया। आधी रात से उस छोटे दरबे में बंद निकलने की कोई युगति न देख हिम्मत हारे बैठा था। दराज़ खुलते ही उसके शरीर में शक्ति का सोता खुल गया हो, मानों अपने जीवन का सारा बल, सारी शक्ति लगा दिया हो। निकलते ही इतना तेज़ भागा की सभी खड़े ताकते रह गये, वह देखते—ही—देखते आँखों से ओझल हो गया। विलियम शेरू, शेरू पुकारते रहा; किन्तु वह एक न सुना, नौ—दौ ग्यारह हो गया। विलियम अपना हैट पकड़े हुए जिधर वह भागा था‚ उधर ही दौड़ा।

गार्ड साहब की आंतरिक ख़ुशी का ठिकाना न था। एकदम बेबाक बच निकले। यहाँ किसी को कुछ पता भी न चल पाया। इनके अंदर आनन्द और उन्माद की लहर उमड़ पड़ी। जान बची तो लाखों पाये। एक बजे रात से ही उनके मन पर एक भारी बोझ और बेचैनी थी उससे वह उबर गये। उनके सर पर लटकती हुई नंगी तलवार हमेशा के लिए टल गयी। 

जब पूरब में लाली छाने लगी, पूर्वा पवन से बदन में ताज़गी और स्फूर्ति पैदा हो रही थी। गार्ड साहब गाड़ी की समरी आँफिस में सौप कर स्टेशन के बाहर स्थित चिर सुप्रसिद्ध हनुमान जी के मंदिर की ओर चले। मन में भक्ति और श्रद्धा का ऐसा समुद्र कभी न उमड़ा था। आज उन्हें ईश्वर की उपस्थिति और दया का पूर्ण साक्षात्कार हुआ था। इससे भी स्पष्ट सिद्धि क्या हो सकता है?


Hindi Story: Buking ka Kutta by Dharmendra Kumar Singh

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