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गुरुवार, 17 सितंबर 2020

हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता — अवनीश सिंह चौहान


आज भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम देशों, यथा— मारीशस, फिजी, गुयाना, सूरीनाम, नेपाल, भूटान, फ़्रांस, जर्मनी, चीन, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड आदि में हिंदी को सहज रूप से अंगीकार किया जा चुका है। इसका परिणाम यह हुआ कि आज दुनिया के तमाम लोग बिना किसी भाषा-द्वेष के देवनागरी लिपि में हिंदी को सुन-समझ रहे हैं और बोलने के साथ लिख-पढ़ रहे है; विभिन्न संस्थाओं में इसके शिक्षण-प्रशिक्षण, अनुवाद और शोध आदि से सम्बंधित अकादमिक कार्य भी किये जा रहे हैं। यद्यपि आश्चर्य की बात यह है कि विश्वपटल पर हिंदी भाषा एवं साहित्य के पहले से अधिक सशक्त होने के बावजूद भी हम हिंदी के भविष्य को लेकर सर्वदा चिंतित रहते हैं। हमारी यह चिंता नयी नहीं है— इसका अपना इतिहास है और इतिहास तो हमेशा रहता है और जो नहीं रहता है वह है वर्तमान। वर्तमान इतना व्यापक एवं विशिष्ट है कि अंतरजाल (इंटरनेट) के विस्तार से अब हिंदी भाषा वैश्विक जनमानस की हो गयी है— इसलिए इसे अब किसी शासनादेश रूपी समर्थन या अहिंदी भाषियों की स्वीकृति की प्रतीक्षा नहीं है। हो सकता है कि तमाम विचारक गंगा की अविरल धारा की तरह सतत प्रवहमान हिंदी की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट न हों, किन्तु उनकी संतुष्टि हिंदी का लक्ष्य तो नहीं हो सकती? 

डॉ अवनीश सिंह चौहान 
प्रोफेसर 
बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, बरेली

A Note about Hindi published in Amar Ujala (Bareilly) on 16 Sep 2020

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