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गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

दया प्रकाश सिन्हा के नाटकों का संग्रह 'नाट्य-समग्र' (तीन खण्डों में) का लोकार्पण


नयी दिल्ली: 11 दिसम्बर 2019, सायं 4:00 बजे: वाणी प्रकाशन एवं संस्कार भारती के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ नाटककार दया प्रकाश सिन्हा के नाटकों का संग्रह 'नाट्य-समग्र' (तीन खण्डों में) का लोकार्पण आज साहित्य अकादेमी सभागार प्रथम तल, रवीन्द्र भवन, कोपरनिकस मार्ग, मण्डी हाउस, नयी दिल्ली में आयोजित हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। श्री प्रहलाद सिंह पटेल, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार, कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रीमती मृदुला सिन्हा, प्रतिष्ठित साहित्यकार व भूतपूर्व राज्यपाल, गोवा ने की व वक्तव्य प्रो. चन्दन कुमार, हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, श्री देवेंद्र राज अंकुर, पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने दिया। 

चन्दन कुमार ने कहा कि दया प्रकाश जी को इतिहास परेशान करता है। इतिहास और सत्ता को समझने की चिन्ता है। यह भारतीय जिजीविषा का पर्याय है। यह भारतीय होने का पर्याय उनके नाटकों में देखा जा सकता है। बालमन, इतिहासबोध, उनके नाटकों में है। दया प्रकाश सिन्हा ने कहा कि मैं एक लक्ष्य लेकर चला हूँ और वह है- नाटक नाटक नाटक। मैंने जो नाटक लिखे, मुझे पता नहीं था कि वे स्वीकार होंगे। पर यह अनायास ही स्वीकार कर लिए गए और आज उनपर पर्याप्त शोध और अनुवाद हो रहे हैं। नाटक में आदमी अपने क़द में दिखायी पड़ता है। अभिनेता और दर्शकों का सीधा परिचय दिखता है। फ़िल्मों में बड़ा और टेलीविज़न में छोटा।देवेन्द्र राज अंकुर ने कहा कि ‘अशोक’ नाटक की भूमिका मैंने लिखी लिखी है। ‘कथा एक कंस की’ का नाट्य केन्द्र राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पूर्व इलाहाबाद में स्थापित होता है। मुख्य अतिथि प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि दुनिया पहले से है आज शुरू नहीं हुई। अपने बचपन के दिनों को याद कर गाँव की नाट्य-समिति को याद किया। उन्होंने कि कहा नाटक एक जीवन्त व्यवस्था है, दिशा भी देती है। समाज के निर्माण और संस्कृति के बारे में सोचना होगा कि इसके साथ हम न्याय कर रहें हैं या नहीं? चयन-प्रक्रिया पर जब सवाल करते हैं तो चयन कौन कर रहा है? इस पर विचार करना चाहिए। 'श्रेष्ठता' पर बातचीत होनी चाहिए। मंचस्थ विद्वान तय करें। 

कार्यक्रम की अध्यक्ष मृदुला सिन्हा ने कहा उत्सव-पुरुष दया प्रकाश सिन्हा भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था के कारण मैं उम्र में छोटी होने के कारण भाई (दया) जी के दीर्घायु की कामना करती हूँ। लोभ मेरे अंदर से कहीं जाता नहीं है। ‘‘जीयो तो भइया लाख बरस...’’ लाख-बरस जीना तो सम्भव नहीं है पर उनका यश-कीर्ति लाख बरस जीये। यही कामना करती हूँ। प्रह्लाद जी का भाषण साहित्यकार और नाटककार का भाषण था। ‘‘संग चलें जब तीन पीढ़ियाँ विकास चले संग-संग’’ संस्कार भारती-भारतीय संस्कृति को समायोजित किए हुए है। नाटक एक ऐसी विधा है जिसे हम अकेले नहीं देखते। सामूहिकता की यह विधा नाटक ही है जो हमें आपस में जोड़ती है। ‘‘सीता की आत्मकथा’’ पर प्रश्न किए जाने पर मैंने कहा कि मैं ही ‘‘सीता’’ हूँ। भारतीय संस्कृति में पत्नी, बहन आदि रूप को स्वयं जीया। वर्तमान की परिस्थितियों को निजात दिलाने के लिए पात्रों का चयन करते हैं। लिखते हैं। जीते हैं। निर्देशन हैं। दया प्रकाश सिन्हा इतिहास को वर्तमान में खोजते हैं। पुस्तक को पढें। नाटकों का मंचन देखें जो कि आनंददायक होता है। ‘‘इतिहास को वर्तमान में प्रस्तुत कर दिखाया है।’ संस्कार भारती के अध्यक्ष राजेश जैन चेतन ने कहा कि जहाँ दया प्रकाश सिन्हा को लिख दिया व संस्कार भारती समझो लिख दिया

वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया व श्रोताओं को वाणी प्रकाशन समूह का विस्तृत परिचय दिया।


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