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रविवार, 23 अगस्त 2020

इन्द्रेश भदौरिया की कुण्डलियाँ

इन्द्रेश भदौरिया

मृदुभाषी, विनम्र एवं प्रसन्नचित्त साहित्यकार इन्द्र बहादुर सिंह भदौरिया (उपनाम- इन्द्रेश भदौरिया) का जन्म 24 दिसंबर 1954 को ग्राम- मोहम्मद मऊ, पोस्ट- कठवारा, जिला- रायबरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। जन-सामान्य में प्रचलित शब्दों एवं मुहावरों को लोकधर्मी काव्य में परिणित करने की कला में निष्णात इन्द्रेश जी का अवधी साहित्य— 'बसि यहै मड़इया है हमारि' (2010), 'गजब कै अँधेरिया है' (2015), 'कुलटा चरित हास्य भण्डारा' (2015) एवं 'बुढ़उनूँ चुप्पी साधौ' (2017, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से दिसंबर 2018 में 'पण्डित वंशीधर शुक्ल पुरस्कार' से पुरस्कृत) समकालीन सरोकारों को बड़ी बेबाकी से मुखरित करता प्रतीत होता है। इस दृष्टि से अवधी भाषा-साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में दया, प्रेम, करुणा, आस्था एवं अहिंसा का पावन सन्देश देने वाले भदौरिया जी का नाम आ. बलभद्र प्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस', गुरु प्रसाद सिंह 'मृगेश', वंशीधर शुक्ल, रमई काका, द्वारिका प्रसाद मिश्र, बेकल उत्साही, पारस भ्रमर, विकल गोंडवी, आद्या प्रसाद 'उन्मत्त', जगदीश पीयूष आदि विशिष्ट रचनाकारों की सूची में बड़े सम्मान के साथ जोड़ा जा सकता है।

वैसे तो इन्द्रेश भदौरिया का नाम देश के श्रेष्ठ कुण्डलियाकारों की सूची में भी जोड़ा जा सकता है (ख्यात कुण्डलियाकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला पहले ही 'कुण्डलिया छंद के नये शिखर' संकलन में इंद्रेश जी की कुण्डलियों को स्थान देकर निश्चित ही सराहनीय कार्य कर चुके हैं)। जोड़ा जाना भी चाहिए। परन्तु, 'चाहिए' कहने भर से काम कहाँ चल पाता है? अक्सर देखने में आया है कि हमारे देश के गांव-जंवार में रहने वाले तमाम साहित्यकारों के रचनाकर्म से साहित्य समाज उस प्रकार से परिचित नहीं हो पाता, जिस प्रकार से होना चाहिए। इसीलिये ऐसे तमाम साहित्यकारों की सर्जना न तो साहित्य की मुख्य धारा में आ पाती है और न ही उस पर चर्चा-परिचर्चा, संकलन, शोध आदि ही हो पाते हैं। कई बार तो अच्छी पत्रिकाएँ भी उन्हें स्पेस नहीं दे पातीं। इसके पीछे कारण कई हो सकते हैं, होने भी चाहिए। परन्तु, बात तब तक नहीं बनेगी जब तक इन समस्याओं का निराकरण नहीं होता और अच्छे रचनाकारों को जानने-समझने का माहौल नहीं बनता। इसके लिए हम सब को सकारात्मक सोच तो रखनी ही होगी, संगठित होकर सहयोगात्मक कार्य भी करने पड़ेंगे। 

आने वाले समय में क्या होगा, क्या नहीं, यह तो समय ही बतलायेगा, किन्तु यहाँ इस रचनाकार के आगामी कुण्डलिया संग्रह— 'कुण्डलियाँ सुमन' के लिए उसे बधाई तो दी ही जा सकती है।

(1)

काली - दुर्गा - शारदा, लक्ष्मी नाम अनेक।
धन, वैभव, सुख, सम्पदा, दाता बुद्धि -विवेक।
दाता बुद्धि - विवेक, भक्त की रक्षा करती।
हरती जन के क्लेश, सभी की झोली भरती।
कह कविवर इन्द्रेश, सर्वे सुख देने वाली।
रक्षा सबकी करो, मातु हे दुर्गा - काली।।

(2)

अटल सत्य है बात ये, होता कर्म स्वतन्त्र।
और बात ये भी सही, फल होता परतन्त्र।
फल होता परतन्त्र, कर्म से इसका नाता।
कर्मों के अनुसार, देत है सुफल विधाता।
कह कविवर इन्द्रेश, आपका सुघर कृत्य है।
फल भी सुन्दर मिले, बात ये अटल सत्य है।।

(3)

अहंकार है रोग इक, रहिए इससे दूर।
घुट घुट मरने के लिए, करता है मजबूर।
करता है मजबूर, लोग लगते हैं कटने।
टूटे कुल परिवार, स्वजन लगते हैं बँटने।
कह कविवर इन्द्रेश, बड़ा अति ये विकार है।
आये कौन समीप, पास यदि अहंकार है।।

(4)

अपने जब देते हमें, प्रेम और सम्मान।
मिलती खुशी अपार है, होता मन अभिमान।
होता मन अभिमान, धरा पर नहीं निरर्थक।
होता है अहसास, हो रहा जीवन सार्थक।
कह कविवर इन्द्रेश, सुघर आते हैं सपने।
मिलता सुक्ख अथाह, प्रेम से मिलते अपने।।

(5)

आया है सो जायगा, बात सभी लें जान।
यही श्रष्टि का है नियम, विधि का यही विधान।
विधि का यही विधान, मृत्यु का दिन जब आता।
राजा हो या रंक, एक ही सम हो जाता।
कह कविवर इन्द्रेश छोड़कर अपनी काया।
जाता है यम धाम, धरा पर जो भी आया।।

(6)

आयेगा वह दौड़कर, भाग्य अगर अनुकूल।
आया भी जाये चला, अगर समय प्रतिकूल।
अगर समय प्रतिकूल, जान ईश्वर की लीला।
राई बने पहाड़, बना दे पर्वत ढीला।
कह कविवर इन्द्रेश, कर्म फल पा जायेगा।
होगी चिन्ता दूर, समय अच्छा आयेगा।।

(7)

आतंकी बन कर रहे सबसे बड़ा गुनाह।
मानव के चिथड़े उड़ें कर नहिं पायें आह।
कर नहिं पायें आह, अरे सोचो गद्दारों।
जो प्राणी निर्दोष, उन्हें तुम क्योंकर मारो।
कह कविवर इन्द्रेश, छोड़ दो ये नौटंकी।
वरना यह सरकार, मार देगी आतंकी।।

(8)

आज उपेक्षित जगत में, है किन्नर समुदाय।
सोचो होते आप भी, करते कौन उपाय।
करते कौन उपाय, पीटना पड़ता ताली।
घर घर लेते नेग, घरैया नहिं घरवाली।
कह कविवर इन्द्रेश, ईश की देन सुपेक्षित।
हैं इज्ज़त के पात्र, न समझें आज उपेक्षित।।

(9)

इनमें उनमें फर्क क्या, कौन ढंग बेढंग।
इत है देशी सभ्यता, उधर विदेशी रंग।
उधर विदेशी रंग, बने देशी परदेशी।
पहन विदेशी वस्त्र, घूमतीं कैसे देशी।
कह कविवर इन्द्रेश, प्रदर्शन अंगक जिनमें।
देश और परदेश, फर्क क्या इनमें उनमें।।

(10)

ईश्वर की लीला अजब, समझ न पाये कोय।
देता सबको है सजा, जैसी करनी होय।
जैसी करनी होय, कर्म यदि अच्छे करते।
होते हैं शुभ कर्म, क्लेश नहिं पास विचरते।
कह कविवर इन्द्रेश, ढहा दें दुख का टीला।
भोगें सुक्ख अथाह, अजब ईश्वर की लीला।।

(11)

ऐसा आयेगा दिवस, सबसे नाता तोड़।
जायेंगे यम धाम को, देंह धरा पर छोंड़।
देंह धरा पर छोंड़, और यश अपयश सारे।
काम क्रोध मद लोभ, कर्म दुष्कर्म हमारे।
रहकर इस संसार, करो तुम चाहे जैसा।
पड़ता कुछ नहिं फर्क, सभी संग होता ऐसा।।

(12)

कपटी साथ न कीजिए, होता है अति तीत।
या के छल प्रपंच से, जीत न पइहो मीत।
जीत न पइहो मीत, बात यह सच्ची जानो।
खुद छानेगा माल, फँसायी तुमका मानो।
कह कविवर इन्द्रेश, चूस लेगा ज्यों चपटी।
करिये नहिं विश्वास, मिले यदि कबहूँ कपटी।।

(13)

कथनी - करनी एक हो, जरा न होवे फर्क।
पारदर्शिता हो जहाँ, कैसा तर्क - वितर्क।
कैसा तर्क - वितर्क, काम सुन्दर सब कीजै।
हो सबका कल्याण, सोच अपने मन लीजै।
कह कविवर इन्द्रेश, सदा सुख पायें धरनी।
चलो समय के साथ, एक हो कथनी - करनी।।

(14)

काला धन है पास यदि, करदो उसको दूर।
बनके रोग असाध्य यह, करता चकनाचूर।
करता चकनाचूर, कलह घर में फैलावे।
रोग दोष बढ़ जाय, राग रंग मन नहिं भावे।
कह कविवर इन्द्रेश, काम सब करिये आला।
देउ तुरन्त हटाय, होय घर में धन काला।।

(15)

काया से तो बहुत कुछ, करते हैं सब लोग।
मेरी एक सलाह है, करो निरंतर योग।
करो निरंतर योग, रोज तुम शाम सबेरे।
होगा स्वस्थ शरीर, कष्ट नहिं अइहैं नेरे।
कह कविवर इन्द्रेश, समझ में मेरी आया।
देती अति आनन्द, निरोगी यदि है काया।।

(16)

कीजै नहीं घमण्ड को, करो स्वयं पर गर्व।
सुन्दर मितभाषी बनो, आदर करिहैं सर्व।
आदर करिहैं सर्व, रखो मन में संतोषा।
करते रहो सुकर्म, ईश पर करो भरोसा।
कह कविवर इन्द्रेश, नाम नित प्रभु का लीजै।
करके पर उपकार जन्म निज स्वारथ कीजै।।

(17)

कुचियाये हैं बाग में, जामुन महुआ आम।
सब बृक्षों में फूल हैं, शोभा ललित ललाम।
शोभा ललित ललाम, देख के छटा निराली।
कोयल रही है कूक, डोलती डाली - डाली।
कह कविवर इन्द्रेश, वसन्ती ऋतु मन भाये।
तन मन ब्यापा हर्ष, देख बिरवा कुचियाये।।

(18)

कंचन काया धारणी लगती बहुत हसीन।
होंठ तुम्हारे हैं मधुर, और नयन नमकीन।
और नयन नमकीन, चढ़ी यौवन की मस्ती।
देखत होवें पस्त, बड़ी हो कितनी हस्ती।
कह कविवर इन्द्रेश, समझ में इतना आया।
होता मन प्रशन्न, देखकर कोमल काया।।

(19)

खामोशी अच्छी नहीं, तोड़ दीजिए मौन।
जो हैं पत्थर फेंकते, वे हत्यारे कौन।
वे हत्यारे कौन, मारकर उन्हें भगायें।
देवें गोली मार, उन्हें जमपुर पहुँचायें।
कह कविवर इन्द्रेश, मार दो जैसे पक्षी।
सीमा रक्षक हेतु, नहीं खामोशी अच्छी।।

(20)

गन्दा जल गन्दी हवा, दूषित भोजन खाय।
मानव रोगी बन रहा, ताकर करो उपाय।
ताकर करो उपाय, सैकड़ों बृक्ष लगाओ।
स्वच्छ हवा शुभ नीर, बदन को सबल बनाओ।
कह कविवर इन्द्रेश, दुखद रोगों का फन्दा।
होगा गर्दन बीच, रखा यदि घर को गन्दा।।

(21)

गोली खाकर आप हित, रहते सीना तान।
सीमा के रक्षक सभी, होते बहुत महान।
होते बहुत महान, सदा रखते निगरानी।
आन बान नहिं जाय, चहै जाये जिन्दगानी।
कह कविवर इन्द्रेश, समझके हँसी ठिठोली।
देश रहा नहिं चेत, खा रहे रक्षक गोली।।

(22)

गंगा सोहैं शीस पर, और चन्द्रमा भाल।
और गले में नाग है, भोलेनाथ दयाल।
भोलेनाथ दयाल, धतूरा भाँग हैं खाते।
आशुतोष भगवान, सभी हैं शीस झुकाते।
कह कविवर इन्द्रेश, वदन है नंग धड़ंगा।
बाघम्बर मृगछाल, शीस पर बहती गंगा।।

(23)

गंगा मैली नहिं हुई, धो पापी के पाप।
गंगा मैली हो गयी, कारण हैं हम - आप।
कारण हैं हम - आप, नगर का गन्दा पानी।
सब गंगा में जाय, बात ये सबने जानी।
कह कविवर इन्द्रेश, करो अपना मन चंगा।
ऐसे करो उपाय, होय नहिं मैली गंगा।।

(24)

चूल्हा-चौका जगत में, जीवन का आधार।
किन्तु कमाई यदि नहीं, सब कुछ है बेकार।
सब कुछ है बेकार, कर्म फल सबसे आगे।
नित कमाय के खात, बहुत सै लोग अभागे।
कह कविवर इन्द्रेश, देख मत चूको मौका।
करिहौ नहिं जो काम, जले कस चूल्हा-चौका।।

(25)

चन्दा - तारे आदि ग्रह, चमक रहे आकाश।
भू का अंधियारा हरे, बिजली करे प्रकाश।
बिजली करे प्रकाश, सगत्तर चमाचम्म है।
रातोदिन निज काम, करत सब झमाझम्म है।
कह कविवर इन्द्रेश मिटाती जग अंधियारे।
बिजली गर गुल होय, करें क्या चन्दा- तारे।।

(26)

चौराहों पर चल रहा, राजनीति का खेल।
जनता बेचारी रही, है रातोदिन झेल।
है रातोदिन झेल, तानते अपनी अपनी।
करते नींद हराम, छूटती मुँह से हफनी।
कह कविवर इन्द्रेश, गली-कूचे-राहों पर।
मिला स्वार्थ चहुँओर, शहर घर चौराहों पर।।

(27)

छप्पर छानी पेंड़ सब, दिन दिन होंय उछिन्न।
देख तमाशा जगत का, मन है बहुतै खिन्न।
मन है बहुतै खिन्न, कहाँ अब रहैं चिरैया।
हुए नदारद गिद्ध, हुई कम हैं गौरैया।
कह कविवर इन्द्रेश, आज की यही कहानी।
पक्के सब घर द्वार, बहुत कम.छप्पर छानी।।

(28)

छोटे कभी न जानिए, कर्ज शत्रु अरु रोग।
पास नहीं आयें कभी, कर ऐसा संयोग।
कर ऐसा संयोग, अगर पल्ले पड़ जायें।
ऐसा करें प्रयत्न, दूर जल्दी हो जायें।
कह कविवर इन्द्रेश, होत हैं प्रतिदिन मोटे।
करते बुद्धि विनष्ट, समझिये इन्हें न छोटे।।

(29)

जग में पूरक हैं सभी, इक दूजे के जीव।
जगत नियन्ता ने किया, सुन्दर काम अतीव।
सुन्दर काम अतीव, छोट बड़ सब बेचारे।
होते सब आहार, एक दूजे के प्यारे।
कह कविवर इन्द्रेश, भटकते हो क्यों मग में।
जन आधारित श्रृष्टि, बनाया विधि ने जग में।।

(30)

जननी जनती कोख से, सुचि सुन्दर संतान।
ममता की समता नहीं, माँ का चरित महान।
माँ का चरित महान, नित्य निज दूध पिलाती।
करती सुत उपकार, स्वयं भूँखी सो जाती।
कह कविवर इन्द्रेश, बची ज्यों चोकर छलनी।
रूखा - सूखा खाय, खुशी रहती है जननी।।

(31)

जाके हृदय विवेक है, जानत है सब कोय।
सास-ससुर, माता-पिता, से बढ़कर नहिं कोय।
से बढ़कर नहिं कोय, लोग जो करते सेवा।
साँची रहे बताय, वही सब खाते मेवा।
कह कविवर इन्द्रेश, देंह मानव की पाके।
करते पर उपकार, भाव भक्ती है जाके।।

(32)

जानो अपने गाँव को, बहुत बड़ा सुख धाम।
बरगद पीपल छाँव है, महुआ जामुन आम।
महुआ जामुन आम, दूध घी की अधिकाई।
लहलहात सब खेत, हवा बहती सुखदाई।
कह कविवर इन्द्रेश, बात यह हमरी मानो।
गाँवन मा है स्वर्ग, नर्क शहरों को जानो।।

(33)

जिन्दा में सुख न मिला, आगे जानें राम।
किन्तु कमायें सुयश को, करके सुन्दर काम।
करके सुन्दर काम, नाम रोशन कर जायें।
याद करें सबलोग, युगों तक जाने जायें।
कह कविवर इन्द्रेश, कभी नहिं हों शर्मिंदा।
मरके रहता नाम, सदा हम रहते जिन्दा।।

(34)

जिनको अति प्यारा लगे, मान और सम्मान।
करते नहीं हैं भूलकर, दूजे का अपमान।
दूजे का अपमान, सभी का आदर करते।
लेंय सुमति से काम, कुमति पर पैर न धरते।
कह कविवर इन्द्रेश, कर रहे वन्दन उनको।
अपनी संस्कृति और, सभ्यता प्यारी जिनको।।

(35)

जीवन एक अमूल्य निधि, जब यम लेंगे लूट।
काया ही रह जायगी, प्राण जांयगे छूट।
प्राण जांयगे छूट, आप हैं नर तन धारी।
करें समय उपयोग, काम कीजै गुणकारी।
कह कविवर इन्द्रेश, सत्य बोले ज्यों दरपन।
करो परम उपकार, सफल हो जाये जीवन।।

(36)

जो आया सो जायगा, राजा हो यि रंक।
यही सत्य है जगत का, जानो इसे निशंक।
जानो इसे निशंक, किन्तु है लगता सपना।
हुआ पराया आज, रहा जो अबतक अपना।
कह कविवर इन्द्रेश, छोड़कर ममता माया।
चिन्ता है बेकार, जायगा जो है आया।।

(37)

झण्डे में हैं तीन रंग, हरा स्वेत अरु लाल।
और बीच में चक्र है, अरि समाज का काल।
अरि समाज का काल, हरा साहस दर्शाता।
हृदय हमारा साफ, स्वेत सबको बतलाता।
कह कविवर इन्द्रेश, सुशोभित है डण्डे में।
केशरिया बलिदान, बताता है झण्डे में।।

(38)

माता, बहना, भार्या, बेटी, पोती, नेक।
साली, सलहज, सासु माँ, नारी रूप अनेक।
नारी रूप अनेक, कि चाची, दादी, नानी।
नातिन और भतीजि, बहू, दिवरानि, जिठानी।
कह कविवर इन्द्रेश, विश्व जिसके गुण गाता।
सर्वोपरि सब नारि, कहाती जग में माता।

(39)

भाई अब कलिकाल में, समझदार सब कोय।
हानि-लाभ जीवन-मरण, सब पर भारी होय।
सब पर भारी होय, समझ कर काम है करना।
सुख दुःख जाओ झेल, कभी ना इनसे डरना।
कह कविवर इन्द्रेश, इसी में है कुशलाई।
सोच समझ कर सभी, काम करना तुम भाई।

(40)

अवढर दानी जानकर, विनय करौं कर जोरि।
पार्वती गणपति सहित, अब सुधि लीजो मोरि।
अब सुधि लीजो मोरि, दुखों से मोहि उबारो।
विनवत बारम्बार, दया करि मोहि निहारो।
कह कविवर इन्द्रेश, सुनो प्रभुवर मम बानी।
मो पर होउ सहाय, आप हो अवढर दानी।। 

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