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गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

भारतीय साहित्य में पर्यावरण विमर्श पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी


कोडुंगल्लूर: 5-6 दिसंबर 2019: पर्यावरण प्रदूषण या पर्यावरण में मानव के हस्तक्षेपों के कारण आजकल जो प्राकृतिक विपत्तियाँ दुनिया भर में हो रही हैं, इनसे हम सब वाकिफ़ हैं। पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का समय बीतता जा रहा है। युवा वर्ग इस गंभीर समस्या के प्रति सचेत नज़र आते हैं। भारत इस विषय में गहराई से सोच रहा हैं तथा अपना ठोस कदम उठाने का प्रयास रहा है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ तथा ‘प्लास्टिक मुक्त भारत अभियान’ जैसे कायक्रमों से दुनिया में भारत का महत्व बहुत बढ़ा है। इस माहौल में भारतीय साहित्य में पर्यावरण की चेतना पर विचार-विमर्श के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के आर्थिक सहयोग से केरल के त्रिश्शूर जिले स्थित एम.ई.एस. अस्माबी कॉलेज में दो दिवसीय अंतर-राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। 

संगोष्ठी का उद्घाटन एम.ई.एस. अस्माबी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अजिम्स पी. मुहम्मद की अध्यक्षता में हुआ। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि आज की ज्वलंत समस्याओं में पर्यावरण की समस्या भी एक है, जिस ओर हमें तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। भारतीय साहित्य में पर्यावरणीय चेतना भरपूर है, जिस पर संगोष्ठी में अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए पधारे विद्वानों से उन्होंने अपेक्षा की कि वे इस विचार-मंथन के साथ-साथ इस समस्या के लिए समाधान भी निकालें। एथोपिया के अरबा मिंच विश्वविद्यालय के अंग्रेजी प्रोफ़ेसर एवं विख्यात हिंदी लेखक डॉ. गोपाल शर्मा ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि साहित्यकार प्राय: प्रकृति प्रेमी होते हैं और यह स्वाभाविक है कि उनकी की रचनाओं में प्रकृति और पर्यावरण सायास और अनायास आ ही जाते हैं। यह सुनते ही आप सीधे वेदों तक जा पहुंचेंगे और कहेंगे – हाँ, यह तो है। पाश्चात्य जगत में विद्वान सीधे आदम और ईव की ‘गार्डेन ऑफ एडेन’ की कथा तक चले जाते हैं जहाँ ये दोनों प्रकृति का दोहन करते हैं और होमर के महाकाव्य ओडिसीस में योद्धा प्रकृति और पर्यावरण को रौंदते चले जाते हैं। भारतीय भी रामायण के रचयिता वाल्मीकि के ‘मा निषाद’ आदि को याद करते हैं। हिंदू धर्म ही नहीं प्रायः सभी धर्मों में पर्यावरण चिंता और चिंतन कई संदर्भों में देखा सकता है। ईकोक्रिटिसिज़्म की परिभाषा, ईकोक्रिटिसिज़्म की विकास-यात्रा, ईकोफ़ेमिनिज़्म, ईको-लिंग्विस्टिक्स अवधारणाओं के विकास पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए साहित्य में उसकी अभिव्यक्ति तथा समीक्षा के द्वारा उसकी पड़ताल जरूरी है जिसके लिए पर्यावरण चेतना से आगे जाकर और प्रकृति चित्रण से बेहतरीन पर्यावरण विमर्श के माध्यम से एकोक्रिटिस्म को एक स्वतंत्र विधा के रूप में अपनाना होगा। अपने बीज भाषण कोच्चिन विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय अध्यक्ष एवं हिंदी विभाग की आचार्या डॉ. के वनजा ने किया था। वैदिक युग से समकालीन युग तक की रचनाओं में चित्रित पर्यावरण विमर्श पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जनसरोकारों से जुड़े ऐसे सामाजिक विषयों पर विमर्श होने पर जो अमृत की बूंद निकलेगी वह आनेवाले मानव पीढ़ी को तो अवश्य ही जिलायेगी और वर्तमान पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करने में सहायक होगी। 

केंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. परमान सिंह जी ने अपने भाषण में कहा कि पर्यावरण के संबंध में समुचित चिंतन का अभाव, विचारहीन विकास की योजनाएँ आदि पर्यावरण को धीमी गति से मृत्यु की ओर ले जाने जैसी हैं। अब हमें अपनी राह बदलने का और हमारे प्राकृतिक सौंदर्य को बचाने की ओर कदम बढ़ाने का वक्त आ गया है। एम.ई.एस. अस्माबी कॉलेज की प्रबंधन समिति के सचिव सलीम अरक्कल, श्रीमती रीना मुहम्मद, डॉ के.पी. सुमेधन, डॉ.के. संजीव कुमार, डॉ. रंजित एम. आदि ने उद्धाटन सत्र को संबोधित किया। 

इस संगोष्ठी में पर्यावरण विमर्श संबंधी प्रमुख मुद्दों पर कुल आठ सत्रों में विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के शिक्षकों, शोधार्थियों ने अपने शोध-पत्रों का वाचन किया। क्रमशः सत्रों की अध्यक्षता कालिकट विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. प्रमोद कोवप्रत, डॉ.वी.के. सुब्रह्मण्यन, डॉ. परमन सिंह, डॉ. पी. गीता, डॉ. मोळी जोसफ़, नार्थ बंगाल विश्वविद्यालय की आचार्या डॉ. मनीषा झा, पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने की। इस संगोष्ठी में छत्तीसगढ़ के डॉ. राजेश कुमार मानस डॉ. आर.पी. टंडन, चेन्नई की डॉ. सुनीता जाजोदिया, केरल के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षकों और शोधार्थियों ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। इस संगोष्ठी में महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित कुल चालीस प्रपत्र प्रस्तुत किए गए। साथ ही, पर्यावरण की समस्याओं के लिए कई समाधान भी सुझाए गए

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